ये मेरी पहली लव स्टोरी होने वाली है इसलिए थोड़ी बहुत गलती हुई तो माफ़ करिएगा और फोलो भी कर लिजिए 100% फोलो बैंक मिलेगा।
सुबह की हल्की धूप खिड़की के पर्दों से छनकर कमरे में फैल रही थी रसोई से बर्तनों की आवाज़ और मसालों की खुशबू पूरे घर में घुल चुकी थी। घर के बाकी लोग अभी अपने-अपने कमरों में थे, लेकिन रवीना काफी पहले उठ चुकी थी।
रवीना ने चुपचाप चूल्हे पर रखा दूध उतारा और आटा गूंथते हुए अपने चेहरे से पसीने की बूंदें पोंछ लीं… उसके चेहरे पर थकान थी, पर आदत भी थी। जैसे ये सब उसके जीवन का हिस्सा बन चुका हो।
तभी पीछे से एक तीखी आवाज़ आई—
माँ- “इतना आटा क्यों गूंथ रही हो , खुद के लिए ही बना रही हो क्या?”
रवीना के हाथ एक पल को रुक गए उसने धीरे से सिर झुका लिया
रवीना- “नहीं माँ सबके लिए ही बना रही हूँ”
माँ- “हूँ सबके लिए पर खाती तो तुम ही सबसे ज़्यादा हो शरीर देखा है अपना…?”
ये शब्द जैसे हवा में नहीं, सीधे रवीना के दिल पर लगे… उसने कुछ नहीं कहा। बस चुपचाप आटा गूंथती रही। उसके अंदर कहीं हल्की सी टीस उठी लेकिन उसने उसे दबा दिया जैसे हर दिन दबा देती थी।
उसे बुरा लगता था बहुत बुरा पर वो किसी से कहती नहीं थी। बस चुप रहना उसने सीख लिया था
तभी कमरे से उसके पिता बाहर आए—
राकेश- “अरे रवीना, चाय बनी क्या…?”
रवीना ने तुरंत मुस्कुराकर जवाब दिया—
रवीना- “जी पापा, अभी लाई…”
राकेश ने उसकी तरफ देखा… उसकी आँखों में थकान और एक अनकही उदासी थी, जो शायद सिर्फ एक पिता ही समझ सकता था।
राकेश- “अपने लिए भी बना लेना… और नाश्ता अच्छे से करना…”
रवीना हल्के से मुस्कुरा दी… जैसे उस एक वाक्य ने उसके मन पर लगी चोट को थोड़ा सहला दिया हो।
तभी उसकी छोटी बहन काजल भी आ गई—
काजल- “दीदी, मैं मदद कर दूँ…?”
रवीना- “नहीं, तुम बैठो… मैं कर लूंगी…”
काजल ने माँ की तरफ देखा… फिर रवीना की तरफ… वो सब समझती थी, पर हर बार कुछ कह नहीं पाती थी।
कुछ देर बाद सब लोग खाने की मेज़ पर बैठे थे… रवीना सबको परोस रही थी। जब उसने अपने लिए रोटी उठानी चाही, तभी माँ ने फिर से टोका—
माँ- “बस दो ही लेना… ज्यादा मत खाना…”
रवीना के हाथ फिर से ठहर गए… उसने बिना कुछ बोले सिर्फ दो रोटियाँ अपनी प्लेट में रख लीं।
उसका पेट शायद इससे नहीं भरता था… पर आदत पड़ चुकी थी।
…
कुछ देर बाद, स्कूल जाने का समय हो गया। रवीना ने अपना बैग उठाया और दरवाज़े की ओर बढ़ी।
राकेश- “ध्यान से जाना बेटा…”
काजल- “शाम को जल्दी आना दीदी…”
रवीना ने दोनों की तरफ देखकर मुस्कुरा दिया… और बाहर निकल गई।
सड़क पर चलते हुए हवा उसके चेहरे को छू रही थी… जैसे थोड़ी राहत दे रही हो। घर की बातें अभी भी उसके मन में घूम रही थीं… पर उसने गहरी सांस ली और खुद को संभाल लिया।
रवीना जानती थी… दुनिया आसान नहीं है।
पर वो ये भी जानती थी… कि वो बुरी नहीं है।
वो जैसी है… वैसी ही ठीक है।
…
दूसरी तरफ, शहर के एक छोटे से ऑफिस में, तुषार अपनी कुर्सी पर बैठा कंप्यूटर स्क्रीन को देख रहा था… उसकी उंगलियाँ कीबोर्ड पर थीं, पर चल नहीं रही थीं।
उसके चेहरे पर एक अजीब सा डर और झिझक थी… जैसे वो हर काम शुरू करने से पहले ही हार मान लेता हो।
तभी उसके छोटे भाई की आवाज़ फोन पर आई—
भाई- “तुषार, पैसे भेज दिए क्या…?”
तुषार- “हाँ… आज शाम तक भेज दूँगा…”
भाई- “जल्दी करना… हमें जरूरत है…”
फोन कट गया।
तुषार ने धीरे से फोन नीचे रखा… उसकी आँखें कुछ पल के लिए बंद हो गईं।
घर में वो ही कमाने वाला था… पिता रिटायर हो चुके थे… और छोटे भाई-बहन… वो सिर्फ मांगना जानते थे।
कोई उसकी हालत नहीं समझता था कोई ये नहीं देखता था कि वो हर दिन खुद से लड़ रहा है।
तुषार ने फिर से स्क्रीन की तरफ देखा… और धीरे से टाइप करना शुरू किया, उसके अंदर डर था कमजोरी थी पर जिम्मेदारी भी थी और शायद यही जिम्मेदारी उसे हर दिन खड़ा रखती थी।
दोपहर की धूप स्कूल की खिड़कियों से अंदर आकर फर्श पर हल्की-हल्की लकीरें बना रही थी… बच्चों की आवाज़ें, घंटी की धुन और कॉपी-किताबों की सरसराहट से पूरा माहौल जीवंत था।
रवीना अपनी कक्षा में खड़ी थी ब्लैकबोर्ड पर “Computer Basics” लिखते हुए उसकी आवाज़ धीमी लेकिन साफ़ थी।
रवीना- “बच्चों, कंप्यूटर हमारे रोज़ के जीवन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है”
बच्चे ध्यान से उसकी तरफ देख रहे थे कुछ समझ रहे थे, कुछ बस उसकी आवाज़ सुन रहे थे। रवीना पढ़ाते समय अपने सारे दुख जैसे भूल जाती थी यहाँ कोई उसे जज नहीं करता था यहाँ वो सिर्फ “मैम” थी।
क्लास खत्म होने के बाद, रवीना स्टाफ रूम की तरफ बढ़ी जैसे ही उसने दरवाज़ा खोला, सामने से एक मुस्कुराता हुआ चेहरा उसकी तरफ आया—
माही- अरे मैडम जी, आज तो बड़ी जल्दी फ्री हो गईं
रवीना के चेहरे पर हल्की सी मुस्कान आ गई
रवीना- हाँ आज बच्चों ने भी ध्यान से पढ़ लिया
माही हँस पड़ी—
माही- या फिर टीचर इतनी अच्छी है कि बच्चों को ध्यान देना ही पड़ा
रवीना ने हल्के से सिर झुका लिया वो तारीफ सुनकर हमेशा थोड़ा संकोच में आ जाती थी
माही और रवीना साथ में कुर्सी पर बैठ गईं दोनों के बीच एक ऐसी सहजता थी, जैसे शब्दों की ज़रूरत ही न हो।श उनकी दोस्ती बहुत गहरी थी सिर्फ स्कूल की नहीं, दिल की भी
माही हिन्दी की टीचर थी उसकी बातों में एक अपनापन और गर्माहट थी। वो सिर्फ बोलती नहीं थी, समझती भी थी।
माही- “तू ठीक है न रवीना?”
रवीना ने एक पल के लिए उसकी तरफ देखा फिर नजरें झुका लीं
रवीना- हाँ मैं ठीक हूँ
माही ने धीरे से उसका हाथ पकड़ लिया—
माही- मुझसे मत छुपा तेरी आँखें सब बता देती हैं
कुछ पल के लिए खामोशी छा गई रवीना के अंदर दबे हुए शब्द जैसे बाहर आने को बेचैन थे।
रवीना- माँ फिर से सुबह वही सब
उसकी आवाज़ धीमी हो गई
माही ने उसकी बात पूरी होने से पहले ही समझ लिया… उसके चेहरे पर हल्की सी उदासी आ गई।
माही- “कब तक सहती रहेगी तू…?”
रवीना ने हल्की सी मुस्कान दी—
रवीना- आदत हो गई है और क्या कर सकती हूँ
माही- आदत होना और सही होना दोनों अलग चीज़ें हैं रवीना
रवीना ने कुछ नहीं कहा बस चुप रही वो जानती थी माही सही कह रही है पर हर सच को बदल पाना आसान नहीं होता
शाम को स्कूल के बाद, माही और रवीना साथ में बाहर निकलीं… सड़क पर हल्की हवा चल रही थी।
माही- “चल, आज मेरे घर चलते हैं…”
रवीना- “नहीं… देर हो जाएगी…”
माही- “बस थोड़ी देर… बृजेश भी आएगा, तुझे देखकर खुश होगा…”
रवीना ने थोड़ी हिचकिचाहट के बाद हाँ कर दी।
…
माही का घर सादा लेकिन बहुत सुकून भरा था… जैसे वहाँ हर चीज़ में अपनापन बसता हो।
दरवाज़ा खुलते ही माही ने आवाज़ लगाई—
माही- “बृजेश, देखो कौन आया है…”
अंदर से एक शांत और स्नेह भरी आवाज़ आई—
बृजेश- “अरे रवीना जी… आइए, आइए…”
बृजेश एक बड़े पद पर काम करता था, लेकिन उसके व्यवहार में कोई घमंड नहीं था। वो रिलायंस कंपनी में एक अच्छे पद पर था, पर उसकी सादगी ही उसे खास बनाती थी।
रवीना- “नमस्ते…”
बृजेश- “नमस्ते… कैसे हैं आप…?”
रवीना- “जी… ठीक हूँ…”
तीनों साथ में बैठ गए… माही चाय बनाने चली गई।
बृजेश- “माही अक्सर आपके बारे में बताती है… आप बहुत अच्छी टीचर हैं…”
रवीना हल्के से मुस्कुरा दी—
रवीना- “बस… कोशिश करती हूँ…”
कुछ ही देर में माही चाय लेकर आई… तीनों के बीच हल्की-फुल्की बातें होने लगीं।
उस घर में बैठकर रवीना को एक अजीब सा सुकून महसूस हो रहा था… जैसे यहाँ कोई उसे जज नहीं कर रहा… कोई उसे ताने नहीं दे रहा…
माही ने उसकी तरफ देखा… उसकी आँखों में थोड़ी शांति थी, जो शायद बहुत दिनों बाद आई थी।
माही- “देखा… थोड़ा बाहर निकलोगी तो अच्छा लगेगा…”
रवीना ने धीरे से सिर हिला दिया
उसी समय, शहर के दूसरे कोने में, तुषार अपने ऑफिस से निकल रहा था… उसके कदम भारी थे, जैसे हर दिन का बोझ उसके कंधों पर हो।
रास्ते में उसने एक स्कूल के पास से गुजरते हुए बच्चों की हँसी सुनी वो कुछ पल के लिए रुक गया।
उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक आई फिर वो धीरे से आगे बढ़ गया।