प्यार की परीभाषा - 8 Rishav raj द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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प्यार की परीभाषा - 8

तुषार अपने कमरे में खड़ा था। हाथ में प्रेस थी, लेकिन उसका ध्यान कपड़ों पर नहीं, कहीं और भटक रहा था। तभी दरवाज़ा खुला और महेश और सुषेला अंदर आए।

महेश ने सीधे मुद्दे पर आते हुए कहा, “हमें रिश्तेदारों को बुलाने की लिस्ट तैयार करनी होगी। शादी में कोई कमी नहीं रहनी चाहिए।”

तुषार ने बस हल्का सा सिर हिला दिया इतने में सुषेला ने एक कड़वी हँसी के साथ महेश की ओर देखा।

“मैंने सोचा था मेरे बेटे की शादी धूमधाम से होगी कोई खूबसूरत, किसी हीरोइन जैसी बहू आएगी इस घर में लेकिन किस्मत ने सब बर्बाद कर दिया। या फिर किस्मत को क्यों दोष दूँ जब आप खुद इस शादी को करवाने पर तुले हुए हैं।”

उसकी आवाज़ में साफ़ नाराज़गी और तिरस्कार था। इतना कहकर वो मुड़ गई और रसोई की ओर चली गई।

कमरे में कुछ पल के लिए सन्नाटा छा गया।

तुषार के हाथ रुक गए। उसने धीरे से प्रेस बंद की और अपने कमरे की तरफ चला गया।

जैसे ही दरवाज़ा बंद हुआ, उसके अंदर दबा हुआ डर अचानक बाहर आने लगा। उसके हाथ हल्के-हल्के कांपने लगे।

वो बिस्तर पर बैठ गया और अपनी हथेलियाँ गद्दे पर जोर से दबा दीं, जैसे खुद को संभालने की कोशिश कर रहा हो।

“नहीं सोचना बंद करो, तुषार” उसने धीमे से खुद से कहा।

उसने टेबल से पानी की बोतल उठाई और जल्दी-जल्दी पानी पीने लगा, जैसे हर घूंट के साथ अपने डर को निगलना चाहता हो

वो लेट गया और अपनी बांह आँखों पर रख ली लेकिन दिमाग रुकने वाला नहीं था

“बस एक महीना और, तुषार फिर रवीना यहीं होगी इसी कमरे में तुम्हारे साथ तुम उससे वैसे नहीं छिप पाओगे जैसे घरवालों से छिपते हो वो तुम्हें हर पल देखेगी हर बात”
उसके दिल की धड़कन तेज़ हो गई साँसें भारी होने लगीं

“नहीं” वो अचानक उठ बैठा उसने तुरंत बाइक की चाबी उठाई और बिना किसी से कुछ कहे घर से निकल गया कुछ ही देर में वो बीच पर पहुँचा वो रेत पर बैठ गया और सामने लहरों को देखने लगा। लेकिन वहाँ शांति नहीं थी रविवार  था चारों तरफ लोग थे।

कहीं परिवार साथ बैठकर हँस रहे थे कहीं कपल्स पानी में खेल रहे थे, एक-दूसरे का हाथ थामे हुए कुछ लोग एक-दूसरे के कंधे पर सिर रखे चुपचाप बैठे थे बच्चे भागते-दौड़ते, खिलखिलाते हुए इधर-उधर घूम रहे थे।

तुषार ने ये सब देखा और उसके अंदर एक अजीब सी खालीपन की भावना उठी।

उसने नजरें फेर लीं उसके लिए ये सब जैसे किसी और दुनिया की चीज़ थी

समुद्र किनारे बैठा तुषार काफी देर तक लहरों को देखता रहा। धीरे-धीरे आसमान का रंग बदलने लगा, लेकिन उसके भीतर का शोर कम नहीं हुआ।

उसने जेब से मोबाइल निकाला, स्क्रीन जली… फिर बुझ गई। किसी को कॉल करने का मन नहीं हुआ।

कुछ देर बाद उसने गहरी साँस ली और खुद से कहा, “भागने से कुछ नहीं होगा”

वो उठा, रेत झाड़ी और वापस घर की ओर चल पड़ा घर पहुँचा तो माहौल सामान्य था, जैसे कुछ हुआ ही न हो। उसकी माँ रसोई में थी, पायल फोन पर किसी से हँसते हुए बात कर रही थी, और महेश हॉल में बैठे कुछ कागज़ देख रहे थे।

तुषार कुछ पल वहीं खड़ा रहा फिर धीरे-धीरे अपने पिता के पास जाकर खड़ा हो गया।

“अप्पा एक बात करनी थी,” उसकी आवाज़ हल्की थी, लेकिन इस बार वो भाग नहीं रहा था।

महेश ने चश्मा थोड़ा नीचे खिसकाकर उसकी तरफ देखा, “हाँ, बोल।”

तुषार कुछ सेकंड चुप रहा, जैसे शब्द चुन रहा हो।

“शादी क्या हम उसे थोड़ा सिंपल रख सकते हैं?” उसने आखिर कह ही दिया

महेश की भौंहें हल्की सिकुड़ीं, “सिंपल? मतलब?”

“मतलब ज्यादा दिखावा ना हो। बस ज़रूरी रस्में करीबी लोग” तुषार ने धीरे-धीरे कहा।

हॉल में हल्की खामोशी छा गई।

महेश ने उसे ध्यान से देखा, “कोई खास वजह?”

तुषार ने तुरंत नजरें हटा लीं, “बस मुझे ऐसा ही ठीक लगता है”

असल वजह वो बता नहीं पाया वो नहीं बता पाया कि पिछले तीन सालों से वो अपनी सैलरी का एक हिस्सा चुपचाप अलग रख रहा है पायल की शादी के लिए।

वो नहीं बता पाया कि उसे डर है—अगर अभी सब खर्च हो गया, तो बाद में क्या होगा।

और सबसे ज़्यादा वो ये नहीं बता पाया कि उसे खुद पर इतना भरोसा नहीं है कि वो इस शादी को लेकर कोई बड़ा सपना देख सके।

महेश कुछ देर तक चुप बैठे रहे।

फिर उन्होंने कागज़ बंद किए और सीधा होकर बैठ गए।

“शादी जिंदगी में एक ही बार होती है, तुषार। लोग क्या कहेंगे, ये भी देखना पड़ता है,” उनकी आवाज़ सख्त नहीं थी, लेकिन साफ़ थी।

तुषार ने हल्का सा सिर झुका लिया, “जी…”

“लेकिन…” महेश ने आगे कहा, “फालतू का दिखावा मुझे भी पसंद नहीं है। ज़रूरत से ज़्यादा कुछ नहीं करेंगे।”

तुषार ने पहली बार उनकी तरफ देखा।

“पर एक बात याद रखो,” महेश ने जोड़ा, “ये सिर्फ तुम्हारी नहीं, उस लड़की की भी शादी है। उसकी इज़्ज़त में कोई कमी नहीं आनी चाहिए।”

तुषार ने धीरे से सिर हिलाया, “जी, अप्पा।”

बात खत्म हो गई लेकिन उसके अंदर कुछ अभी भी अधूरा था।

वो अपने कमरे में वापस आ गया।

दरवाज़ा बंद करते ही उसकी नजर अलमारी के अंदर रखे एक छोटे से बॉक्स पर गई उसने उसे निकाला खोला अंदर कुछ पैसे और एक छोटी डायरी थी।

डायरी के पहले पेज पर लिखा था— “पायल की शादी”

तुषार कुछ पल उसे देखता रहा फिर धीरे से बॉक्स बंद कर दिया।

“कम से कम एक चीज़ तो ठीक करनी है,” उसने मन ही मन सोचा।

कमरे में फिर से वही खामोशी लौट आई लेकिन इस बार उसमें एक छोटा सा फैसला भी था।