अभी सिया अपनी सिसकियों पर काबू पा ही रही थी कि फार्महाउस के गेट पर सायरन की गूँज और भी तेज हो गई. तभी DGP खुद अपनी सरकारी गाडी से नीचे उतरे, उनके चेहरे पर घबराहट और कबीर के खौफ की लकीरें साफ दिख रही थीं. उन्होंने पीछे मुडकर इशारा किया और दो हट्टे- कट्टे पुलिसवालों ने उस दरिंदे दिग्विजय सिंह को लगभग हवा में लटकाते हुए बाहर निकाला.
DGP ने खुद आगे बढकर, कबीर के सामने झुकते हुए, उस कातिल को कबीर के जूतों के पास झटके से पटक दिया. DGP की थरथराती आवाज गूँजी, मेहरा साहब, ये रहा आपका मुजरिम. जैसा आपने कहा था, इसके साम्राज्य का सूर्यास्त हो चुका है और ये अब आपके पैरों में है। कबीर ने एक ठंडी नजर DGP पर डाली जिससे साफ था कि कबीर के सामने वर्दी की धमक भी फीकी है। फार्महाउस के अहाते में बने उस पुराने शिव मंदिर की सीढियों पर आज जैसे कुदरत खुद न्याय का गवाह बनने आई थी. मूसलाधार बारिश कबीर मेहरा और सिया
के बीच के उस भारी तनाव को धोने में नाकामयाब हो रही थी. कबीर अपनी उसी शाही और अटूट अकड में खडा था, उसकी सफेद सिल्क की शर्ट बारिश में भीगकर उसके कसरती शरीर से चिपक गई थी, लेकिन उसके चेहरे पर वही' मेहरा खानदान' वाला पुराना अहंकार और रुतबा साफ झलक रहा था.
उसे आज अपनी ताकत पर नाज था कि उसने सिया के भाई के कातिल को नर्क के दरवाजे से भी ढूँढ निकाला है. उसके जूतों के ठीक पास, कीचड और खून में सना हुआ वह दरिंदा पडा था—ठाकुर दिग्विजय सिंह. वह आदमी जो कल तक लखनऊ की सडकों पर मौत का तांडव करता था, आज कबीर मेहरा की सत्ता के नीचे एक लाचार कीडे की तरह रेंग रहा था. कबीर ने एक सिगार सुलगाया और धुएं को बारिश की बूंदों के बीच बेपरवाही से उडाते हुए सिया की तरफ देखा.
" ये रहा वो जानवर, सिया! आज ये तुम्हारे सामने बेडियों में है. इसका साम्राज्य, इसका पैसा, इसका घमंड. सब मैंने एक घंटे में राख कर दिया है. अब तुम तय करो कि इसके साथ क्या करना है, कबीर की आवाज में सत्ता की वो खनक थी जो किसी को भी झुकाने के लिए काफी थी. सिया, जो अब तक मंदिर के खंभे का सहारा लिए अपनी सिसकियों को रोकने की नाकाम कोशिश कर रही थी, धीरे- धीरे अपनी जगह से उठी.
उसकी आँखों में वो मंजर दोबारा जीवित हो गया जब उसका भाई आर्यन इसी दिग्विजय की गाडी के नीचे तडप- तडप कर अपनी आखिरी साँसें ले रहा था. सिया के कदम दिग्विजय की तरफ बढे, जो अब जमीन पर पडा अपनी जान की भीख माँग रहा था। बेटी. रहम कर. मुझसे गलती हो गई. जो कहेगी वो करूँगा, दिग्विजय ने कांपते हाथों से सिया के पैर पकडने की कोशिश की. जैसे ही' बेटी' शब्द सिया के कानों से टकराया, उसके भीतर का बरसों पुराना लावा फट पडा.
उसने अपनी पूरी नफरत अपनी हथेली में समेटी और दिग्विजय के चेहरे पर एक जोरदार तमाचा जडा—' चटाख! थप्पड की वह गूँज पूरे अहाते में बिजली की कडक से भी तेज और खौफनाक सुनाई दी. दिग्विजय का चेहरा एक तरफ झटक गया और उसके मुंह से खून की एक लकीर बह निकली. कबीर खामोश खडा अपनी गहरी और ठंडी नजरों से ये सब देख रहा था.
उसे पहली बार अहसास हुआ कि जिसे वह एक' साधारण लडकी' समझ रहा था, उसके भीतर कितनी ज्वाला छिपी है. सिया ने दिग्विजय का कॉलर पकडकर उसे ऊपर की ओर झकझोर दिया. बेटी मत कह मुझे! मेरी रूह कांप जाती है तेरे जैसे दरिंदे के मुंह से ये पवित्र शब्द सुनकर. ये थप्पड उस माँ के लिए है जिसका तूने बुढापा अंधेरा कर दिया! जिसने अपने जवान बेटे की लाश को सडक पर लावारिस पडे देखा था, जबकि तू अपनी दौलत का जश्न मना रहा था!
दिग्विजय अभी संभल भी नहीं पाया था कि सिया ने दूसरा थप्पड उसके दूसरे गाल पर दे मारा—' चटाख! और ये थप्पड मेरे भाई आर्यन के लिए! जिसकी आँखों में हजारों सपने थे, जिसे तूने अपनी तेज गाडी के नीचे किसी कीडे की तरह कुचल दिया! बता मुझे. क्या बिगाडा था उसने तेरा? सिर्फ इसलिए उसे मार दिया क्योंकि उसने तेरे जैसे गुंडे के खिलाफ सच बोलने की हिम्मत की थी? सिया का गला रुंध गया था, लेकिन उसके हाथ नहीं रुके. वहां मौजूद कमिश्नर और कमांडो की रूह भी कांप गई.
सिया पीछे मुडी और वहां खडे पुलिस कमिश्नर की तरफ देखा. उसकी आवाज में एक अजीब सी शक्ति थी. कमिश्नर साहब, ये आदमी और इसके सारे गुनाहों के सबूत अब आपके हवाले हैं. इसे ऐसी कालकोठरी में सडाना जहाँ इसे सूरज की रोशनी भी नसीब न हो. इसे मारना मेरे भाई के नाम पर धब्बा होगा, इसे कानून के हाथों तिल- तिल कर मरने दो। कमिश्नर ने तुरंत कबीर की तरफ देखा. कबीर की आँखों में वही पुराना' मेहरा' वाला अंदाज था, उसने हल्के से गर्दन झुकाकर इशारा किया कि जो सिया ने कहा है, वही अब कानून है.
पुलिस वाले दिग्विजय को कुत्तों की तरह घसीटते हुए गाडी की तरफ ले गए. जब गाडियों का सायरन दूर हो गया, तो सन्नाटे में सिर्फ बारिश का शोर बचा था. सिया धीरे से कबीर के पास आई. कबीर को लगा कि शायद अब सिया उसे गले लगा लेगी या माफी माँगेगी,
लेकिन सिया ने अपनी सूजी हुई आँखों से सीधे कबीर की आँखों में झांका. मेरे भाई के कातिल को उसके अंजाम तक पहुँचाने के लिए. थैंक यू, Mister मेहरा. आज आर्यन की आत्मा को पहली बार शांति मिलेगी.
कबीर के चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कान आने ही वाली थी कि सिया ने अपनी बात पूरी की, लेकिन ये मत समझिएगा कि इस एक अहसान से मैं वो सब भूल गई जो आपने मुझसे कहा था. आपने मुझ पर शक किया, मेरे चरित्र को अपनी दौलत से तौला. मेरा भाई चला गया, इंसाफ मिल गया, पर कबीर मेहरा की नजरों में मेरा जो अपमान हुआ, उसका हिसाब अभी बाकी है.
कबीर कुछ कहना चाहता था, लेकिन उसकी अकड उसके शब्दों के बीच दीवार बनकर खडी हो गई. सिया वहां से मुडी और दौडते हुए फार्महाउस के अंदर चली गई. वह सीधे गायत्री दादी के कमरे में पहुँची, जहाँ दादी ईश्वर से प्रार्थना कर रही थीं. जैसे ही सिया ने दादी को देखा, उसका सारा बांध टूट गया.
वह दौडकर दादी के चरणों में गिर गई और उनके आंचल में अपना सिर छिपाकर फूट- फूटकर रोने लगी. दादी. आर्यन को इंसाफ मिल गया. मेरा भाई अब सुकून से सो पाएगा. दादी की आँखों से भी आँसू बहने लगे. उन्होंने सिया के भीगे हुए बालों को सहलाया और उसे अपनी ममता के आंचल में समेट लिया.
बाहर बरामदे में खडा कबीर, खिडकी से ये नजारा देख रहा था. उसने सिया को उसका कातिल तो दे दिया था, लेकिन शायद उसने सिया का भरोसा हमेशा के लिए खो दिया था.
आज के इस अध्याय ने हमें सिखाया कि सत्य की राह कितनी भी कठिन क्यों न हो, न्याय जरूर मिलता है. सिया ने अपने भाई के कातिल को धूल चटा दी, लेकिन कबीर के शक ने जो जख्म दिया है, वह अब भी हरा है. कबीर की शक्ति काम तो आई, पर क्या वह सिया का दिल दोबारा जीत पाएगा?
क्या कबीर अब अपना अहंकार छोड पाएगा?
दादी का प्यार क्या सिया को इस घर में रोक पाएगा?
क्या आप कबीर के इस' एटीट्यूड' वाले इंसाफ से खुश हैं?
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