Episode -10 (अचानक से)
प्रिया, रिया को वह रहस्यमयी खत देकर कमरे से बाहर निकल चुकी थी। उधर मंडप में सन्नाटा था, जिसे पंडित जी की भारी आवाज़ ने तोड़ा।
"मुहूर्त का समय निकला जा रहा है, कन्या को शीघ्र बुलाइए!" पंडित जी के माथे पर चिंता की लकीरें थीं। उनकी बात सुनकर रिया के पिता, मिस्टर दीक्षित, थोड़े असहज हो गए। उन्होंने अपनी पत्नी की ओर देखते हुए हड़बड़ी में कहा, "जाओ, जल्दी से रिया को लेकर आओ, शुभ मुहूर्त बीता जा रहा है।"
रिया की माँ कमरे की ओर बढ़ीं, जहाँ रास्ते में उन्हें प्रिया खड़ी दिखी। उन्होंने इशारों में प्रिया से पूछा कि रिया कहाँ है और वह उसे साथ लेकर क्यों नहीं आई? प्रिया ने बहुत सहजता से जवाब दिया, "बस आती ही होगी आंटी, उसने मुझसे कहा था कि तू चल, मैं पीछे से अभी आती हूँ।"
प्रिया की बात सुनकर सब थोड़ी देर और रुके, पर समय रेत की तरह फिसलता जा रहा था। पंडित जी ने फिर अपना स्वर ऊंचा किया, "अरे भाई! आखिर कन्या कहाँ रह गई? मुहूर्त निकला जा रहा है!" अब मिस्टर दीक्षित की पत्नी की चिंता बढ़ गई। वह लगभग दौड़ते हुए रिया के कमरे में दाखिल हुईं, पर वहाँ का नज़ारा देखकर उनके होश उड़ गए।
"रिया... ओ रिया! बेटा कहाँ है तू? बाहर सब तेरा इंतज़ार कर रहे हैं!" उन्होंने कमरे का कोना-कोना देख लिया, अलमारी के पीछे झाँका, आवाज़ें लगाईं, पर वहाँ सिर्फ एक डरावनी खामोशी थी। बेतहाशा भागती हुई वह वापस मिस्टर दीक्षित के पास पहुँची और घबराहट में बुरी तरह हाँफते हुए बोलीं, "रिया अपने कमरे में नहीं है जी!"
मिस्टर दीक्षित सन्न रह गए। हज़ारों मेहमानों के सामने उनके चेहरे का रंग सफेद पड़ गया। वह बौखलाते हुए बोले, "क्या कह रही हो? ठीक से देखा भी है या बस ऊपर-ऊपर से देख आई?"
रिया की माँ ने सिसकते हुए, थोड़े गुस्से में कहा, "हाँ! मैंने सब जगह देख लिया है, उसे आवाज़ें भी लगाईं, पर वह कहीं नहीं है।"
मिस्टर दीक्षित पत्थर के हो गए। हज़ारों मेहमानों और दूल्हे के सामने उनकी इज़्ज़त दांव पर थी। उनके मन में बस एक ही सवाल कौंध रहा था— "आखिर कहाँ गई होगी यह लड़की?"
वर्तमान...
अस्पताल के उस ठंडे बिस्तर पर लेटी रिया अपनी उन्हीं पुरानी यादों की परछाइयों में खोई हुई थी। तभी नर्स डेजी ने कमरे में प्रवेश किया और ऊँची आवाज़ में उसे झकझोरा, "सुनो! दवा लो, तुम्हारे दवा लेने का समय हो गया है।"
रिया ने भारी पलकें खोलीं। उसे पल भर के लिए लगा मानो उसकी माँ उसे आवाज़ दे रही हो, पर सामने नर्स डेजी की सख्त सूरत देख उसकी आँखों में उदासी छा गई। उसने बिना कुछ कहे, बेजान तरीके से दवा निगल ली। नर्स डेजी के जाने के बाद रिया फिर से बिस्तर पर लेटी ही थी कि अचानक पूरे कमरे की बत्ती गुल हो गई।
धड़ाम! कमरे का भारी दरवाज़ा एक तेज़ आवाज़ के साथ अपने आप बंद हो गया। रिया झटके से बिस्तर से उठी और एक कोने में जाकर खड़ी हो गई। उस घने काले अंधेरे में रिया का डर चरम पर था। कमरे का तापमान अचानक गिरने लगा, मानो किसी ने बर्फ का दरवाज़ा खोल दिया हो। रिया को ठंड लगने लगी, उसे महसूस हुआ जैसे कोई बर्फीली, ठंडी हवा उसके पास से गुज़र रही हो।
उस घने अंधेरे में उसे कुछ दिखाई नहीं दे रहा था। वह थर-थर कांपते हुए पीछे हटने लगी, तभी वह किसी ठोस चीज़ से टकरा गई और उसके गले से एक चीख निकल गई। उसी समय डॉक्टर खुराना वहाँ से गुज़र रहे थे। रिया की दर्दनाक चीख सुनते ही वह कमरे की ओर लपके।
"दरवाज़ा खोलो! अंदर कौन है?" डॉक्टर खुराना ने दरवाज़ा पीटना शुरू किया।
अंदर से रिया की डूबती हुई आवाज़ आई, "बचाओ... बचाओ..."
डॉक्टर खुराना ने पूरी ताकत लगाकर दरवाज़ा तोड़ने की कोशिश की, तभी वहाँ डॉक्टर सिन्हा भी आ गए। डॉक्टर खुराना को इस हाल में देख वह घबराकर बोले, "क्या हुआ खुराना?"
डॉक्टर खुराना ने हाँफते हुए कहा, "अंदर से किसी लड़की के चीखने की आवाज़ आई है, दरवाज़ा अंदर से बंद है!"
दोनों ने मिलकर दरवाज़े पर ज़ोरदार धक्का दिया। अचानक अंदर से आवाज़ें आना बंद हो गईं। सन्नाटा और भी गहरा गया। एक आखिरी प्रहार के साथ दरवाज़े की कुंडी टूट गई। जैसे ही बत्ती जलाई गई, नज़ारा खौफनाक था। रिया बिस्तर के पास फर्श पर बेहोश पड़ी थी और उसके सिर के पास खून का एक बड़ा धब्बा फैल रहा था।
डॉक्टर सिन्हा उसे उठाने के लिए दौड़े। गौर से देखने पर पता चला कि खून उसके सिर से नहीं, बल्कि पैर की चोट से बह रहा था, जो फिर से ताज़ी हो गई थी। खून देख डॉक्टर सिन्हा के हाथ-पांव फूल गए। उन्होंने जल्दी से रिया को उठाकर बिस्तर पर लिटाया।
उसी समय डॉक्टर खुराना की नज़र खिड़की की ओर गई। उन्हें एक नकाबपोश साया तेज़ी से बाहर भागता हुआ दिखाई दिया। डॉक्टर खुराना ने उसका पीछा किया और अस्पताल के अहाते में उसे दबोच लिया। वह उसका हाथ पकड़कर नकाब हटाने ही वाले थे कि उस नकाबपोश ने उन्हें ज़ोरदार धक्का दिया और भाग निकला।
पीछा करने की कोशिश में डॉक्टर खुराना का पैर फिसल गया और वह वहीं गिर पड़े। पर उस हाथापाई में नकाबपोश के हाथ की घड़ी ज़मीन पर गिर गई थी। डॉक्टर खुराना ने जैसे ही वह घड़ी उठाई, उनके चेहरे का रंग सफेद पड़ गया। वह उस घड़ी को अच्छी तरह पहचानते थे। उनके माथे पर पसीना आ गया और वह गहरी सोच में डूब गए। वह घड़ी किसी ऐसे शख्स की थी जिसके बारे में वह सोच भी नहीं सकते थे।
वापस कमरे में, डॉक्टर सिन्हा रिया का इलाज कर रहे थे, पर उनका दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था। वह सोच रहे थे, "अगर उसे (मास्कमैन को) पता चला कि रिया पर फिर से हमला हुआ है, तो वह मुझे ज़िंदा नहीं छोड़ेगा।" पसीने की बूंदें उनके माथे से टपक रही थीं।
वह रिया के होश में आने का इंतज़ार कर ही रहे थे कि तभी भारी कदमों की आहट हुई। मास्कमैन कमरे में दाखिल हुआ। बिस्तर पर बेहोश पड़ी रिया को देख उसका गुस्सा ज्वालामुखी की तरह फट पड़ा। वह बिजली की गति से आगे बढ़ा और डॉक्टर सिन्हा का गला अपने फौलादी हाथों से दबोच लिया।
डॉक्टर सिन्हा की साँसें अटकने लगीं। "वह... वह ठीक है!" उन्होंने किसी तरह शब्द निकाले।
मास्कमैन ने उसे झटके से छोड़ दिया और रिया के चेहरे की ओर देखते हुए गरज कर पूछा— "तुम्हारे रहते हुए यह सब कैसे हुआ? किसने हिम्मत की उसे छूने की?"
प्रिय पाठकों, उम्मीद है आपको आज का अध्याय - अचानक से पसंद आया होगा। कौन था वो नकाबपोश क्या डॉक्टर खुराना उसका पर्दाफाश कर देंगे या कुछ अनहोनी होगी? जानने के लिए बने रहे। कहानी पसंद आए तो रेटिंग जरूर करें। अपना सुझाव कॉमेंट में जरूर बताएं।