Episode -8 (अतीत की अनकही यादें)
रिया के मन में द्वंद्व चल रहा था। "क्या सच में रूहें होती हैं? मैं तो इन सब पर विश्वास नहीं करती।" वह खुद से ही तर्क-वितर्क कर रही थी, पर एक बात उसे भीतर ही भीतर काट रही थी—आखिर उसे हुआ क्या है? उसे सच जानना था।
वह धीरे से बेड से उतरी। पैर की चोट के कारण उसे चलने में असहनीय पीड़ा हो रही थी, पर सच जानने की तड़प उस शारीरिक दर्द से कहीं बड़ी थी।
दीवारों का सहारा लेते हुए वह लड़खड़ाते कदमों से कमरे के बाहर आई। पास ही एक कर्मचारी गमले में छोटा सा पौधा रोप रहा था।
रिया ने उससे डॉक्टर सिन्हा के केबिन का रास्ता पूछा और किसी तरह वहाँ तक पहुँच गई।
केबिन के बंद दरवाज़े के पीछे से डॉक्टर सिन्हा और नर्स डेजी की फुसफुसाहट सुनाई दे रही थी। वे दीवार पर लिखी किसी 'धमकी' के बारे में गंभीर चर्चा कर रहे थे।
रिया ने कांपते हाथों से दरवाज़ा खटखटाया। अंदर से डॉक्टर सिन्हा की भारी आवाज़ आई, "कौन है?"
"मैं हूँ... क्या मैं अंदर आ सकती हूँ?" रिया ने सधे हुए स्वर में पूछा।
अंदर जाते ही रिया की आँखें फटी की फटी रह गईं। डॉक्टर सिन्हा अपनी कुर्सी के पास अकेले खड़े थे, जबकि कुछ ही पल पहले उसने नर्स डेजी की आवाज़ साफ़ सुनी थी।
वह हैरान होकर चारों ओर देखने लगी, तभी उसकी नज़र दीवार पर टंगी एक बेहद खूबसूरत पेंटिंग पर पड़ी। वह पेंटिंग इतनी सम्मोहक थी कि रिया क्षण भर के लिए भूल गई कि वह वहाँ किस मकसद से आई थी। वह उस कलाकृति में इस कदर खो गई कि उसे अपनी सुध-बुध न रही।
"तुम्हें आराम करना चाहिए रिया, तुम्हारे पैर में चोट है। तुम यहाँ क्यों आई हो?" डॉक्टर सिन्हा के कड़े सवाल ने उसका ध्यान तोड़ा।
"मुझे... मुझे यह पेंटिंग बहुत अच्छी लगी," रिया ने मंत्रमुग्ध होकर कहा।
डॉक्टर सिन्हा ने कड़े स्वर में टोकते हुए कहा, "मैंने तुमसे कुछ पूछा है, पहले उसका जवाब दो।"
रिया को याद आया, "मैं अपनी मेडिकल रिपोर्ट लेने आई थी। मुझे जानना है कि आखिर आप मेरा इलाज किस चीज़ का कर रहे हैं?"
डॉक्टर सिन्हा के चेहरे पर अचानक घबराहट की लकीरें उभर आईं, जिसने रिया के शक को यकीन में बदल दिया। उन्होंने हड़बड़ाते हुए कहा, "देखो तुम, ठीक हो रही हो और जल्द ही तुम्हें अस्पताल से छुट्टी मिल जाएगी। लेकिन अभी तुम जाओ और आराम करो। अगर तुम्हें कुछ चाहिए होगा, तो हम खुद आ जाएंगे, तुम्हें यहाँ आने की ज़रूरत नहीं है।"
तभी रिया की नज़र केबिन के भारी पर्दों के नीचे गई। वहाँ से किसी लड़की के जूतों का किनारा दिख रहा था। वह उन जूतों को अच्छी तरह पहचानती थी—वे उसी नर्स डेजी के थे जो उसका इलाज कर रही थी! 'ये दोनों मुझसे ज़रूर कुछ छिपा रहे हैं,' रिया ने मन ही मन सोचा।
अचानक, उस सुंदर पेंटिंग के भीतर से गाढ़ा लाल रंग रिसता हुआ दिखाई दिया। रिया का दिल ज़ोर से धड़कने लगा। डर के बावजूद उसने साहस जुटाया और उस पेंटिंग को दीवार से उतारने के लिए हाथ बढ़ाया।
"रुको! मैंने कहा न तुम आराम करो!" डॉक्टर सिन्हा ने चिल्लाकर उसे रोका। रिया बिना कुछ कहे, सहमी हुई वापस अपने कमरे की ओर चल दी। पर उसके मन सक की लहर उठ चुकी थी।
उसके जाते ही नर्स डेजी पर्दे के पीछे से बाहर निकली और चिढ़कर बोली, "यह लड़की अब कुछ ज़्यादा ही होशियार बन रही है।" डॉक्टर सिन्हा ने पेंटिंग हटाकर दीवार पर लिखी दूसरी धमकी की ओर देखा और बोले, "शायद इसे याद नहीं है कि इसके साथ क्या हुआ था, इसीलिए यह सब पूछ रही है।"
नर्स डेजी बेबसी से बोली, "अब हम क्या करें? एक तरफ वो मास्कमैन है जो जान से मारने की धमकी देता है, और दूसरी तरफ यह अज्ञात साया जो बस धमकियाँ दिए जा रहा है। हम इस खेल में बुरी तरह फंस गए हैं!"
डॉक्टर सिन्हा अचानक ज़ोर-ज़ोर से हँसने लगे। उनकी हँसी में एक अजीब सा पागलपन था। नर्स डेजी ठिठक गई, "आप ठीक तो हैं डॉक्टर शाहब?"
"हाँ, मैं ठीक हूँ! डरो मत, मैं अभी पागल नहीं हुआ हूँ," डॉक्टर सिन्हा ने अपनी हँसी पर काबू पाते हुए कहा।
उधर अपने कमरे में रिया को अचानक तेज़ हिचकियाँ आने लगीं। उसने पानी का गिलास उठाया, पर वह हाथ से छूटकर बेड के नीचे चला गया। जैसे ही वह गिलास उठाने के लिए झुकी, उसकी नज़र उस कागज़ के टुकड़े पर पड़ी जिसे उसने फाड़कर रखा था। उसे देखते ही उसकी हिचकी रुक गई और वह फिर से अतीत के उन पन्नों में डूब गई जहाँ से यह सब शुरू हुआ था...
कुछ साल पहले...
मिस्टर दीक्षित आर्यन की तलाश में निकले थे, पर कई दिन बीत जाने पर भी कोई खबर नहीं मिली। रिया की माँ का धैर्य जवाब दे रहा था। उन्होंने गुस्से में रिया से कहा, "सब तेरी वजह से हो रहा है! न तू ये सब करती, न आर्यन जाता। भगवान न करे अगर तेरे पापा को कुछ हुआ, तो मैं तुझे कभी माफ नहीं करूँगी।"
रिया का पछतावा अब असहनीय हो चुका था। मां की बातों ने उसे और पछताने के लिए मजबूर कर दिया था।
वह पागलों की तरह शिव मंदिर गई और महादेव के सामने फूट-फूटकर रोने लगी। "हे भोलेनाथ मेरे पापा को सही सलामत घर भेज दो वरना मैं अब जी नहीं पाऊंगी प्लीज़ बाबा!" रिया को रोता देख मंदिर के पुजारी प्रसाद लेकर उसके पास आए "ले बेटी प्रसाद, परेशान मत हो ये महादेव का दरबार है यहां से कोई खाली हाथ नहीं लौटा! जा घर जा सब ठीक होगा।"
जब वह घर लौटी, तो देखा कि उसके पापा वापस आ गए थे। वह उनके गले लग गई, पर मिस्टर दीक्षित की आँखों में एक अजीब सी उदासी थी।
"पापा, आप ठीक तो हैं ना?" रिया ने पूछा।
मिस्टर दीक्षित ने उसका हाथ थामकर भारी आवाज़ में कहा, "रिया... आर्यन अब इस दुनिया में नहीं रहा।"
यह सुनते ही रिया के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। वह चीख पड़ी, "नहीं! ऐसा नहीं हो सकता!" उसके दर्द की कोई सीमा न थी।
नमस्ते प्रिय पाठकों, उम्मीद है आपको आज अध्याय- अतीत की अनकही यादें पसंद आया होगा। क्या रिया खुद को संभाल पाएगी? अब उसके जीवन में क्या नया मोड़ आने वाला है। जानने के लिए बने रहे। अगर कहानी पसंद आए तो रेटिंग जरूर करें। अपना सुझाव कॉमेंट में जरूर बताएं।