हैरानी - Ateet ki Yaadein - 3 vishnupriya pandit द्वारा थ्रिलर में हिंदी पीडीएफ

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हैरानी - Ateet ki Yaadein - 3

अस्पताल की उस ठंडी रोशनी में रिया के हाथ कांप रहे थे। डॉक्टर सिन्हा की पैनी नज़र रिया के हाथ में दबी उस छोटी सी तस्वीर पर टिकी थी। उस तस्वीर में एक मासूम बच्ची पतंग की डोर थामे खड़ी थी। बाहर से देखने वाले के लिए यह महज़ एक कागज़ का टुकड़ा था, पर रिया के लिए यह उसकी रूह का एक हिस्सा था।

डॉक्टर सिन्हा सोच में डूबे थे कि आखिर इस तस्वीर में ऐसा क्या है, तभी नर्स डेजी ने उनकी चुप्पी तोड़ी। "डॉक्टर साहब, इस तस्वीर में तो ऐसा कुछ भी खास नज़र नहीं आ रहा। फिर ये लड़की इसे देख कर इस कदर क्यों टूट गई? इसकी आँखों के ये आँसू... ये दर्द... आखिर किसलिए?"

डॉक्टर सिन्हा ने गहरी सांस ली और धीमी आवाज़ में बोले, "मैं भी इसी उलझन में हूँ। आखिर इस तस्वीर में ऐसा क्या है जो सिर्फ इसे दिखाई दे रहा है और हमें नहीं? यह कोई साधारण याद नहीं है, इसके पीछे कोई बहुत गहरा राज़ छिपा है।"

डॉक्टर सिन्हा दबे पाँव, बहुत धीरे से रिया के बिस्तर की ओर बढ़े। रिया उस तस्वीर को किसी कीमती खज़ाने की तरह घूर रही थी। उसकी पलकें भीगी हुई थीं, पर उसकी रूह इस कमरे में नहीं थी। वह बरसों पीछे, अतीत के उन गलियारों में खो चुकी थी जहाँ से लौटना शायद उसके लिए मुमकिन नहीं था...

कुछ साल पहले की यादें...

रिया अब इक्कीस साल की हो चुकी थी। लंबे और तड़पाने वाले साल बीत चुके थे उस बचपन के दोस्त को बिछड़े हुए। 

इन सालों में रिया ने अपनी दुनिया बदल ली थी। उसने खुद को घर की चारदीवारी में कैद कर लिया था। बाहर की दुनिया, रौनक, दोस्त—सब उसके लिए बेरंग हो चुके थे।

आज भी रिया अपने अंधेरे कमरे में बिस्तर पर लेटी छत को निहार रही थी। तभी अचानक पास के पार्क से बच्चों के खिलखिलाने और शोर मचाने की आवाज़ें उसके कानों में पड़ीं। उन आवाज़ों में एक अजीब सी खनक थी, जो रिया को बरसों पुराने दिनों की याद दिला रही थी।

रिया उठी और घिसटते कदमों से खिड़की के पास जाकर बैठ गई। बाहर बच्चे बेफिक्र होकर दौड़ रहे थे, बिल्कुल वैसे ही जैसे कभी वह अपने दोस्त के साथ दौड़ा करती थी। 

तभी उसकी माँ कमरे में दाखिल हुईं। रिया की ऐसी बेजान हालत देख कर माँ का कलेजा मुँह को आ गया।

"बेटा, पिछले कई सालों से देख रही हूँ, तू जैसे ज़िंदा लाश बन गई है," माँ ने रुंधे गले से कहा। "जब से वह तेरा दोस्त गया है, तू तो जैसे हँसना ही भूल गई है। आखिर उस लड़के में ऐसा क्या है जिसे तू भुला नहीं पा रही? क्या तू अपने जीवन में आगे नहीं बढ़ेगी? देख बेटा, दुनिया में और भी बहुत अच्छे लड़के हैं जिनसे तेरी दोस्ती हो सकती है। तू एक बार इस घर से बाहर निकल कर तो देख, दुनिया कितनी खूबसूरत है!"

रिया खामोश रही, उसकी खामोशी माँ के सब्र का बांध तोड़ रही थी। माँ ने रिया का हाथ पकड़ कर उसे अपनी ओर मोड़ा। "बस कर अब! तेरी यह उदासी मुझसे देखी नहीं जाती। आखिरकार मैं तेरी माँ हूँ, क्या मेरा तुझ पर इतना भी हक नहीं है कि मैं तुझे फिर से खिलखिलाते देख सकूँ? हर माँ चाहती है कि उसका बच्चा कामयाब हो, खुश रहे। क्या वह लड़का तेरे माँ-बाप से भी ज़्यादा ज़रूरी हो गया है? क्या तू हमारे लिए खुश नहीं रह सकती?"

माँ की आँखों से आँसू छलक पड़े। "अगर तेरे मन में कोई बात है, तो बोल बेटा। क्या हम तुझे समझेंगे नहीं? बता तो सही, ऐसी कौन सी बात है जो तुझे अंदर ही अंदर दीमक की तरह खाए जा रही है? क्या तुझे उस लड़के से प्यार हो गया है, जिसकी वजह से तू आज भी वहीं खड़ी है?"

माँ की ममता और उनकी बेबसी ने रिया के भीतर के बांध को तोड़ दिया। उसने बड़ी मासूमियत और दर्द भरी आँखों से माँ को देखा और झपट कर उनके गले लग गई। 

रिया फूट-फूटकर रोने लगी, उसके रोने में बरसों की घुटन और तड़प साफ़ झलक रही थी। बेटी की ऐसी हालत देख माँ भी खुद को नहीं रोक पाईं और दोनों माँ-बेटी एक-दूसरे को पकड़ कर रोने लगीं।

कमरे के बाहर बरामदे में खड़े रिया के पिता, मिस्टर दीक्षित, यह सब देख रहे थे। उनकी आँखों में भी आँसू तैर आए, पर वह एक शब्द भी नहीं बोले और चुपचाप वहाँ से बाहर की ओर चले गए।

माँ ने रिया का सिर सहलाते हुए पूछा, "क्या बात है बेटा, मुझे बता।"

रिया ने सिसकते हुए, कांपते होंठों से सिर्फ एक बात कही— "माँ... उसने मुझे माफी माँगने का मौका भी नहीं दिया!"

वर्तमान...

अस्पताल के कमरे में डॉक्टर सिन्हा ने देखा कि रिया की आँखों से आँसू अब तेज़ी से बह रहे थे। उसने अपनी मुट्ठी में उस तस्वीर को इतनी ज़ोर से भींच लिया कि वह कागज़ बुरी तरह सिकुड़ गया।

"चलो तुम्हारा चेकअप करना है। क्या तुम ठीक हो?" डॉक्टर सिन्हा ने उसे पुकारा।
रिया की ओर से कोई जवाब नहीं आया, जैसे वह किसी और ही दुनिया में हो। 

डॉक्टर सिन्हा ने नर्स डेजी की ओर देख कर कहा, "इसे दस मिनट में तैयार करो और चेकअप के लिए मेरे केबिन में लेकर आओ।"

डॉक्टर सिन्हा वहाँ से चले गए। नर्स डेजी रिया के पास गई और उसके हाथ से वह तस्वीर लेने की कोशिश करने लगी। 

जैसे ही नर्स डेजी ने तस्वीर को छुआ, रिया ने एक भयानक गुस्से के साथ नर्स डेजी की ओर देखा। उसकी आँखें... वे आँखें नहीं थीं, वे तो जैसे सुलगता हुआ लहू थीं। 

नर्स डेजी के पाँव जड़ हो गए। रिया की आँखें एकदम लाल खून की तरह दहक रही थीं, जैसे पानी की जगह आँखों में खून के आँसू भरे हों।

नर्स डेजी बुरी तरह डर गई। वह चीखती हुई केबिन की ओर भागी। केबिन के अंदर अंधेरा था। 
नर्स डेजी ने जैसे ही लाइट जलाई, उसकी रूह कांप गई। सामने डॉक्टर सिन्हा पसीने से भीगे हुए, जड़वत खड़े दीवार की ओर देख रहे थे। नर्स डेजी की नज़र भी उसी ओर गई और वह एक भयानक चीख मारकर बेहोश होकर गिर पड़ी।

बाहर खड़े कर्मचारी चीख सुनकर दौड़े। "डॉक्टर साहब! क्या सब ठीक है?"
"हाँ... हाँ, सब ठीक है! तुम लोग जाओ!" डॉक्टर सिन्हा ने लड़खड़ाती आवाज़ में उन्हें टाला।

डॉक्टर सिन्हा ने नर्स डेजी को होश में लाया। नर्स फिर से चिल्लाने वाली थी कि डॉक्टर 5टुकने उसके मुँह पर हाथ रख दिया। दोनों की फटी हुई नज़रें उसी दीवार पर टिकी थीं... जहाँ मौत का पैगाम लिखा था।

"नमस्ते प्यार पाठको! उम्मीद है कि आपको एक तस्वीर और कई अनकही पुरानी यादें का या नया और रहस्यमई मोड़ पसंद आ रहा होगा। अस्पताल की उस ठंडी रोशनी में रिया के हाथ में दबी वह छोटी सी तस्वीर आखिर किस बड़े राज की तरफ इशारा कर रही है। आगे जानने के लिए साथ बने रहे। अपना प्यार और रेटिंग्स देते रहे। अपना सुझाव कॉमेंट में जरूर बताएं।