हैरानी - Ateet ki Yaadein - 6 vishnupriya pandit द्वारा थ्रिलर में हिंदी पीडीएफ

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हैरानी - Ateet ki Yaadein - 6

Episode -6 (अतीत का साया और एक अनकहा पछतावा)


डॉक्टर सिन्हा और नर्स डेजी जैसे ही आगे बढ़े, गलियारे के धुंधले इलाके में उनके सामने एक भयावह परछाईं उभरी। 

दोनों के कदम वहीं के वहीं जम गए। एक-दूसरे की आँखों में झाँकते हुए उनकी साँसें तेज़ होने लगीं; सीने में धड़कता दिल मानो चीख-चीख कर उन्हें अनहोनी का आभास करा रहा था।

अस्पताल के बाहर की काली सड़क पर पसरा सन्नाटा और वहाँ की धुंधली रोशनी किसी अनिष्ट का संकेत दे रही थी। सर्द हवाएँ जब उनके शरीर को छूकर गुज़रतीं, तो ऐसा लगता मानो कोई उनके कान में फुसफुसा रहा हो— "वो देख रहा है!" 

दोनों ने सहमकर एक-दूसरे को देखा और फिर सामने नज़रें दौड़ाई, तो पाया कि वह परछाईं ओझल हो चुकी थी।

जैसे ही उन्होंने हिम्मत जुटाकर कदम आगे बढ़ाए, अचानक साक्षात 'मास्कमैन' उनके सामने आ खड़ा हुआ। नर्स डेजी के गले से आवाज़ तक न निकली और वह दहशत के मारे वहीं ज़मीन पर गिर पड़ी। 

नर्स डेजी को गिरता देख डॉक्टर सिन्हा का कलेजा मुंह को आ गया; वे पीछे हटने लगे। मास्कमैन उनकी ओर बढ़ने लगा, तो डॉक्टर अपनी जान बचाने के लिए तेज़ी से पीछे मुड़े और रिया के कमरे की ओर भागे।

कमरे के अंधेरे में डॉक्टर सिन्हा की परछाईं देख रिया डर के मारे चीख उठी। उसकी चीख सुनकर अस्पताल के अन्य कर्मचारी, डॉक्टर और नर्सें वहाँ जमा हो गए। डॉक्टर सिन्हा ने कांपते हाथों से कमरे की बत्ती जलाई और हाँफते हुए बोले, "डरो मत तुम... मैं हूँ, तुम्हारा डॉक्टर।"

वहाँ मौजूद लोग एक साथ बोल पड़े, "क्या हुआ डॉक्टर शाहब? यह अचानक ऐसे चीखी क्यों?" डॉक्टर सिन्हा ने पसीना पोंछते हुए बात संभाली, "कुछ नहीं, बस अंधेरे में मुझे देख कर डर गई थी।" 

सब "ओह, अच्छा!" कहकर वापस अपने-अपने स्थानों पर चले गए।

जैसे ही सब गए, रिया ने घबराते हुए डॉक्टर सिन्हा की आँखों में झाँका, "आप लोग चाहते क्या हैं? मुझे यहाँ क्यों रखा गया है? मैं ठीक हूँ, मुझे मेरे घर जाने दीजिए! क्यों कैद कर रखा है मुझे यहाँ?"

रिया की बेबसी देख डॉक्टर सिन्हा ने धीमी आवाज़ में कहा, "मैंने तुम्हें नहीं रोक रखा! 'उसने' रोक रखा है।"

रिया ने तड़प कर पूछा, "किसने?"

डॉक्टर सिन्हा जैसे ही कुछ कहने वाले थे कि अचानक बिजली गुल हो गई। पूरे कमरे में स्याह अंधेरा छा गया। कुछ ही पलों में बत्ती वापस आई, तो रिया की आँखें फटी की फटी रह गईं—डॉक्टर सिन्हा वहाँ से गायब थे! 

दहशत के मारे रिया का दम घुटने लगा; वह भागकर अपने बेड के नीचे छिप गई।

थोड़ी देर बाद, सन्नाटे को चीरती हुई किसी के कदमों की आहट सुनाई दी। रिया ने अपना मुंह हाथ से दबा लिया ताकि उसकी सिसकियाँ बाहर न निकलें। उसके डर की कोई सीमा न थी। बेड के पास किसी के पैर नज़र आए, जो धीरे-धीरे उसकी ओर ही बढ़ रहे थे। वे पैर ठीक उसके पास आकर रुक गए। रिया दूसरी तरफ से निकलने की कोशिश कर ही रही थी कि तभी अचानक किसी ने बेड के नीचे झुककर उसे देखा। रिया की एक चीख निकली और वह वहीं बेहोश हो गई।

जब उसकी आँख खुली, तो उसने खुद को बेड पर लेटा हुआ पाया। उसके पास डॉक्टर सिन्हा और नर्स डेजी खड़े थे। उन्हें देख रिया ने राहत की लंबी साँस ली। वह डॉक्टर सिन्हा से कुछ कहना चाहती थी, पर डॉक्टर ने अपनी उंगली होंठों पर रख कर उसे चुप रहने का इशारा किया।

रिया बोलते-बोलते रुक गई। नर्स डेजी ने उसे ताकते हुए पूछा, "क्या हुआ? बोलो, तुम कुछ कहना चाहती हो?"

रिया ने डॉक्टर सिन्हा की ओर देखा और नज़रें चुराते हुए कहा, "नहीं... कुछ नहीं।"

डॉक्टर सिन्हा चेकअप करने के बाद रिपोर्ट तैयार करने के लिए अपने केबिन में चले गए। 

उनके जाते ही नर्स डेजी का लहज़ा बदल गया। उसने कड़ाई से पूछा, "कुछ याद आया तुम्हें?"

रिया ने अनजान बनते हुए कहा, "क्या?"

नर्स डेजी ने अपने गुस्से को दबाते हुए फुसफुसाकर कहा, "यही कि वो कौन है, जो तुम्हें यहाँ इस हालत में लेकर आया था?"

रिया ने दृढ़ता से कहा, "नहीं, मुझे कुछ याद नहीं।"

गुस्से में पैर पटकती हुई नर्स डेजी कमरे से बाहर चली गई। रिया के मन में शक की लहर दौड़ गई, 'आखिर डॉक्टर सिन्हा ने मुझे बोलने से क्यों रोका? और यह नर्स इतना गुस्सा क्यों है? यहाँ ज़रूर कोई गहरा राज़ है।'

तभी उसकी नज़र पास रखे कागज़ और कलम पर पड़ी। उसने कांपते हाथों से उस कागज़ को उठाया। उसे पढ़ते ही उसकी आँखें भर आईं। उस पर लिखा था: "जब तक मैं तुम्हारे साथ हूँ, तुम्हें कोई नुकसान नहीं पहुँचा सकता। तुम्हें डरने की ज़रूरत नहीं है, रिया।"

रिया ने उस कागज़ का वह हिस्सा फाड़कर अपने पास छिपा लिया। उसे लगा जैसे ये शब्द उसने पहले भी कहीं सुने हैं। उसकी यादें उसे सालों पीछे ले गईं...


कुछ साल पहले...


मिस्टर दीक्षित अपनी बेटी रिया की चुप्पी से बेहद परेशान थे। उन्होंने उसका मन बहलाने के लिए बाहर घूमने की योजना बनाई। वे उत्साह में "रिया... मेरी गुड़िया कहाँ है? देख, मैंने तेरे लिए क्या सोचा है!" कहते हुए उसके कमरे में आए और उसे गले लगाकर बाहर ले आए।

उन्होंने प्यार से कहा, "चल बेटा, हम तीनों कहीं बाहर घूमने चलते हैं।" पर रिया का मन कहीं और ही था; उसने मना कर दिया और वापस कमरे में जाकर दरवाज़ा अंदर से बंद कर लिया। रिया का यह रूखा बर्ताव मिस्टर दीक्षित को चुभ गया।

उन्होंने नाराज़गी में अपनी पत्नी से कहा, "यह सब क्या है? आखिर इस लड़की को चाहिए क्या? अब मुझसे इसका यह व्यवहार बर्दाश्त नहीं होता। जाओ और उसे समझाओ!"

रिया की माँ ने उन्हें शांत किया, "आप नाराज़ मत होइए, मैं बात करती हूँ उससे।"

कुछ देर बाद माँ खाना लेकर रिया के पास गईं। रिया खिड़की पर शून्य में ताक रही थी। माँ उसे खाना खिलाते हुए बोलीं, "बेटा, आज तेरे बर्ताव से तेरे पापा बहुत दुखी हुए हैं।" इतना कहकर माँ चली गईं, पर रिया के कानों में वे शब्द गूंजने लगे जो बरसों पहले उसके एक दोस्त ने कहे थे।

उसे याद आया कि वह कैसे अपने दोस्त से बेवजह रूठ जाया करती थी और वह उसे मनाता था। एक बार उसने पूछा था, "जब तुम जानते हो कि गलती तुम्हारी नहीं है, फिर भी माफी क्यों मांगते हो?"

तब उसके दोस्त ने मुस्कुराकर कहा था, "मैं जानता हूँ मेरी गलती नहीं है, पर मैं तुम्हें दुखी नहीं देख सकता। जब तक मैं तुम्हारे साथ हूँ, तुम्हें कोई दुख नहीं दे सकता।"

रिया ने तब मुंह बनाकर कहा था, "ऐसा क्यों? तुम भी तो मुझसे नाराज़ हो सकते हो!"

वह खिलखिलाकर हंसा था, "मैं जानता हूँ कि अगर मैं नाराज़ हुआ, तो तुम माफी नहीं मांगोगी। और भला मैं तुम्हारी तरह पागल थोड़े ही हूँ जो छोटी-सी बात पर रूठ जाऊं!"

"क्या मैं तुम्हें पागल लगती हूँ?" रिया ने गुस्से में पूछा था।

उसका दोस्त और ज़ोर से हँसा, "लगती नहीं, तुम तो हो ही पागल!"

रिया ने तब गुस्से में कह दिया था, "आज से हमारी दोस्ती खत्म! न मैं खेलूँगी, न बात करूँगी। तुम बहुत गंदे हो, चले जाओ यहाँ से और कभी लौटकर मत आना!"

दोस्त की आँखों में आँसू आ गए थे। उसने भरे गले से कहा था, "रिया, सोच लो... अगर मैं एक बार चला गया, तो कभी वापस नहीं आऊँगा।"

रिया ने अहंकार में कह दिया, "हाँ, मत आना!"

उस दोस्त ने जाते-जाते आखिरी बार कहा था, "समय रहते रिश्तों को बचा लेना चाहिए रिया, वरना कभी-कभी बेवजह की बातों से खूबसूरत रिश्ते टूट जाते हैं। अगर गलती खुद की हो, तो माफी मांगने में देर नहीं करनी चाहिए।"

जब वह सच में चला गया, तब रिया को अपनी गलती का एहसास हुआ। वह उसे पुकारने लगी...

वर्तमान में लौटते ही रिया की आँखों से आँसू बह निकले। वह अपनी उस पुरानी गलती पर आज भी रो रही थी। वह भागकर अपने पापा के पास बगीचे में गई। मिस्टर दीक्षित वहाँ अकेले बैठे उसी पेड़ को देख रहे थे जहाँ बचपन में रिया की पतंगें अटका करती थीं।

रिया उनके पैरों में गिरकर फूट-फूट कर रोने लगी, "पापा, मुझे माफ कर दीजिए!"

मिस्टर दीक्षित ने उसे उठाकर सीने से लगा लिया। रिया सिसकते हुए बोली, "पापा, मुझे बस एक बार उससे मिलना है... प्लीज मिलवा दीजिए।"

"किससे मिलना है बेटा?"

रिया ने कांपती आवाज़ में कहा, "आर्यन से..."

यह नाम सुनते ही मिस्टर दीक्षित ने उसे खुद से दूर किया और गुस्से में बोले, "तेरा दिमाग खराब हो गया है? तू उसके लिए रो रही है जो सालों पहले चला गया? वह तुझे भूल चुका होगा रिया! ग्यारह साल बीत गए हैं, समझ रही है? ग्यारह साल कम नहीं होते किसी को भूलने के लिए।"

रिया की सिसकी निकली, "मैं उसे नहीं भूल पाई, तो वह मुझे कैसे भूल सकता है पापा?"

मिस्टर दीक्षित दंग रह गए। उन्होंने पूछा, "आखिर ऐसा क्या है उस लड़के में जो तू उसे भुला नहीं पा रही?"

रिया सिर झुकाए खड़ी रही। जब पापा ने दबाव डाला, तो उसके मुंह से बस एक शब्द निकला— "पछतावा..."

"पछतावा? कैसा पछतावा रिया? क्या किया है तूने ऐसा?"

रिया बिना कुछ कहे अपने कमरे में भाग गई और तकिए में मुंह छिपाकर आर्यन का नाम पुकारने लगी। उसका दर्द सिर्फ वही जानती थी। वह पछतावा इतना गहरा था कि उसने हँसना और जीना ही छोड़ दिया था।

मिस्टर दीक्षित अपनी पत्नी से बोले, "हमें अब तक लगा कि रिया 'गौरव' के लिए परेशान है, पर वह तो 'आर्यन' के लिए तड़प रही है। हमें पता लगाना होगा कि उस दिन असल में हुआ क्या था और आर्यन अब कहाँ है..."

"नमस्ते प्रिय पाठकों, उम्मीद है आपको आज का यह अध्याय- अतीत का साया और एक अनकहा पछतावा जरूर पसंद आया होगा। अब डॉक्टर सिन्हा का अगला कदम क्या होगा? मिस्टर दीक्षित क्या आर्यन की तलाश शुरू करेंगे ? क्या रिया आर्यन से मिल पाएगी जानने केे लिए बने रहे। अगर कहानी पसंद आए तो रेटिंग जरूर करें। अपनी राय कमेंट में जरूर बताएं।