डर राज बोहरे द्वारा लघुकथा में हिंदी पीडीएफ

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डर

                                                          डर

 

शाम उतर रही थी—धीरे-धीरे, जैसे किसी बूढ़े लेखक की कलम थककर कागज़ पर रेंग रही हो।

दफ्तर की घड़ी ने पाँच बजाए, और दिनेश ने अपनी कुर्सी से उठते हुए एक लंबी साँस ली। वह साँस केवल थकान की नहीं थी—वह वर्षों से जमा एक अदृश्य बोझ की थी, जिसे वह हर शाम अपने साथ घर ले जाता था।

 

फाइलों के ढेर पर एक नज़र डालकर वह मुस्कराया—“कागज़… तुम सच में कितने हल्के हो, और तुम्हारा बोझ कितना भारी…”

 

बाज़ार आज उसे वैसा नहीं लगा, जैसा वह रोज़ देखता था।

हर दुकान एक आईना थी—और हर आईना जैसे उसे ही देख रहा था।

 

किराने की दुकान पर वह रुका। दुकानदार ने उसे देखा—उस नज़र में आदर कम, अर्थ अधिक था।“आइए साहब,” उसने कहा, “अब तो भाव आप ही तय करते हैं… हम तो बस नाम के व्यापारी हैं।”

 

दिनेश चौंका। “मैं?” उसकी आवाज़ में विस्मय था, जैसे कोई बच्चा पहली बार अपना नाम सुन रहा हो।

दुकानदार ने होंठों पर व्यंग्य की रेखा खींची—“हाँ साहब… कागज़ों में जो लिखा जाता है, वही तो सच होता है न?”

यह वाक्य हवा में तैर गया—और दिनेश के भीतर कहीं धँस गया।

फल वाले के पास पहुँचा तो उसने विदेशी फलों की चमकदार परत के नीचे एक और सच्चाई देखी।

“साहब,” फल वाला बोला, “यह अनानास… थोड़ा महँगा है, पर आपकी पहुँच से बाहर नहीं।”

दिनेश ने पूछा—“और जो आम आदमी है?”

फल वाला हँसा—“उसके लिए तो देशी फल ही ठीक हैं… जैसे उसके लिए देशी सच।”

दिनेश ने महसूस किया—आज हर शब्द एक तीर है, और हर तीर उसी की ओर छोड़ा गया है।

सब्ज़ी वाले ने तो जैसे अंतिम प्रहार किया— “साहब, आप हिसाब मत कीजिए… हम अपने मन से काट लेंगे।”

“मन से?” दिनेश के होंठ काँपे—

“या… आदत से?”

**

घर में प्रवेश करते ही उसे लगा—यह वही घर है, पर इसकी दीवारें आज कुछ अधिक सुन रही हैं।

प्रभा ने चाय रखी, पर उसकी आँखों में प्रश्न थे—गहरे, अनकहे।

“आपके दफ्तर की बातें अब बाहर आ गई हैं,” उसने कहा।

दिनेश चुप रहा।

“कहते हैं,” प्रभा आगे बोली, “कि सौ रुपये की चीज़ सौ बीस में खरीदी गई… और कागज़ पर सब सही लिखा गया।”

दिनेश ने सिर झुका लिया— “कागज़ पर लिखा सच… और सच में लिखा झूठ… दोनों में फर्क कौन देखता है, प्रभा?”

प्रभा की आँखें भर आईं— “अदालत देखती है… या भगवान।”

**

अगले दिन दफ्तर एक रंगमंच था— और सभी पात्र अपने-अपने भय का अभिनय कर रहे थे।

सफारी सूट पहने अधिकारी—जैसे न्याय के दूत नहीं, बल्कि प्रश्नों के शिकारी हों।

“दिनेश!” एक आवाज़ गूंजी।

“जी…”

“सारे कागज़ लाओ।”

“पर—”

“कोई ‘पर’ नहीं। कागज़ बोलेंगे।”

दिनेश ने अलमारी खोली। हर फाइल जैसे एक जीवित प्राणी थी—जिसकी आँखों में आरोप थे।

कागज़ निकलते गए— और सच, कहीं भीतर दबता गया।

**

जब निलंबन का आदेश आया, तो वह कोई विस्फोट नहीं था— वह एक धीमा ध्वंस था, जो भीतर ही भीतर सब कुछ गिरा देता है।

आधी तनख्वाह… आधा सम्मान… और लगभग पूरा जीवन अधर में।

बच्चों की हँसी धीमी पड़ गई।

प्रभा की आँखों में स्थायी नमी बस गई।

दिनेश ने एक रात कहा— “शायद गलती मेरी थी… कि मैंने कभी सवाल नहीं पूछे।”

प्रभा ने उत्तर दिया—“और शायद गलती व्यवस्था की थी… कि उसने कभी जवाब नहीं दिए।”

**

पाँच वर्ष—

समय ने दिनेश को भीतर से खोखला कर दिया, पर तोड़ा नहीं।

अदालत मे फैसले का दिन आया।

जज ने फाइलें देखीं—जैसे इतिहास के पन्ने पलट रहे हों।

“अभियोजन पक्ष यह सिद्ध नहीं कर सका,” उनकी आवाज़ गूंजी,“कि आरोपी दिनेश इस भ्रष्टाचार में संलिप्त था।”

एक क्षण का मौन—जो वर्षों की पीड़ा से भारी था।

“अतः… दिनेश को सभी आरोपों से निर्दोष घोषित कर बरी किया जाता है।”

**

बाज़ार फिर वही था।

दुकानदार वही, फल वाला वही।                                                                

पर आज किसी ने उसे “साहब” नहीं कहा।

दिनेश मुस्कराया—“अच्छा है… अब मैं सिर्फ ‘दिनेश’ हूँ।”

प्रभा ने पूछा—“अब क्या बदलेगा?”

दिनेश ने धीरे से कहा—“मैं बदलूँगा… और शायद यही सबसे बड़ी शुरुआत है।”

 

कहानी यहीं समाप्त नहीं होती—

क्योंकि हर दफ्तर में, हर फाइल में, हर हस्ताक्षर के पीछे यह प्रश्न आज भी जीवित है—

दिनेश ने सीखा— “कागज़ की कीमत तय की जा सकती है, पर सत्य का मूल्य… समय ही तय करता है।”