भटका रास्ता राज बोहरे द्वारा सामाजिक कहानियां में हिंदी पीडीएफ

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भटका रास्ता

भटका रास्ता

कॉलेज का विशाल गेट जैसे ही सामने आया, अमल के कदम अपने आप तेज हो गए। चेहरे पर उम्मीद की चमक थी, आँखों में अनगिनत सपने। उसने जेब से मुड़ा-तुड़ा कागज निकाला और एक बार फिर विज्ञापन को देख लिया—“क्लर्क पद हेतु चयन सूची”।

“इस बार तो हो ही जाएगा…” उसने मन ही मन खुद को दिलासा दिया।

कॉलेज परिसर में हलचल थी। कुछ लड़के हँसते हुए बाहर निकल रहे थे, कुछ उदास चेहरे लिए चुपचाप दीवारों से टिके खड़े थे। अमल की नजर सीधे नोटिस बोर्ड पर गई। उसने तेजी से नामों की सूची पढ़नी शुरू की।

एक-एक नाम… फिर दूसरा… तीसरा…

उसकी आँखें अचानक ठिठक गईं। उसने सूची दोबारा पढ़ी। फिर तीसरी बार।

“नहीं… ये कैसे हो सकता है?” उसके होंठ सूख गए।

उसका नाम वहाँ नहीं था।

अमल कुछ पल वहीं खड़ा रह गया, जैसे पैरों में जान ही न बची हो। उसके भीतर कुछ टूट सा गया। उसने भीड़ से हटकर एक कोने में जाकर दीवार का सहारा लिया।

“इतना पढ़-लिखकर भी…?” उसके भीतर से आवाज आई।

उसी समय उसे इंटरव्यू का वो दृश्य याद आया—

एम.डी. सर कुर्सी पर पीछे की ओर झुकते हुए मुस्कुराए थे, “अरे अमल जी! ऊँट की सवारी करने वाले अब खच्चर की सवारी पर कैसे आ गए?”

कमरे में हल्की हँसी गूँज उठी थी।

अमल के चेहरे पर उस समय एक पल को खून दौड़ गया था, मगर उसने खुद को संभालते हुए धीमे स्वर में कहा था—

“सर, हम तो इस संस्था से जुड़ना चाहते हैं… किसी भी रूप में जोड़ लीजिए।”

“हूँ…” एम.डी. सर ने नाक सिकोड़ते हुए कहा था, “देखते हैं।”

अब वही “देखते हैं” उसके सामने नतीजे के रूप में खड़ा था।

“क्यों उम्मीद करता हूँ हर बार?” उसने खुद से सवाल किया, “क्यों हर बार सोचता हूँ कि इस बार कुछ बदल जाएगा?”

उसके कदम खुद-ब-खुद कॉलेज से बाहर निकल पड़े। धूप अब तेज हो चुकी थी, लेकिन उसे कुछ महसूस नहीं हो रहा था।

शाम ढलने लगी थी जब अमल सेठ अभय जायसवाल के दफ्तर पहुँचा।

दफ्तर में शराब की तीखी गंध फैली हुई थी। दीवारों पर बड़े-बड़े कैलेंडर और मोटे-मोटे हिसाब के रजिस्टर रखे थे।

सेठ अभय जायसवाल अपनी कुर्सी पर बैठे थे। गोल चेहरा, तोंद निकली हुई, माथे पर पसीना चमक रहा था।

“कौन?” उन्होंने चश्मा ठीक करते हुए पूछा।

“जी… मैं अमल…” उसने झिझकते हुए कहा, “आपके दोस्त श्रीवास्तव जी का बेटा…”

सेठ ने उसे ऊपर से नीचे तक देखा, जैसे उसका वजन तौल रहे हों।

“हूँ…” उन्होंने तीखे स्वर में कहा, “यहाँ अपनी ऊँची पढ़ाई का रौब मत दिखाना। तुम्हारे पिता के कहने पर रख रहा हूँ, समझे?”

अमल के भीतर आग सी भड़क उठी। एक पल को उसका मन हुआ कि वहीं से लौट जाए।

“क्या मैं इतना गिर गया हूँ कि कोई भी मुझे यूँ अपमानित कर दे?” उसके भीतर आवाज उठी।

लेकिन अगले ही क्षण उसे पिता का थका हुआ चेहरा याद आया—

“बेटा, कहीं भी लग जा… अब और नहीं हो पाता…”

उसने गहरी साँस ली और सिर झुकाकर बोला—

“आप मेरे पिता के मित्र हैं, आपसे क्या रौब दिखाऊँगा? जैसा काम बताएँगे, वही करूँगा।”

सेठ ने हल्की हँसी के साथ कहा—

“ठीक है, कल से आ जाना।”

दिन बीतने लगे।

अमल अब रोज शराब के ठेकों पर जाकर हिसाब लिखता। वहाँ का माहौल उसके लिए बिल्कुल नया था।

“आओ बाबूजी, एक पैग लगा लो…” कर्मचारी अक्सर हँसते हुए कहते।

अमल मुस्कुरा कर मना कर देता, “नहीं भाई, मुझे नहीं चाहिए।”

लेकिन भीतर ही भीतर उसकी कुंठा बढ़ती जा रही थी।

रात को जब वह घर लौटता, तो माँ पूछती—

“कैसा रहा दिन?”

वह बस इतना कहता—

“ठीक था…” और कमरे में चला जाता।

अंदर बैठकर वह छत को घूरता रहता।

“मैंने एम.ए. किया… वो भी फर्स्ट क्लास… और आज ये हाल है…” उसके मन में विचारों का तूफान उठता, “क्या यही सपना था?”

एक दिन ठेके पर काम करते-करते उसका सिर भारी होने लगा।

“आज तो पी ही लेता हूँ…” अचानक उसके भीतर से आवाज आई।

उसने हिचकते हुए गिलास उठाया। हाथ काँप रहे थे।

“बस थोड़ा सा…” उसने खुद से कहा और एक ही साँस में गिलास खाली कर दिया।

शराब गले से उतरते ही उसे अजीब सी गर्मी महसूस हुई।

“शायद इससे सब भूल जाऊँ…” उसने सोचा।

उस दिन के बाद जैसे एक सिलसिला शुरू हो गया।

एक शाम ठेके पर दो चेहरे उसे जाने-पहचाने लगे।

“अरे… अमल?” एक ने आश्चर्य से कहा।

अमल ने गौर से देखा—

“जेठा? और… सप्रा?”

तीनों कुछ पल एक-दूसरे को देखते रहे, फिर हँसी फूट पड़ी।

“चल, आज पुरानी यादें ताज़ा करते हैं…” जेठा ने बोतल उठाते हुए कहा।

तीनों साथ बैठ गए।

“तू यहाँ कैसे?” अमल ने पूछा।

सप्रा ने मुस्कुराते हुए कहा—

“अब हम हिस्ट्रीशीटर हैं भाई… हफ्ता वसूली करते हैं।”

अमल चौंक गया, “क्या?”

जेठा ने कंधे उचकाए—

“क्या करें… पढ़ाई से कुछ मिला नहीं, तो यही सही।”

अमल चुप हो गया।

“शायद यही सच है…” उसने मन ही मन सोचा, “ईमानदारी से कुछ नहीं मिलता…”

धीरे-धीरे वह उनके साथ ज्यादा समय बिताने लगा।

एक रात तीनों किसी गली में खड़े थे।

“आज काम बड़ा है…” सप्रा ने धीरे से कहा।

अमल का दिल तेज धड़कने लगा।

“क्या मैं सच में ये सब करने जा रहा हूँ?” उसके भीतर सवाल उठा।

लेकिन अगले ही पल उसने खुद को समझाया—

“अब पीछे मुड़ने का क्या फायदा?”

अचानक पुलिस की जीप की आवाज आई।

“भागो!” जेठा चिल्लाया।

लेकिन इस बार वे भाग नहीं सके।

कुछ ही पलों में तीनों पुलिस की गिरफ्त में थे।

थाने में बैठे अमल का सिर झुका हुआ था।

दरवाजे से उसके पिता अंदर आए।

उनके चेहरे पर दर्द और गुस्से का मिश्रण था।

“अमल…” उनकी आवाज काँप रही थी।

अमल ने नजर उठाई, फिर तुरंत झुका ली।

“बेटा, ये क्या कर लिया तूने?” पिता की आँखों में आँसू थे।

अमल के होंठ काँपने लगे, “मैं… मैं हार गया पिताजी…”

पिता कुछ पल चुप रहे। फिर धीरे-धीरे बोले—

“हार तो हम सब गए हैं बेटा… इस व्यवस्था से…”

वे अचानक तेज स्वर में बोलने लगे—

“लानत है ऐसी व्यवस्था पर! शिक्षा देने के बाद भी रोजगार नहीं देती। बेरोजगारी आदमी का आत्मसम्मान छीन लेती है… उसे अंदर से तोड़ देती है…”

थाने में सन्नाटा छा गया।

अमल अपने पिता को देख रहा था।

“क्या अभी भी कुछ बचा है मेरे लिए?” उसके मन में उम्मीद की हल्की किरण जगी।

पिता ने उसकी ओर देखा, आँखों में दृढ़ता थी।

“नहीं… अभी सब खत्म नहीं हुआ है,” उन्होंने मन ही मन तय किया, “मैं अपने बेटे को इस अंधेरे से बाहर निकालूँगा… चाहे कुछ भी करना पड़े।”

अमल ने पहली बार महसूस किया—

शायद रास्ता भटका है… लेकिन मंजिल अभी भी कहीं बाकी है।