कलयुग: पाप और पुण्य jagGu Parjapati ️ द्वारा लघुकथा में हिंदी पीडीएफ

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कलयुग: पाप और पुण्य

नोट:-- यह कहानी पूर्णतः काल्पनिक तथा हमारे द्वारा स्वरचित है।

कलयुग अपनी चरम सीमा पर तैनात था...मानो अब तो हवा भी सांसों में पाप का जहर घोलने लगी थी। अंबर जो कभी नीला हुआ करता था वो अब मट मैला सा लगता था। लगभग सभी पेड़ नरभक्षी बन चुके थे। इंसानों की इंसानियत कहीं गुम हो चुकी थी वहीं जानवरों की जनवरियत कहीं ढूंढने से नहीं मिल रहा था। समस्त विश्व कलयुगी हाहाकार का साक्षी बन हुआ था। अब हर कोई जाति धर्म के नाम पर नहीं अपितु इंसानियत हेवानियत के नाम पर लड़ते थे।
एक तरफ जहां कुछ कलयुग को चारों ओर बाहें पसारने में उसका सहयोग दे रहे थे ... वहीं दूसरी तरफ अब भी एक छोटा सा समुदाय ऐसा बचा हुआ था...जो कलयुग को बढ़ावा देने के पक्ष में बिल्कुल नहीं था....वो अब भी इंसानियत को पूजते थे...उन्हें अब भी भगवान के होने में संपूर्ण विश्वास था। उनके अनुसार कलयुग या पाप कितना भी बढ़ जाए लेकिन खुदा से मात खा ही जाएगा उनका यह कहना गलत भी नहीं था ...वह जब जब अच्छाई करते थे तब तक उनके समुदाय में अच्छे लोगों की संख्या बढ़ जाती थी। कलयुग के पुजारी भी उनके समुदाय से निकलने वाली पॉजिटिव ऊर्जा से डरते थे। क्योंकि कहीं ना कहीं उन्हें भी ऐसा लगता था कि कोई अनजान ताकत जरूर इनके समुदाय का साथ दे रही है। जिसके होने के आभास मात्र से वह अपने अंदर के कलयुगी पाप को डरा हुआ सा महसूस करते थे।
अर्णव भी नया नया उस समुदाय का हिस्सा बना था। लेकिन अपनी अच्छाई से वो पूरे समुदाय का चहेता बन गया था। दस साल का अर्णव उसके पापा के द्वारा ...उसकी एक गलती की सजा भुगतने के तहत इस समुदाय में आया था। अर्णव के पापा भी तो उसी समुदाय का ही एक हिस्सा थे ...अर्णव को कलयुग सत्ता के लिए अनजाने ही सही कुछ करते हुए देखकर उन्होंने अर्णव को छोटी उम्र में ही समुदाय में जाने के लिए बंधित कर दिया था। लेकिन समय के साथ साथ ही...कुछ दिनों में ये अर्णव को ये बंधन इतना पसन्द आया कि उस बन्धन ने तो अर्णव को आजाद कर दिया था...लेकिन अर्णव खुद ही बंधी हो गया था।
उसी समय कलयुग को पूर्णतः समाप्त करने की और अग्रसर समुदाय के लोगों ने एक महविधी करने का फैसला किया था। लेकिन उस महाविधी की समस्या यह थी कि उसे पूर्ण केवल एक पाक दिल बालक ही कर सकता था।
समस्त समुदाय को अर्णव में ही एक उम्मीद की किरण नजर आ रही थी। क्यूंकि अर्णव बालक होने के साथ साथ ही एक साफ मन का मालिक भी था। समुदाय के सभी लोगों ने अर्णव के पिता से इस बारे में बात करने का फैसला लिया..... उन्होंने भी खुशी खुशी इस बात में अपनी सहमति जता दी। उनके अनुसार इससे खुशी की बात क्या होगी कि उनका अर्णव समुदाय के किसी काम आ सकता है।
चूंकि अर्णव एक बच्चा था... जिस की वजह से उसको संपूर्ण विधि समझाना एक कठिन कार्य लग रहा था। लेकिन उन्होंने जैसा सोचा था उसके विपरीत अर्णव बड़ी आसानी से सब सीख गया था।
उस महा विधि के द्वारा... वह अपने समुदाय की अब तक अर्जित की गई संपूर्ण पॉजिटिव ऊर्जा को एकत्रित कर.... एक बार अपने इष्टदेव का आह्वान कर सकते थे और अपनी मनचाही इच्छा पूर्ण कर सकते थे।
महाविधि के दिन पूरा समुदाय खुशी और उत्साह से भर गया था। हर कोई अर्णव को अपनी अर्जित ऊर्जा प्रदान कर रहा था। धीरे धीरे अर्णव के भीतर से ही मानो एक तेज उत्त्पन्न होना शुरू हो गया था।
अर्णव को महविधि समारोह कक्ष में अकेले ही प्रवेश करना था ..उसको अन्दर जाने से पहले ही हिदायत दी गई कि.. जब महा विधि के संपूर्ण होने के बाद इष्टदेव उनके सामने प्रकट हो तब वह अपनी इच्छा में कलयुग का संपूर्ण खात्मा मांग ले। अर्णव ने भी उनके कहे अनुसार चलने के लिए अपनी सहमति जताई...और सबको देखकर हाथ जोड़ते हुए कक्ष में प्रवेश कर गया। उसके अंदर जाते ही उस जगह के द्वार बन्द कर दिए गए और एक साथ बहुत से मंत्रोच्चारण के साथ उस पर बाहर से एक ताला जड़ दिया गया।
महा विधि का पूरे ग्यारह दिनों तक चलने का संकल्प था। बारहवें दिन ही उस कक्ष को अब पुनः खोलना था। एक तरफ जहां सब समुदाय के लोग भी अपनी तरफ से पूजा पाठ कर रहे थे। वहीं दूसरी तरफ अर्णव भी विधिवत अपना पूर्ण विधि पूरे दिल से कर रहा था। उसे ग्यारह दिनों तक सिर्फ पानी के सहारे ही जीवन वहन करना था ....जैसे जैसे दिन गुज़र रहे थे वैसे वैसे अर्णव का शरीर उसका साथ देना बन्द करता जा रहा था। लेकिन अर्णव अब भी पूरे दृढ़ निश्चय से अपना कार्य कर रहा था। उसका पूरा शरीर लकड़ी की भांति सुख चुका था। आंखो के नीचे स्याह काले घेरे ...और सूखे पत्तों से उसके होंठ उसकी तड़प का एहसास करा रहे थे।
लेकिन जब निश्चय दृढ़ हो तब देह दुख कहां मायने रखता है। अंत में अर्णव की मेहनत रंग लाई और महा विधि के अंतिम दिन ...सम्पूर्ण कक्ष एक अलौकिक तेज से भर गया। इतना तेज जिसमें सामान्य व्यक्ति अपनी नजरें भी नहीं खोल सकता था ... लेकिन विधि के प्रभाव की वजह से अर्णव अपने सामने का दृश्य बहुत आसानी से देख पा रहा था।
इष्ट देव के नाम पर वो अपने सामने खुद को ही खड़ा हुआ महसूस कर रहा था... एक पल के लिए तो उसे वह सब अपनी आंखो का भ्रम मात्र लगता है।फिर वह देखता है कि उसके सामने खड़ा वह देखने में उस जैसा जरूर है लेकिन उसका वो अलौकिक तेज ...उसकी वो मन्द मन्द मुस्कुराहट ...और एक अजीब सी संतुष्टि ... उसको उसका जैसा होता हुए भी उस से अलग बना रही थी।
" आप..! " अर्णव ने पूरी हिम्मत जुटा कर उस से सवाल किया।
" मैं वहीं हूं..जिसका तुम इतने दिनों से आह्वहन कर रहे थे अर्णव....!" उसने मंद मंद मुस्कुराते हुए जवाब दिया।
" क्या आप इष्टदेव हैं...??..लेकिन आप तो देखने में बिल्कुल मेरे जैसे ही लग रहे हो ऐसा कैसे हो सकता है...!!"अर्णव ने हैरानी से उनकी तरफ देखते हूए पुछा।
"क्यों नहीं हो सकता है मैं तो समस्त संसार के कण-कण में हूं.... तुम भी तो मेरा ही एक हिस्सा हो। मैं तुमसा नहीं हूं अपितु तुम मुझसे हो... तुम मेरा ही तो एक रूप हो अर्णव...!" उन्होंने दोबारा एक शांत से आवाज में जवाब दिया ।उनकी आवाज अर्णव के कानों में मानो मिश्री सी घुल रही थी। अर्णव को लग रहा था जैसे वह आवाज उसको सम्मोहित कर रही हो और उसके भीतर स्वतेः ही एक ऊर्जा का संचार सा महसूस करा रही थी।
"यकीन नहीं होता प्रभु कि आप स्वयं ही मेरे सामने खड़े हैं मेरा जीवन तो आप के दर्शन मात्र से ही धन्य हो गया है।।" अर्णव ने अपने हाथ जोड़ते हुए कहा।
" तुमने इस घोर कलयुग में भी हमारी सच्चे दिल से तपस्या की है जिसकी वजह से हमें हमारा ये रूप धरते हुए भी प्रसन्नता हो रही थी।'" उन्होंने अर्णव रूपी शरीर की तरफ इशारा करते हुए अर्णव से कहा।
" किन्तु हमारा उद्देश्य केवल यहां आना नहीं है अपितु जिस वजह से तुमने हमारा आह्वाहन किया है उस को पूरा करने में तुम्हारी सहायता करना ही इस समय हमारा धर्म है... कहो तुम क्या मांगते हो ???" उन्होंने अर्णव की तरफ देखते हुए उस से पूछा..
" प्रभु मैं चाहता हूं कि समस्त संसार से कलयुग संपूर्ण तरीके से नष्ट हो जाए और इंसानियत पुनः हम धरतीवासियों की शान बने ...बस इसी उद्देश्य को मन में साध कर हमने आपका आह्वाहन किया था। मैं चाहता हूं कि आप मेरी ये इच्छा पूर्ण करें प्रभु...!" अर्णव ने हाथ जोड़ते हुए कहा..!
" मैं ऐसा नहीं कर सकता हूं .... कलयुग ने भी धरती पर आने के लिए मेरी ही तपस्या की थी ..और श्रृष्टि के नियम अनुसार किसी का भी समय से पहले ध्वंस करना नियम के खिलाफ होगा..! " उन्होंने फिर से अपनी चिर परिचित आवाज में कहा।
" किन्तु प्रभु श्रृष्टि के निर्माता को कौनसे नियम बांध सकते हैं..!"
" श्रृष्टि निर्माण के साथ उन नियमों का भी निर्माण हुआ था.... अगर मैं उन नियमों का पालन नहीं करता हूं तो मैं स्वयं ही सम्पूर्ण सृष्टि के विनाश का कारण बन जाऊंगा.. अतः आप हमें विवश ना करें। " विनम्र आंखों से उन्होंने अर्णव की तरफ देखते हुए कहा।
ऐसा सुनकर अर्णव निराशा से अपनी आंखें झुका लेता है। उसको देखकर वह पुनः बोलना शुरू करते हैं।
" लेकिन तुम ऐसा मांग सकते हो जिसकी वजह से हर कोई कलयुग का साथ देने से डरे.... अगर कोई कलयुग का साथ ही नहीं देगा तो वह अपने आप ही समय के साथ नष्ट हो जाएगा...! "
अर्णव उनकी यह बात सुनकर बहुत देर तक सोचता है कि वह ऐसा क्या मांगे ... लेकिन उसका बालमन इतने उच्च पैमाने पर सोचने में असमर्थ था। वह अपनी पूरी बीती जिंदगी को याद करता है। तब उसे एक विचार आता है ...वह पहली बार आंखों में एक तेज और चेहरे पर मुस्कान के साथ उनकी तरफ देखते हुए कहता है ...
" प्रभु इस कलयुगी संसार में हर कोई सिर्फ बाहरी चेहरे को सजाते हैं ...हर कोई सिर्फ दिखने में सुंदर लगना चाहता है .. भले ही उनका भीतरी मन बदसूरती का जीता जागता उदाहरण ही क्यूं ना हो।
इसलिए मैं चाहता हूं कि आज से.. नहीं नहीं बल्कि अभी से ..बाहरी सुंदरता भी हमारे कर्मों से ही बने ...जैसे जो जितने अच्छे काम करेगा वो उतना ही खूबसूरत बनता जाएगा ...और जो जितने पाप.. छल, कपट ..बुरे कर्म करेगा वह उसी अनुसार उतना ही बदसूरत होता जाएगा । अब से सुंदरता जन्म नहीं बल्कि कर्म तय करेंगे ... हां प्रभु आप मुझे यही वरदान दीजिए कि जब कोई अच्छा काम करे तब वो सुंदर बने ... और बुरे व्यक्ति भी अगर बुराई छोड़कर अच्छे कर्म करने लगे तो वह अपनी सुन्दरता को और भी बड़ा सकते हों।।" उसने हाथ जोड़ते हुए कहा।
सामने खड़ा भगवान उसके इस पाक वरदान को सुनकर पहले मुस्कुराया और फिर उन्होंने कहा
"ऐसा ही हो..!!"और इतना कहकर वो वहां से चले गए ...और चारों ओर पुनः सामान्य वातावरण हो गया। अर्णव जब उनके जाने के बाद खुद को देखता है तो वह खुद को और भी ज्यादा चमकता हुआ सा महसूस करता है। वह यह देखकर मुस्कुरा उठता है।
अगले दिन जब उसके कक्ष के द्वार खोले जाते हैं तो वह पाता है कि उसके है समुदाय के बहुत से लोगो पहले से अलग लग रहे थे कुछ पहले से बद्धे लग रहे थे तो कुछ की खूबसूरती देखते ही बन रही थी।
धीरे धीरे वो सबको देखता है और एक बार फिर से मुस्कुरा देता है। वहां खड़े लोग जब उसकी उनके भगवान से हुई मुलाकात के बारे में पूछते हैं तो वो अंदर घटी पूरी घटना सबको बता देता है।
अब सब एक दूसरे को देख रहे थे ...कोई गर्व से ऊंचा हो गया था तो कुछ की आंखें अब शर्म से धरती निहार रही थी।
धीरे धीरे यह बात पुरे विश्व में फ़ैल जाती है....सब अब जब भी किसी सुंदर इंसान को देखते तो उसकी तरफ खिंचे चले आते और उस के जैसा बनने की कोशिश करने लगते...!
पहले जो लोग बुराई करने से नहीं डरते थे वो अब दूसरों के लिए कुछ अच्छा करने के बहाने ढूंढने लगे थे ..। जब भी वह कुछ अच्छा करने के बाद खुद में हुए बदलाव को महसूस करते थे... तब ही उनकी हर अच्छाई उन्हें और अच्छा करने पर मजबुर कर देती थी....धीरे धीरे बदसूरती कम हो रही थी...!
या यूं कहूं कि कलयुग अपने अंत तक पहुंच चुका था।
अर्णव एक ऊंचे पहाड़ पर खड़ा होकर आज भी मुस्कुरा रहा था। उसमें से निकल रहा तेज चारों दिशाओं को उज्वल कर रहा था। नीचे खड़ा अर्णव भी उसी और देखकर मुस्कुरा रहा था...मानो उसका शुक्रिया अदा कर रहा हो...!

समाप्त...!

तो दोस्तो यह थी मेरी एक छोटी सी कल्पना ....उम्मीद करती हूं कि आप सबको भी पसंद आएगी...! और क्या आप सब भी मेरी तरह एक ऐसी ही दुनिया चाहते हैं...?? अपना जवाब समीक्षा में जरूर बताइएगा।
तब तक के लिए टाटा ...
आंगन माना गुतू 🙏🤜🤛🤪
©jagGu parjapati✍️