आधुनिकता Vs आध्यात्मिकता ANKIT YADAV द्वारा मनोविज्ञान में हिंदी पीडीएफ

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आधुनिकता Vs आध्यात्मिकता

विषय -: आधुनिकता vs आध्यात्मिकता

" पूरी तरह से अस्तित्व में रहने के लिए आपको वास्तव में आधुनिकता की आवश्यकता नहीं है। आपको आधुनिकता और आध्यात्मिकता के मिश्रण की जरूरत मात्र है। "
:- THEODORE
क्या आप उपरोक्त कथन से सहमत है ? आप हो या ना हो, ये आपके जानने का विषय है, परंतु 2001 जनगणना की बात करे, तो भारत के करीब 10% लोग किसी धर्म और आध्यात्मिकता को नही मानते है। ये संख्या आगे चलकर बढ़ेगी या घटेगी, निस्संदेह ये विवादास्पद योग्य है। भारत के वर्तमान रुझान देखे, तो ये संख्या बढ़ती हुई आप देख सकते हैं, लेकिन क्या ये संख्या बढ़नी चाहिए, क्या ये संख्या बढ़ना देश के वैज्ञानिक चिंतन के लिए घातक है, क्या ये संख्या बढ़ना अच्छा रूझान है? चलिए विचार करने की कोशिश करते है।
आधुनिकता का लोकप्रिय मतलब जो है, दरअसल वो इसके सही अर्थ से कोसो दुर है। लोकप्रिय संदर्भ मे आधुनिकता पश्चिमी कपड़ो से है, पश्चिमी खान - पान से है, पश्चिमी जीवन - शैली से है। लेकिन शायद आपको जानकर आशचर्य हो कि आधुनिकता का यह मतलब भारत की 85% आबादी सच मानती है। पश्चिम का जो कुछ हैं, सब आधुनिक है, इस मानसिकता का गुलाम संस्कृति को मानते हुए भी घोर रूढ़िवादी हो सकते हैं। दरअसल आधुनिकता का सही मतलब आर्थिक, सामजिक, न्यायिक संदर्भों मे आधुनिक नजरिए से है। आधुनिक नजरिए का संबंध तार्किक नजरिए से है। महिलाओं के अधिकारों की बात करना आधुनिकता है। जातिवाद के विचारों को खारिज करना आधुनिकता है। Transgender ( समलैंगिकों) के अधिकारों की बात करना आधुनिकता है। बराबर की बात करना आधुनिकता है। रूढ़ियों को खत्म करना आधुनिकता है । सार ये है कि आप धोती-कुर्ता पहने हुए भी आधुनिक हो सकते हैं, जबकि अगर आपका नजरिया तार्किक नहीं है,तो आप जींस पहने हुए भी बल्कि फटी हुई जींस पहने भी अनआधुनिक ही माने जाएंगे।
अध्यात्मिकता का संकीर्ण अर्थ पूजा पाठ करने, मंदिर जाने से लोग मानते हैं। जबकि आध्यात्मिकता का व्यापक अर्थ एक परासत्य को मानने या वैसी अनुभूति मानने से है।
परा सत्य अर्थात जो हमारे इस जगत के परे हैं। आप बिना मंदिर,मस्जिद जाए भी आप अध्यात्मिक हो सकते हैं। आप श्री राम,कृष्णा, ब्रह्मा, हनुमान जी मोहम्मद, ईसा मसीह को नहीं मानते हैं लेकिन आप किसी की चेतन सता को महत्व देते हैं तो आप आध्यात्मिक है।
भारत मे ज्यादातर आबादी धर्म को मानने से आध्यात्मिक हैं। यानि हमारे देश में धर्म से आध्यात्मिकता पैदा होती है। धर्म को मानने वाला हरे व्यक्ति आध्यात्मिक है। एक अन्य स्थिति भी वर्तमान मे कई देशों मे प्रचलित है जिसमें बिना माने लोग आध्यात्मिक है। अमेरिका मे ये रुझान सबसे ज्यादा देखे जा सकते है। आप कौन-सी भी आध्यात्मिका को मानें, लेकिन आपको यह मानना होगा कि धर्म आधारित आध्यात्मिकता ज्यादा गहरी होती है।
क्या यह जरूरी है कि अगर आप आधुनिकता माने, तो आपको आध्यात्मिकता को खारिज करना ही होगा? क्या आध्यात्मिकता होने के साथ-साथ आप आधुनिक नहीं हो सकते हैं। जरूर हो सकते हैं। आप यहां कह सकते हैं कि तर्कीक नजरिए से आप परासत्य को कैसे मानेंगे? यहां Imanuel Kant के Quote की जरूरत है, [ भगवान आस्था का विषय है और जहाँ आस्था आती है, वहां तर्क चुप हो जाते है। ] दरअसल इस दुनिया का अंतिम सत्य कोई नही जानता। वैज्ञानिकों से लेकर धर्मगुरुओं से लेकर चितंको तक, सब अंतिम सत्य की तलाश मे है। विज्ञान अभी शोध के चरण मे है। वर्तमान रुझानो को देखते हुए अगले करीब 10 - 20 Lakhs सालो तक अंतिम सत्य का प्रश्न युँ का युँ रहने वाला है। इसके जबाव की आशा अभी करना दरअसल बेमानी है।
तो अंतिम बात के रूप में देखते है कि कैसे हम आधुनिक व अध्यात्मिक हो सकते है। दरअसल एकमात्र समस्या हमे हमारे शास्त्रों मे पातिगत भेदभाव से लेकर महिलाओं के विरुद्ध काफी प्रावधान है। सही बात है, हम इसे नकार भी नहीं सकते। जाति व्यवस्था कर्म आधारित भी, बाद मे जन्म आधारित हो गई ये तर्क अवसर आता है। इसपे क्या खूब किसी ने कहा -
" हमको मालुम है जन्नत की हकीकत लेकिन "
दिल बहलाने को खालिब ख्याल अच्छा है।"
पहले क्या था - उसका छोड़िये, आज क्या है उसपर विचार करने की जरूरत है। आज जाति व्यवस्था जन्म आधारित है, ये सत्य है, तो इसको व्यागना ही आधुनिकता है। मनुस्मृति को पूरी जलाने की क्या जरूरत है, महिलाओं व दलितों के खिलाफ लिखे वाक्यांशो को जला देना समझदारी है।
मनुस्मृति में इतनी शानदार बातें भी लिखी है जिन पर तथाकथित लोकप्रिय संदर्भ में आधुनिक लोगों को विचार करना चाहिए। मनुस्मृति में शानदार संपत्ति संबंधित प्रावधान है। आप सिर्फ महिलाओं के विरुद्ध प्रावधान होने से पूरी मनुस्मृति को जलादे, ये कहां की समझदारी है। तो अपने धर्म के, अपने शास्त्रों के गलत प्रावधानों जो पहले से थे या समय अनुसार जोड़े गए, उनको खारिज करके बाकी प्रावधानो को मानकर आधुनिक एवं आध्यात्मिक दोनों साथ-साथ हो सकते है। और चरम बिंदु हमेशा चाहे किसी भी पक्ष का हो, हमेशा घातक होता है। घोर आधुनिकता दरअसल मुर्खता है, घोर आध्यात्मिकता भी दरअसल मुर्खता है। बुहद कह गए हैं " मध्यम मार्ग सबसे शानदार मार्ग है " - अर्थात आधुनिकता व आध्यामिकता के मध्य हमे चलने की जरूरत है। ये रास्ता जितना जल्दी जितने ज्यादा लोग अपनाले, उतना ही इस विशव और उसके समाज के लिए श्रेष्यशकर है।