निशा ANKIT YADAV द्वारा मनोविज्ञान में हिंदी पीडीएफ

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निशा

मौसम शाम की सुनहरी अंगडाईयां ले रहा था। पानी दीवार काटते हुए पास के खेतों में घुसा जा रहा था। किसान को इसकी भनक न थी, नही तो वह कब का इसे रोक चुका होता, कबका पानी किसान के निशिचत किए रास्ते पर चलता रहता। इसी प्रकार मनुष्य नामक प्राणी के भी रास्ते समाज नामक संस्था तय करती है। अगर मनुष्य इन्हें काटने की चेष्टा करे, तो समाज मनुष्य को ही काटने मे जरा भी नही हिचकता। खैर समाज ने अपनी मूल्यों के लिए एक ढाँचा बुना ही है और इस ढांचे के अंदर रहकर जीने की अपेक्षा मनुष्य नामक प्राणी से समाज करता है।
ठीक जिस प्रकार पानी कभी-कभी किसान के निशिचत की तोड़ बेबाक चलने लगता है, ठीक उसी प्रकार मनुष्य भी कभी-कभी समाज के ढांचे को तोड़ने की चेष्टा करता हैं | जैसे पानी के अपना रास्ता बदलने पर किसान उसे जबरदस्ती बदल देता है, ठीक वैसे ही ढांचा तोड़ने पर समाज मनुष्य नामक प्राणी को ही ख़त्म कर देता है अथवा मार देता है | इन्हे सुनहरी वादियों के बिच निशा का घर भी है | प्राकृतिक रूपों से अनजान निशा अभी अपने यौवन के चरम स्तर की तरफ कदम बढ़ाए जा रही है | इन्ही कदमों मे किसी दूसरे प्राणी के यौवन से आकर्षण होना बेहद स्वाभाविक है | इस उम्र मे ये सब होना बेहद सामान्य घटना है , लेकिन समाज ने आजादी के 75 वर्ष बाद भी इस घटना की सहजता को स्वीकारा नहीं है | जहाँ शहरो में, बड़े महानगरों में भले लाखो सांस्कृतिक समस्याँए/ पतन दिखती हो, लेकिन एक बात जो महानगरों के लिए काबिले तारिक है, वो ये समाज जो बड़े महानगरों का है, उसे बेहद सहजता से मनुष्य की यौन संबंधी इच्छाओ को स्वीकारयता प्रदान की है | जहाँ गुप्त रोगी अकेले मे मिले ' जैसे पोस्टर से sex clinics का सफर बेहद सुखमय बदलाव है जिसका केंद्र अभी केवल मुख्यत: महानगरों व छोटे शहरो तक सीमीत है | इस केंद्रों को जल्द से जल्द बड़े गाँवो व छोटे कस्वो तक पहुंचना अत्यंत आवश्य्क है| इसका प्रभाव सबसे ज्यादा उन गरीब अनपढ़ ग्रामीण लड़कियों को होगा जिनको केवल periods होने की वजह से बदनाम मान लिया जाता है | ये लोग ऐसा जो मानते है,वो अपने असिस्तव को ही दरहसल नकार रहे है | इस असिस्तव की रक्षा वज्ञानिक दृष्टिकोण से ही सुनिशिचत हो सकता है जिसकी आज भारी कमी मौजूद है |
अरे निशा, तुम्हारा बुखार उतर गया क्या ? मुझे तो vaccine लगवाने के पस्चात बुखार हुआ ही नहीं, कही पानी भरकर तो इंजेक्शन नही दे दिया न |
' निशा ठहाका मारते हुए - पानी लगाते तो हम खुद ही न लगा लेते, इस लाइलाज बीमारी का कम से कम कोई इलाज तो मिला | ये vaccine जिंदगी सुनिशिचत करदे तो बेहतर' |
सुनो-सुनो-सुनो, आज सुबह 11 बजे से शाम 10 बजे तक गांव के औषधालय में free vaccine मिलेगी, जिसने vaccine नहीं लगवाई, अगले महीने से उसके बाहर निकलने पर पाबंदी रहेगी, हां, सब ध्यान से सुनो |
' अरे भाई, काश ये vaccine जितने में लगी, उतने पैसे तो सरकार हमे यु दे देती, तो कुछ बेहतर होता'
'अरे ये वैक्सीन-वैक्सीन कुछ नहीं,सब ढ़कोसले है, सबको नपुंसक बनाने की वैशिवक स्तर पर ये कोशिश है '|
हां भाई, हां, ये सरकारे कब से हमारे बारे मे इतना सोचने लगी ? इन्हे तो केवल पैसा कमाने से मतलब है, वो ये कमाएगे दवाई बेचकर, बाकी दवाई से चाहे कितने करोड़ो लोग क्यूँ न मर जाए |
निशा आज कुछ बेसुध सी प्रतीत हो रही थी, ये बेसुधी इसलिए थी की होली होने के बाबजूद निशा को आज किसी ने न रंगा था | दोपहर ढलने को थी, बच्चे होली खेलकर सामने के तालाब में नहा रहे थे, लड़कियाँ अपने हाथ,पैर, बाल धो रही थी| बड़े बूढ़े नाच,गाना,संगीत में व्यस्त हो चुके थे | मौसम करवटे ले रहा था | बारिश आने को थी | लोग सब बाहर सूख रहा गेहूँ, धान को इकट्ठा करने में लग गए थे | बच्चे आसमान की तरफ आहें भर रहे थे | उन्हें इंतजार था कि कब सुकून की एक बूंद टपके | लेकिन फिर वही, हाथ कुछ लगा नहीं, कमबख्त कोई भी भाव जगा नहीं' | बारिश हुई ही नहीं | आसमान ने आज बच्चो को धोखा व बड़ो को तोहफा दे दिया था | इस बख्त किसान मौसम की मार कैसे सह सकता है |
अभी तो धान की पकाई भी न हुई थी, अभी बारिश कैसे सुहाए | लेकिन निशा को बारिश से खास लगाव है | सारे दिन घर में अकेलेपन का शिकार निशा के लिए बारिश ही वह मित्र है जिसके साथ वो अबसर घंटो बात किया करती है | इन निर्जीव बारिश की बुँदो से निशा क्या बात करती है, आप भी नहीं जानते, शायद मै भी नहीं जनता और निशा भी, लेकिन नाजान होते हुए भी इनका महत्व निशा के लिए मित्र समान है, ये जरुरी व आवश्य्क प्रसंग है |