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हमने दिल दे दिया - अंक १४

जन्मदिन

     रात का समय था | समय रात के लगभग लगभग ११ बजकर ३० मिनिट हुए थे और सारे दोस्त दिव्या के जन्मदिन को मनाने के लिए तैयार थे लेकिन सबकी चिंता थी ख़ुशी क्योकी ख़ुशी को रात के ११:३० बजे उसके घर से निकालकर जादवा परिवार की उस हवेली में ले जाना जहा जाने के लिए जादवा परिवार ने मना किया हुआ है | सबसे बड़ा रिश्क तो यही था की जादवा परिवार की लड़की को रात में कही बहार अपने साथ ले जाना अगर इसका पता या भनक एक बार भी मानसिंह जादवा को लग जाये तो वो सबको काट के रख दे पर अंश उनमे से नहीं था जो नियमो को माने और सीधे से चले अंश तो वो था जो अपनी मरजी का ही करेगा और अपनी मरजी का ही जियेगा और आज भी वेसा ही होने वाला था | उसने ठान लिया था की मानसिंह जादवा की बेटी को में देर रात को उस हवेली में ले जाऊंगा जहा मानसिंह जादवा के बेटे की विधवा है जिससे मिलने की मनाई है पर यह अंश था जो किसी के निचे ना कभी रहा है और ना ही रहेगा |

     अंश करना क्या है वो तो बता दे हम अभी गाव के बिच चोराहे पर है और वह भी ढेर सारे जन्मदिन के समान के साथ ...चिराग ने अंश से फोन पर बात करते हुए कहा |

     एसा करो जिसके पास सामान है वो लेकर हवेली के पीछे की और पहुचे और बाकि के दो जादवा सदन से आगे कुछ दुरी पर एक खंडर घर है वहा पर पहुचो और मेरा इंतजार करो ... अंश ने फोन पर कहा |

     ठीक है तो में पराग को यह सारा सामान लेकर हवेली के पीछे की और भेजता हु और में और अशोक वहा आते है ... चिराग ने फोन पर कहा |

     चिराग और अशोक के बिच और रही बातचीत को पराग सुन लेता है |

     ओह भाई में अकेला वहा नहीं जाने वाला सालो कभी रात को वहा गए हो कितनी भयानक जगह है अगर मेरे साथ कोई आ रहा है तो ठीक है बाकी में अकेला वहा नहीं जा रहा ठीक है ... पराग ने अपने दोस्तों से कहा |

     अबे जाना उसमे क्या डरने वाली बात क्या है कल से एक महीने तक में तुझे गुटखा खिला दूंगा अब तो जा ... चिराग ने पराग को लालच देते हुए कहा |

     भाई अपनी पेंट खुद धोने से अच्छा है मै खुद के पैसो से गुटखा खरीदू | मै नहीं जाऊंगा मतलब नहीं जाऊंगा मेरे साथ तुम दोनों में से किसी एक को चलना ही होगा ... पराग ने अकेले जाने से साफ़ साफ़ मना करते हुए कहा |

     पराग और चिराग के बिच हो रही सारी बाते अंश फोन पर सुन लेता है |

     कोई बात नहीं चिराग एसा करो तुम और पराग चले जाओ और अशोक को यहाँ पर भेज दो ठीक है ... अंश ने बिच का रास्ता खोजते हुए कहा |

     ठीक है तो में अशोक को वहा पर भेजता हु और मिलते है हवेली पे और हा एक बात और की संभालकर बहुत रिश्की काम करने जा रहे हो ...चिराग ने कहा |

     हा ठीक है कोई बात नहीं तु ज्यादा चिंता मत कर ठीक है ...अंश ने फोन रखते हुए कहा |

     जैसे तय हुआ था वैसे ही चिराग और पराग एक मोटर-साईकल में जन्मदिन मनाने का सारा सामान लेकर निकल जाते है और अशोक अंश का साथ देने के लिए मानसिंह जादवा की हवेली जाने के लिए निकलता है |

     अशोक मानसिंह जादवा की हवेली से कुछ दुरी पर अपनी मोटर-साईकल रोकता है और अंश को फोन लगाता है | अंश फोन उठाये इससे पहले अशोक के पास अपनी मोटर-साईकल द्वारा पहुच जाता है |

     आ गया फोन काट दे ...अंश ने अपनी मोटर-साईकल रोकते हुए कहा |

     अब बता करना क्या है और कैसे ...अशोक ने कहा |

     हम अपनी मोटर-साइकले यही पर छोड़ देते है और सावधानी के साथ हम जादवा सदन के पीछे की और चले जाते है फिर वहा से देखते है ख़ुशी को कैसे घर से निकाला जाए ... अंश ने अपनी मोटर-साईकल से उतरकर उसको स्टैंड पे लगाते हुए कहा |

     अबे मतलब तेरे पास कोई प्लान नहीं है और तु अभी वहा जाकर कुछ सोचने के लिए बोल रहा है | अबे तु पागल तो नहीं हो गया ना हम यहाँ पे कोई रसोई बनाने नहीं आए की सोचेंगे और फिर बनाते जाएंगे | अबे हम मानसिंह जादवा की लड़की को देर रात में उसके घर से छुपके से लेने आए है तुझे कुछ समझ आ रहा है ...अशोक ने थोडा सा परेशान होते हुए कहा |

     तु ठंडा हो इतना चिल्लाएगाना तो जादवा काका एसे ही उठकर बहार आ जाएंगे शांति रख और मेरे पीछे आ चल ... जादवा सदन की पीछे की और जाते हुए अंश ने अशोक से कहा |

     दोनों अपनी अपनी मोटर-साईकल वही पर खड़ी करके जादवा सदन की पीछे की और चलते है |

     अंश ख़ुशी को फोन लगाता है | इस तरफ रूम में ख़ुशी सही कपड़ो में सजी धजी अंश का इंतजार ही कर रही थी जैसे अंश का फोन आता है तुरंत ख़ुशी फोन उठा लेती है |

     हा अंश बोल ...ख़ुशी ने कहा |

     ख़ुशी हमारे जादवा सदन के पीछे की और है तो निकलना कहा से है ...अंश ने ख़ुशी से कहा |

     क्या मतलब यह मुझे सोचना था अंश तु मुझे यहाँ से निकालने वाला था ...ख़ुशी ने थोडा सा परेशान होकर कहा |

     जादवा सदन चारो तरफ से दीवारों से बंधा हुआ था जिसमे से बहार आने जाने का एक ही रास्ता था और वह था मुख्य द्वार जो रात को बंद होता है जहा से जाना नामुमकिन है |

     तु भी शांति रख और मुझे कुछ सोचने दे ...अंश अपनी चारो और देखता है और फिर जादवा सदन की और देखता है |

     ख़ुशी तु एसा कर अपने घर की छत पर जा और वहा से अपने पडोसी के घर की छत पर जा जिसकी सीढि से तु निचे उतर जा उसके घर की दीवारे छोटी है वहा से में तुझे निकाल लुंगा ठीक है ...अंश ने ख़ुशी से कहा |

     हा ठीक है ...ख़ुशी ने फोन रखते हुए कहा |              

     ख़ुशी अपना फोन अपने साथ लेकर सबसे पहले बड़ी सावधानी से अपने रूम का दरवाजा खोलती है और बहार इधर उधर हर जगह अपनी नजरे फेरती है की कही कोई है तो नहीं ना | हर तरफ नजरे घुमाने के बाद ख़ुशी वापस रूम में आती है और अपने बेड पर तकिये को चद्दर से ढक देती है ताकि देर रात अगर कोई आए तो उसे पता ना चले | दबे पाव ख़ुशी अपने रूम से बहार निकलती है और बड़ी सावधानी के साथ आगे सीढियों की तरफ बढती है | ख़ुशी अपने जीवन में पहली बार अपने घर से इस तरह सबसे छुपते छुपाते वो करने जा रही थी जिसकी मंजूरी शायद जादवा परिवार की सात पुश्ते भी ना दे | ख़ुशी जैसे ही सीढियों की तरफ आगे बढती है तभी ख़ुशी की भाभी अपने रूम से बहार आती है और ख़ुशी उन्हें देखकर सीढि के पास में अँधेरे में छुप जाती है और मन ही मन भगवान को प्राथना करने लगती है की कही भाभी घर की बत्तिया ना जला दे पर एसा नहीं होता भाभी को किचेन में से कुछ चाहिए था जो लेकर वह वापस अपने रूम में चली जाती है |

     हाश, भगवान आपने बचा लिया अगर भाभी देख लेती तो मेरा जाना केंसल हो जाता ...ख़ुशी ने मन ही मन कहा |

     भाभी के जाने के बाद ख़ुशी दबे पाव सीढियों से होकर अपने घर की छत पर पहुचती है और वहा जाकर सबसे पहले जादवा सदन के पीछे खड़े अशोक और अंश को देखती है और अपना हाथ हिलाकर उन्हें बुलाती है | सामने खड़ा अंश भी ख़ुशी को अपने हाथ के इशारे से उत्तर देता है और बाद में हाथ के इशारो के द्वारा उसे बगल वाले घर की छत पर जाने के लिए कहता है | ख़ुशी अपना शिर हिलाकर अंश की बातो में हामी भरती है और बगल वाले घर की छत पर जाती है | जब तक ख़ुशी उस घर की छत तक पहुचे उतनी देर में अंश और अशोक उस घर की दिवार के उस हिस्से के पास पहुच जाते है जहा पर सीढि ख़त्म होती है | ख़ुशी उस घर की छत से होकर उस घर की सीढियों के पास पहुचती है और निचे उतरकर उस घर की दीवार पे चढ़ती है | घर की दिवार एकदम छोटी थी | घर की दीवार पे चढ़कर दुसरी और अंश खड़ा था जिसके सहारे ख़ुशी निचे अंश और अशोक के पास पहुच जाती है |

     चलो हो गया | अब जल्दी से चलते है हमें यहाँ पर कोई देखले इससे पहले ...अंश ने कहा |

     तीनो जहा पर अंश और अशोक ने अपनी मोटर-साईकल खड़ी की थी वहा पर पहुचते है और वहा से हवेली की और जाने के लिए रवाना होते है | ख़ुशी और अंश दोनों एक मोटर-साईकल में बैठे थे और अशोक अकेला | बिच गाव से बड़ी सावधानी के साथ अंश, ख़ुशी और अशोक निकल जाते है और उन्हें कोई देखता भी नहीं है |

     इस तरफ बहार सारे दोस्त और ख़ुशी मिलकर दिव्या के जन्मदिन को खास बनाने की तैयारी कर रहे थे और उस तरफ रूम में दीवार के सहारे अपनी पीठ और दोनों घुटनों को जोड़कर दोनों हाथ बांधे हुए अकेली दिव्या अपनी तनहाई के साथ बैठी हुई थी | रूम में चारो और घना अँधेरा था सिर्फ खिड़की खुली थी जहा से थोडा उजाला आ रहा था पर कहते है ना जिसके जीवन में अँधेरा छाया हो ना उसको बहारी उजालो की तरफ ध्यान बहुत कम जाता है |

     नींद का मानो जैसे दिव्या से वास्ता ही तूट सा गया था | पुरी रात और दिन दिव्या एसे ही बैठकर निकालती और अपने बचपन की यादो को याद करती रहती और आखो में तो मानो जैसे आशु ने आजीवन जगह ले ली हो रुकने का नाम ही नहीं ले रहे थे |

     दिव्या को सबसे ज्यादा अपने बचपन के उस प्यार की याद आती जो उसे कभी मिला ही नहीं | एक तरफ़ा प्यार | जिसके पास पैसे ना हो जेब और किस्मत फटी हो उनके लिए होता है यह एक तरफ़ा प्यार पर हा कोई लड़की करे एक तरफ़ा प्यार तो उसके कारण कुछ अलग होते है क्योकी उनका भरी जेबों से कोई मतलब नहीं होता | जब लड़की किसी को एक तरफ़ा प्यार करती हो तो समझ लेना की लड़का वो है जो किसी और से प्यार करता है पर करे क्या यह प्यार साली अपने हाथो की चीज ही नहीं है किसी से भी हो जाती है | यह महोब्बत है जनाब डूबी कस्ती को तेरा दे और तैरती नया को डूबा देती है |

    दिव्या जब भी उदास होती तो बार बार अपने पहले प्यार को याद करती और उन किस्सों को याद करती जब वह देर तक बैठकर अपने उस पहले प्यार का इंतजार करती और जब वह आता जैसे मानो राजकुमार आया हो | उसके बोलने की ठाठ चलने की शेर सी चाल और क्या बताऊ मेरी महोब्बत के बारे में एसा कुछ चलता रहता दिव्या के दिमाग में | दिव्या का मानना था की वह उसके जीवन के सबसे अच्छे पल थे और जब भी दिव्या उदास होती तो वह उस पलो को सोचती जिससे उसे थोड़ी राहत मिलती पर जब वो इस सोच से बहार निकलती तो उसे बेहद तकलीफे होती की क्यों कभी उसे सच्चा प्यार नहीं मिला और उसे इस हालत का सामना करना पड़ रहा है | कभी कभी तो अपने हालात देखकर उसे लगने लगता की हा सच बात है बा की में अभागन ही हु तभी तो यह सब मेरे साथ हो रहा है |

   जब से वीर गया है तब से हर रात दिव्या एसे गुजारती | पहले कुछ मीठी यादो में खो जाती और वापस आने के बाद उसके लिए अफ़सोस जताती | अब उस पहले प्यार का क्या हुआ वो तो पता नहीं पर जब भी उस बारे में दिव्या सोचती तो उसे कुछ पल एसे मिल जाते जब उसे इस दुःख से बहार निकलने का मौका मिलता |

    इस तरफ चिराग और पराग हवेली की पीछे की और घने अँधेरे में ख़ुशी, अंश और अशोक का इंतजार कर रहे थे |

    बाप यह हवेली तो रात में बड़ी भयानक दिखती है | यहाँ पर अपनी रात कैसे बिताती होगी दिव्या जी उन्हें डर के मारे नींद भी नहीं आती होगी ... पराग ने कहा |

    जिसे जिंदगीने बड़े घाव दे दिए हो ना उसे एसी छोटी चीजो से डर नहीं लगता पराग | दिव्या जी को पिछले कुछ दिनों में इतने घाव मिले है की उन्हें मेरे ख्याल से यह अँधेरा और यह डरावना माहोल दीखता ही नहीं होगा | क्योकी हर पल जिसको मौत का इंतजार हो वो कैसे घने अंधेरो से डर सकता है ...चिराग ने पराग से कहा |

    वाह क्या मस्त बोला बे | मुझे तो आज पता चला की तुझे इतना अच्छा बोलना भी आता है भाई थोडा और बोलना अच्छा लग रहा है मानो जैसे अनूप जलोटा जी भजन गा रहे हो ...पराग ने चिराग की झूठी तारीफ करते हुए कहा |

    समझ गया में तुझे गुटखा खानी है पर मेरे पास है नहीं वो अशोक के पास है उसने ली थी तेरे लिए मैंने नहीं तो औकात में आकर बोल ...चिराग ने पराग की झूठी तारीफ़ का इरादा समझते हुए कहा |

    साला बंद कर अपना यह बकवास अँधेरा और मौत साले अपनी सकल देखके बोलना चाहिए ... पराग ने अब सही शब्द बोलते हुए कहा |

    अबे यह लोग कहा रह गए अभी तक आए नहीं ...चिराग ने रास्ते की और देखते हुए कहा |

    हा यार बहुत देर हो गई कही पकडे तो नहीं गए होंगे ना ...पराग ने भी रास्ते की और देखते हुए कहा |

    साले शुभ शुभ बोल गुटखा खा खाकर तेरे दात के साथ तेरी जबान भी गंदी हो गई है आते ही होंगे ...चिराग ने कहा |

    दिखी दिखी लाईटे दिखी शायद वही होंगे ... पराग ने रास्ते पर लाईटो का प्रकाश देखते हुए कहा |

    अंश, ख़ुशी और पराग वहा पर पहुचते है | सब ठीक ...अंश ने चिराग और पराग को देखते हुए कहा |

    बढ़िया ...चिराग ने कहा |

    चलो फिर जल्दी से चलते है अंदर वरना बहार कोई देख लेगा | सब मोटर-साईकल को लॉक कर देना ...अंश ने सभी से कहा |

    चलो फिर सबसे पहले अंश तु चला जा बाद में ख़ुशी, पराग और अंत में में आता हु ...अशोक ने सभी से कहा |

    ठीक है ...बोलकर सबसे पहले अंश मोटर-साईकल के जरिये दीवार पर चढ़ जाता है |

    अंश उपर चढ़ जाता है बाद में ख़ुशी और क्रमानुसार पराग, चिराग चढ़ जाते है फिर अशोक निचे से जन्मदिन मनाने का सारा सामान उपर सबको दे देता है थोडा थोडा करके और फिर खुद दीवार पर चढ़ जाता है | सारे दीवार पर थोडा चलकर उस पेड के पास पहुचते है जहा से पहले अंश वगेरा हवेली में उतरा करते थे |

    ख़ुशी यह ले यह सामान पकड़ में सबसे पहले निचे उतर जाता हु बाद में मुझे तुम लोग सारा सामान देकर उतर जाना बारी बारी ठीक है ... अंश ने अपने हाथ में जो सामान था वो ख़ुशी को देते हुए कहा |

    अंश सबसे पहले निचे उतरता है और फिर सारा सामान अपने हाथो में लेकर निचे रख देता है और सबको निचे उतरने में मदद करता है | सब हवेली में उतर के थोडा थोडा सामान लेकर पीछे के दरवाजे की और आगे बढ़ते है और पहली मुश्किल का सामना करते थे |

   अबे मर गए ... सबसे आगे चल रहे पराग ने हवेली के पीछे के दरवाजे की और देखते हुए कहा |

   क्या हुआ अबे ...अंश ने कहा |

   सामने देखो पीछे के दरवाजे पर भी एक गार्ड बैठा हुआ है ...पराग ने कहा |

   सबका ध्यान पीछे के दरवाजे पर बैठे गार्ड की तरफ जाता है |

   अब क्या करेंगे ... हताशा के साथ ख़ुशी ने कहा |

   कोई और रास्ता नहीं है ...अशोक ने कहा |

   नहीं ना यार दो ही रास्ते थे और दोनों के पास गार्ड है | अभी इतनी बड़ी हवेली की दीवारे तो चढ़ नहीं सकते ... अंश ने कहा |

   यार इतना सारा सामान और रिश्क उठाकर हम वापस जाने के लिए तो नहीं आये थे अंश ...चिराग ने कहा |

   नहीं वापस तो नहीं जायेंगे | मुझे कुछ सोचने दो ...अंश ने अपना दिमाग लगाते हुए कहा |

   यार अंश जल्दी इस झाड़ियो में बहुत गर्मी हो रही है ... ख़ुशी ने कहा |

   चिराग ...अंश ने चिराग से कहा |

   हां बोल ना ... चिराग ने कहा |

   हमारे पास शराब की कितनी बोटल है ... अंश ने कहा |

   क्या तुम लोग शराब की बोटले भी लेकर आए हो ...ख़ुशी ने कहा |

   ख़ुशी हम कोई छोटे बच्चे का जन्मदिन मनाने के लिए नहीं आए है और हा तुम दोनों के लिए नहीं है हम तीनो के लिए है ...अशोक ने कहा |

   दो बोटले है ...चिराग ने कहा |

   एक साथ में ले ले और चल मेरे साथ बहार ...अंश ने वापस मुड़कर बहार जाते हुए कहा |

   अबे तुम क्या करने वाले हो ...अशोक ने कहा |

   तु रूक ना में रास्ता बनाके आता हु ...अंश ने कहा |

   अंश और चिराग दोनों अपने साथ आगे एक शराब की बोटल लेकर हवेली के आगे के बहार के मुख्य दरवाजे के पास जाते है और फिर वहा रूककर वह दरवाजा खटखटाते है | दरवाजे खटखटाने की आवाज सुनकर आगे के दरवाजे की निगरानी कर रहा बॉडीगार्ड कुछ बोलते हुए दरवाजे की और जाता है |

   कौन है अबे बार बार दरवाजा क्यों खटखटा रहा है ...गार्ड ने दरवाजे की और जाते हुए कहा |

   गार्ड दरवाजा खोलता है |

   हा जी बोलिए क्या काम है आपको ... गार्ड ने बहार आकर अंश और चिराग को देखकर कहा |

   जी हम लोग चुनाव चल रहा है तो विकास दल के पक्ष से है और सबको यह चुनाव में वोट के लिए शराब की बोटले दे रहे है तो सोचा आपको भी देदे अगर आपको पीनी है तो ...अंश ने शराब का लालच देते हुए कहा |

   हा लाईये लाईये ...लालची गार्ड ने कहा |

   हा पर आपको वोट हमारे दल को ही देना होगा ...अंश ने गार्ड से कहा |

   हा बिलकुल बिलकुल ...अंश से बोटल लेते हुए उस गार्ड ने कहा |

   ठीक है फिर चलते है अपना कोई साथी हो तो उनको भी दीजियेगा और वोट का भी कहियेगा ...अंश ने जाते हुए कहा |

   साले पुरे ७००० हजार की बोटल थी ...चिराग ने कहा |

   और कोई रास्ता था तेरे पास ...अंश ने कहा |

   ओह भाई आगे आजा एक कमाल का विदेशी माल हाथ में लगा है दोनो एक एक जाम लगाते है आजा ...अपनी जगह पर जाते हुए दुसरे गार्ड ने फोन लगाते हुए कहा |

   पीछे के दरवाजे पर जो गार्ड था वो अपनी जगह छोड़कर आगे की और चला जाता है |

   गया ...पराग ने गार्ड को जाते देख कहा |

   थोडा समय बीतता है | अंश और चिराग वापस आ जाते है |

   चलो जल्दी से घुसो अंदर ...अंश ने सभी से कहा |

   अभी तो जा रहे है लेकिन वापस कैसे निकलेंगे बहार ... पराग ने सवाल करते हुए कहा |

   अभी अंदर जाने का करो तुम लोग वापस आने का वापस आते वक्त देख लेंगे ...अंश ने कहा |

   सभी दोस्त पीछे के दरवाजे से होते हुए हवेली से अंदर घुसते है सिवाय अंश के |

   तुम लोग पहुचो में आया मुझे पेशाब लगी है ...इतना बोलकर अंश पेशाब करने के लिए चला जाता है और इधर सारे दोस्त हवेली के अंदर घुसते है |

   अबे यार यह तो बहुत बड़ी है ...चिराग ने हवेली को चारो और से देखते हुए कहा |

   हां यार ...अशोक ने भी |

   सारे दोस्त ख़ुशी के पीछे पीछे सीढियों से होते हुए दिव्या को जिस रूम में रखा गया है उस रूम के पास पहुचते है और इतनी देर में फटाफट दोड़कर अंश भी उनके साथ पहुच जाता है |

   ख़ुशी दरवाजा खटखटाती है | सोच में डूबी हुई दिव्या दरवाजे की खटखटाहट से बहार आ जाती है और अचानक से खड़ी होकर दरवाजे की और आती है | दिव्या के मन में कई सारे सवाल गूंज रहे थे की इतनी रात को कौन होगा |

   कौन है ...दिव्या ने आवाज देते हुए कहा |

   भाभी मै हु ख़ुशी दरवाजा खोलिए ...ख़ुशी ने कहा |

   सही समय पर है हम १२ बजकर एक मिनिट ही हुआ है ...अपनी घड़ी में ताकते हुए अंश ने कहा |

   दिव्या ख़ुशी की आवाज सुनकर सबसे पहले अपनी सारी सही करती है और फिर जल्दी से दरवाजा खोलती है और सामने ख़ुशी और अंश समेट सारे दोस्तों को देखती है और हाथ में कितने सारे सामान को भी |

   ख़ुशी और तुम लोग इतनी रात को यहाँ पर ... दिव्या ने सबकी और देखकर कहा |

   जन्मदिन की ढेर सारी शुभकामनाएं भाभी आपको ... ख़ुशी ने सीधा अपनी भाभी के गले लगते हुए कहा |

   Happy Birthday दिव्या जी ...अंश ने कहा |

   Happy Birthday...चिराग, पराग और अशोक ने कहा |

   कुछ देर तक दिव्या की समझ में कुछ नहीं आ रहा था की यह हो क्या रहा है |

   सारे लोग अंदर कक्ष में आ जाते है |

   यह सब क्या है ख़ुशी ...दिव्या ने चौकते हुए कहा |

   भाभी मुझे पता है आज आपका जन्मदिन है और हम आपका जन्मदिन मनाने के लिए आए है ...ख़ुशी ने बड़ी आसानी से कहा |

   क्या बात कर रही हो ख़ुशी तुम्हे शर्म भी नहीं आई एसा बोलते हुए और सोचते हुए | अभी तुम्हारे भाई को गए हुए १८ दिन हुए है और तुम जन्मदिन मनाने का सोच रही हो... दिव्या ने थोडासा गुस्सा होते हुए कहा |

   पर भाभी ...ख़ुशी ने कहा |

   पर वर नहीं सुनना मुझे | ख़ुशी तुम मानो ना मानो पर में एक विधवा हु और मेरे लिए यह सब करना पाप है और बार बार तुम भी मेरे साथ मिलकर इस सबका हिस्सा बन रही हो | मुझे यह सब शोभा नहीं देता है और अगर तुमको मेरे साथ उन लोगो ने देख लिए तो तुम्हारा बहुत बुरा हाल कर देंगे तुम समझ क्यों नहीं रहे हो | मुझे महेरबानी करके मेरे हाल पर छोड़ दो ...दिव्या ने चिल्लाते हुए कहा |

    एक मिनिट आप किसीकी बात सुनेगी महेरबानी करके ...अंश ने थोड़ी उची आवाज में कहा |

    क्या बोलना है अभी तुम्हे ...दिव्या ने कहा |

    आप चिल्लाये मत ख़ुशी या हम पर हमने कुछ गलत नहीं किया | हम सब यहाँ पर इतना बड़ा रिश्क लेकर इसलिए आए है ताकि आपके साथ ख़ुशी के दो पल बाट सके और आप जो कुछ दिनों से बहुत से अत्याचारों से गुजर रहे हो उससे थोड़ी आपको राहत मिल सके | बात यहाँ पे किसी के मरने के बाद जन्मदिन मनाने की नहीं है पर बात यहाँ पर किसी को दुःख के बिच ख़ुशी के दो पल देने की है अगर किसी को ख़ुशी के दो पल देने गलत है तो आप हमें यहाँ से भगा सकती है ...अंश ने अपनी बात दिव्या के सामने रखते हुए कहा |   

   बात यह नहीं है बात यह है की यह सब करने की मुझे आजादी नहीं है | में एक अभागन हु मेरे साथ रहेकर आपके भी दिन और जीवन बिगड़ सकते है आप यहाँ से चले जाईये अब में माया मुक्त हु मुझे संसार के किसी भी सुख को जीने की इजाजत नहीं है ... दिव्या ने आखो में आशु के साथ अपने दोनों हाथ जोड़कर अंश से कहा |

   यह सब आपकी सोच है जो इस गाव और समाज ने बोयी है | आप अभागन नही है | आपके अभागन होने की वजह से वीर ने शराब नहीं पी थी | उसने शराब पीकर कार चलायी वह उसकी गलती है और में नहि मानता इस विधवा के रिवाज में | मेरा मानना साफ़ है की अगर आप अपने पति से प्यार करते हो और वह अगर देह रूप से आपको छोड़कर चला जाए तो सिर्फ उसका शरीर आपसे छुटा है आपका प्रेम अमर है और उस प्रेम में आपका पति जिंदा है तो आपके पति के मर जाने के बाद भी अगर आपका प्यार अमर है तो में मानता हु की आपको तब भी सजना सवरना चाहिए और उसके नाम का मांग में सिंधुर लगाना चाहिए और अगर आपका पति मर गया और आप उससे प्यार नहीं करते थे तो उसमे भी यह रिवाज कोई काम का नहीं है आपको तो नया जीवन मिला है अब दोनों में से आप किस स्थिति में है यह मुझे नहीं पता पर यह रिवाज गलत है और हम उसके भागन अभागन किसी को नहीं मानते और रही बात हमारी सुरक्षा की तो इस वजह से ही छुपकर आपको फिर से जीवन जीना सिखा रहे है अगर पकड जाना होता तो सबसे सामने आपको मिलने आते | कभी कभी कुछ पलो को कुछ अडचनों को भुलकर जीना सिख लेना चाहिए दिव्या जी ...अंश ने दिव्या को लंबा भाषण देते हुए कहा |

   तुम समझ नहीं रहे अंश यह सब मेरे लिए आसान नहीं है | यह दो पल की ख़ुशी मेरे लिए सपने जैसी है बाद में तो जीवन वही है ना ...दिव्या ने अपनी तकलीफ कुछ शब्दों में बया करते हुए कहा |

   सही है पर यही जीवन है कल क्या होने वाला है किसको पता पर आपको जीवन जीना नहीं छोड़ना चाहिए और सोचो आपके जीवन में कुछ चीजे अगर छोड़ दे तो बहुत बढ़िया है इस हवेली में सबकुछ जिया जा सकता है अगर आप हमें बार बार यहाँ पर आने की इजाजत दे दे तो | हम यहाँ पर ढेर सारे खेल खेल सकते है किताबे पढ़ सकते है और बहुत कुछ कर सकते है ...अंश ने दिव्या से कहा |

    अंश जो भी बोल रहा था वह सबकुछ सही था पर जीन हालातो में दिव्या थी उस जगह पे रहकर यह सब सोचना और करना बहुत ही मुश्किल था |

    भाभी आप को मेरी कसम है आज रात सबकुछ भुल जाईए और हमें यह जन्मदिन मनाने दीजिए कल जो होगा वो कल देख लेंगे कल की आज क्यों सोचे ...ख़ुशी ने दिव्या से कहा |

    हा पर ...दिव्या ने ख़ुशी के सामने देखते हुए कहा |

    मुझे कुछ नहीं पता अगर आप खुश नहीं रहोगे तो में भी नहीं रह सकती मुझे आपका हर एक दिन सही बनाना है और अगर कभी मौका मिला तो आपको इस रिवाज और इस दर्दनाक भरे जीवन से भी में आपको निकालूंगी चाहे मुझे इसके लिए अपनी जान ही क्यों ना देनी पड़ी ...भावुकता के साथ ख़ुशी ने कहा |

    बस कर यह सब क्या बोल रही है तु ...ख़ुशी के गले लगते हुए दिव्या ने कहा |

    दोनों रोने लगते है |

   दिव्या जी यह सच बोल रही है हम कुछ ना कुछ जरुर करेंगे क्योकी यह सवाल सिर्फ आपका नहीं है पर इस गाव की हर एक औरत का है और किसी ना किसी को तो इसके लिए कुछ ना कुछ तो करना ही होगा ...अंश ने दिव्या से कहा |

   हम राक्षसों के बिच है अंश हम से कुछ नहीं हो सकता अब तो बस जैसे तैसे यह जीवन कट जाए ...दिव्या ने कहा |

   आप एसा मत बोलिए ...अंश ने कहा |

   सब दिव्या को दो पल ख़ुशी के देने के लिए तो आ गए थे लेकिन यहाँ आकर हर किसी के दिमाग में यही सवाल चल रहा था की हम आजाद है हमारे लिए यह सब करना आसान है पर दिव्या तो केद में है आज अगर जन्मदिन मना भी लिया तो कल तो उसके लिए वही जीवन इंतजार कर रहा है जो उसके गाव वालो ने और समाज ने दिया है उसका क्या ? क्या दिव्या का यही जीवन रह जाएगा क्या उसके लिए हम कुछ नहीं कर सकते ? किसी को कुछ समझ नहीं आ रहा था पर अब आगे जो भी होने वाला था वह सबकुछ बदल देने वाला होने वाला था | आगे कहानी में बहुत से रहश्य खुलने वाले है जिसे पढ़कर आप इस कहानी से दिल से जुड़ने वाले है तो जुड़े रहिएगा हमारी कहानी Hum Ne Dil De Diya के आने वाले सारे अंको के लिए |

    ५००० शब्दों की मर्यादा की वजह से बहुत से सवाल सवाल बनकर रह गए है पर उसके उत्तर आपको आगे के अंक में मिल जायेंगे जैसे की क्या दिव्या इस पार्टी के लिए तैयार होगी और होगी तो किस सोच के साथ ? कैसे सब हवेली के बहार निकलेंगे उन दो वोचमेन के होते हुए ? क्या ख़ुशी के घर वालो को सब पता चल जाएगा ? सारे सवालों के उत्तर पढने के लिए पढ़े इस नवलकथा का अगला अंक |

TO BE CONTINUED NEXT PART ...

|| जय श्री कृष्णा ||

|| जय कष्टभंजन दादा ||

A VARUN S PATEL STORY 

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