बिटिया पर हुई सघन चर्चा अशोक असफल द्वारा लघुकथा में हिंदी पीडीएफ

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बिटिया पर हुई सघन चर्चा

बिटिया पर हुई सघन चर्चा पर सत्येंद्र कुमार रघुवंशी की टिप्पणी
इस कहानी का धमाका पूरे पटल ने महसूस किया है। कहानी जिस चुस्त और रोचक अंदाज़ में लिखी गयी है, वह क़ाबिल-ए-तारीफ़ है। भाषा की जीवंतता आद्योपांत बाँधकर रखती है। ज्योति एक दिलचस्प पात्र है। उसकी कुछ महत्वाकांक्षाएँ हैं जिन्हें कहानीकार ने सधी और खरी भाषा में पाठक तक पहुंचाया है। उसकी उड़ानें गुड्डू नामक पात्र, जो वकालत के पेशे में कामयाबी की कई सीढियाँ चढ़ चुका है, पूरी करने की क्षमता रखता है। वल्लरियाँ सीधी खड़ी होने और ऊपर तक जाने के लिए किसी पेड़ का सहारा लेती ही हैं। गुड्डू जो शादीशुदा है और एक बेटी का बाप है, ज्योति के पिता से कम आयु का है मगर ज्योति से काफ़ी बड़ा है। कहानीकार कहानी को इन दोनों पात्रों, जो स्त्री-पुरुष हैं, के मनोविज्ञान की सुरंग से लेकर आगे बढ़ाता है। यह एक दुर्वह दायित्व है। इस दायित्व का निर्वाह उसने जिस तरह से किया है, उसने पाठकों, जो सुधीजन हैं और कथा-जगत् के निकटतम सम्पर्क में रहते हैं, को पक्ष-विपक्ष में बतियाने के अवसर उपलब्ध कराये हैं।
हर व्यक्ति मूलतः मर्यादा-प्रेमी होता है। नैतिकता की उसकी जो मान्यताएँ हैं, सदाचरण को लेकर उसके जो विचार हैं, चारित्रिक स्थितियों के बारे में उसकी जो धारणाएँ और उद्भावनाएँ हैं, उनका उल्लंघन उससे बर्दाश्त नहीं होता। कहानी के उत्तरार्द्ध में गुड्डू और ज्योति शहर से बाहर अर्थात् राजधानी में होने के कारण एक होटल में ठहरते हैं। यह एक बढ़िया होटल है। गुड्डू वहाँ एक बढ़िया कमरा लेता है। फ़्रेश होकर दोनों हॉल में डिनर के लिए जाते हैं। म्यूजिक प्रोग्राम डिनर के आनन्द को बढ़ा देता है। जब वे कमरे में लौटते हैं तो कपड़े चेंज करके एक बेड लेट जाते हैं। ज्योति का यह सहज व्यवहार ही है क्योंकि वह गुड्डू को ख़ुद से बड़ा और एक तरह से उसे अपना संरक्षक मानती है और उसकी संगति में स्वयं को निश्चिन्त और पूर्णतः अकुंठ पाती है। गुड्डू जो उसे निरन्तर आगे बढ़ने के अवसर मुहैया करा रहा है, का सामीप्य उसे ताक़त देता है और उसके आत्मविश्वास को बढ़ाता है। सोने के लिए गुड्डू बत्ती बन्द कर देता है। बत्ती बन्द करने से पहले वह इस बारे में उसकी सहमति चाहता है तो वह सरलता से कहती है कि उसे उजाले में नींद नहीं आती। बत्ती बन्द होने पर कमरे में अँधेरा छा जाता है। इसके बावजूद कमरे की खिड़कियों से बाहर का उजास अन्दर आता है जिससे चाँदनी का आभास होता है। बिस्तर पर पड़ते ही ज्योति सो जाती है पर गुड्डू को नींद नहीं आती। एक युवती का सान्निध्य उसे विचलित कर देता है। पहले भी उसे ज्योति के सपने आते रहे थे। उसकी कोशिश पहले भी कई बार उसकी निकटता प्राप्त करने की रही थी। साथ में ज्योति रहेगी तो राजधानी का उसका सफ़र सुहाना हो जायेगा, राजधानी की यात्रा से पहले यह भावना भी उसके अन्दर स्वाभाविक रूप से आ गयी थी। शताब्दी में उसका व्यवहार (ज्योति की जीन्स पर हाथ मारना या उसके गले में हाथ डालकर कान में कुछ कहना या खिड़की से बाहर का कोई नज़ारा दिखाने के बहाने उसके सीने से कलाई सटा देना) उसकी पुरुषोचित उच्छृंखलता या संयमहीनता के संकेत दे चुका था। होटल के डाइनिंग हॉल में ज्योति के हाथ में हाथ डालकर उसका वहाँ जाना और डिनर के बाद दोनों का एक दूसरे की कमर में हाथ डालकर कमरे में आना भी एक तरह से मर्यादा या भद्र आचरण की सीमा-रेखा का उल्लंघन था। बहरहाल, विचलन और भटकाव के रात्रिकालीन लमहों में गुड्डू ख़ुद से तक़रीबन सटी ज्योति के साथ जिस तरह की कोशिशें करता है, वे उसके पूर्णतः विपथगामी हो चुके होने की ओर संकेत करती हैं। उसके इस भौंडे और काम-दग्ध बर्ताव से स्तब्ध हुई ज्योति नींद से बाहर आकर उसे यह कहते हुए परे धकेल देती है कि "हम तो आपको पापा समझते रहे।"
कहानी पर पाठकों की जो प्रतिक्रियाएँ आयीं, उन्होंने पटल को गुलज़ार कर दिया। यह एक प्रकार से विमर्श की धूम है। चुप बैठने वाले विमर्श की भट्ठी को ठण्डा कर देते हैं।
सर्वश्री पोखनलाल जायसवाल, श्याम सुन्दर तिवारी, चन्द्र कुमार पवार, लक्ष्मीकान्त कलुस्कर, सुधीर देशपांडे, पंकज कुमार, अरुण सातले, छत्रपाल जादौन, शिवसिंह यादव, सदानन्द कवीश्वर, शिव अवतार पाल, कमलेश झा, धनेन्द्र प्रवाही, आलोक मिश्रा, पूनम अरोरा, उर्मिला आचार्य, डॉ मधु गजवानी, डॉ मधुबाला सिन्हा, गीता चौबे, अनिता राज, धृति बेडेकर, शिवानी खन्ना, ख़ुदेजा खान, राजनारायण बोहरे, रीमा चड्ढा, त्रिलोक महावर, बलवीर सिंह पाल, छत्रपाल जादौन, अजय श्रीवास्तव, नीलिमा करैया, रश्मि चौधरी, सतीश खनगवाल आदि के विचार महत्वपूर्ण हैं।
मेरा मानना है कि किसी कहानी या उपन्यास को पढ़कर अगर पाठक-मन किसी भी तरह क्षुब्ध या उद्वेलित होता है अर्थात् उसमें व्यक्त किसी स्थिति, मनःस्थिति, प्रतिक्रिया, घटना आदि से सहमत या असहमत होता है तो इसे रचना की कमज़ोरी तो नहीं ही माना जा सकता। यह अधिक-से-अधिक रचनाकार के किसी अनुभव की जटिलता या अपरिभाषेयता या विशिष्टता या वैयक्तिकता मानी जा सकती है। ऐसे में हम उसके मन्तव्य या प्रयोजन की टॉर्च की रोशनी में रचना को पुनः पढ़ या समझ सकते हैं या नये सिरे से व्याख्यायित कर सकते हैं। संक्षेप में, किसी रचना के कथ्य में अगर कोई पाठक कोई अपाच्यता या दृष्टि की अव्यावहारिकता या अनुभव की किञ्चित् अस्वीकार्यता पाता है तो वह अपने पास उपलब्ध विकल्पों में से श्रेष्ठतम विकल्प अर्थात् रचनाकार के मन्तव्य की पड़ताल करने की सोच सकता है।
यह असफल जी की कहानी की ताक़त है, जिसने आपको इतना विचलित कर दिया। जब हम किसी स्थिति से क्षुब्ध या किसी वाज़िब कारण से बेहद विचलित होते हैं तो बेहतर और दूसरों से अलहदा सोचते हैं। आपका चिन्तन कई कोणों तक गया है। यह दरअसल एक तरह का परिपक्व स्त्री-चिन्तन है। जीवन के जिन कोनों तक पुरुष पाठकों की निगाह नहीं पहुँचती, वहाँ महिलाएँ टॉर्च लेकर या कभी-कभी अंधेरे की टोह लेते हुए पहुँच जाती हैं। यह बात मैं आपकी टिप्पणी के सम्मान में कह रहा हूँ। जहाँ तक मुझे ध्यान है, किसी भी टिप्पणीकार ने अपने चिन्तन के इजलास से ज्योति को बाइज़्ज़त बरी नहीं किया है। उसकी शत-प्रतिशत निश्छलता की गारंटी भी किसी ने नहीं ली है। बहरहाल असफल जी की कहानी एक ताक़तवर कहानी है। इस कहानी ने ज्योति की एप्रोच के शेड्स और काउंटर शेड्स के विमर्श में पाठकों को जिस तरह से उलझाया है, वह एक प्रकार का स्टाइल या कलात्मक सलीक़ा क्यों न माना जाये!
एक बात यह भी महत्वपूर्ण है कि कोई कहानी आदि अगर सरसरी तौर पर पढ़कर तुरन्त भुला दी जाये या बिना कोई प्रभाव पैदा किये पढ़ी जाये और (किसी भी प्रकार की) चर्चा के पाले को न छू पाये तो यह उसका प्राप्य नहीं माना जा सकता। रचनाकार केवल स्वान्तःसुखाय लिखता है और उसका अभीष्ट किसी की सृजन-पिपासा या आस्वाद-ग्रन्थि तक पहुँचना नहीं है, प्रचार-प्रसार के इस जिज्ञासु कालखण्ड में यह स्वीकार करना मुश्किल है। असफल जी की कहानी पर जो चर्चा हुई है और ज्योति-गुड्डू के बीच घटित एक बदसूरत प्रसंग के बारे में सहमति-असहमति (प्रतिक्रिया) का जो बगूला उठा है, उसे नज़रअंदाज़ करना कठिन है। स्वयं असफल जी ने इस बगूले से कुछ तिनके बटोरे हैं। तभी उन्होंने अपनी कहानी के अन्त को पाठकीय रुचि और आस्वाद के अनुरूप किञ्चित् परिवर्तित किया है। सृजन के क्षेत्र में ग़ज़ब की लोकतांत्रिकता होती है। वहाँ किसी भी वाज़िब नाइत्तिफ़ाक़ी की खिल्ली नहीं उड़ायी जाती और हर ज़रूरी मशविरे को सिर आँखों पर बिठाया जाता है।
-सत्येंद्र कुमार रघुवंशी