नया घर अशोक असफल द्वारा लघुकथा में हिंदी पीडीएफ

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नया घर

शादी को छह-सात साल हो गए थे पर सुमित को सन्तान सुख नहीं मिला। पत्नी और अपना चेकअप भी करा लिया। कोई कमी नहीं थी, लेकिन पता नहीं क्यों? दोस्तों से अक्सर बात होती...।
मज़ाक में विजेंद्र ने सुझाया- पुत्रेष्टि यज्ञ क्यों न करा ले! मैं एक ऐसे पंडित को जानता हूँ जो गारंटी से यह काम करा देता है।'
सुनकर निराश हो चुके सुमित के मन में अभिलाषा का नया अंकुर फूट गया। वह विजेंद्र के साथ मेरे घर आ पहुंचा। सारी बात सुनकर मैंने दोनों के नाम पूछे और मोटे तौर पर गृह-नक्षत्र का आकलन कर कहा, "शादी से पहले कुंडली क्यों नहीं मिलवाई? तुम्हारी नाम-राशि के हिसाब से तो पितृ दोष बन रहा है। पितृ दोष वाले जातकों को संतान सुख में बाधा का सामना करना पड़ता है।'
-क्या करूं महाराज?' उसका मुँह सूख गया।
-विधान से निवारण हो सकता है!'
-कब करा सकते हैं?'
-जब चाहो, लेकिन हमें समय निकालना पड़ेगा।'
-तो निकाल लीजिए, पंडित जी!' उसके दोस्त विजेंद्र ने अनुरोध किया।
इस पर मैंने आश्वासन दिया, अवश्य, शीघ्र ही सूचित करेंगे।'
तब सुमित घिघियाता-सा बोला, पंडित जी, तब तक हवन-सामग्री लिख दीजिये, लेकर साफ-सूफ करा कर रख देंगे।'
-हाँजी, एक दो दिन में लिखकर पर्चा तुम्हारे घर पहुंचा देंगे, पता दे जाओ।' मैंने विश्वास दिलाया तो नारियल सौंपकर वह मित्र के साथ वापस लौट गया।

कुछ दिनों बाद रात के आठ बजे किसी के बंद दरवाज़े पर खड़े होकर बेल बजाते हुए दरवाजा खोलने की प्रतीक्षा करना बड़ा अटपटा लग रहा था... मेरा वहाँ से भाग जाने का मन हुआ। किंतु तभी किसी ने दरवाजा खोला, माथे पर अनायास छलक आए पसीने की बूंदों को मैंने कंधे पर पड़े गमछे में समेट लिया और सामने देखा, चौखट के बीच कोई चौबीस-पच्चीस वर्षीय युवती मुझे बड़ी अजनबीयत से देख रही थी।
“सुमित घर में हैं?” मैंने अचकचा कर पूछा।
“जी, वो दिल्ली ग...ए हैं!” कहते शायद सोचा कि बताना नहीं चाहिए था।
“कब तक आएँगे?’ मुझे अपने असमय यहाँ आने पर खीझ होने लगी।
“मालूम नहीं, पर आप...“
शायद, यह सुमित की ब्याहता है! मैंने गौर किया, आधी बाँहों की हरी छींटदार कुर्ती और नीली सलवार पहने मध्यम कद की वह युवती मुझे आकर्षक प्रतीत हुई। उसने विवाह से पहले कुंडली न मिलवा कर इस बेचारी को संकट में डाल दिया...
-हम पंडित जी...वो सन्तान विधान कराना है...तो सामग्री का पर्चा देने...चले आये!'
सुनकर उसकी आँखों में चमक-सी आ गई और मैंने देखा- वह आदर पूर्वक मुझे अंदर बुलाती दरवाजे से हट गई।
भीतर आकर मैं सोफे पर बैठा तब तक वह पानी का गिलास ले आई। मैंने अपनी नजरें फिर उस पर जमा दीं। रोशनी में नहाया उसका चेहरा अब मुझे पूर्व परिचित-सा लग रहा था। कहीं देखा है? पर कहाँ? दिमाग़ पर जोर डालने के बावजूद भी मुझे कुछ याद नहीं आ रहा था।
“लीजिये!” उसने मेरी और ट्रे बढ़ायी। और मैंने चौंक कर उस पर से अपनी दृष्टि हटा पानी के गिलास पर जमा दी। राम जाने क्या सोच रही होगी मेरे इस तरह भटर-भटर देखने को लेकर...
-फिर किसी दिन चला आऊंगा।' मैंने घबराकर कहा।
-जी!' उसने स्वीकृति से गर्दन हिला दी।

उस दर से लौटने के बाद मैं एकबारगी स्नेह के धागों में झूलने लगा...। यह मानव मन की गति भी कितनी विचित्र है...कोई दिखा नहीं कि लग गया उसके पीछे! अब मुझे सबकुछ याद आ गया, सुमित ने उसका नाम काजल बताया था! चेहरा विस्मृत नहीं हो रहा था, परेशान करने लगा... और मैं विधुर प्रौढ़ लगभग किशोरावस्था में प्रवेश कर गया। कुछ दिनों बाद मन अधीर हो-हो कह उठा, कि अब तो दिल्ली से लौट आया होगा! क्यों नहीं सुमित के घर हो आऊँ! देख आऊँ उसे! विधान का बहाना भी था!
घर से निकलते ही बूंदाबांदी होने लगी। पर मैं रुका नहीं। गोया उसे वर्षा की बूंदों के साथ अठखेलियाँ करते देखना चाहता था...।
संयोग से मुझे कॉलबेल भी दबाने की आवश्यकता नहीं पड़ी, दरवाजा खुला पडा था जहाँ से खड़ा होकर मैं अंदर का काफी कुछ देख सकता था। लेकिन न जाने क्यों, मुझे घबराहट होने लगी, माथे पर पसीने की बूंदें उभरती महसूस हो रही थीं। मैंने गमछे से पोंछने कंधे पर हाथ डाला, पर जल्दी में शायद मैं उसे घर पर ही भूल चुका था। अब क्या करूँ? चुपके से इधर-उधर देखा और उँगलियों से पसीने को समेटने का प्रयास करने लगा... तभी भीतर आहट के स्वर उत्पन्न होने लगे... शायद, जो भीतर था उसे किसी के बाहर आने का एहसास हो गया था। मैंने घबराकर भीतर की तरफ अपनी दृष्टि फैला दी जैसे चोरी पकड़ी जाने वाली हो... तभी देखा, सामने से वही चली आ रही थी... चटक लाल रंग का सलवार कुर्ता पहने, तौलिये से अपने गीले बालों को सुखाने का प्रयास करती... पर बालों से पानी की बूंदें कुछ इस तरह झर रही थीं मानो सूखी धरती को भिगो देना चाहती हों।
-अरे आप!' पहचानते ही वह जैसे चौंकी!
-जी सुमित.....' मेरे मुँह से अस्फुट-सा स्वर फूटा।
-आज भी नहीं हैं...' कहते मुस्कुरा पड़ी।
मुस्कुराते हुए दाएं गाल पर गड्ढा पड़ रहा था, जिससे सौंदर्य द्विगुणित...
-कहाँ गए हैं?' मैंने जाहिर नहीं होने दिया कि किसी और कारण से आया हूँ!
-ऑफिस।' वह अपने बालों को तौलिये में लपेट चुकी थी।
-तो चलूँ...' मैंने निराशा से कहा।
-चाय लेकर जाइये...' वह आग्रह पूर्वक बोली और अंदर चली गई।
मैं सोचने लगा कि यह अच्छा ही है, सुमित न मिले और मैं इसी तरह आता रहूँ। मिलने पर तो तारीख तय हो जाएगी और कार्यक्रम के बाद सदा-सर्वदा को छुट्टी। क्योंकि इस विधान के यजमान स्थाई नहीं होते। दरअसल, बॉयोलॉजिकल अक्षम लोग ही इसे कराते हैं और बाद में निराश हो जाते हैं तो फिर सम्पर्क नहीं रखते।
अब तक वह चाय ले आई थी। चाय बहुत अच्छी थी। मैंने तारीफ की। वह खुश हुई। उसके बाद मैं उठता हुआ बोला, 'संडे को आऊंगा।'

और वह रोकना चाहती थी, लौटकर भी यह एहसास दिल से गया नहीं! रात को छत पर टहलते हुए, आकाश से कोई शुभ्र तारा तोड़ लेने की इच्छा अंदर जनम लेने लगी...।
संडे जैसे सदियों में आया। और मैंने आज पहली बार दिन में आकर फिर उसी दर पर डरते-डरते टोह ली। बेल के बटन पर उँगली रखते दिल खड़खड़ा उठा, सुमित कहीं यकायक न कह बैठे, आप तो हाथ धोकर ही पीछे पड़ गए!
दरवाजा धीरे-से खुला... दरवाजे के मध्य फिर वही थी!
मेरी टकटकी बंध चुकी थी।
आज वह मुस्कुरा नहीं रही थी। व्यग्र थी पहले से कहीं ज्यादा।
बाल बिखरे-बिखरे, कपड़े अस्त-व्यस्त...
और मेरा आना ठीक नहीं लग रहा हो, फिर भी औपचारिकता-वश अंदर आने के लिए कहा हो!
पर मैं वह सब अनदेखा कर मोहित-सा पीछे-पीछे चल आया...। अंदर सुमित आज भी नहीं, शायद! तभी शायद किचिन से आवाज आई, 'आज ऑफिस में ऑडिट आ धमका...'
मुझे फिर एक बार शर्मिन्दगी का एहसास होने लगा। मगर तब तक वह खाना ले आई, और मुस्कराती हुई बोली, 'आज चाय नहीं, खाने का समय है, खाना लीजिये!'
और मैं दूसरों के भविष्य बताने वाला पंडित, अपने भविष्य को अपने सम्मुख अचरज से मुँह फाड़े देख रहा था। काजल ने खाना मेज पर रख दिया था और अब शायद पानी लाने जा रही थी...।
खाना देखते ही लार ग्रंथियाँ सक्रिय हो उठीं... पंडितानी जब से गई है, पराया चौका ताकते भूख मतवाली नदी बन जाती है।
मैंने उजबक की तरह उठकर हाथ धो लिए। ...और उसके आने तक खाने की मेज पर आ विराजा, जो मेरे लिए पानी नहीं, अपने लिए भी खाने की थाली ले आई थी!
खाने की तारीफ करते मैं चटखारे ले रहा था और वह प्रसन्न हो रही थी...। इस सन्तुष्टि पूर्ण मुस्कान ने उसकी सुंदरता में चारचाँद लगा दिए थे।
खाने के बाद मैंने डरते-डरते टोह ली कि- चलूँ! फिर किसी दिन चला आऊँगा!' तो वह निराश-सी चुपचाप दीवार का सहारा ले खड़ी रही, फिर बुज़दिल-सी बोली, 'बैठिए... वे शायद, लौटने वाले हों।’
-हाँजी, एक मीटिंग हो जाय तो फिर कार्यक्रम में क्या देर!' कहते मैं सजे-धजे ड्राइंग रूम के गुदगुदे सोफे में आकर धँस गया। इच्छा हो रही थी कि बेड मिल जाता तो तनिक विश्राम कर लेता।
इस बीच वह मेज से बर्तन उठाकर भीतर चली गई। जब लौटकर आई तो ड्राइंगरूम खुशबू और शोभा से भर गया! बाल सँवरे थे, सूट बदला हुआ, वही चटक लाल रंग वाला।
मुझे आराम फरमाते देख दीवार घड़ी पर दृष्टि डालते बोली, 'शायद, कहीं रुक गए हैं!'
-हाँ-और क्या...तभी नहीं आये...' मैं बुदबुदाया। पर मेरी बुदबुदाहट बादलों की गड़गड़ाहट में गुम गई थी। दो पल बाद हतोत्साह-सा मुखर हुआ, 'मुझे चलना चाहिए, कहीं बारिश न पड़ने लगे!'
-मेरा ख्याल है आप कुछ देर और देख लें, विधान जल्द हो जाये तो संकट कटे!' उसने व्यग्रता में कहा और खिड़की के पास जाकर बाहर देखने लगी। शायद, बूंदे बरसने लगी थीं क्योंकि कुछ देर में ही उसने कईं बार आँखें बंद कीं, जिससे मुझे लगा कि बारिश की बूंदों से उसे आत्मिक संतोष मिल रहा है।
-पूजा विश्वास से फलदायी होती है...तुम्हें विश्वास तो है?' मैंने पूछा।
घर के सामने ही हनुमान मंदिर था जो खिड़की से साफ दिख रहा था। पीपल की चोटी पर हनुमान जी का लाल ध्वज लहराता हुआ...। अचानक उसने चुटकी ली, 'इनकी बड़ी मान्यता है...'
'होनी चाहिए,' मैं स्वभावतः धार्मिक, तुरंत एक वैज्ञानिक कयास जोड़ता बोला, 'देव के साथ हमारे पूर्वज भी, आखिर हम मनुज वानर जाति से ही तो...!'
-पर ये केशरीनंदन, पवन देव के भी नहीं, शिव जी के औरस पुत्र हैं!' वह मुस्कराई।
-क्या-हुआ! उस युग का समाज ही ऐसा था,' मैंने प्रमाण दिया, 'दशरथ का पुत्रेष्टि-यज्ञ और कौरव-पांडवों की वंश परंपरा...'
-वही तो...' वह खुलकर हँसने लगी। और अर्थ समझ मैंने अपना सर पकड़ लिया। फिर जैसे मुँह छुपाने, 'चलता हूँ, रात काफी हो गई है।' कहकर इस बार सचमुच खड़ा हो गया।
-अरे...बारिश शुरू हो चुकी है, आप रुकिये!' वह जैसे तड़प उठी।
-कोई रिक्शा मिल जाएगा।' मैंने जिद पकड़ ली।
फिर वह बोली नहीं तो सोचने लगा, अब वह मुझसे रुकने के लिए नहीं कहेगी!
पर वह खिड़की से हट कर मेरे रास्ते में आ गयी! उसके माथे पर फैले बाल भीग चुके थे, उनसे धीमे-धीमे पानी की बूंदें टपक रही थीं। लग रहा था, बरसों से ठहरा प्यार एकाएक उमड़ पड़ा है! ऐसी अवस्था में हर शख्स में सिर्फ प्यार ही दिखता है। अब रुकना ठीक नहीं, मेरा डर बोला। पर मैंने ज्योंही कदम बढ़ाया, वह सिसकने लगी, 'विधान कराना है, आप रुकिए, आप उन्हें समझा कर जाइये...'
बारिश तेज़ हो गयी थी। सांत्वना स्वरूप हाथ मैंने उसके सिर पर रख लिया, फिर डरते-डरते पीठ पर और कहने लगा, 'क्या करूं, कितनी बार आ चुका...'
-वही तो,' सिसकना छोड़ वह शिकायती लहजे में बोली, 'इतना भी नहीं कि सामग्री ही लाकर रख देते, हम तो अकेले करा लेते...'
-सच!' मैं गोया चौंक गया फिर विवशता बताई कि- पंडिताई के नाते होम-द्रव्य तो मेरी गांठ में रहता है, पर वैदिक कुंड कहाँ से लाऊं!'
इस पर वह मुस्कराती हुई बोली, 'जी, वो मेरे पास है... गृहस्थी में सुई से लेकर जहाज तक रखना पड़ता है!'
मामला मनोनुकूल हो चुका था... बारिश सहायिका बनी हुई थी... सुमित आ नहीं पायेगा, मैंने सोचा और कल्पना में उसे बाजुओं में भर उठा लिया, मन ही मन बुदबुदा उठा- तो चलो, इसी बेला में यज्ञ सम्पन्न कर लें...
मगर हकीकत में तब तक कॉलबेल बज उठी! और वह दरवाजे की ओर बढ़ गई, मैं आकर सोफे में धँस गया।
बारिश से बचकर आया सुमित मुझे पाते ही एहसान से भीग गया...।
◆◆

विधान के लिए तीन दिन बाद की तिथि मुकर्रर हुई। मैं एक झोले में अपने कपड़े और एक सहायक को लेकर ब्रह्ममुहूर्त में ही उसके घर पहुंच गया। वहीं नहाया-धोया, वहीं पूजा-पाठ। पहले ही बता दिया था कि एक दिन और एक रात रुकना पड़ेगा तुम्हारे यहां। सुमित ने भी सहर्ष अपनी बैठक मुझे दे दी थी। सहायक अपने साथ पोथी-पत्रा और वैदिक हवन कुंड लेकर आया था। हव्य-सामग्री जो सुमित ने एक दिन पहले ही लाकर रख ली थी, सहायक ने सही अनुपात में उसे मिला लिया।
आहुति देने काजल को ही बिठाना था, सो कलावा बाँध तथा पवित्री पहना उसी को बिठाया गया। सर्वप्रथम शुद्ध धी का दीपक जला कर पूर्व से तैयारशुदा चौकी पर गणपति को स्थापित कर पूजन कराया गया। ततपश्चात उसी के हाथ से लड्डू गोपाल का पूजन कराया गया। उनको माखन-मिश्री का भोग लगा, फिर संतान गोपाल मन्त्र के सवा लाख मन्त्रों का जप शुरू हुआ।
उससे कहा गया था कि पूरा शृंगार करके बैठे। सो, लाल परिधान में वह सिंदूर से पूरी मांग भरे, आँखों में काजल, माथे पर बिंदी, ओठों पर लिपस्टिक, हाथों में चूड़ियाँ और पैरों में आलता रचे एकदम नव विवाहिता प्रतीत हो रही थी।
और सहायक और उसका ध्यान भले पूजा-विधि, मन्त्र जाप और आहुतियों पर हो, लेकिन मेरा तो उसके शृंगार, रूप-लावण्य और मधुर आवाज पर ही टिका था। सोच रहा था कि मुझे ऐसी स्त्री मिलती तो जीवन धन्य हो जाता...।
जप की समाप्ति से पूर्व वहाँ सुमित का मित्र विजेंद्र भी आ गया था। वह बहुत खुश था कि उसकी सलाह से अनुष्ठान हो रहा था। जप उपरांत सहायक ने जब पवित्री वापस ले ली और काजल ने पूछा, 'अब हम जा सकते हैं,' उसी क्षण विजेंद्र ने मुझसे कहा कि- 'हर अनुष्ठान की फलश्रुति सम्बन्धी एक कथा होती है,' और मैं विचार करने लगा तब तक उसने पूछा, 'क्या इसकी कोई कथा नहीं है?'
-हो तो सुना दीजिये जिससे कुछ आधार मिले...' सुमित ने अनुरोध किया।
-और रास्ता भी!' काजल ने जोड़ा।
तब कुछ देर आँखें मूँद सोचते रहकर मैंने कहा- इस जप की कोई कथा नहीं है... जैसी आपने करवाचौथ, तीजा, सन्तोषी माता या सत्यनारायण व्रतकथा में फलश्रुतियाँ सुनी हैं, वैसी तो बिल्कुल नहीं! पर श्रेष्ठपुत्र प्राप्ति की एक कथा जरूर है, जिससे एक नए वंश की नींव पड़ी।'
-लो, इससे अच्छा और क्या!!!" तीनों एक साथ बोले।
तब मैं कथा सुनाने के मूड में आ गया। मैंने कहना शुरू किया-
'एक बार की बात है, भगवान विष्णु वैकुण्ठ लोक में लक्ष्मी माता के साथ विराजमान थे। उसी समय वहाँ उच्चै:श्रवा नामक अश्व पर सवार होकर रेवंत का आगमन हुआ। उच्चै:श्रवा की सुंदरता की तुलना किसी अन्य अश्व से नहीं की जा सकती थी। वह समुद्र मंथन से प्रकट नवरत्नों में से एक था। लक्ष्मी जी ने पहली बार देखा तो उस अश्व की शोभा देखती रह गईं। जब विष्णु ने लक्ष्मी को उस अश्व को दत्तचित्त देखते पाया तो उन्होंने उनका ध्यान अश्व की ओर से हटाना चाहा। लेकिन लक्ष्मी जी तो अश्व को देखने में मगन थीं...। विष्णु द्वारा बार-बार झकझोरने पर भी उनका ध्यान अश्व पर से नहीं हटा तो उन्हें क्रोध आ गया और उन्होंने लक्ष्मी को शाप दे दिया, “तुम इस अश्व के सौंदर्य में इतनी खोई हो कि मेरे द्वारा बार-बार झकझोरने पर भी तुम्हारा ध्यान इसी में लगा रहा, अतः तुम अश्विनी हो जाओ।”
इतना सुनते ही लक्ष्मी जी के पैरों के नीचे की जमीन खिसक गई। वे तुरन्त क्षमा माँगते विष्णु से प्रार्थना करने लगीं कि- मैं तो आपके बिना एक पल भी जीवित नहीं रह पाऊँगी...मुझ पर दया करें, अपना शाप वापस ले लें।”
पर विष्णु ने कहा कि- अब आपको कुछ समय तो अश्व की योनि में रहना ही होगा...जब आपकी कोख से पुत्र उत्पन्न हो जाएगा तब उस योनी से मुक्ति मिलेगी।"
सुनकर लक्ष्मी ने सिर पीट लिया कि, हे प्रभु! ये कैसा दंड...'
कहकर मैंने एक उसाँस भरी और काजल को देखा, जिसके मुख पर हँसी की लहर थी...।
फिर मैंने बताया कि- इस तरह माता लक्ष्मी पृथ्वी पर अश्व की योनी में जीवन व्यतीत करने आ गईं। यहाँ आकर उन्होंने काफी समय तक भगवान शिव की आराधना की और उन्हें अपने तप से प्रसन्न भी कर लिया! पर शिव जी ने कहा कि- शाप जिसने दिया, निवारण तो वही कर पायेगा, इसलिए आप भगवान विष्णु की आराधना करें।" तो लक्ष्मी ने उनकी आराधना आरंभ कर दी। तब कुछ समय बाद भगवान विष्णु ने स्वयं अश्व रूप में अवतार लिया और माता लक्ष्मी के साथ अश्व योनी में समय व्यतीत करने लगे।'
यह सुन काजल ने घने कौतूहल से पूछा, 'क्या सचमुच!'
-हाँजी, पुराणों में लिखा है!' मैंने विश्वास दिलाया, 'उन्होंने यमुना और तमसा के किनारे रमण किया...जिससे लक्ष्मी ने कुछ समय बाद एकवीर नामक पुत्र को जन्म दिया।'
अब उसका आश्चर्य सातवें आसमान पर... नेत्र चौड़ाकर बोली, 'अरे- गजब!'
-फिर क्या हुआ महाराज?' विजेंद्र ने निष्कर्ष जानना चाहा।
सहायक को भागने की पड़ रही थी, वह बोला, 'पुत्र प्राप्ति के फलस्वरूप लक्ष्मी देवी श्राप से मुक्त होकर वैकुंठ धाम चली गईं। और एकवीर से हैहय वंश की उत्पत्ति हुई।'

दिन भर बहुत व्यस्त कार्यक्रम रहा था, इतना अधिक कि साँस लेने की फुर्सत न मिली। सो, रात तक सभी थक कर चूर हो गए थे। सहायक जब पोथी-पत्रा समेट अपने घर चला गया, सुमित मेरे पास आया और कहने लगा, 'महाराज! ऑडिट टीम अभी रुकी है...'
-अरे! बड़ा संकट है...' मैंने कहा।
-हाँ, और आज पूजा की वजह से मैं जा नहीं पाया।'
-तो अब...' मेरे मुख पर चिंता की लकीरें थीं।
-फोन आया है, जाना पड़ेगा, उनकी खान-पान की व्यवस्था कराने।'
सुनकर चिंतित होते मैंने उससे कहा, 'लेकिन सुमित जी, एक छोटा-सा और जरूरी अनुष्ठान तो अभी शेष है... उसे फलाहार करा दो जिससे थोड़ी शक्ति आ जाए, तब संपन्न कराएँ।'
-ठीक है, मैं दस-ग्यारह बजे तक आ जाऊँगा...'
-अरे... तब तक तो समय निकल जायेगा, जप के सवा घण्टे के भीतर ही इसे कराना होता है!' मैंने ताकीद की।
-आप करा दीजिये, महाराज! मैं नहीं रुक पाऊँगा!' उसने हाथ जोड़े। और मैं एक अनजानी खुशी से भर गया।
काजल सुन रही थी, वह मेरे और अपने लिए फलाहार लेने चली गई।
थोड़ी देर में सुमित तैयार होकर आया और मेरे पैर छूकर अपने दोस्त विजेंद्र के साथ निकल गया।
सुमित के जाने के बाद काजल दोनों हाथों में प्लेट्स लेकर आ गई। टेबिल पर रख वह आदर पूर्वक बोली, 'लीजिये!'
-तुम भी ले लो!'
-जी,' कहते वह बैठ गई।
फलाहार करते वह मुझे एहसानमंद नजरों से देख रही थी और मैं ऐसे जैसे लॉटरी लग गई हो!
फलाहार समाप्ति के बाद जब वह बर्तन समेट ले गई तो आज मैं निर्भयता पूर्वक उसके पीछे चला गया और बोला, 'तुम लोगों के सोने का कमरा कौनसा है, यह अनुष्ठान वहीं पर करना होगा।'
काजल ने मुझे बेडरूम दिखा दिया।
वह सुंदर था। उसमें बड़ा-सा बेड, कपाट, ड्रेसिंग टेबिल, दीवार पर कलात्मक पेंटिग्स, एसी और फर्श पर कालीन बिछा था। तेज परफ्यूम से महक भी रहा था वह कक्ष।
निरीक्षण कर मैंने कहा, 'ठीक है... अब तुम कोई ढीला वस्त्र पहन आओ और चौकी से दीपक तथा थाल से कदली फल उठा लाना।'
आज्ञा शिरोधार्य कर वह थोड़ी देर में आ गई। वदन पर उसने श्वेत गाउन डाल रखा था जिससे अब वह फूल-सी हल्की और अत्यंत कमनीय लग रही थी।
मैंने उसे बेड पर सीधा लेटने को कहा और एक मूढा लेकर नजदीक बैठ गया। झिझकते-झिझकते वह लेट गई तो दीपक जलाकर उसकी नाभि पर रख दिया। फिर केले के गुच्छे से एक बड़ा-सा केला तोड़ उसे पकड़ाते हुए कहा, 'इसे वस्त्र के अंदर अपने अधो शक पर रख लो।'
-कहाँ?' वह समझी नहीं।
-निचले अंग पर।'
सुनकर सनाका खा गई। जब फटी-फटी आंखों से मुझे देख रही थी तभी कड़क स्वर में मैंने कहा- यही वह टोटका है जिसके करने पर गर्भ ठहरेगा, अन्यथा नहीं। और इसे तुम्हारे पति के हाथों ही कराना था लेकिन वह बीच में ही चला गया तो मैं क्या करूँ?'
अब कोई चारा नहीं था। काजल ने झिझकते-झिझकते गाउन में हाथ डाल केला अंदर रख लिया। मैंने मंत्र पढ़ा, फिर पूछा, 'क्या वह प्रवेश कर गया?'
हिचकते हुए उसने गर्दन न में हिलाई। तब मैंने केले के गुच्छे से दूसरा पिलपिला-सा केला तोड़ा और उसे पकड़ा कर कहा कि इसे प्रयोग करो। और उसने आँखें बंद कर गाउन में हाथ डाल उसे बदल लिया! तब मैंने फिर मंत्र पढ़ना शुरू किया और तीन बार पढ़ने के बाद पूछा, 'क्या इसे सफलता मिली?'
और उसने इस बार भी निराशा में गर्दन हिलाई तब मैंने गुच्छे से सबसे छोटा केला तोड़कर उसे पकड़ाते हुए कहा, 'लो, इसे प्रयोग करो।' तो उसने परेशानी में पड़ उसे ज्यों-त्यों अपने गाउन में रखा, और इस बार मैंने खूब जोर से पाँच बार मन्त्र पढा "..................."
मुखाकृति भयभीत और रंग पीला पड़ गया। इससे तो मैं भी डर गया। क्योंकि वहाँ एक सन्नाटा-सा खिंच गया था। लग रहा था कोई अदृश्य शक्ति प्रकट हो रही है!
इस बार नहीं पूछा कि कदली फल प्रवेश हुआ अथवा नहीं! मूढ़े से उठते भयभीत से स्वर में बोला, 'जप व्यर्थ न चला जाये इसलिए तुम आज ही सम्पर्क कर लेना।'
-किससे...' उसने डरते-डरते पूछा।
-सुमित से, और किससे...' मैंने दीपक उसकी नाभि से उठाते हुए कहा।
सुनकर वह चुप रह गई और मैं दीपक हाथ में लिए चला आया, जिसे वापस पूजा की चौकी पर रख दिया और वहीं पड़ी चटाई पर लेट गया।
अच्छी तरह खा-पीकर झूमता हुआ सुमति घर आया, तब तक आधी रात बीत चुकी थी। रात में जब-जब पेशाब के लिए नींद खुली तो मैंने देखा, वह ड्राइंगरूम के सोफे पर ही पसरा पड़ा था।
◆◆

सुबह वह फिर जल्दी आज्ञा लेकर चला गया! ऐसा भी क्या काम, मैं सोचता रह गया...। उसके बाद काजल आई, जो अभी तक रात्रि वाले परिधान में थी, वही श्वेत गाउन! उसे देख मन ऐसे खिल गया, जैसे सूर्योदय पर कमल-पुष्प। मैंने कहा- बैठो!' मैं अभी तक चटाई से उठा नहीं था। विधान कराने में इतनी थकान हो जाती है, जितनी क्रिकेटर्स को भी नहीं होती।
पर वह बैठी नहीं। पीछे हाथ किये जो चीज छुपाकर लाई थी, वही मुस्करा कर मेरी झोली में डाल कर चली गई।
और मैं हतप्रभ। क्योंकि ये वही कदली फल था जो मैंने मन्त्र फूंक उसकी देह में पिरोया था। यानी विधान निष्फल हो गया... वह मुझ पर हँस रही थी!
खैर। मैं नहाया-धोया, पूजा-पाठ किया और झोला उठा चलने की सोची। पर बाहर के पोर्शन में काजल को न पाकर अंदर विदा लेने जा पहुँचा... तो न किचन और न वाशरूम, कहीं से कोई आहट न पा बेडरूम की तरफ चला आया, जिसका गेट उढ़का था। और इधर आते ही जेहन में रात का दृश्य कौंध गया जब मैं अधिकारपूर्वक इस भव्य कक्ष का स्वामी बना हुआ था और उसे दासी की तरह मेरी हर आज्ञा शिरोधार्य थी। उसी रौ में दरवाजा ठेल अंदर चला आया। जब उसकी कीक सुन पड़ी "हाय-मम्मीऽऽऽ!" तब उसे विवस्त्र देख मैं बुरी तरह झेंप गया।
कुछ कहते-करते न बना। जिस गति से आया था, उसी से लौट पड़ा...। खिसियाया मन एकदम भाग जाने को कर रहा था लेकिन दरवाजा कौन बंद करें, घर खुला छोड़कर भाग जाना तो एक और भूल होगी! इसी पसोपेश में बैठक में सिर झुकाए बैठा था। तब थोड़ी देर बाद लॉबी की ओर से उसका महीन स्वर सुन पड़ा, 'तैयार होकर कर हम तो आपको ही विदा करने आ रहे थे कि आप...'
पलट कर देखा- मैक्सी अंग में डाले शर्म से मुस्करा रही थी।
-जय हो!' मेरे मुँह से निकला और शर्म से हँस पड़ा, 'इससे बढ़िया विदाई और क्या हो सकती थी!'
सुनकर वह भी हँस पड़ी। झोला उठाकर बाहर निकल आया तो दरवाजे पर आ गई। मुड़ मुड़ कर देखा, जब तक ओझल नहीं हो गया, खड़ी रही।

अब आंखों में अक्सर ही उसकी कसी हुई मौसम्मियां और कमर तक लहराती काली घटाएं नाचती रहतीं।
स्वप्न में तो कभी-कभी मांसल नितंब थिरक उठते... एक बार तो अधो शक पर हथेली रख दी जो भीग गई और 'अरे राम-राम' कहते झटके से उठ बैठा, नींद काफ़ूर हो गई।
अब भागवत या रामकथा में भी जाता और वहां गीत-संगीत तथा वाचक की तालियों पर भक्ति की मस्ती में भारी भरकम स्तनों-कूल्हों और बेडौल कमर वाली प्रौढ़ औरतें बेताल नाच उठतीं तो मुझे उनमें भी काजल के मोसम्मियों से स्तन, खरबूजे की बटी से नितंब और पतली लहराती कमर दिखाई पड़ने लगती।
मन की दशा किसी से कह भी तो नहीं सकता था। किसी मनोचिकित्सक से भी नहीं, क्योंकि मुझे सभी जानते थे। आखिर में यही सूझा कि उसी के पास जाऊँ जिसके दरस-परस (दर्शन और स्पर्श) से तनिक सुख-चैन मिले। अब मेरा इलाज तो वही दर था। सो, एक नया बहाना लेकर उसी तरफ चला आया...और उम्मीद के बरक्स आज सुमित ओर उसका दोस्त दोनों ही घर मिल गए तो आते ही नानी मर गई।
लेकिन उन्होंने बड़ी आवभगत की। और इस बात का अफसोस जताया कि आपको विदाई भी नहीं दे पाये! खूब सोचते रहे कि जाएं पर व्यस्तता इतनी रही कि जा भी नहीं पाए। ईश्वर से प्रार्थना कर रहे थे, बड़ा मेहरबान है, उसने आपको यहीं भेज दिया।
अब मैं अनंत पश्चाताप से घिर गया कि यह मेरे प्रति क्या भाव रखते हैं और मैं इनके साथ कैसी घटियायी करने चला हूं! कितने विश्वास पूर्वक इन्होंने मुझे यह काम सौंपा, अपनी अनुपस्थिति में घर पर छोड़ा और मैं इन्हीं की इज्जत से खेलने चला हूँ...मन जूते मारने लगा और मैं भागने का जतन विचारने लगा। तभी वहां काजल आ गई जो कि इन दोनों के लिए नाश्ता ले आई थी। मुझे देखकर वह ऐसे खिल गई जैसे कली चिटक कर खिल जाती है। बस वही सूरत देखकर कुछ ढांढस बंधा।
मुझे देखते ही वह भीतर लपक गई और लौटते में मेरे लिए भी नाश्ता ले आई। उसी समय सुमित ने मुझे पांच हजार रुपये निकाल कर दिये और कहा, पंडित जी, यह आपकी दक्षिणा, कम तो नहीं, बता देना! और छोटे पंडित जी के भी बता दीजिए!'
तब मैंने कहा कि- यह तो बहुत हैं, इन्हीं में से दे दूंगा।'
-अरे बहुत अधिक हैं!' मुझे गिनने पर पता चला, उसे मैंने दो हजार लौटाने का प्रयास किया। मगर विजेंद्र ने कहा, अरे नहीं, अब निकल आए तो आप रख लीजिए। आप जैसा भला, भोला और विद्वान पंडित हमें कहां मिलेगा।'
-कृपा बनाए रखिएगा। आप जैसे निर्लोभ पुण्यात्मा व्यक्ति का आशीर्वाद पाकर हम धन्य हैं।' सुमित ने जोड़ा।
तभी मैंने सोचा कि ये यह न सोचें कि मैं दक्षिणा के लालच में आया, इसलिए कहने लगा- विधान के बाद थोड़े से व्रत-नियम भी होते हैं, मैं उन्हीं को बताने चला आया!'
-जरूर! आप बहुत ख्याल रखते हैं।' काजल मुझे लेकर बहुत उत्साहित थी।
उसके बाद में समझाने की तैयारी कर ही रहा था कि वह उठकर भीतर चली गई। और थोड़ी देर बाद विजेंद्र ने भी सुमित से कहा, चलो चलें! समय तो हो गया।'
जब मैं उन दोनों का मुंह देख रहा था, तब सुमित ने कहा, महाराज! आप तो आराम से बैठो, अभी काजल आती होगी, करना तो उसी को है, विधि-विधान बता देना, सामान का पर्चा दे जाना, मैं आज नहीं तो कल लाकर रख दूंगा।'
-तो ठीक है पंडित जी!' विजेंद्र ने मेरे पाँव छुए और सुमित ने हाथ जोड़ आज्ञा ले ली।
मैं देखता रह गया और वे उठकर चले गए। जब मोटर साइकिल की आवाज गूंजी, काजल अंदर से दौड़ती-सी आई और बाहर जाकर शायद, हाथ हिलाने लगी। फिर बाइक की आवाज गुम गई तो वह गेट बंद कर मुस्कराती हुई भीतर आ गई और मेरे बगल में सोफे पर बैठ पूर्ववत मुस्कराती हुई बोली, जी- फरमाइए...'
क्या फरमाऊं! मैं पश्चाताप में घिरा था। सुमित कितना भला है और कितना भरोसा करता है तुम पर और तुम कैसे छल रही हो उसे!
अंतर संवाद में मैं उसे घेर रहा था। और वह प्यार जताने मेरे कंधे से टिक गई थी। अगर मौके पर आज उसका पति न मिला होता तो मैं उसे टूट कर प्यार कर रहा होता...मगर उसकी सदाशयता ने मेरा मन बदल दिया था। समझ में साफ-साफ आ रहा था कि प्यार का आधार मानसिकता से है...!
-क्या सोच रहे हो...' उसने थाह ली।
-कुछ नहीं।' मैंने कहा।
-कुछ कैसे नहीं! मेरे बारे में उल्टा-सीधा सोच रहे हो ना!"
-नहीं, मैं सुमित के बारे में...'
-उनके बारे में क्या?'
-कितना जानते हो...' लगा वह आवेशित हो रही थी, क्योंकि कामना में विघ्न पड़ रहा था...
-यही कि वे हम पर भरोसा करते हैं!'
-तो! और क्या करेंगे...? विजेंद्र उनका 'गे' है!' बिजली-सी तड़प कर वह एकदम उठ गई।
-अरे!' मेरे सामने सारा रहस्य हठात ऐसे खुल गया जैसे किसी ने नाटक का पर्दा उठा दिया हो! यह शब्द हाल ही में मैंने सुना था और समझा था कि समान लिंग के व्‍यक्ति के प्रति कामुक भाव से आकृष्‍ट व्‍यक्ति, विशेषतः पुरुष; गे कहलाता है।
अब जाना कि काजल का दुख सिर्फ सन्तान हीनता नहीं, पति के प्यार का अभाव भी है। और उससे बढ़कर एक घृणा जो समलैंगिक के प्रति हो सकती है।
अब उसके प्रति और गहरी सम्वेदना उमड़ पड़ी थी। और मैं उसे खोजता उसी बेडरूम में जा पहुंचा। वहां वह तकिए में सिर दिए उदास पड़ी थी। पलँग पर बैठ प्यार से सिर सहलाते मैंने कहा, तुम्हें गलतफहमी भी तो हो सकती है, तुमने कैसे जाना।'
-उनके चरित्र से, व्यवहार से...' उसने दुख में डूबे स्वर में कहा, 'ऐसे लोग जो अपोजिट के प्रति आकर्षित नहीं होते, अपने ही जेंडर की ओर जिनका झुकाव होता है, गे नहीं तो और क्या!'
-तो फिर शादी क्यों? मैंने पूछा।
-समाज में अस्वीकार्यता के चलते इन्हें अपनी पहचान छुपाकर जीना पड़ता है...। शादी इसीलिए की ओर अब सन्तान भी चाहता है!'
सुमित का पर्दाफाश हो चुका था। अब मेरे मन में कोई डर या गिला नहीं। लेकिन माहौल ऐसा हो चुका था कि जैसे भोजन रखा होने पर भी भूख मर जाये! थोड़ी देर बाद मैंने कहा, 'अच्छा चलता हूँ।' और उसने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी तो उठकर चला आया।

मगर रात में मन में एक नई इच्छा जागने लगी। और मैं अगले दिन फिर उसके दर पर। जान बूझकर ऐसे समय पर पहुंचा जब सुमित जा चुका था। कॉलबेल की ध्वनि सुनते ही काजल ने दरवाजा खोल दिया और आज आते ही निसंकोच मैंने उसे बाँहों में भर लिया, 'तुमने पहले बताया होता...' मेरा स्वर काँप रहा था।
सुनकर वह चोंक पड़ी फिर मुस्कराते हुए बोली, 'अभी क्या उम्र निकल गई!'
-काजल...' मैं भावुक हो आया, 'तुम्हें एक संतान देना चाहता हूं...'
और वह हँसने लगी, 'हैहय वंश की उत्पत्ति के लिए...'
'हाँ-जी! पर अश्व योनि से नहीं, मानव योनि से...बाकायदा दाम्पत्य में बंधकर...'
और वह मुंह ताकने लगी तो मैंने फिर कहा, 'मैं एक वकील को जानता हूँ...'
-अरे... आप हमारे लिए यहां तक...' कहकर वह मेरी बाहों में ही रोने लगी तो इतना सुख मिला, जितना पहले कभी नहीं मिला था।
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