इस्तीफ़ा अशोक असफल द्वारा लघुकथा में हिंदी पीडीएफ

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इस्तीफ़ा

इजलास में ज्योंही दाखिल हुआ, मुलाजिम उठकर खड़े हो गए। आसंदी पर बैठा तो रीडर ने पेश होने वाले मुकद्दमों की फाइलें डाइज पर लाकर रख दीं। सबसे ऊपर ट्रेफिक मैन द्वारा काटे गए एक चालान की फाइल थी। केस था- एक साइकिल सवार पर जुर्माने का। मैंने मुस्कराकर गर्दन हिलाई कि यह भी खूब है! तभी सरकारी वकील ने आकर अभिवादन किया। मैंने विहंसते हुए कहा, पीपी साब! यह भी कोई मुकद्दमा है?' इस पर वह भी हं-हं-हं कर हंसने लगा।
-ठीक है, पेश करो!' मैंने रीडर से कहा।
चपरासी गैलरी में जाकर हांक लगाने लगा- नारायण राव हाजिर हो ऽ... '
इस बीच मैंने काले कोट वाले पीपी से पूछा- कोई एक्सीडेंट किया है, इसने?'
-नहीं जजसाब!'
-फिर?'
-बिना ब्रेक की साइकिल चला रहा था, चौराहे से गुजरा तो ट्रेफिक मैन ने पकड़ लिया।'
-बस!' मेरे मुंह से निकला। तब तक मुल्जिम नारायण राव कठघरे में आकर खड़ा हो गया। मैंने एक उड़ती-सी नजर डाली, कमीज-पायजामा धारी वह एक साधारण आदमी था। नजरें झुकाकर मैं फाइल पढ़ने लगा। मुल्जिम का पेशा पढ़ते ही झटका-सा लगा! नजरें उठाकर उस पर गड़ा दीं और अचानक फट पड़ा:
-शर्म नहीं आती ऽ... अध्यापक होकर कायदे का पालन नहीं करते? बिना ब्रेक की साइकिल चलाते हो... विद्यार्थियों को क्या कायदा सिखाते होगे? टयूशन खोरी करते होगे... पीढि़यों को बरबाद कर रहे हो...।'
अध्यापक नारायण राव जो कि पहले बेफिक्र खड़ा था, बात सुनते ही सहम गया। मैंने रीडर से कहा, एक मोटी-सी नोटबुक मंगाओ!'
ट्रेफिक मैन की गवाही जरूरी नहीं समझी। वह भीगी बिल्ली बना खड़ा था। पीपी भी मेरे तेवर देख सतर्क हो गया। वैसे भी शोर था कि नए जजसाब सख्त हैं। नया खून है, नया जोश। नोकरी का नया-नया नशा। किसी को बख्शते नहीं। इजलास में सिर्फ सांसों की आवाजें रह गई थीं। रीडर नोटबुक ले आया तो मैं उसकी मोटाई उंगलियों से नाप उसी को वापस करते हुए बोला, मुल्जिम को दे-दो, साथ में एक नया डाॅटपेन भी। फिर मुल्जिम से बोला, इस पर लिखो- जीवन में अब कभी कोई गलत काम नहीं करूंगा...।'
सुनते ही वह शायद, यह सोचकर मुस्करा पड़ा कि यह कौन-सी बड़ी सजा है? तभी मैं दहाड़ा- खबरदार ऽ! जो नोटबुक की एक भी लाइन छोड़ी... एक भी पेज खाली छोड़ा... इसे पूरा भरिए, आपकी यही सजा है ऽ।'
सुनते ही उसका मुंह फक पड़ गया। फाइल मैने रीडर को वापस कर दी। उसने ट्रेफिक मैन को बुला हस्ताक्षर ले लिए और उसे वापस जाने को कह दिया। पीपी दूसरे मुकद्दमों की सुनवाई कराने लगा। इस दौरान मैं नजर उठाकर देख लेता कि पिछली बैंच पर बैठा मुल्जिम नोटबुक भर रहा है या नहीं!

बीच में लंच ब्रेक हुआ। मैं अपने केबिन में जा बैठा। किसी को पता नहीं था कि ऐसी अनोखी सजा मैंने अध्यापक को क्यों दी? दबी जुबान लोग कह रहे थे, साब सनकी हैं। जबकि घटना सनक से नहीं, मेरे विद्यार्थी जीवन से जुड़ी थी। तब मैं दसवीं में पढ़ता था। इम्तिहान बोर्ड का था। मेरा मैथ पिछड़ रहा था। पिछड़ने का कारण मैथ वाले सर थे। मैंने पिताजी से कहा कि- मेरा गणित पिछड़ रहा है।'
-क्यों?'
-सर क्लास में मैथ नहीं करा रहे।'
-क्यों?'
-ट्यूशन पर पढ़ा देते हैं।'
-तुम पर गणित की किताब तो है?' उन्होंने आंखें निकालीं!
-हां!' मैंने गले का थूक घोंटा।
-उसी से कर लिया करो!' उन्होंने हाथ झाड़ लिए।
मैं मां से जा रोया, मुझे कुछ प्रश्नावलियां नहीं आरहीं...' उन्होंने पिताजी से कहा। और वे मां पर भी बरस पड़े, नहीं आ रहीं, क्या मतलब ऽ... दो दूनी चार होते हैं या तीन और पांच? ये पहले से पिछड़ रहा होगा, गणित तो रेल की तरह है जो स्टेशन से एक बार छूट गई तो फिर छूट गई... मिडिल से पिछड़ रहा होगा!'
-नहीं... कोर्स बदल गया है', मैं मिमियाया, 'मुझे टयूशन लगवादो... मेहनत करके कवर कर लूंगा।'
-हम तुम्हें स्कूल पहुंचा रहे हैं, कहीं काम पर नहीं लगा रहे, यह क्या कम है...?' वे उखड़ गए।
दिल बैठ गया मेरा। मां ने समझाया, गरीबी है, बेटा! बड़ी मुश्किल से गुजर हो रही है...' उसने आंखें भर लीं। और मैंने कहा, एक मुसीबत नहीं है, मां! होमवर्क न होने पर सर क्लास से निकाल देते हैं...।'
-तू दोस्तों से कांपी मांग लिया कर...' वे साहस देते हुई बोलीं।
-दोस्त देते नहीं... एक ने दी तो सर ने उसे भी डांट दिया। वे सभी पर ट्यूशन के लिए प्रेशर बना रहे हैं... मैं रुआंसा हो आया।'
मां ने सुझाया कि प्रिंसिपल साब से कहूं। और मैंने हिम्मत कर एक दिन उनसे कहा, सर! मेरा मैथ पिछड़ रहा है...'
-उन्होंने डांटते हुए पूछा, क्यों?'
-वो-सर! मैथ वाले सर कोर्स क्लास में नहीं करा रहे...' कहते मैं हकला गया।
-खन्ना सर!' आंखें निकाल कर उन्होंने पूछा।
-जी, सर!' कहते मेरी घिग्घी बंध गई।
-क्यों ऽ..?' वे मुझी पर दहाड़े।
-पता नहीं सर, आप...' मेरा बोल रुक गया यह कहते कि आप पूछ लो और भाग पड़ा। और वे पीछे ही क्लास में आ गए! पूरी क्लास और खन्ना सर उन्हें देखते ही खड़े हो गए। सिर्फ सांसों की आवाजें रह गईं। प्रिंसिपल साब सख्ती से बोले, खन्ना सर!'
-जी-सर!'
-इसकी शिकायत है कि आप पढ़ा नहीं रहे?'
-इसे छोडि़ए सर, बाकी क्लास से पूछिए...।' फिर वे लड़कों की ओर इशारा कर बोले, क्यों भई, गणित अनकम्पलीट है तुम्हारा?'
-नहीं सर ऽ! सब एक स्वर में चीखे।'
मुझे ताज्जुब हुआ कि वे लड़के भी चीखे जो मेरी तरह ट्यूशन नहीं लगा पा रहे थे और मैथ उनका भी पिछड़ रहा था। होम वर्क पूरा न होने से क्लास से उन्हें भी बाहर कर दिया जाता...।
खन्ना सर ने कहा, प्रिंसिपल सर को कांपी चैक कराओ अपनी...।'
सुनकर लड़कों ने अपने-अपने बस्तों से कांपियां निकाल कर सर की टेबिल पर ढेर करदीं। डर के मारे मैं दीवार से चिपक गया। प्रिसिपल साब मुझे खा जाने वाली नजरों से घूरते हुए बाहर निकल गए। उसके बाद खन्ना सर ने एक अत्यन्त कठिन सवाल ब्लैक बोर्ड पर लिख दिया, बोले, जो छात्र इसे हल न कर पाए, खुद मुर्गा बन जाए। मेरे साथ आठ और लड़के जो ट्यूशन नहीं जाते थे, चुपचाप मुर्गा बन गए। उसके बाद हम लोगों पर दो-दो ईंटें मंगाकर रख दी गईं।
अगले दिन से मैथ का पीरिएड छोड़ दिया मैंने। परिणाम बुरा निकला। मैथ में मेरी बैक आ गई। हाईस्कूल किसी तरह निकाला, इंटर में मैथ छोड़ दिया मैंने। आईटी का सपना चूर हो गया। आगे चलकर बीए और लाॅ के सिवा कोई रास्ता न बचा।

लंच के बाद डाइज पर पहुंचा तो अध्यापक महोदय नोटबुक भरते मिले। मैं अन्य केसों में लग गया। अदालत उठी तो मैंने बैंच खाली देख रीडर से पूछा, मुल्जिम चला गया ?'
-जी, सर!' वह उठकर मेरे पास आ गया, मुस्कराता हुआ बोला, नोटबुक पूरी भरकर दे गया है।'
बात आई-गई हो गई। पर तीन-चार दिन बाद अचानक सपने में मुझे खन्ना सर दिखाई दिए। अदालत आकर रीडर से मैंने अध्यापक नारायण राव द्वारा भरी गई नोटबुक मांगी तो उसने रिकार्ड से निकाल कर नोटबुक मुझे पकड़ा दी। खोल कर देखी। उसका हर पेज लिखावट से भरा था... प्रत्येक पेज और प्रत्येक लाइन पर वही एक वाक्य लिखा था- जीवन में अब कभी कोई गलत काम नहीं करूंगा।
खन्ना सर के खिलाफ मन में जो गुस्सा भरा था, वह बदले के रूप में निकल गया। यह क्या हुआ...? नारायण राव उनकी तरह काइयां तो न थे। न शहरी। सीधे-सादे देहाती लग रहे थे...। सोच-सोच कर मन बेचैन हो उठा। शाम को नोटबुक रीडर को लौटाते मैंने कहा, फाइल से इनका पता लेकर चपरासी को दे, दो। बुलवालो।'
सोचा था, वे आजाएंगे तो माफी मांग लूंगा। तभी इस अपराधबोध से निजात मिलेगी...। लेकिन चपरासी अगले दिन भूल गया। उसके बाद दो दिन की छुट्टी थी। स्कूल कचहरी सब बंद। यों हप्ता बीत गया। सोते-जागते उसी एक बात का ख्याल रहता। अगले वर्किंग डे की शाम चपरासी से पूछा, अध्यापक महोदय मिले...?'
-नहीं, सर! हेडमास्टर ने बताया कि अध्यापक नारायण राव तो इस्तीफा देकर अपने गांव चले गए।'
सुनकर पांव तले की जमीन सरक गई। नोटबुक रीडर से पुनः मांग मैंने अपने ब्रीफकेस में रख ली। बंगले पर लौट रात के एकान्त में फिर से खोलकर देखी। आधी के बाद पन्ने बूंटों के आकार में सिकुड़े थे। लिखावट उन हिस्सों पर बिगड़ गई थी। फिर एक झटका-सा लगा मुझे कि यहां उनके आंसू गिरे थे...। उंगलियां उन्हें टटोल उठीं। मन विकल हो गया। बमुश्किल नींद आई। अगले दिन बाबू को जिला शिक्षा अधिकारी के यहां भेज अध्यापक महोदय का स्थाई पता मंगवा लिया।
क्या कहूं- किसी करवट चैन न था। गांव उनका तीन-चार सौ किलोमीटर दूर। जिम्मेदार पद पर था। मुंह उठाकर एकाएक न जा सका। पर नोटबुक रोज उठाकर देखता और पन्नों पर बिखरे सूखे आंसुओं पर उंगलियां फेर आहत होता। मन ही मन देर रात तक माफी मांगता। कोई सुनता तो हंसता। सो, मन की व्यथा मन में ही दबाकर रखता। बेचैनी दिन-प्रति-दिन बढ़ती ही जा रही थी।

तभी चार दिन का एक मुश्त अवकाश हाथ लग गया। मैंने उनके गांव जाने की ठान ली। वह कोई सरकारी यात्रा न थी, न पारिवारिक! सो, मैंने किसी को नहीं बताया। चल पड़ा सूबे के अत्यन्त पिछड़े इलाके में, जहां उनका गांव था। जहां के रहवासी जीवन-यापन के लिए भी मोहताज थे। आजादी के 68 सालों बाद भी जहां सड़क, बिजली, स्कूल, अस्पताल जैसी बुनियादी सुविधाएं न थीं...। मैं किसी तरह डेढ़ दिन की यात्रा के बाद वहां पहुंचा तो पता चला, शिक्षक नारायण राव गांव में नहीं हैं!
-कहां चले गए?'
-माट्साब बाबड़ी पे रहत हैं।'
-क्यों?'
-भेंई टपरा डार लओ है।'
-क्यों?'
-भें ओरपास के सग चौपिया बच्चा मिल जात हैं।'
राज मेरी समझ में नहीं आया। पर बताई गई दिशा में चल पड़ा। कोई डेढ़ मील चलने के बाद पेड़ों के झुरमुट के करीब आया तो किशारों का समवेत स्वर सुनाई पड़ने लगा। करीब आने पर कोरस स्पष्ट हो गया।... दो अलग-अलग जमातों में बैठे चौपिया बच्चे जिनके जानवर जंगल में आसपास ही चारा चर रहे थे, बड़ी तन्मयता से पहाड़े-बारहखड़ी रट रहे थे। मास्टर नारायण राव पीठ पर हाथ बांधे दोनों जमातों के बीच इस छोर से उस छोर तक उन किलक कर पढ़ते विद्यार्थियों को ध्यान से सुनते-देखते हुए घूम रहे थे।
मैं अपनी पद-प्रतिष्ठा और सारा अभिमान तज, उनके चरणों पर झुक गया। पहचान कर वे हकला गए, जज्ज साब! आप्प!!'
पर मुझसे बोला नहीं गया। आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे। तब उन्होंने वहीं पड़े पत्थर पर मुझे बिठाकर धीरज बंधाते हुए कहा, अफसोस नहीं करो, जजसाब! अभागा तो मैं हूं जिसने पढ़-लिखकर भी माटी का कर्ज नहीं चुकाया। सरकारी मास्टर बन शहर पहुंच गया। शिक्षा को दान नहीं धंधा बना लिया। ऋणी हूं आपका, सोई आत्मा जगा दी...' कहते गला अवरुद्ध हो गया उनका।
विद्यार्थी अपना कोरस भूल उजबक से हम दोनों का अश्रुपात देख उठे। पेड़ों से शीतल मंद बयार बह उठी।
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