कहानी प्यार कि - 5 Dr Mehta Mansi द्वारा फिक्शन कहानी में हिंदी पीडीएफ

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कहानी प्यार कि - 5

अनिरूद्घ ओब्रॉय संजना से मिलने के बाद सीधा अपनी ओब्रॉय फार्मा कंपनी के लिए निकल गया। ओब्रॉय फार्मा कंपनी दिल्ली कि जानीमानी कंपनी में से एक थी। अनिरूद्घ ओब्रॉय के इंडिया आने से पहले इस कंपनी को अनिरूद्ध के अंकल अखिल मल्होत्रा संभालते थे.. जो अनिरूद्ध के पिता के दोस्त थे। अनिरूद्घ के इंडिया आने के बाद उसने इस कंपनी कि शाखा को और भी बड़े शहरों तक पहुंचाया था। आज वो इंडिया कि टॉप फार्मा इंडस्ट्री में से एक थी।

अनिरूद्घ जैसे ही अपनी आफिस में पहुंचा.. तो शर्माजी दौड़ते हुए उसके पास आए..

" सर... आपको इतनी देर कैसे हो गई..? आप जानते हो ना आज हमारी कितनी बड़ी मीटिंग थी?"

पर जैसे अनिरुद्ध पर उनकी किसी भी बात का कोई असर नहीं हुआ हो वैसे वो रिलॅक्स होकर सोफे पर आके लेट गया..

" अरे! सर आप एसे लेट कैसे सकते हो? "

" जस्ट चिल.. शर्मा जी.. मैंने आपको मूवी देखने जाने को कहा था ना फिर आप यहां क्यों आए? बड़े ही अनरोमेंटिक है आप। और मे मंदिर गया था इसलिए देर हो गई। "
अनिरूद्घ ने आंखें बंद किए हुए ही कहा।

"ठीक है सर पर हमारी मीटिंग का क्या? " शर्माजी को कुछ समझ में नहीं आ रहा था।

" आप को मैने कहा था ना मीटिंग यहां नहीं कही और होने वाली है.. "

"ये क्या कह रहे हो तुम...?" पीछे से अखिल मल्होत्रा ने कहा जो उन दोनों कि बात सुन रहे थे।

उनके आते ही अनिरूद्ध खड़ा हो गया ।
" शर्मा जी आप जाइए..." अनिरूद्घ ने कहा और ये सुनते ही शर्मा जी वहा से चले गए।

" अनिरूद्घ तुम ये क्या कह रहे हो..? " अखिल जी जो ये बात सुनकर थोड़े गुस्से मे लग रहे उन्होंने थोड़ी कड़क आवाज से पुछा।

" जी अंकल मे सही कह रहा हूं.. अमेरिका से जो पार्टी आज मीटिंग के लिए आने वाली थी उनको यहां तक नहीं पहुंचने देने कि साजिश की गई है। " अनिरूद्घ ने थोड़ा गंभीर होते हुए कहा।

" क्या ? पर किसने ये साजिश कि है? " अखिलिजी थोड़ा शॉक्ड थे ये सुनकर।

" ये में आप को अभी नहीं बता सकता। पर आप चिंता मत करिए.. मे सब संभाल लूंगा.. वो लोग उनको बेवकूफ बना सकते है पर मुझे नहीं.. इसलिए जो वो कर रहे है वो करने दो.. आप रिलेक्स हो जाइए ..और घर जाकर आराम करिए.." अनिरूद्ध ने एकदम शांति से कहा।

" पर बेटा .. वो है कौन वो तो मुझे बताओ.. मुझे तुम्हारी चिंता हो रही हैं.. पहले ही इस डिल कि वजह से कई लोगो का ध्यान तुम पर है इसलिए तो में तुम्हे किसी के सामने नहीं आने दे रहा.. "

" अंकल इसलिए... मुझे वो लोग नहीं पहचानते .. पर आप को तो पहचानते है .. मै नहीं चाहता कि आप लोगो पर कोई मुसीबत आए.. मे सब संभाल लूंगा कहा ना आपको.. आप प्लीज़ घर जाइए और आराम कीजिए। "
अनिरूद्घ कि बात सुनकर अखिल जी वहा से जाने लगे। उनके जाते ही अनिरूद्ध खिड़की के पास आया और एक तीखी मुस्कुराहट लेते हुए ज्यूस पीने लगा।

अखिल मल्होत्रा पीछे से अभी भी अनिरूद्ध को देख रहे थे और सोच रहे थे कि..
" पता नहीं ये लड़के के दिमाग़ मे क्या चल रहा है? अच्छा होगा इस मामले से दूर ही रहूं.. एक बार मामला सुलझ जाए फिर देखूंगा.."

और फिर वो वहां से चले गए..

इस तरफ जैसे जगदीश त्रिपाठी ने प्लान किया था वैसे ही उनके आदमी नक़ली आई डी बना कर जो पार्टी अमेरिका से ओब्रोय फार्मा कंपनी मे आने वाली थी उनको एक होटल में लेके आ गए।

जहां पहले से ही जगदीश त्रिपाठी के साथ कई और शहर के बड़े लोग कोट पहने हुए मौजूद थे।
उन लोगो के आते ही जगदीश त्रिपाठी उनके स्वागत के लिए खड़े होकर आगे आए।
" हेल्लो ! मी. जोसेफ.. वेलकम.. "

" थैंक यू.. मि मल्होत्रा.. " जोसेफ ने कहा ।

" हेव अ सीट..." जगदीश त्रिपाठी ने कहा और सब बैठ गए।

" वैसे मि. ओब्रोय नहीं दिखाई दे रहे...? " जोसेफ इधर उधर नजर घुमाते हुए बोले।

" हा.. वो उनकी थोड़ी तबीयत ठीक नहीं है इसलिए.."

" ओह.. वैसे पहले तो मीटिंग कंपनी मे होने कि बात हुईं थीं फिर यहां क्यों? " जोसेफ ने पूछा।

" वो क्या है ना आज हमारी कंपनी मे विजिट है स्टूडेंट्स की तो इसलिए.. " जगदीश त्रिपाठी बोले।

" आप के आई डी कार्ड्स चेक कर सकता हूं..? " मि. विलियम ने कहा।

" या स्योर... " जगदीश त्रिपाठी ने कहा और आई डी दिखाया।

उनके आइडी में अखील मल्होत्रा लिखा हुआ था..देखने पर कोई भी बता नहीं सकता कि ये नक़ली आई डी है। उन लोगो को भी शक नहीं हुआ।

" ठीक है.. नाउ लेट्स टॉक टू अवर डील.."
मि. विलियम ने कहा।

" देखिए .. मि मल्होत्रा.. this 'Ibrance' मेडिसिन इस ए बेस्ट अमेरिकन मेडिसीन फोर केंसर.. और जैसे हमारी डील हुईं थी.. १ मिलियन डॉलर ..

ये सुनते ही त्रिपाठी सोचने लगा...
" १ मिलियन डॉलर...? ये ओब्रोय के पास इतना सारा पैसा है..! पर कोई बात नहीं इसके बाद हम भी बिलियन डॉलर के मालिक होंगे.."

"क्या सोच रहे है.. मि.मल्होत्रा ? " जोसेफ ने कहा।

" कुछ नहीं.. हमें ये डील मंजूर है.. .."

" ठीक है ये पेपर पर आपकी साइन चाहिए..."
मि. विलियम पेपर्स दिखाते हुए बोले।

फिर जगदीश त्रिपाठी ने साइन कि और एक बड़ा सा बेग उनको दिया जिसमे पांच लाख डॉलर थे।
" ये लीजिए...ये एडवांस बाकी के डिलीवरी के बाद मिल जाएंगे"

" Thanks.. और मेडिसीन के बॉक्स आप के एड्रेस पर पहुंच जाएंगे.. ये लीजिए दस बोक्स आप चाहे तो चेक कर सकते है..." जोसेफ ने कहा।

जगदीश त्रिपाठी के आदमी ने सब चेक किया । सब चेकिंग बाद थोड़ा पेपर वर्क हुआ और वो लोग वहां से चले गए।

उनके जाते ही वो लोग जोर जोर से हंसने लगे..
" ये फिरंगी तो इतनी आसानी से बेवकूफ़ बन गए.." जगदीश त्रिपाठी ने हसते हुए कहा।

" अब हम इस दवाई को दुगने दामों में बेचेंगे और कमाएंगे बिलियन डॉलर... " साथ मे खड़े मंत्री भी बोल पड़े।

" हा.. अब ये मेडिसीन इंडिया नहीं बल्कि कोरिया जाएगी... " जगदीश त्रिपाठी ज़हरीली मुसकुराहट के साथ बोले जिसमे से लालच कि बड़ी बू आ रही थी।

फिर वो लोग आगे का प्लान बनाने लगे।

इस और संजना बेचैनी मे इधर उधर टहल रही थी। फिर उसने फोन निकाला और नंबर डायल कर दिया।

सामने से आवाज आई...
" हेलो...! "

" हरदेव जी मे संजना बात कर रही हूं.."

" जी बोलिए .. संजना जी.."

" मे आपसे मिलना चाहती हूं..."

" ठीक है तो मे रात को वहा आ जाता हूं.."

" नहीं.. रात को नहीं.. अभी इसी वक्त और घर पे नहीं कही और.."

" ठीक है हम अभी वो आप के घर के पास वाले बगीचे मे मिलते है.. मे आ रहा हूं वहा.."

" ठीक है.." संजना ने कोल काटा और फिर वहा से पार्क के लिए निकल गई।

🥰 क्रमशः..🥰