बेपनाह - 7 Seema Saxena द्वारा फिक्शन कहानी में हिंदी पीडीएफ

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बेपनाह - 7

7

करन और मनोज सबसे पीछे बैठे मूँगफली और चने के डिब्बे से चपके चुपके निकाल कर टूँग रहे थे ! खूब लंबा और बढ़िया पर्सनाल्टी का मालिक है करन डांस भी बहुत अच्छा करता है, न जाने अब तक कितने देश घूम चुका और इतने अवार्ड जीते है ! मनोज पतला दुबला सा खूब अच्छा वायलिन बजाता है हर गाने को बखूबी बाजा लेता है ! दोनों ही अपने अपने काम में माहिर हैं और साथ ही बहुत अच्छे दोस्त भी, हर जगह साथ, खाना पीना भी साथ साथ ।

“अरे ओ चिपकू, लंबू इतने पीछे क्यों बैठे हो चलो आगे आओ ।”सर ने पुकारा ।

सर ने उनका नाम चिपकू, लंबू रख दिया था ।

“जी सर, आ रहे हैं ।”

“और यह क्या दोनों बैठे बैठे कुछ न कुछ टूँगते रहते हो ?”

“कुछ नहीं सर ! वो जिम करता हूँ न इसीलिए ।”

“कोई बात नहीं न ।”

सर इन दोनों से बहुत खुश रहते हैं, काम बहुत अच्छा करते हैं शायद इसलिए ! बुआ अक्सर कहती भी हैं “कामलों सो लाड़लों” ! शुभी को अपनी बुआ की बात याद आई ! काश बुआ भी फोन चलाती तो उनको कह देती कि मम्मी के पास चली जाओ ! पता नहीं क्यों उन्हें मोबाईल फोन बिलकुल पसंद नहीं है ! उनको लगता है कि फोन के कारण सब अपनों से तक दूर हो गए हैं किसी को किसी की कोई खबर ही नहीं, मोबाइल से उबरे तो अपनों को और दुनिया को देखे भी । बस यही सोच उनको फोन से दूर रखती है ।

“शुभी आओ तुम ! अरे शुभी कहाँ गुम हो जाती हो ?”

“जी जी कहीं नहीं सर ! जरा मम्मी के बारे में सोचने लगी थी ।”

“वो ठीक है, तुम उनकी फिक्र छोड़ो और मन लगाकर काम करो ! मुझे काम में सम्झौता बिलकुल पसंद नहीं है ।”

बिना कुछ कहे उस ने अपना सर हिलाया ।

“सर पहले मैस में चलकर खाना खा लीजिये फिर 11 बजे तक सब खत्म हो जायेगा ।” करन ने कहा ।

अपनी लंबी कद काठी के कारण सब पर उसका दबदबा है, सब उससे डरते हैं हालांकि सर डरते नहीं हैं लेकिन अक्सर उसकी बात मान लेते हैं ।

“हाँ करन तू सही कह रहा है, चलो सब लोग पहले खाना खा आते हैं ।”

“मेरा मन तो नहीं कर रहा !” सर की बेटी हिना बोली ।

“बेटा तेरा मन तो वैसे ही नहीं करता है । अभी मन नहीं फिर कब खाओगी ?”

“जब भूख लगेगी ।” हिना ने कहा ।

“लेकिन बेटा तब यहाँ कुछ नहीं मिलेगा ।“

“पापा कैसी बातें कर रहे हो, यहाँ के गेट के बाहर निकल कर देखिये तो जरा रात भर खाने पीने का समान मिलता है ।”

“अच्छा तो तुम सब देख आई, ठीक है तो तुम यही रुको, हम लोग अभी खा कर आते हैं । फिर तुम खुद ही देख लेना, तुमको कब और क्या खाना है ?”

“सही है पापा।“

“इसकी मम्मी ने इसे अपने सर पर चढ़ा रखा है बहुत नकचढ़ी है ! यह नहीं खाना है, वो नहीं खाना है ! मेरा तो दिमाग ही खराब हो जाता है ! पहली बार इसे अपने साथ लाया हूँ अब आगे से ख्याल रखूँगा कि कहीं इसे साथ लेकर न जाना पड़े ।” वे गुस्से में बड़बड़ा रहे थे ।

“नहीं सर, हिना ऐसी नहीं है ! अभी उसने पानी पूरी और टिक्की खा ली थी न, तभी उसका खाना खाने का मन नहीं कर रहा होगा ।” शुभी ने हीना का पक्ष लेते हुए कहा ।

अच्छा । तुम चल रही हो खाना खाने या फिर तुम भी उसके साथ यही रहोगी ?” सर ने थोड़ा गुस्से में कहा ।

“जी, मैं आ रही हूँ आपके साथ ।” शुभी एकदम से बोल पड़ी ।

मैस मे अभी खाना शुरू ही हुआ था । खूब बड़ा सा हाल, जिसने खूब लंबी सी डायनिग टेबल और कुसियाँ पड़ी हुई थी ।

“लीजिये सर आप बैठिए न ।” करण ने कुर्सी आगे की तरफ खींचते हुए कहा ।

सर अपनी थाली में खाना लगाकर कुर्सी पर आकर बैठ गए और थाली मेज पर रख कर खाने लगे ।

“शुभी जाओ जल्दी से खाना खा लो अभी गरम है ! खाने में अच्छा लगेगा फिर ठंडे में कोई स्वाद नहीं रहता ।” सर ने शुभी से कहा ।

सर अपनी बेटी की तरह से उसे प्यार करते हैं, वैसे सर ग्रुप की सभी लड़कियों को बहुत प्यार व सम्मान देते हैं ।

“हाँ सही है सर ! कह कर शुभी ने अपने लिए प्लेट में सलाद अचार रखा और दाल सब्जी लेने के लिए टेबल की तरफ बढ़ ही रही थी कि तभी हिना उसके पास आकर बोली, “शुभी क्या तुम मेरे साथ होटल में रूम लेकर रहोगी ?”

“क्यों ? यहाँ भी तो हम लोगों का कमरा काफी अच्छा है ।”

“नहीं यह बात नहीं है,कमरा तो ठीक है !”

“फिर क्या बात है ?”

“अरे यार तू समझती क्यों नहीं ? मुझे यहाँ पर नींद नहीं आयेगी, तूने देखा नहीं कि यहाँ कितना शोर हो रहा है ।”

“हिना, यह तो थोड़ी देर में बंद हो जायेगा ।”

“कुछ भी बंद नहीं होगा, जैसे हम लोग अपनी तैयारी में लगे रहेंगे वैसे ही यह सब लोग भी, तू एक बार मेरे पापा से कह दे न, मैं अगर पापा से कहूँगी तो वो मेरी डांट लगा देंगे और तेरी कही हुई बात पर कभी मना नहीं करेंगे ।” उसने बड़े प्यार से शुभी के गले में अपनी बाँहें डालते हुए कहा ।

ओहह अच्छा तो यह बात है तभी इतने प्यार से बात कर रही है, वैसे तो मैं कुछ कहती रहूँ, कोई बात पूछती रहूँ अगर मन किया तो बता देगी, नहीं तो चुप साध कर बैठी रहेगी ।

यह कैसी इंसानी फितरत है । जब काम होता है तो कैसे प्यार से बात करता है लेकिन जब कोई काम नहीं तो बिल्कुल भाव नहीं देगा ।

“देख हिना मैं सर से कुछ भी नहीं कहूँगी क्योंकि मैं जिस काम से आई हूँ वो ज्यादा जरूरी है अगर एक दिन नींद भर नहीं सोयेँगे तो कोई परेशानी तो हो नहीं जायेगी !” शुभी ने बड़ी बेरुखी से उसे टालते हुए कहा ।

“यार ऐसे क्यों कह रही हो ?”

“फिर क्या कहूँ ?”

“पापा से कह दे न ?”

“अच्छा पहले खाना खा लेने दो फिर देखती हूँ ।” उसने टालने की गरज से उससे कहा ।

“ठीक है तू खाना खाकर जल्दी से आ फिर बात करते हैं ।” कहते हुए हिना वहाँ से चली गयी ।

“हे भगवान, अब इससे कैसे अपना पीछा छुड़ाऊँ ? क्या करूँ मैं ? यह सोचते हुए उसने अपने मन को उसकी तरफ से हटाने की कोशिश की और खाने की तरफ अपना ध्यान लगा दिया ।

खाना खाने में स्वादिष्ट था, मन ना होने पर भी खा लिया जा रहा था । चने की दाल में कटी हुई सब्जियाँ पड़ी थी जिससे उसे खाने पर सांभर जैसा स्वाद आ रहा था । सब्जी के मसाले भी बहुत अच्छे लग रहे थे । एक रोटी और थोड़े चावल खाने के बाद भी पेट भरा नहीं लग रहा था या पेट भर गया था लेकिन मन भरा हुआ नहीं लग रहा था । आज न जाने कितने दिनों के बाद मन लगाकर खाने का स्वाद लिया था । वो भी बहुत अच्छा लग रहा था जो बहुत सादा खाना था और घर पर जो खाना मम्मी बड़े मन से उसके लिए बना कर देती थी वो भी उसे स्वादिष्ट नहीं लगता था या फिर बड़े बेमन से मुँह बनाकर खाती थी ।