मार खा रोई नहीं - (भाग तीन) Ranjana Jaiswal द्वारा फिक्शन कहानी में हिंदी पीडीएफ

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मार खा रोई नहीं - (भाग तीन)

आखिर मेरी आशंका सच निकली।
आर्थिक मंदी के कारण 50 प्लस वालों को नौकरी से रिटायर करने के सरकारी निर्देश का पालन सरकारी महकमों में अभी शुरू होने वाला था।उसके पहले ही इसे प्राइवेट स्कूलों ने लागू कर दिया ।वैसे भी वहाँ सत्र के बीच में या कभी भी कोई दोष लगाकर अध्यापक को निकाला जा सकता है।
स्कूल के 15 वर्षों के कार्यकाल में मुझ पर कोई आरोप नहीं लगा था।अपने विषय हिंदी में मैंने डॉक्टरेट किया था।बच्चे ,अभिभावक और स्कूल मैनेजमेंट भी मेरे उत्तम शिक्षण पद्धति के कायल थे।सांस्कृतिक कार्यक्रम कराने में मेरी मुख्य भूमिका होती थी।सैकड़ों सुपरहिट नाटक मैंने कराए थे।जिस भी प्रतियोगिता में बच्चों को ले गयी ,वे जीतकर ही आए।शिक्षक -चयन बोर्ड की मैं सक्रिय सदस्य थी।प्रेस रिपोर्टिंग से लेकर स्कूल पत्रिका की प्रूफरीडिंग तक मैंने की।।कुल मिलाकर स्कूल में मेरी एक साख थी..इज्जत थी ...प्रतिष्ठा थी।इस अंग्रेजी माध्यम स्कूल में मेरे आने के बाद से हिंदी में शत- प्रतिशत रिजल्ट आने लगा था।बाकी हिंदी अध्यापकों को सहयोग,निर्देश,परामर्श सब देती रही थी।ज्यादातर तो मेरे द्वारा ही चुने गए थे।अध्यापक चयन प्रक्रिया आसान नहीं थी।
एक टीचर के पद के लिए सैकड़ों आवेदनपत्र आते।उनमें से पच्चीस ही छाँटे जाते थे फिर उनका साक्षात्कार होता । पी -एच .डी ,एम .एड,बी. एड. किए हुए तथा अन्य स्कूलों में कई वर्ष पढ़ाए हुए अनुभवी प्रत्याशी ही आते थे ।पर के बार उनका विषय -ज्ञान इतने छिछले स्तर का होता कि हम सिर पकड़ लेते।व्याकरण- ज्ञान तो लगभग शून्य ही होता ।प्रिंसिपल झल्ला जाते कि हिंदी क्षेत्र में हिंदी पढ़े और हिंदी के अध्यापक बनने जा रहे लोगों का हिंदी ज्ञान इतना कमतर क्यों है?
मैं उन्हें समझाती कि छात्र हिंदी को गम्भीरता से नहीं पढ़ते।बस किसी तरह उसमें डिग्री लेकर पैसा कमाना चाहते हैं।चूंकि हिंदी में कम ही अनुत्तीर्ण होते हैं,इसलिए ज्ञान के लिए इसे कम ही पढ़ते हैं।अंग्रेजी माध्यम स्कूलों में हिंदी वैसे भी दोयम दर्जे पर रहती है।जरूरी नहीं होता तो इस विषय को पढ़ाया ही नहीं जाता।हिंदी अध्यापक भी अंग्रेजी माध्यम स्कूलों में उपेक्षा का शिकार होता है क्योंकि वह फर्राटेदार अंग्रेजी नहीं बोल पाता ।मैंने भी बड़ी मुश्किल से अपने लिए सम्मानित जगह बनाई थी ,वह भी अपनी अतिरिक्त और विशिष्ट प्रतिभा के कारण।फिर भी कई बार ऐसा लगता था कि मुझे अजीब नजरों से देखा जा रहा है।बच्चे,अभिभावक और अंग्रेजी पढ़ाने वाले टीचर "हिंदी की टीचर हैं" यह बताते हुए कुछ अजीब भाव से मुस्कुराते हैं।उस समय मैं सोचती कि ये काले अंग्रेज हिंदुस्तान में रहकर ,उसकी रोटी खाकर भी राष्ट्र-भाषा हिंदी का सम्मान क्यों नहीं करते?
सारे संसार में कॅरोना वायरस का आतंक मचा हुआ है।सभी अपने घरों में कैद हैं।किसी के साथ कभी भी कुछ भी हो सकता है।बच्चों और उम्रदराज लोगों को बहुत खतरा है।जनता कर्फ्यू लगा हुआ है।
यह कोई महामारी है जिसने पूरी दुनिया को निगलने के लिए अपने जबड़े फैला दिए हैं।कोई पूजा ,कोई प्रार्थना ,कोई पुकार काम नहीं आ रही।धर्म-प्रतीकों के दरवाजे बंद हैं।
यह प्रकृति का प्रकोप है इंसानों ने हद भी तो कर दी है।कुछ समय पहले भूकम्प ने दिल दहलाया था अब इस महामारी ने।
मैं घर में कैद हूँ अकेली हूँ।हमेशा ही रहती हूँ पर इस तरह नहीं कि बाहर निकलने से पहले सौ बार सोचना पड़े।पहले दिन भर स्कूल में बच्चों के साथ बीत जाता था,बाकी समय घर के काम-काज और कुछ लिखने-पढ़ने में।अब तो घर की कई बार दिवाली जैसी सफाई कर चुकी।लिखने- पढ़ने का मन नहीं हो रहा।भीतर से कुछ उदासी है पर समय तो काटना ही है।वैसे भी रिटायरमेंट पास है फिर तो ऐसे ही जीवन गुजारना होगा ,हाँ तब शायद बाहर आने -जाने में पाबन्दी न हो।
इस वर्ष कोविड 19 की दहशत के साथ एक नई दहशत नौकरी चली जाने की बराबर बनी रही थी। और अंततः यह पता चल ही गया कि 31 दिसम्बर को 50 प्लस छह लोगों को रिटायर कर दिया जाएगा,जिसमें एक मैं भी हूँ।वैसे कॅरोना काल में कई एक वर्ष पुराने कम- उम्र के टीचर्स को भी हटा दिया गया था।चूंंकि लंबे वर्षों से काम कर रहे लोगों को इस तरह नहीं हटाया जा सकता , इसलिए बकायदा उन्हें रिटायर करने की योजना बनी।मेरी तो जान ही सूख गई क्योंकि स्कूल ही मेरा आर्थिक आधार था और उसी आधार पर मैं अपने जीवन के अन्य युद्ध लड़ पा रही थी।बाकी टीचर्स का अपना घर -परिवार था ,नात-रिश्तेदार थे।आय के दूसरे स्रोत थे।स्कूल को मैंने अपनी सारी शक्ति,ऊर्जा,प्रतिभा और उम्र समर्पित कर दी थी।विगत 16 वर्षों से वही मेरे लिए सम्पूर्ण दुनिया बन गया था।वहां की हर चीज़ से मेरा जुड़ाव था।मैं अक्सर कहा करती-"जीना यहाँ मरना यहाँ इसके सिवा जाना कहाँ?" 16 वर्षों में मैंने कोई छुट्टी नहीं ली।बीमार होने पर भी नहीं ।यहाँ आने के बाद कहीं और जाने के बारे में सोचा भी नहीं।प्रिंसिपल बड़े सदय थे ..मुझसे प्रभावित भी।मुझे लगता ही नहीं था कि पूरी तरह से पढ़ाने में अक्षम होने के पूर्व मुझे रिटायर भी होना पड़ेगा।अभी मैं तन -मन से पूर्ण स्वस्थ और युवा थी और किसी नवयुवा से ज्यादा काम कर रही थी।वह भी पूरे उत्साह,लगन और प्रसन्नता से।मेरे ऑनलाइन क्लास की भी प्रशंसा हो रही थी।बाकी रिटायर के लिए प्रस्तावित पांच लोग छोटी कक्षाओं में काम करते थे ।कोविड 19 के इस संकट- काल में वे कुछ नहीं कर रहे थे।पांचवी क्लास तक के बच्चे स्कूल नहीं आ रहे थे और इन लोगों को ऑनलाइन क्लास भी नहीं लेना था।कभी -कभार स्कूल से उन्हें कुछ अन्य कार्य मिल जाता था,पर मेरे पास तो सीनियर क्लास थे,बच्चे भी आ रहे थे और लाइव क्लास के साथ वीडियो क्लास भी चल रहे थे, फिर सत्र के बीच में इस तरह रिटायर करने का क्या मतलब था?मैंने प्रिंसिपल से बात की, तो उन्होंने अपनी असमर्थता जताते हुए कहा कि उनकी संस्था का यही निर्णय है।बाकी स्कूल भी यही कर रहे हैं ।कोविड 19 के कारण स्कूल आर्थिक संकट से गुजर रहा है।बच्चों के फीस भी नियमित नहीं आ रहे।स्कूल में भी बच्चे कम आ रहे हैं ,इसलिए उन्हें दिसम्बर के बाद स्कूल आने से मना कर दिया जाएगा।ऑनलाइन तो एक ही टीचर पढ़ा लेगा।दसवीं और बारहवीं कक्षा का प्रीबोर्ड एक्जॉम ले लिया गया है।वे अब नहीं आएंगे तो उनके टीचर्स खाली हो जाएंगे।उनमें से एक आपकी कक्षा पढ़ा लेगा।
पढ़ाना ही क्या था, मैंने तो पूरे वर्ष का पाठ्यक्रम पूरा कर दिया था।कविता,कहानी,उपन्यास और व्याकरण के सारे अध्यायों के बेहतरीन वीडियो अपलोड कर दिए थे।उसी को दिखाकर रिवीजन कराना ही शेष था।