दह--शत - 28 Neelam Kulshreshtha द्वारा थ्रिलर में हिंदी पीडीएफ

दह--शत - 28

एपीसोड ---28

        समिधा को अपने घर के दीवान पर बैठी व कहती, “हाँ, मैं बहुत बोल्ड हूँ। मैं बहुत बोल्ड हूँ।” फुँफ़कारती कविता याद आ जाती है।

तीसरे दिन मीनल का फ़ोन आ जाता है, “समिधा जी! कल कविता का मेरे पास फ़ोन आया था वह कह रही थी आपने उससे कहा है कि मैं उसे याद कर रही हूँ। ‘इनफ़ेक्ट’ मैं तो उसे अच्छी तरह जानती भी नहीं हूँ।”

 “हाँ, मैंने ही उससे कहा था। मैं उसके कारण बहुत मुसीबत में हूँ। शी इज़ ए विकेड लेडी उसने इसीलिए महिला समिति छोड़ी है।”

“अच्छा?”

समिधा भावुक हो चुकी है, “मैं बचपन से सुनती हूँ जो बुराई करता है उससे बहुत से लोगों को तकलीफ़ पहुँचती है। अच्छाई के परिणाम से बहुत लोगों को लाभ पहुँचता है। मेरे पति को पागलपन की अवस्था तक पहुँचाया गया है। रंजनजी को मेरी तरफ से थैंक्स कर दीजिये उनका नाम लेकर मैंने इनसे अपने को बचाया था। उस दिन मैं शाम को चार बजे आपको सड़क पर मिली थी। मैं अपने पति का नहीं, कविता के पति का इंतज़ार कर रही थी।” फिर वह संक्षेप में सारी बात बता कर कहती है, “रंजनजी से कहिए कि मेरी ‘हेल्प’ करें।”

“देखिए। ओफ़िशियली तो ये कुछ नहीं कर सकते बट ही इज़ वेरी हेल्पिंग। एक बाई को उसके पति ने इतना पीटा उसको खून निकलने लगा तो रंजन ने उसकी पिटाई करके उसकी अक्ल ठीक कर दी।”  

“ओ रियली।”  

“कभी ज़रूरत पड़ी तो मैं आपसे मिलूँगी।”  

“ओ श्योर।”  

मीनल के आने वाले फ़ोन का फ़ार्मूला भी अपना असर खो चुका है। अभय सुन्न होने लगे हैं। इस बार चोट खाई नागिन का उनके चेहरे पर अधिक वहशीपन फैल रहा है। विभाग के एम.डी. का स्थानांतरण हो चुका है। विकास रंजन केस के कारण यहाँ कोई एम.डी. आने को तैयार नहीं है। जब एम.डी. नहीं है तो महिला समिति भी लावारिस हो गई है क्यों कि उसकी अध्य़क्ष भी नहीं है। मीटिंग्स बंद हो गई है।

कुछ युवा अफ़सर विभाग के प्रमुख की अहमियत नहीं समझते, मुँह बिचका देते हैं, “एम.डी. नहीं है तो क्या सारे विभाग चल नहीं रहे ? बड़े अफ़सर करते ही क्या हैं बस रजिस्टर पर चिड़िया(हस्ताक्षर) बिठा देते हैं।”  

अभय का बदहवास चेहरा देख व उबली आँखें देखकर उन्हें टोक देती है, “आप फिर आऊट ऑफ ट्रैक हो रहे हैं।”

“तुम भी तो विज़िलेंस की धौंस दिखाती हो।”

“क्या बिना बात ही दिखाती हूँ?”

“तो जाओ अभी मीनल के पास। वैसे ही डरा रही थीं कि विज़िलेंस में रिपोर्ट कर दी है।”

“अभय ! इस घर की बेइज्ज़ती करने पर क्यों तुले हो?”

“मैं कर रहा हूँ ? घर में दो लोग रह गये हैं और तुम घर का वातावरण ख़राब करती रहती हो।”

 “कौन मैं?”

अभय दिमाग में फ़िट किये वाक्य जैसे बोलते जा रहे हैं, “और क्या सुअरिया....कुतिया....बदमाश औरत मुझे चैन से नहीं जीने देगी। मैं हार्ट पेशेंट हूँ.....मारकर रहेगी जाहिल औरत। ऐसे लड़ेगी तो बच्चे भी घर आना बंद कर देंगे।”

उस पर ये गालियाँ असर ही नहीं करती। वह कहती है, “तुम्हें कभी महसूस नहीं होता कि बीच-बीच में तुम कैसे पागल, गुंडे टाइप हो जाते हो?”

“इतना बुरा खाना बनाओगी तो मैं पागल हूँगा ही।”

“क्या? इतने वर्षों से कह रहे थे कि तुम खाना अच्छा बनाती हो।” तो मौका मिलते ही अपने हाथ का खाना खिलाकर ये ज़हर भी भरा जा रहा है?

समिधा वहाँ से हट जाती है। वह अधिक बहस नहीं बढ़ाना चाहती।

दूसरे दिन अभय शर्मसार से व संकोच से पूछ रहे हैं, “कल दीदी व जीजा जी बम्बई से दिल्ली वाले भाईसाहब के पास डीलक्स से जा रहे हैं। तुम तो चलोगी नहीं?”

“क्यों नहीं चलूँगी? उनको फ़ोन कर दीजिये रात का खाना हम लोग स्टेशन पर लेकर आयेंगे।” अभय को उसकी बात पर विश्वास करना मुश्किल हो रहा है। वह संज्ञा शून्य किए अभय को क्या समझाये? विवाह एक स्त्री व पुरुष के बीच का रिश्ता भर नहीं है, न ही सिर्फ़ दैहिक कामनाओं की आपूर्ति। ये एक हसीन सामाजिक व्यवस्था है जो समाज से जोड़ती है, ढ़ेरों रिश्तों का सुख देती है। तुम्हारे जीजा जी व दीदी इस रिश्ते से मेरे भी कुछ है। तुम बेवकूफ़ी कर रहे हो तो शादी से मिले ये सारे रिश्ते मेरे बेमानी तो नहीं हो गये। तुम मेरे न परमेश्वर हो, न मालिक। इस विवाह व्यवस्था की एक महत्वपूर्ण कड़ी भर हो, उतनी ही महत्वपूर्ण जैसे कि मैं। ये बात तुम कब समझोगे ?

समिधा और अभय को दस दिनों के लिए बाहर छुट्टी पर जाना है। वह निर्णय ले लेती है कल ही मीनल से मिलेगी।

मीनल अपने बँगले पर उसी अपनत्व से मिलती है। वह उन्हें संक्षेप में सारी बातें बताती है। उन घिनौने संवादों को सांकेतिक रूप से सुनकर भी वह ‘छी’ ‘छी’ कर उठती है जिन्हें कविता ने अभय को रटाया है। मीनल कहती है, “रंजन आप की ‘हेल्प’ अवश्य करेंगे। आप संडे को अपनी बेटी या बेटे के साथ आइए, लेकिन आपसे वह ‘क्रॉस क्वेश्चन्स’ भी करेंगे।”  

“नो प्रॉब्लम।”  

इतवार  आ ही कहाँ पाता है ? शुक्रवार को ही मीनल का फ़ोन आ जाता है ,“समिधा जी! वेरी सॉरी! हमारे ऑर्डर्स आ गये हैं। कल ही हमें निकलना है। नये एम.डी. जो यहाँ आये हैं, उनकी तारीफ़ सुनी है। आप उनसे मिल लीजिये। वो कविता के पति का ट्रांसफ़र कर देंगे।”

“आप कल कब निकल रही हैं?”

“ये मैं बता नहीं सकती। रंजन के दोस्तों की राय है बम्बई तक हम बाई रोड जायें। वहाँ से ट्रेन पकड़ेंगे।”

इनका कसूर क्या है जो इन्हें छिपकर भागना पड़ रहा है? चार पाँच दिन बाद मीनल त्रिवेन्द्रम पहुँच कर फ़ोन करती हैं, “हमारे फ़्रेन्ड्स बहुत ‘सेफ़ली’ हमें यहाँ तक छोड़ गये हैं। यहाँ के एम.डी. ने रंजन को बुलाकर हाथ मिलाया व शाबासी दी व कहा है ये जिस तरह चाहें काम करें।”  

“काँग्रेट्स। आप लोग खुश है यह जानकर अच्छा लगा। मैं आप लोगों को कभी भूल नहीं सकती। आप लोगों के कारण मैंने कुछ दिन सुकून से निकाले हैं।”  

समिधा उनके जाने से भँवर में फँसी घूमती अकेली रह गई है, बिल्कुल अकेली। शादी की वर्षगांठ है। मन की घबराहट  को राहत देने के लिए, सारी वितृष्णाओं के बावजूद अभय के लिए आये मन में अलगाव के बावजूद वह शादी पर अभय की दी हुई अँगूठी पहनना चाहती है। बरसों पुरानी उस अँगूठी को दो वर्ष पूर्व ही एक बड़े ज्वैलर्स के यहाँ बेचकर दूसरी अँगूठी ली थी। वह अलमारी खोलकर अँगूठी निकालती है। ये देखकर हैरान रह जाती है केन्द्र की खूबसूरत डिज़ाइन से जुड़ा वह चौड़ा एक जोड़ टूटा हुआ है।

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जो किसी विभागीय कॉलोनी के कैम्पस में रहते हैं वे ही जानते हैं ऐसी जगह में कितनी आत्मीय सुरक्षा महसूस होती है। नगर के साम्प्रदायिक दंगों, मारधाड़ से दूर। हाँ, समिधा जैसे हतभागे हों वो अलग बात है। अनेक लोगों से सड़क पर, पार्क में, अस्पताल में मुलाकात होती रहती है। घर चाहे आना-जाना न हो लेकिन एक दूसरे परिवार, रिश्तेदारों की जानकारी हो जाती है। घर में नल की, बिज़ली की या मरम्मत की समस्या हो तो एक फ़ोन कर दीजिये सब ठीक हो जाएगा।

ऐसे कैम्पस के चेयरमैन या एम.डी. के रुतबे को वही लोग जानते हैं जो इन कैम्पस में रहे हों। ये इस सल्तनत के राजा होते हैं। महिला समिति की अध्यक्ष उनकी पत्नी। यदि दोनों में से किसी को छींक आ जाये तो वह भी चर्चा का विषय हो जाता है। इस अतिशयोक्ति अलंकार से उनकी सर्वोच्च शक्ति को बताने का प्रयास किया जा रहा है। ऐसे एम.डी. से मिलने की सलाह दे गई है लेकिन समिधा के हौसले पस्त हैं। उनकी पत्नी ढाई-तीन महीने बाद आयेंगी चीफ़ विज़िलेंस ऑफ़िसर की नियुक्ति हुई नहीं है। ऐसे नाज़ुक कारण के लिए कैसे मिले वह एम.डी. से? उसे बेहद घबराहट होती है।

रंजन के जाने के बाद अभय को और भी खूँखार बना दिया है। अब तो वे लंच लेकर आधे घंटे में चले जाते हैं। उन पर जो गुंडापन सवार है वह उससे टकरा नहीं सकती। एक दिन हिम्मत करके वह एम.डी. के पी.ए. को फ़ोन  करती है, “मैं महिला समिति की सदस्या बोल रही हूँ। सर से बात कर सकती हूँ ?”

एम.डी. से फ़ोन लाइन कनेक्ट होते ही वह कहती है, “सर ! नमस्कार ! सर ! मैं लगभग एक वर्ष से मुसीबत में हूँ आप से मिलना चाहती हूँ ।”

“आ जाइए।”

वह आश्चर्य में पड़ जाती है। कल, परसों का समय नियत न कर उसे उन्होंने तुरन्त बुला लिया।

वह इतने वर्षों से इन कॉलोनी में है । बस एक बार समिति की सदस्याओं के साथ एम.डी. के चेम्बर में आई थी। वह पूरी हिम्मत  जुटाते हुए उनके चेम्बर में प्रवेश करती है। एम.डी. लम्बी चौड़ी मेज़ के दूसरी तरफ़ बैठे हैं। उनकी मेज़ के सामने आठ दस कुर्सियाँ रखी हैं। वह शालीनता से उनका अभिवादन स्वीकार करते हुए कहते हैं, “बैठिए।”

“सर ! मैं एक कॉन्फ़िडेन्शियल व ‘पर्सनल प्रॉब्लम’ डिस्कस करना चाहती हूँ। एक एप्लिकेशन भी लिखकर लाई हूँ।”

“कहिए तो मैं दो-तीन ऑफ़िसर्स को बुलवा लूँ?”

“नो थैंक्स!” फिर वह घुमा फिरा कर अपनी बात बताती है ।

वह ‘हाँ’, ‘हूँ’ करते उसकी बात सुन रहे हैं। फिर उसे समझाते हुए कहते हैं, “देखिए ! ये आपका ‘फ़ेमिली मैटर’ है। आप घर के बुज़ुर्गों की सलाह लीजिये।”  

“सर ! हम तो स्वयं ही उस उम्र पर पहुँच गये हैं । हमें कौन राय देगा? बस आप बबलू जी  का ट्रांसफ़र कर दें।”

 वे बहुत सभ्यता से समझाते हैं, “देखिए ट्रांसफ़र ऐसे ही नहीं होते। पहले ‘एन्कवायरी’ होगी तो आपकी फ़ेमिली की बदनामी होगी।”  

“अभय इज़ी मनी वाले परिवार की चपेट में हैं। बदनामी का ड़र लगता है, नहीं तो मैं पुलिस में रिपोर्ट कर देती, बेटी की शादी की चिन्ता भी है।”  

“इसीलिए आपको समझा रहा हूँ, धीरज रखिए।”  

“इट्स नॉट रिलेशनशिप। उन दोनों पति-पत्नी ने मिलकर इन्हें ट्रेप किया है। मैं उसे अपनी पत्नी को इनके पास ग्राउंड में छोड़ते देख चुकी हूँ।”  

“वेरी स्ट्रेन्ज।”  वह धीमी स्मित से मुस्करा देते हैं। शायद ये सोचकर किस होशियारी से अपने पति को बचाया जा रहा है।

“सर ! ये ‘वल्गर टॉक्स’ करते हैं। बिल्कुल न्यूरोटिक लगते हैं। ही इज़ ए हार्ट पेशेंट। मैं बार-बार ट्रिक करके उन्हें इस हालत से बाहर लाती हूँ वर्ना इन्हें अब तक ‘हार्ट अटैक’ पड़ चुका होता।”  

“मैं भी यहाँ नया आया हूँ। देखता हूँ क्या कर सकता हूँ फिलहाल ये ‘एप्लिकेशन’ अपने पास रखिये।”  

“नो सर ! मेरी समस्या के बारे में जानकर तो देखिये।”  वह ज़बरदस्ती ही लिफाफ़ा मेज़ पर रख देती है। उनसे मिलने दो तीन लोग आ चुके हैं। वह अभिवादन कर चल देती है। एम.डी. को शिकायत करना एक बड़ी राहत है, उस दिन वह ऐसे चैन से सोती है जैसे बरसों से सोई न हो।

आठ दस दिन बाद वह घर पर अभय को टोकती है, “अभय ! लंच के बाद इतनी  जल्दी  क्यों चले जाते हो?”  

“आजकल नया प्रोजेक्ट चल रहा है। और हाँ, संजना को मैंने बाहर देखा था क्या घर आई थी?”

“नहीं तो, वह तो कॉलोनी के बाहर रहती है। मेरे पास क्यों आयेगी, मैं उसे लिफ़्ट नहीं देती।”

समिधा उद्विग्न तो है ही। अभय विकेश जानते हैं उसकी व संजना की लड़ाई को। तो? तो क्या उसे कविता से मिलवा दिया है ? ये विकेश की ही शैतानी चाल होगी। संजना अपने कर्मों से जल्दी ही इस कॉलोनी से गई थी। पति ने लम्बी बीमारी के कारण, सच ही उन्होंने साइकिक होने के कारण जल्दी रिटायरमेंट ले लिया था। अब तो उनकी मृत्यु को भी एक वर्ष हो चुका था।

दूसरे दिन सुबह अभय तैयार होते हुये कह रहे हैं , “आज मेरा नाश्ता नहीं बनाना। मैं व विकेश हॉस्पिटल में चेकअप करवा रहे हैं।”

उसे विकेश के नाम से भी भय लगने लगा है, “हॉस्पिटल कितने बजे पहुँच रहे हैं? मैं भी आ जाऊँगी।”

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नीलम कुलश्रेष्ठ

ई –मेल---kneeli@rediffmail.com

 

 

 

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Puneeta Saxena

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