दह--शत - 27 Neelam Kulshreshtha द्वारा थ्रिलर में हिंदी पीडीएफ

दह--शत - 27

एपीसोड ---27

         अब वह नोट कर पाती है, अक्सर लंच के समय या कभी-कभी सुबह सात बजे इंटरनल फ़ोन  पर एक रिंग आती थी अब वह रिंग आना बंद हो गई है। ऐसा फ़ोन कविता के यहाँ नहीं है।

  पाँच-छः दिन बाद धीरे-धीरे दोनों का तनाव हल्का होता है तो वह फँसे गले से अभय से कहती है,“अभय ! मेरा शक ठीक था।”

  “ कौन सा?”

“कविता के खेल में बबलू जी का पूरा-पूरा  हाथ है। कविता ने ‘इज़ी मनी’ का रास्ता बबलूजी को दिखाया है।”

“क्या बक रही हो? कोई पति ऐसा कर सकता है? जिस आदमी का एक ताऊ ब्रांच ऑफ़िसर हो, दूसरा डॉक्टर वह ऐसा कर सकता है ?”

“समाज में कहीं तो ये हो ही रहा है।” वह विस्तार से सोलह मार्च की रात की घटना बताने लगती है, “कविता तुम्हारे पास आई होगी और बबलू जी छिप गये होंगे। मुझे अभी तक उसके कपड़े याद हैं।”

“क्या पहने थी?” उसके स्वर में अविश्वास है।

  “मस्टर्ड कलर का स्वेटर व उसने रंजन जी के भय से सिर पर कपड़ा बाँधा हुआ था कि कहीं कोई पहचान न ले।”

अभय का चेहरा खिसियाया हुआ है हर उस चेहरे जैसा जो कि सोचता है सच्चे सुरमई प्यार का साथ पा लिया लेकिन सब हसीन धोखा निकलता है फिर भी वे बात बनाते हैं, “मेरे पास ग्राउंड में कोई नहीं आया था।”

रात में उसकी कमर के घेरे में लेता उनका हाथ सच बोल उठता है। वे दोनों सहम कर ऐसे लिपट जाते हैं जैसे दो मृगशावक घने जंगलों में जंगली जानवर की हुँकार सुनते, सहमते हुए अलग-अलग भटक गये थे, अब अचानक मिल गये हैं। वह आठ दस दिन तक डरी सहमी बच्ची सी उन्हें पकड़कर सोती रहती है। उससे भी मजबूत है उनकी पकड़।

  वो घर रात के सात बजे से ही अँधेरे में डूबा रहता है। बस एक कमरे की लाइट जलती रहती है। वह चैन की साँस लेती है, एक बड़ा युद्ध जीता है।

एक भयंकर दौर गुज़रा है। एक तूफ़ान समिधा और अभय के बीच गुज़रा है। अभय को अपना होश नहीं था। अभय की हालत देखकर समिधा को होश नहीं था। वह ये भूल गई थी कि उनके किसी से सम्बन्ध हो गये हैं। सबसे बड़ा तनाव था  इन तनावों व उठा-पटक के बीच उनके जीवन की सुरक्षा का तनाव, एक दूसरा तनाव बच्चों को इतने प्यार से पाला हैं कहीं इसका अंत एक बड़ी बदनामी में न हो। कहीं वे उन्हें विरासत में पारिवारिक कलंक न दे जायें।

अभय का ऊँची से ऊँची आवाज़ में चीखना बंद है। उसकी घबराहट गायब-सी है, दिमाग शांत हो पा रहा है। अब वह लगभग सात महीने बाद एक-एक बात याद कर उसकी गहराई में जा रही है। सिर्फ़ छतों के इशारे से कोई आदमी इतना पागल नहीं हो सकता कि ये समझने लगे कि घर में उसे कोई नहीं पूछता। तो बबलूजी व कविता ने एक वर्ष तक पूरी तैयारी की है। उन्हें ऑफ़िस से, लंच के लिए लौटते समय या शाम को अपने घर ले जाया गया है। हर ऐसी कॉलोनी में ये आम बात है कभी-कभी ऑफ़िस से लौटते समय कोई किसी को भी चाय पिलाने घर ले जाता है। उसने बालकनी से भी तरह-तरह की इशारेबाज़ियाँ की हैं। अभय के वहाँ से गुज़रते समय रेडियो तेज़ करके उनकी भावनाओं को बेकाबू रखा है। ऐसे ही धीरे-धीरे उन्हें कविता ने अपनी घिनौनी बातों के, अपनी अदाओं के आकर्षण में बाँधा है, परिवार वालों के लिए मन में ज़हर भरा है।

  तभी वे उन्हें लेकर जब घर आई थी तो बबलू जी उस पर कितना ज़ोर डाल रहे थे कि वह अपना शक समाप्त कर दे। नहीं तो आम पति तो पत्नी पर थोड़ा तो शक करेगा। हे भगवान् ! अभय को ‘तलाक’ ‘तलाक’ रटा कर उसका घर तोड़ने की साज़िश थी? समिधा ने उसे पहचान जो लिया था कि वह एक घरेलू औरत नहीं है।  न उसकी बेटी अपनाई, न उसे घर में लिफ्ट ही दी। समिधा पहले जैसी गुनगुनाने लगी है। घर की साज सज्जा भी बदल दी है।

            लेकिन ये सब कितने दिनों तक? अभय फिर सुन्न होते जा रहे हैं। अपने तन्नाये हुए चेहरे से भाग-दौड़ करने लगे हैं। अब फिर अस्पताल के चक्कर अधिक लगते हैं। वह अपने में मगन, बिना बोले कुछ रहस्यमय सी अवस्था में रहने लगते हैं, वह  पहचान लेती है। ये सम्बन्ध फिर शुरू हो गया है। एक परिचित अस्पताल में दाखिल है। वह उन्हें देखने जाती है। उनकी पत्नी गदगद  हो बताती है, “भाई साहब ! रोज़ ऑफ़िस से इन्हें देखने आते हैं।”

समिधा खिसियाई  सी मुस्कराती है। उसे कब से पता है कोई स्थान यहीं आस-पास है उसकी हिम्मत नहीं पड़ती कि पता करे, बहुत संकोच होता है।

  सब कुछ बेहद ख़तरनाक होता जा रहा है। अभय उन दोनों गुंडों के चंगुल में फिर हैं। उसके पास तो सबूत भी नहीं हैं कि अभय ने उसकी पिटाई भी की है। बात तो आगे बढ़नी ही है। रोली के इस बार घर आते ही वह अभय से कहती है,“मुझे रोली के सामने तुमसे बात करनी है।” कहते हुए समिधा ‘डिप्रेस्ड’, असहाय एक अनपढ़ स्त्री जैसी हो रही है।

“तो करो न ! एक साइकिक औरत  से क्या मैं डरता हूँ?”

वे तीनों पलंग पर बैठ गये हैं। वह कहती है,“देखो, रोली ! इन्होंने मुझ पर बुआ जी के जाने के बाद ‘एसॉल्ट’ किया था।”

“क्या? आपने पहले क्यों नहीं बताया?” रोली खिसक कर उसके पास आकर उसके कंधे पर हाथ रख देती है फिर कहती है, “पापा ! क्या ये पढ़े-लिखे लोगों की निशानी है?”

“मैं इनसे तंग आ गया हूँ। ये झूठे इल्ज़ाम लगातीं रहतीं हैं। बबलू जी से कह आईं कि वह प्रोफेशनली ये सब करवा रहे हैं।”

“रोली ! मैं उसे ग्राउंड में इनके पास अपनी बीबी को ले जाते देख चुकी हूँ। मैंने उसके कपड़े बताये तो ये मान भी गये थे। पंद्रह दिन से इन पर वही वहशीपन सवार हो रहा है।”

“तुम झूठ बोलती हो । अँधेरे में तुम्हें दस कदम दूर की चीज़ तो दिखाई नहीं देती तो तेज़ भागते स्कूटर पर तुमने कविता को कैसे पहचान लिया?”

“ओ ! अभय !  मैं यही नहीं समझ पा रही थी कि हमारे बीच सब नॉर्मल हो गया था। फिर तुम्हें किसने भड़काया है? तो ये बात है फिर तुम्हारा ब्रेन वॉश कर दिया गया है। तुम्हें, अपनी पत्नी की बात पर विश्वास नहीं है ? बबलू जी की व कविता की लम्बाई में बहुत अंतर है। वे ही उस दिन स्कूटर दौड़ाता ले गया था। मुझे दूर की चीज़ इतनी कम भी नहीं दिखाई देती।”

“देखो ! ये कैसी बातें कर रही है । रोली, मैं तुम्हारी शादी के बाद इनसे तलाक ले लूँगा।”

वह दृढ़ हो उठी, “चलो, कल रोली के साथ जाकर कोर्ट  में ‘एप्लिकेशन’ दे देते हैं। तलाक होते-होते एक दो वर्ष लगेगा तब तक इसकी शादी कर देंगे।”  

अभय का फक्क पड़ता चेहरा देखने लायक हो रहा है । उनसे उसे हर तरह की धमकी दिलवाई जा रही है जिससे वह सम्बन्ध बना रहे। वह बार-बार अभय को अलर्ट करती रहती है इसलिए कविता इनसे रुपये नहीं खींच पाती तो उसने इन्हें प्यार में पागल करना शुरू कर दिया है।

“तुम तीनों एक हो।” अभय रटाया वाक्य दोहराते हैं।

“हाँ, हम तीनों एक हैं। तुम बदमाशों के साथ बैठकर बदमाश बन गये हो।”

“मॉम! प्लीज़! आप दूसरे कमरे में जाइए मैं पापा से बात करती हूँ।” वह उसे कमरे से बाहर कर कमरा बंद कर लेती है। रोली दूसरे दिन जाने को तैयार नहीं है। वह ज़िद करती है तो समिधा उसे समझा देती है, “मुझमें इन गुंडों का सामना करने की हिम्मत है।”

“मैं एक शर्त पर जाऊँगी आप मुझे नेट से रोज़ मेल करेंगी।”

“प्रॉमिस, आई विल।”

तीसरे दिन अभय उसे अस्पताल से पिक करते घर की तरफ़ आ रहे हैं। कविता अपनी बिल्डिंग के सामने सड़क पर खड़ी है। वह अपने होठों से आँखों से मुस्कराते हुए, समिधा की खिल्ली उड़ाते हुए अभय को देखे जा रही है। बिना पलकें झपकाये, एकटक  पूरी तन्मयता के साथ उन्हें घूर रही है। उसकी इस अदा में एक चुनौती है, “देखो? मैं तुम्हें कितनी चाहती हूँ मुझे चीफ़ विज़िलेंस ऑफ़िसर का भी ड़र नहीं है।”

समिधा इस बेहयाई के खौफ़ से थर्रा गई है। वह क्या करे ? किससे सहायता ले ? वह मीनल को फ़ोन लगा बैठती है, “मीनल जी कैसी हैं ?”

लग रहा है मीनल किसी गहरे कुएँ से रुँआसी सी बोल रही हैं, “नॉट फ़ाइन। आपने तो विकास के बारे में सुना ही होगा।”

“हाँ, कुछ-कुछ।”

“आपका फ़ोन आया है तो अच्छा लग रहा है, वर्ना हमें तो सबने काले पानी की सज़ा दे दी है। हमें कोई फ़ोन नहीं करता। ऐसा लग रहा है जैसे विकास व मैंने ही क्राइम किया है।” उनकी आवाज़ भर्रा जाती है।

“लोगों को तो रंजन जी को उनकी हिम्मत के लिए बधाई देनी थी।”

“ईमानदार आदमी आज के टाइम में किसे अच्छे लगते हैं? हमारी ‘फ़ेमिली आइसोलेट’ कर दी गयी है। बच्चे भी हमारे बच्चों को बर्थडे पार्टी में नहीं बुलाते। हम दोनों तो सम्भाले हुए है लेकिन बच्चे इस ‘बाइकाट’ में सहमे हुए हैं। सहमे से आपस में खेलते रहते हैं। हम लोग क्लब भी नहीं जा पाते तो बच्चे घर में कितना खेलें?”

“आप लोगों के साथ ऐसा हो रहा है?”

“हाँ, आपको एक कविता की पंक्तियाँ सुना रही हूँ, मैंने अभी-अभी पढ़ी है-”

मैंने बस्ती में चोरों की आहट  पा

‘जागते रहो’ की आवाज़ लगा दी

मुझे मालूम न था

ये मौसेरे भाईयों की बस्ती है,

जागते रहो की आवाज़ सुनते ही

सब मौसेरे भाई मुझ पर टूट पड़े

कौन है तू लोगों को जगा रहा है ?

“ओ माई गॉड ! सच्चाई की ये सज़ा है।”

“देख लीजिये, अरे ! मैं पूछना भूल गई आपने हमें कैसे फ़ोन किया?”

“आप नीता से लेकर ‘फ़ेमिनिस्ट बुक’ पढ़ना चाह रही थीं। मेरे पास एक है मैं भिजवा देती हूँ।”  

“थैंक्यू, वेरी मच ! टाइम तो कटेगा।”  

वह एक लिफ़ाफे में किताब रखकर लिफ़ाफे पर ‘बंगला नंबर सोलह’ लिख देती है व अभय के सामने बाई को लिफ़ाफ़ा देकर कहती है, “इसे जाकर सोलह नम्बर वाली मैम साब को दे आओ।”

 “आप उस बंगले की बात कर रही है जिन साब ने पुलिस बुलाकर मोटे साहब (बड़े साहब) को पकड़वाया था।”

“हाँ वही।”

दूसरे दिन शाम को अभय चाय पीकर टीवी देख रहे हैं तभी फ़ोन  घंटी बज़ उठती है। उस आवाज़ को सुनकर समिधा का दिल खुशी से झूम उठता है, “हलो । मीनल जी।”

“आपने क्या किताब भिजवाई है। झोपड़पट्टी की औरतों के विषय में कितना जानने को मिला है।”

“अभी इसमें दिल्ली की एक लेखिका का लेख पढ़िए तो पता लगेगा कि स्त्रियाँ क्यों हाय, हाय करती रहती हैं।”

“ओ.के.”

अभय ‘दाँये’ ‘बाँये’ देख रहे हैं। अभय का ये ड़र उसे राहत पहुँचा रहा है कम से कम कुछ दिन वे ठीक रहेंगे।

मीनल का दूसरे तीसरे दिन फ़ोन आता रहता है। उन्होंने पहली बार नारीवादी किताब पढ़ी है इसलिए उसे पढ़कर समिधा को प्रतिक्रिया देती रहती है। उसके फ़ोन समिधा के लिए सुरक्षा है। अभय के चेहरे पर उभरी कालिमा व डर उसकी चिन्ता कम करता है। पीछे के घर में यही भय फैल गया होगा। एक दिन कविता की नौकरानी को देखकर उसे शरारत सूझती है वह उसे रोक लेती है, “अपनी मैडम से कहना उसे मीनल मैम साहब बहुत याद कर रही हैं, पूछ रही थीं उसने महिला समिति क्यों छोड़ दी? वे उसका मोबाइल नंबर भी माँग रही थीं।”

“कौन मीनल मैम  साहब?”

“वह समझ जायेगी।”

“हमारी मैम साहब तो अजमेर गई थीं, लौटी हैं तो बहुत बीमार होकर।”

“अच्छा?”

 रात में वह घर की तरफ़ लौट रही हैं कविता अपने फ़्लैट के कमरे से निकल कर बीमारी में गिरती पड़ती बालकनी की दीवार पकड़ कर खड़ी हो जाती है। वह चलने से बुरी तरह हाँफ़ रही है। दूसरे से आँखों से ज्वाला निकालती वह समिधा पर नज़रें टिकाये है। क्या चोट खाई जीभ लपलपाती नागिन ऐसी ही नहीं फुँफ़कारती होगी?

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नीलम कुलश्रेष्ठ

ई –मेल---kneeli@rediffmail.com

 

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