चंपा पहाड़न - 6 Pranava Bharti द्वारा सामाजिक कहानियां में हिंदी पीडीएफ

चंपा पहाड़न - 6

चंपा पहाड़न

6

    मह्तू जैक्सन साहब का विश्वासपात्र बावर्ची भी था और ड्राइवर भी | रात के अंधेरों में ऊबड़-खाबड़ रास्तों में से किस प्रकार गन्तव्य तक पहुँचा जा सकता है, वह बखूबी जानता था | यह सब तो ठीक परन्तु वकील साहब यह समझने में अपने आपको असफल पा रहे थे कि वे उस युवती को किसके पास और कहाँ ठिकाना दिला सकेंगे ? उनका अपना परिवार तो उसे अपने यहाँ स्वीकार नहीं करेगा तब ?यह भी समस्या थी कि यदि वे जैक्सन को मना कर देते हैं तब वह गोरा क्या सोचेगा कि इस हिन्दुस्तानी को अपने देश की लड़की के प्रति इतनी भी हमदर्दी नहीं है ? बेचारे पशोपेश में थे, इस बार वे सचमुच फँस गये थे किन्तु बात अब उनके स्वाभिमान पर आ टिकी थी | उन्हें कुछ तो करना ही था |

“डोंट वरी अबाउट मनी, आई विल अरेंज ---” वकील साहब को बात और भी चुभ गई |

‘ये गोरे भी ---क्या समझते हैं अपने आपको, कहाँ से करेंगे अरेंज? हम भारतीयों के पैसे से ही न ? फिर वे स्वयं क्यों नहीं यह काम कर सकते ?’वे मन में बुदबुदाए |

“आप कुछ बोले ?”जैक्सन ने शायद उनकी बुदबुदाहट भांप ली थी |

“डोंट वरी मि.जैक्सन, आई विल अरेंज द मनी –”उन्होंने अपने स्वाभिमान की डोर पकड़े रखने की चेष्टा करते हुए जैक्सन को आश्वासन दिया | वैसे जैक्सन के चेहरे पर वास्तव में लड़की की चिंता पसरी हुई थी |

“आर यू श्योर ----?”

“ओ यस ---“

   रातों रात लड़की व वकील साहब को दूर गाँव में वैद जी के घर पर छोड़कर जैक्सन और मह्तू वापिस लौट गये | वापिस लौटते हुए जैक्सन ने वकील साहब को गले लगाया और उनकी दिलेरी पर उन्हें धन्यवाद देकर अपना कर्तव्य पूरा कर दिया | अब वकील साहब की बारी थी | वैद जी ने दो दिन अपने पास रखकर लड़की का इलाज़ किया और बाद में दवाईयाँ व कुछ लेपादि देकर उन्हें विदा किया | लड़की का गुप्तांग लहूलुहान था, बुरी प्रकार फट चुका था |

“ यह कभी माँ नहीं बन सकेगी –“ वैद जी ने वकील साहब से कहा |

    वकील साहब को भला इस बात में क्या रूचि हो सकती थी ? वैद जी की बातें सुनते हुए वकील साहब सोच रहे थे ‘इसको लेकर कहाँ जाएंगे?’, उन्हें इस बात की चिंता खाए जा रही थी?

   जब उन्हें कुछ और नहीं सूझा तब वे अपने ही शहर में लड़की को लेकर आ गए | दो-चार दिन घर पर रखा लेकिन स्वाभाविक था वहाँ उनकी पत्नी व बच्चों को उसका आना खटकता | लड़की ने रास्ते में अपना नाम चंपा बताया था | वकील साहब की इच्छा थी कि यदि वह अपना पता-ठिकाना बता देती तो उसके गाँव जाकर उसके घरवालों के सुपुर्द कर आते लेकिन उसने रोते-रोते बताया कि उसके सौतेले चाचा ने ही उसे गोरों के हाथ बेच दिया था जिन्होंने उसकी यह हालत बनाकर इस प्रकार मरने के लिए छोड़ दिया था, अब यदि वह घर गई भी तो उसे प्रताड़ना के अलावा कुछ नहीं मिलेगा | वह आप-बीती बयाँ करते हुए लगातार सुबकियाँ लेती रही थी और बार-बार उनसे प्रार्थना करती रही थी कि उसे चाहे कहीं छोड़ दें, उसके चाचा के पास न छोड़ें |

   इस प्रकार चंपा उसके शहर में लाई गई थी |दो ही दिनों की खोज में वकील साहब ने उसके लिए वह ठिकाना ढूंढवा लिया था | लेकिन समाज के लोगों की दृष्टि में वह देह-व्यापार करने वाली रंडी थी, वैश्या थी जिसे देखकर वे और लोगों के सामने फिकरे कसते, मुह बिचकाते, अपने घर की लड़कियों को उनसे दूर रखने के लिए ज़ोर-ज़ोर से चिंघाड़ते, एक तमाशा सा बनाकर रख देते लेकिन मुह में उनके लार टपकती रहती और उनका बस चलता तो वे चंपा को कच्चा ही चबा जाते| समाज के ठेकेदार थे वे, कुछ भी कर सकते थे |कितना नीचे गिर जाता है मनुष्य !अपने आप ही कल्पना करके अपने आप ही परिणाम की घोषणा भी करने लगता है |  

   देश में जबर्दस्त स्वाधीनता-संग्राम की आँधी चल रही थी|गुड्डी की माँ एक अध्यापिका तो थीं ही, स्वतन्त्रता संग्राम से भी जुड़ी थीं |शहर में हर दूसरे दिन अंग्रेजों के विरुद्ध जुलूस में अन्य जागरूक स्त्रियों सहित गुड्डी की माँ भी शामिल होतीं |कुछेक दिनों में ही चंपा ने उसकी माँ का ध्यान अपनी ओर आकर्षित कर लिया था | वह जानती थी कि समाज में उसके लिए कोई सम्मानीय स्थान नहीं है, यह भी जानती थी कि गुड्डी की माँ उसे व उसके कार्य-कलापों को छिप छिपकर देखती हैं किन्तु चंपा ने कभी न तो उस बात को मन से लगाया कि लोग क्या कहते हैं, न इस बात पर अधिक ध्यान दिया कि उसकी जासूसी की जाती है | वह अपने आपको एक स्वस्थ तरीके से जीने की राह दिखाने की चेष्टा में लगी रही, ज़िंदगी पाने पर वह एक सकारात्मक सोच की ओर बढती रही, बिलकुल कीचड़ के कमल की भांति |हाँ! वह अंग्रेजों के प्रति बहुत असंवेदनशील व कठोर बनी रही जबकि वह इस बात से भिज्ञ थी कि उसकी जान बचाने वाला भी पहले एक अंग्रेज़ ही था, वकील बाबू तो उसी अंग्रेज़ के कहने पर उसे लेकर आए थे |गुड्डी की माँ श्रीमती माया देवी शनै: शनै: चंपा की दिनचर्या से प्रभावित होने लगीं थीं |उन्हीं दिनों शहर में स्वामी दयानन्द के विचारों के प्रभाव के फलस्वरूप शहर में ‘आर्यसमाज’ की स्थापना हुई जिसको समाज के शिक्षित वर्ग ने सराहा था, यह वर्ग स्वामी दयानन्द के विचारों पर चलने का प्रयास कर रहा था | अध्यापिका माया देवी का परिवार आर्यसमाज में बहुत उत्साह से जुड़ गया | माया ने अब उस ‘बेचारी’ सी युवा लड़की के बारे में गंभीरता से सोचा और समाज को ताक पर रखकर उन्होंने चंपा को अपने साथ आर्यसमाज में चलने का निमन्त्रण दे डाला |

    कई दिनों तक चंपा चुप्पी साधे रही, समाज में बाहर निकलने का, लोगों से मिलने का उसका साहस ही नहीं होता था | वह जिन नीच, अभद्र शब्दों को कान बंद करके, आँखें नीची करके अपने भीतर उतारती रहती थी, उन्हीं शब्दों ने उसके बाहर निकलने के द्वार पर पहरे बैठा रखे थे, संकोच की दीवार खड़ी कर रखी थी | समाज के बेहूदे ठेकेदारों के मुख से निसृत गलीज शब्दों ने उसके भीतर उसके अपने लिए एक हिकारत भर दी थी जिसमें लिपटकर वह एक बेचारी सी ‘चीज़’ बनकर रह गई थी जिसे जीवन पर्यन्त एक कोने में पड़ा रहना था | गुड्डी की माँ उसके पशोपेश की स्थिति को बखूबी समझती थी | यूँ तो पास ही में रहने वाली गुड्डी की नानी भी आर्यसमाज की चुस्त, उत्साही सदस्या थीं किन्तु चंपा उनकी आँख में भी किरकिरी बनकर चुभती, वे उसे स्वीकार करने में स्वयं को असमर्थ पा रही थीं | विशेषकर वे इस बात को लेकर परेशान व अनमनी हो जातीं जब देखतीं कि उनकी अध्यापिका बेटी माया अपनी एकमात्र बच्ची यानि गुड्डी को ‘उसके’ पास जाने की छूट देने लगी थी |जब चंपा उसकी माँ के कमरे के बाहर वाली संकरी गैलरी के बाहर से गुज़रकर अपने लिए नल पर पानी भरने जाती गुड्डी अपनी आया की नज़रों से छिपकर चुपचाप घुटनों चलकर उसके पीछे-पीछे हो लेती |अपनी कोठरीनुमा रसोई में जब बाल्टी रखकर वह पीछे मुड़कर देखती उसे एक नन्हा सा मुस्कुराता हुआ फूल दिखाई देता, जिसे वह इधर-उधर देखकर झट से अपने सीने से चिपका लेती | गुड्डी को भी जैसे उसकी गोदी में स्वर्ग का आभास होता और वह खिलखिलाकर हँसने लगती| आया कई बार गुड्डी को उससे छीनकर ले आई थी, चंपा के मुख पर जैसे कोई तमाचे मार जाता, फिर वह माया से उसकी शिकायत करती |

   सात-आठ माह की घुटनों के बल पर चलना सीखने वाली बच्ची को क्या समझाया जा सकता था ?माया आया से ही कहतीं;

“मैं तो कॉलेज में होती हूँ, बच्ची का ध्यान तो तुम्हें रखना है |” आया ‘हाँ’ में सिर तो हिलाती परन्तु उसके पास अपने बढ़ई दोस्त से कहाँ फुर्सत होती थी?जैसे ही माया घर से कॉलेज के लिए निकलतीं, गंगा का दोस्त आ धमकता और फिर मज़ेदार चाय–नाश्ता होता, हलुआ बनाया जाता जिसमें से कुछ गुड्डी को भी चटा दिया जाता |आया की नजरें बचाकर बच्ची कब चंपा की कोठरी में जा घुसती, किसीको पता ही नहीं चलता |इस प्रकार चंपा और बच्ची में धीरे-धीरे ताल-मेल बैठ गया था, चंपा उसे स्वयं न बुलाती परन्तु उसकी प्रतीक्षा अवश्य करती रहती  थी, उसकी दृष्टि माया के कमरे के दरवाज़े पर ही गड़ी रहती, कभी-कभी वह आया को उसके मित्र के साथ ग़लत तरीके से चूमा-चाटी करते देख लेती और उसे आया पर क्रोध आने लगता |जब माया ने उसे अपने साथ आर्य समाज में जोड़ लिया तब वह माया के साथ कुछ सहज हुई और धीरे-धीरे उसने माया से गंगादेई के बारे में बात करनी शुरू की |

क्रमश..

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