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दाई की माला

दाई की माला

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आज नन्ही मीनू सत्तर वर्ष की वृद्धा हो चली है |हँसी आती है न सत्तर वर्ष की उम्रदराज़ स्त्री को नन्ही मीनू कहते हुए | कभी तो सब ही नन्हे-मुन्ने होते ही हैं ,फिर संकोच कैसा? नाती-पोतों वाली मीनू अपनी तीसरी पीढ़ी को बहुत कुछ बताना चाहती है | बहुत सी बातें शेयर करना चाहती है किन्तु तीसरी पीढ़ी को मोबाईल और लैपटॉप जैसे झुंझुने से फ़ुर्सत ही नहीं है | उसका मन कभी द्रवित हो जाता है ,यह सोचकर कि जो चीज़ें या बातें उनकी पीढ़ी के पास आज तक सुरक्षित हैं ,उनके बारे में आने वाली पीढ़ियाँ अनभिज्ञ ही रहेंगी |आज तो वैसे भी कितने संयुक्त परिवार रह गए हैं ? उंगलियों पर गिन लो ---बस

हम दो ,हमारे दो के नारे ने एक-एक के भीतर अकेलापन भर दिया है ,अब तो एक और किसी किसी को तो एक ही नहीं चाहिए | अकेला भी क्या धीरे-धीरे सब एकाकी होते जा रहे थे |

एकांत हो तो एक सकारात्मक ऊर्जा से मन केंद्रित होने के साथ एक भीनी बयार का सुखद अनुभव भी करता है पर अपने जीवन में टूटते परिवारों को देखकर मीनू का मन चीत्कार करता है |

मीनू के ज़माने में तो फ़ोन भी बड़े कम घरों में हुआ करते थे |उसके पिता-माता उच्च शिक्षा प्राप्त थे| पिता 'मिनिस्ट्री ऑफ कॉमर्स ' में 'सैक्शन ऑफ़िसर'थे ,माँ संस्कृत की लैक्चरार ! वह अंग्रेज़ों का ज़माना था जब उसके माता-पिता ने इतनी उच्च शिक्षा प्राप्त की थी| अक़्सर उसे अपने माता-पिता पर गर्व होता और वह ये सब बातें अपनी तीसरी पीढ़ी को सुनाने को लालायित रहती | पता नहीं ,जब भी वह कोई बात सुनाने बैठती बच्चे कहते ;

" ओह ! ग्रैनी ,यह बात आपने एक,दो,तीन ,चार ---न जाने कितनी बार सुना दी है | हम सुनाएं?,रटीहुई है हमें ---एक -एक वर्ड --| "

वह बड़ी अजीब सी हो जाती ,आख़िर उसे क्यों याद नहीं ,उसने एक ही बात इतनी बार सुना दी है | जब तक वह कोई दूसरी बात सोचती ,बच्चे अपने मोबाईल ,लैपटॉप में व्यस्त हो जाते |

एक बात और भी थी जो उसे बड़ी उलझन में डालती थी ,उसे अपने बच्चों का बचपना याद नहीं था यानि एक तारतम्यता में यदि वह याद करती तो उसकी लड़ियाँ बिखर जाती थीं | वह उन्हें टुकड़ों में याद कर पाती थी | इसी तरह जैसे उसे अपने बचपन की बातें कहीं न कहीं बिखरी हुई मिलने लगीं थीं | वह उन्हें जोड़ना चाहती थी ,उनके मनके पिरोकर एक सुन्दर माला बनाना चाहती थी लेकिन कोई न कोई मनका मिसिंग हो जाता था |

"ग्रैनी ,ये क्या है ? व्हाट इज़ दिस ? " अपनी आदत से मज़बूर आर्शिया यानि अर्शी अपनी दादी के पुराने सूटकेस ,बक्से खँगालती रहती | एक वह थी जिसके पास दादी से जानने के लिए समय भी था और रूचि भी | इसका सबसे बड़ा कारण था कि उसके पास अभी तक मोबाईल और लैपटॉप के झुनझुने नहीं थे | खसोट लेती थी कभी चुपके से ,जब भी मौका मिलता पर परमैनेंट तो ऐसा कुछ था नहीं उसके पास | यूँ दाऊ -दाई के मोबाईल पर कब्ज़ा कर लेना वह अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझती थी लेकिन अधिक समय उसके पास न रहा पाता| डाँस-क्लास से वापिस आने के बाद वह दाऊ -दाई में से किसी एक का मोबाईल तो उसे चाहिए ही था | जाने उसने कितने गेम्स डाऊनलोड किए हुए थे उन दोनों के मोबाइलों पर |

"दाई ,ये क्या है ?" वह अपने हाथ में पकड़ी चीज़ को घुमाकर देखते हुए दादी से बोली |

आठ वर्षीय पोती के हाथ में एक पुरानी सी माला थी,उस दिन शायद उसका मन कुछ तोड़फोड़ का था | अब मन ही तो है कब बिरट जाए|अच्छे-अच्छों का मन बहकने लगता है फिर वह तो छोटी बच्ची थी | मुसीबत यह कि उसके सात/नौ वर्ष बड़े भाई-बहन उसे बिलकुल बच्चा समझते और उसे घास क्या तिनका तक न डालते | तब उसे दादी का संदूक खोलने की याद आती |

"बताइये न ,ये क्या है ?" अर्शी मीनू के पास आकर पूछने लगी थी |

मीनू याद करने की कोशिश में अपने माथे पर बल चढ़ाकर कुछ सोचने लगी | वह एक माला थी जो काफ़ी पुरानी हो गई थी | हल्के हरे रंग की माला उसे बहुत पीछे खींचकर ले गई | धीरे -धीरे उसे माला से जुड़ी हुई बहुत सी बातें याद आने लगीं ,उसके चेहरे पर मुस्कान थिरक उठी |

"क्या हुआ दाई ? " अर्शी के चेहरे पर भी उत्सुकता फ़ैल गई |

मीनू ने उसके हाथ से माला ली और बाथरूम में वॉशबेसिन पर जाकर हल्का सा हैंडवॉश उस पर डालकर ,उसे धो दिया | माला में एक चमक सी आई यध्यपि उसका पुरानापन वैसा ही बना रहा | अर्शी उसके पीछे-पीछे घूम रही थी |

"इससे जुड़ी कहानी तो बहुत मज़ेदार है ---"मीनू के चेहरे पर बचपने की मुस्कान थिरक उठी |

पोती के हाथ में माला देखकर दादू भी हँसने लगे |

"आपको भी पता है इसकी कहानी ?" बच्ची ने जिज्ञासा से पूछा तो दाऊ,दाई दोनों ही खुलकर हँस पड़े|

सोलह वर्षीय वंदना भी हँसी सुनकर दादू के कमरे में भाग आई थी |

"व्हाट इज़ दिस ?" उसे भी वो पुरानी सी माला बड़ी अजीब सी लगी | उसकी समझ में नहीं आ रहा था आख़िर इस माला में हँसने जैस था क्या ?

"ये तो बहुत पुरानी लगती है दाई ,दाऊ ने प्रेज़ेंट की होगी आपको ---" उसने छोटी बहन के हाथ से माला झपट ली ,वह चीखकर रोने लगी |
"अच्छा ,मुझे दो --चलो ये किसीके पास नहीं रहेगी ,मुझे दो ---" दादा जी ने मुस्कुराते हुए कहा |

अब तो दोनों बच्चों के चेहरे देखने लायक थे | जो दाई की बातें सुनने में बोर होते थे उनके चेहरों पर से जिज्ञासा झाँक रही थी |

"बताइए न ! आपने ही गिफ़्ट को न दाई को ---?" बड़ी बहुत कुछ जानना चाह रही थी | शायद दाऊ ,दाई की डेट की बात छिपी हो इसमें !

" नहीं बेटा ,यह तबकी है जब मैं बहुत छोटी थी ,अर्शी से भी बहुत छोटी ---" दादी ने मुस्कुराकर बताया , बच्चे और भी पशोपेश में थे |

" अब सुना भी दो न ,बच्चों को इसकी कहानी ---" दादा जी ने हँसते हुए पत्नी से कहा |

"हाँ ,मेरी मज़ाक बनवाना चाहते हो न ---?" दाई भी हँस रही थीं |

" नहीं दाई ,प्लीज़ ---हम नहीं हँसेंगे ,सुनाइए न ---"

"अच्छा ,चलो पहले कमरा बंद करो ,अँधेरा कर दो ----" दादू जी ने कहा तो बच्चे घबरा गए | कोई भूत-प्रेत की बात तो नहीं है ?

" सुननी हो तो पहले वो करो ,जो हम कह रहे हैं |"

झख मारकर बच्चों ने दरवाज़ा बंद किया | दादी ने मुट्ठी में पकड़ी माला अँधेरे में खोल दी | माला चमकने लगी थी |

"ओ---दिस इज़ सो क्यूट ---" इतनी पुरानी माला में से भी हरी रोशनी निकल रही थी |
"अब ये तो बताइए ये कहाँ से मिली आपको ? "

" बताओ तो ये कितनी पुरानी होगी ?" दादा जी ने पूछा |
"हम कैसे बता सकते हैं ?"

" ठीक है ,मैं बताती हूँ तुम्हें ---एक कहानी सुनाती हूँ --"बच्चियाँ एलर्ट होकर बैठ गईं |

"ये तब की बात है जब मैं शायद चौथी में पढ़ती थी --"

"ओह ! इतनी पुरानी बात ---आपके समय में तो एज भी काउंट नहीं होती थी न ?"

" हाँ ,मैंने तरह साल की उम्र में टेंथ कर लिया था ,अब तो सोलह साल मिनिमम एज है ---"

"तुम लोगों जैसे हमें कहीं बाहर अकेले जाने की छूट नहीं थी | हमारे यहाँ साल में एक बार नुमाइश होती थी | जिसमें हमें अपनी मम्मी के साथ ही जाना होता था | खैर, एक बार नुमाइश में मैंने एक चमकता मैटल देखा जिससे बहुत सारे ऑर्नामेंट्स बने हुए थे | हम सबने ही यह मैटल पहली बार देखा था | मैं तो ज़िद में आ गई कि मुझे माला ही चाहिए | मम्मी ने दुकान वाले भैया से पूछा ,उन्होंने बताया कि यह एक नया मैटल निकला है | जिसका नाम 'रेडियम' है और यह अँधेरे में खूब चमकता है | दुकान वाले भैया बार-बार लाइट बंद करके ग्राहकों को लालच दे रहे थे | मेरे जैसे कई बच्चे उस चमकनी चीज़ को देखकर दुकान के सामने ही ठिठक गए थे | वह काफ़ी मँहगी थी इसलिए बच्चों के माता-पिता उसे लेने में हिचक रहे थे ,फिर यह भी नहीं मालूम था कि वह मैटल आख़िर है क्या और चलेगा भी या नहीं ? ख़ैर हमें माला इस शर्त पर दिलवा दी गई कि हम इसे बहुत सँभालकर रखेंगे और मम्मी से पूछे बिना इसे पहनकर कहीं नहीं जाएँगे---"

" दाई ,आपने तो प्रॉमिज़ कर लिया होगा ?"

"करना ही था न ,नहीं तो हमें माला कौन ख़रीदवाकर देता ?" मीनू ने हँसकर कहा |

" आपके ज़माने में भी बच्चे झूठमूठ प्रॉमिज़ करते थे ?" छुटकी कहाँ चुप रहने वाली थी |

"बच्चे तो बच्चे ही होते हैं बेटा !"दादू ने हँसकर कहा |

"चलिए ,दादी ---फिर क्या हुआ ?"

" कई दिन हो गए ,मैंने अपने पास रहने वाली सहेली को तो माला दिखाई पर मेरे मन था कि स्कूल में सब सहेलियाँ मेरी माला देखें | एक दिन मम्मी के कॉलेज जाने के बाद मैंने चुपके से माला अपने बैग में रख ली और रिसेस में सब सहेलियों को क्लासरूम का दरवाज़ा बंद करके माला की रोशनी उन्हें दिखा दी ---सब लड़कियाँ मेरे रौब में आ गईं | उस दिन स्कूल में मेरा मन नहीं लगा ,जल्दी से छुट्टी हो और मैं माला ले जाकर मम्मी की अलमारी में रखूँ|"

" छुट्टी होते ही मैं अपने रिक्षा वाले का बड़ी बेताबी से इंतज़ार करने लगी|लगा,इतनी देर क्यों हो रही है ? जबकि गोरा काका समय पर रिक्षा लेकर आए थे| ख़ैर ,घर आकर सबसे पहले मैंने मम्मी की अलमारी में माला को वहीं रख दिया जहाँ से लेकर गई थी |"

"अगले दिन जब मैं स्कूल गई तो अपने को बहुत अमीर महसूस कर रही थी | मेरे जैसी माला किसीके भी पास नहीं थी,मैं सबमें अपना रौब दाल चुकी थी |लेकिन थोड़ी ही देर में मेरी फूँक निकल गई |मेरी क्लास की एक लड़की मेरे पास आई और रोने लगी |"

"क्या हुआ राधिका ,तुम रो क्यों रही हो ? "मैं परेशान हो गई थी |

"तुझे यकीन नहीं होगा मीनू ,इसलिए मैं तुझे नहीं बताती ---" उसने रोते हुए कहा |

"अरे ! तुम मेरी इतनी अच्छी सहेली हो ,क्यों नहीं होगा यकीन ---बताओ ----" मैं उसके पीछे पड़ गई|

"तुम्हें तो पता है ,हमारे घर में कृष्ण भगवान की पूजा होती है ,इसीलिए तो मेरा नाम राधिका रखा है ---" वह और सुबकने लगी |
" तो रो क्यों रही हो ? बताओ न---!" मैंने ज़िद की |

"कल रात मेरे सपने में कृष्ण भगवान आए थे ,उन्होंने मुझे कहा कि अगर तुम्हारी सहेली एक दिन के लिए मुझे अपनी माला नहीं देगी तो उसके मम्मी-पापा मर जाएँगे ---" ये कहकर वह खूब ज़ोर-ज़ोर से रोने लगी | उसके साथ मैं भी रोने लगी | कुछ समझ ही नहीं आ रहा था ---"

"पर ,कृष्ण भगवान कैसे पहनेंगे मेरी माला ?" मैंने रोते हुए मूर्खों वाला प्रश्न उससे पूछा |

"उन्होंने कहा है ,हमारे स्कूल में जो बड़ा सा पीपल का पेड़ है न ,उसके नीचे गड्डा खोदकर माला रख दो , वो वहाँ से ले लेंगे ,एक-दो दिन में वो पूजा करके वहीं रख जाएँगे | बस यह बात किसीको बतानी नहीं चाहिए नहीं तो तेरे ---| "

" मैंने फिर से रोना शुरू किया ,क्या करती? कैसे करती ? मेरे मम्मी-पापा तो वैसे भी यह सब मानते नहीं थे -- मैं उस दिन स्कूल में रोती रही | "

"तू देख ले , भगवान जी एक-दो दिन में माला वापिस दे जाएँगे | तेरे मम्मी-पापा को कुछ न हो इसीलिए तो उन्होंने मेरे सपने में आकर सब कुछ बताया --"

बच्चे ठहाका लगाकर हँसे जा रहे थे और मीनू अपने बालपन की यादों में चकफेरी लगा रही थी |

"फिर ,क्या हुआ दाई --"

"मैं पूरी रात भर रोती रही ,मम्मी ने पूछा तो कहा पेट में दर्द है | वैद्य जी की कड़वी दवाई लेनी पड़ी ,उस दिन स्कूल ही नहीं गई | शाम को वही लड़की घर पर आई ,उसने फिर से वही बात दोहराई | कृष्ण भगवान ने उससे पूछा था कि अभी तक माला क्यों नहीं रखी गई ? कब तक स्कूल न जाती ? अगले दिन मैंने चुपके से फिर मम्मी की अलमारी से माला निकली और लिफ़ाफ़े में रखकर उस लड़की के साथ जाकर उसे पेड़ के नीचे गाड़ आई | "

"अब देखना तेरे मम्मी-पापा को कुछ नहीं होगा ---" उसने बहुत आश्वस्त होकर कहा |

"मेरे दिल की धड़कन तो धौंकनी बनी हुई थी | कब कृष्ण जी माला पहनकर पूजा करेंगे ,कब मुझे वापिस मिलेगी ? "

"अगले दिन मैंने उसे पूछा कि "अभी तक तो भगवान जी ने पूजा कर ली होगी .माला तो वहाँअभी रखी ही नहीं --?" दो दिन बाद उससे पूछा मैंने | घबराहट के मारे मेरे आँसू निकले जा रहे थे |

"तू तो पागल है ,पूजा की बात तो भगवान जी को पता ,मुझे तो जो उन्होंने कहा था ,मैंने तुझे बता दिया ---" उसका स्वर उस दिन बदला हुआ था |

"जब ह्फ़्ता बीत गया ,तब मैंने मम्मी को डरते डरते पूरी कहानी बता दी ---"
"आपकी मम्मी ने आपको मारा ?"

"नहीं ,मारा भी नहीं ,डाँटा भी नहीं | बस,ये कहा कि ऎसी मूर्खता की बातों में तुम कैसे आ गईं ?"
"उसने कहा था न कि तेरे मम्मी-पापा मर जाएँगे ---" मैं रोने लगी |

"पागल ! ऐसे कोई मम्मी-पापा मरते हैं ?" मम्मी ने मुझे गोदी में लेकर चुप कराया |

मम्मी तो कॉलेज में पढ़ाती थीं ,उन्हें और हमारे परिवार को बहुत अच्छी तरह सब जानते थे| मम्मी मेरे साथ स्कूल आईं और प्रिंसिपल से बात की | मुझसे पेड़ दिखाने को कहा गया | मम्मी के साथ प्रिंसिपल भी मरे साथ आए ,रोते -रोते मैंने उन्हें पेड़ और वह जगह दिखलाई जहाँ मैंने माला रखी थी |

"हमारे यहाँ पीपल का पेड़ ही नहीं है ---" प्रिंसिपल ने कहा |

"ये वाला ---" मैंने पेड़ के पास जाकर कहा |

"बेटा ! ये तो कटहल का पेड़ है ---" वो और मम्मी ज़ोर से हँस पड़े| उस लड़की को क्लास से बुलाया गया | चपरासी के साथ उसके घर भेजा गया ,उसका घर पास ही था | वह मेरी ये वाली माला लेकर जल्दी ही वापिस आ गई | प्रिंसिपल ने उसके घर पर भी एक नोट भेजा था और उसे पनिश करके वार्निंग दी गई कि आगे से वह किसीके साथ ऎसी हरक़त नहीं करेगी |

डॉ. प्रणव भारती

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