दरमियाना - 23 Subhash Akhil द्वारा सामाजिक कहानियां में हिंदी पीडीएफ

दरमियाना - 23

दरमियाना

भाग - २३

दिल्ली के दिल क्नॉट प्लेस के आसपास का यह इलाक वी.वी.आर्इ.पी. कहलाता है। इसके एक तरफ राष्ट्रीय शान 'इंडिया गेट' है, तो दूसरी तरफ कला और संस्कृति का क्षेत्र मंडी हाउस -- जहाँ दूरदर्शन केन्द्र से लेकर साहित्य, कला, नाट्य आदि से जुड़े अनेक संस्थान और सभागार। श्रीराम सेंटर, त्रिवेणी, साहित्य कला अकादमी, फिक्की, एन.एस.डी., हिमाचल भवन, बंगाली मार्केट जैसा सुपर पॉश इलाका तो है ही, मगर सांगली मैस के पीछे पंजाब और हरियाणा भवन भी हैं। हार्इ कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट भी यहाँ से ज्यादा दूर नहीं है और प्रगति मैदान भी बस सामने ही समझिये!

यह सब बताना इसलिए जरूरी लगा कि यदि आप इस सुपर वी.वी.आर्इ.पी. एरिया के पास सांगली मैस या प्रिंसिस पार्क जैसे इलाके को देख लें, तो आपके होश ही फ़ाख्ता हो जाएँ।... हम जैसे-जैसे उस दायीं तरफ की गली से होते हुए साँगली मैस की तरफ बढ़ रहे थे, आश्चर्य हमें भी हो रहा था। बायीं तरफ एक हलवार्इ की दुकान के पास पहुँचकर रेखा के बारे में पूछा, तो हमें थोड़ा आगे जाकर एक स्कूल के सामने, बायीं तरफ ही कोने का मकान बताया गया था।

अलग-अलग रंगों में पुते ये सभी मकान किसी स्लम एरिया का आभास दे रहे थे। ये सभी कच्चे-पक्के-से एक मंजिला मकान थे, जिन पर लेंटर नहीं था।

"ये कहाँ आ गये यार?" मुकेश ने पूछा था।

"चलता चल, देखते हैं!" मैंने कहा। थोड़ा आगे जाकर फिर किसी से पूछा, तो उसने उँगली के इशारे से एक मकान की तरफ संकेत कर दिया।

धड़कते दिल से मैंने दरवाजा खटखटाया था। नहीं जानता था कि अंदर क्या माहौल मिलेगा? कौन-कौन लोग होंगे? पिछले अनुभव ने भी थोड़ा-सा नर्वस किया था।

तभी दरवाजा खुला। सामने एक लड़की खड़ी थी। उसने सवालिया निगाहें मुझ पर टिका दीं, तो मैंने पूछा था, "रेखा जी है?"

मेरे पूछते ही वह बिना कोर्इ जवाब दिये अंदर चली गर्इ। यह भी नहीं पूछा कि मैं कौन हूँ? क्या काम है?... वगैरा-वगैरा!

मैंने एक निगाह घर के अंदर डाली थी -- सामने एक बड़ा-सा आँगन, आँगन के बायीं तरफ शायद शौचालय रहा हो। दायीं तरफ रसोर्इ घर और सामने दो कमरे। साथ लगे हुए और दोनों के दरवाजे अलग-अलग! आँगन में एक खटिया पर कोर्इ वृध्दा बैठी थीं।

वही लड़की वापिस लौटी, "अभी आती हैं!" कहा और हमें वहीं दरवाजे पर खड़ा छोड़ एक कमरे में चली गर्इ। तभी एक अन्य कमसिन दरमियाना सामने आया -- सस्ती-सी सलवार-कमीज और सिर के बाल कटे हुए। उसने हाथ जोड़ कर नमस्कार किया और हमें भीतर चले आने का इशारा कर, दो कुर्सी उसी खटिया के सामने डाल दीं, जिस पर वह वृध्दा बैठी थीं। उन्होंने हमारी तरफ देखा, तो मैंने दोनों हाथ जोड़ कर उन्हें नमस्कार किया। नमस्कार तो उन्होंने भी किया, मगर बोलीं कुछ नहीं। मैं और मुकेश बैठ गये थे। तभी दो गिलास में पानी आ गया।

हम पानी पी ही रहे थे कि दूसरे कमरे से रेखा चली आर्इ, "अरे आप आये हैं सर जी!... मैंने सोचा -- निगम से कोर्इ बाबू आये हैं। आइए, अंदर आ जाइए।... दरअसल मैं सुबह ही निगम के दफ्तर में सबको हड़का कर आर्इ थी कि यहाँ साफ-सफार्इ क्यों नहीं होती।"

हम भीतर चले आये, तो उसने मुकेश की तरफ देखा था। मैंने परिचय कराया, "मेरे मित्र हैं, प्रेस फोटोग्राफर!"

"फिर तो मेरी फोटो जरूर खींचना!" वह चहक उठी।

"हाँ-हाँ, क्यों नहीं!"

हम बैठ गये, तो उसने किसी को पुकारा, "अरी चंदा!..." मैंने देखा -- यह तो वही है, जिसने हमें पानी दिया था।... तो यह चंदा है। मुझे समझते देर न लगी कि अवश्य ही यह भी रेखा की चेली ही होगी। वह आर्इ, तो रेखा ने उसे आँखों से ही कोर्इ इशारा किया था। वह समझ भी गर्इ और लौट गर्इ।

समझ मैं भी गया था, इसी लिए कहा, "हम चाय वगैरा कुछ नहीं लेंगे। बस, अभी पीकर ही आये है।

"क्यों, ऐसे कैसे?... थोड़ी-थोड़ी ले लीजिए।"

"नहीं, एन.एस.डी. के नुक्कड़ पर पीकर ही आये हैं।" मैंने फिर मना किया।

उसने पुकारा, "अरी सुन..." चंदा फिर चली आर्इ, तो वह बोली, "अभी रुक जा!"

***

चंपा लौट गर्इ, तो बातों का सिलसिला शुरू हुआ। शुरू तो नगमा से ही हुआ था, लेकिन फिर सुनंदा, सुधाकर, तार्इ अम्मा तक विस्तार से बहुत-सी बातों और घटनाओं का जिक्र होता रहा। मैंने पाया कि रेखा नगमा के काफी निकट है। साथ ही सुनंदा और तार्इ अम्मा के प्रति भी उसके मन में बहुत सम्मान है।... सुधाकर को यह भी अव्वल दर्जे का हरामी मान रही थी।

मैंने अपना और मुकेश का परिचय भी थोड़ा संक्षेप में ही दिया था। हालाँकि मेरे बारे में वह कुछ ज्यादा नहीं जानती थी। शायद उतना ही, जितना नगमा ने मुझे, सुनंदा के यहाँ आने-जाने के दौरान समझा हो।... या फिर हो सकता है तार्इ अम्मा से भी नगमा को मेरे बारे में कुछ पता चला हो! हाँ, इतना जरूर था कि मेरे शादीशुदा होने के बारे में इसे पता था, मगर तारा, रेशमा या संध्या के बारे में कुछ विशेष नहीं।

यह सोच कर मुझे भी अच्छा लगा था कि सुनंदा या तार्इ अम्मा ने नगमा को भी ज्यादा कुछ नहीं बताया था... और शायद इसी कारण रेखा भी ज्यादा नहीं जान पार्इ थी।

तभी वही लड़की चाय ले आर्इ थी, जिसने हमारे आगमन पर दरवाजा खोला था।

"ये मेरी छोटी बहन है निशा। अभी दसवीं में पढ़ती है।..." मैंने उसकी ओर गर्दन हिलाकर अभिवादन किया, तो उसने भी गर्दन हिलायी। रेखा ने अब हमारा परिचय कराया, "ये पत्रकार सर जी हैं और ये फोटोग्राफर हैं!"

इस बार आर्इ चाय को हमने मना नहीं किया। यूँ भी पहली चाय पिये समय हो गया था।

जब चलने लगे, तो उसने बाहर आकर उस वृध्दा से परिचय कराया था, "मेरी माँ है!"

हमने पुनः उन्हें प्रणाम किया। तभी एक अन्य दरमियानी युवती चली आयी, तो रेखा फिर बोली, "इसे तो आप पहचान ही गये होंगे -- मेरी चेली है – गुलाबो, आपसे मिली भी थी सरोजिनी नगर में।... अभी एक और है, वो बाहर गर्इ है।

हम फिर एक बार सभी को नमस्कार कर बाहर आ गये थे।

"यार बाहर से देखकर नहीं लगता कि घर अंदर से ऐसा होगा।" मुकेश ने निकलते ही कहा, तो उसका अभिप्रायः समझ गया। दरअसल बाहर से स्लम की तरह लगने वाले लगभग सभी घर अंदर से बहुत सुज्जित थे। रेखा के घर में भी फ्रिज, टी.वी. से लेकर जरूरत के लगभग सभी उपकरण मौजूद थे।

घर के अंदर बैठे रहने के दौरान भी मुकेश ने इस कॉलोनी के बारे में पूछा था, तब रेखा ने बताया भी था कि इस कॉलोनी का इतिहास बड़ा लम्बा है।... दरअसल, साँगली मैस से सटी हुर्इ, इसी तरह की एक और कॉलोनी भी है -- प्रिंसिस पार्क! यह प्रिंसिस पार्क दो भागों में बँटी हुर्इ है -- एक ऊपरी भाग और दूसरा निचला... मगर आगे जाकर इनकी ऊचार्इ और संस्कृति एक सामान हो जाती है। दोनों की समानता लगभग एक जैसे बने हुए मकान ही हैं, मगर अंतर यह है कि 'प्रिंसिस पार्क' थोड़ा ऊंचार्इ पर है और 'सांगली मैस' की अपेक्षा ज्यादा साफ है। इसी 'प्रिंसिस पार्क' से लगी हुर्इ एक और कॉलोनी भी है, जहाँ सेना के अधिकारियों के लिए बनाये गये फ्लैट्स हैं। यह क्षेत्र सेना के ही नियंत्रण में है और बेहद स्वच्छ तथा व्यवस्थित है। यहाँ सुरक्षा के भी पर्याप्त प्रबंध हैं।

वस्तुतः आसपास के एक-दो किलोमीटर क्षेत्र में घूमते हुए यह कल्पना भी नहीं की जा सकती कि इस वी.वी.आर्इ.पी. क्षेत्र के मध्य कोर्इ ऐसा इलाका भी हो सकता है! रेखा की बातों से ही पता चला था कि इस सटे हुए सैन्य क्षेत्र में कभी अंग्रेजों के घुड़सवार सैनिक रहा करते थे। इंडिया गेट और राष्ट्रपति भवन (तब का वायसराय हाउस) की सुरक्षा के मद्देनजर यह जगह उनके लिए मुफीद थी। सैन्य क्षेत्र से लगे हुए प्रिंसिस पार्क में इन सैनिकों के सेवक रहा करते थे और सांगली मैस में इन सैनिकों के घोड़े तथा उनकी देखभाल के लिए 'सर्इसों' (घोड़ों की सेवा करने वालों) को रखा गया था।

फिर जब अंग्रेज यहाँ से गये, तो अपने घोड़ों को तो साथ ले गये, मगर उनके सेवक और सर्इस यहीं रह गये। तभी से इन मकानों पर उन्हीं लोगों का कब्जा है। फिर जब भारत-पाक का बँटवारा हुआ, तो पाकिस्तान से आये कुछ शरणार्थियों को भी अस्थायी रूप से यहाँ भी बसाया गया। कुछ अन्य बाहरी लोगों ने भी चोरी-छिपे पहले थोड़ी जगह घेर कर एक कमरा बनाया, फिर धीरे-धीरे उस कमरे के आगे पीछे बढ़ाकर पूरा मकान ही बना लिया। इन्हीं के बीच कुछ जरायमपेशा लोग भी यहाँ आ बसे... और नेताओं ने उनके राशन कार्ड, वोटर आर्इडी आदि भी बनवा दिए। बस, तभी से ये तमाम सारे लोग यहीं रह रहे हैं। रेखा के दादा जी भी कभी 'सर्इस' हुआ करते थे और इसी कारण, तभी से यह मकान उनके पास है।

इस क्षेत्र की एक बड़ी विडम्बना यह भी है कि अति महत्वपूर्ण क्षेत्र होने के कारण आज इस जमीन की कीमत, कर्इ हजार करोड़ की है।... किन्तु न तो सरकार इन्हें यहाँ से हटा पा रही है और न ही वह इन्हें अपने मकान पक्के करने दे रही है। इस जमीन के महत्व को देखते हुए ही अनेक संस्थाओं ने इस पर कब्जा करने के लिए मुकदमे दायर कर दिये। शायद इतने अधिक लम्बित मामलों के कारण ही, कोर्इ निर्णय न होने तक, ये सभी लोग यहाँ बने हुए हैं। हालाँकि सरकार ने इन्हें वैकल्पिक स्थान या फ्लैट देने का आश्वासन अनेक बार दिया, किन्तु मुकदमों के चलते ही कोर्इ योजना सिरे नहीं चढ़ सकी।

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