दरमियाना - 4 Subhash Akhil द्वारा सामाजिक कहानियां में हिंदी पीडीएफ

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दरमियाना - 4

दरमियाना

भाग - ४

धीरे-धीरे क्षण बीते और बीते हुए क्षण, महीनों से होते हुए... वर्षो में बदल गए। हमारा मकान भी बदल गया था। पिता जी की तरक्की के बाद एक दूसरी कालोनी में बड़ा घर मिल गया था। मैं भी बहुत बदल गया था। उस दौरान यह भी तो नहीं सोच पाया कि तारा अब कैसी होगी ! होगी भी, या... या उसकी हथेलियाँ थक कर चुप हो चुकी होंगी ? उसका लाड़-प्यार या गालियाँ, बनारसी पत्तों की थैली या तालियाँ—इतने बर्षों में मुझे कुछ भी याद नहीं रहा था।

अचानक एक दिन जब मैं अपनी पत्नी के साथ, खरीदारी करके लौट रहा था, तो मुझे लगा कि मैंने ‘इसे’ कहीं देखा है। वह दरमियाना भी शायद मेरे विषय में यही सोच रहा था।... गौर करने पर मैंने पहचाना, "रेषमा !... तुम ?..."आश्चर्य रेशमा की आँखों में भी था। उसने ठहर-ठहर कर कहने की कोशिश की, "अरे बबुआ ! कितने बड़े हो गये हो ? "

"और तुम भी तो देखो--कितनी बुढ़ा गई हो !"

"नहीं रे !... अभी तो सोलह भी पार नहीं..."रेशमा सहज रूप से कह रही थी, किन्तु मेरी पत्नी के लिए यह सब जैसे अस्वाभाविक था। रेशमा ने सामान्य मनोविज्ञान के स्तर पर, मेरी पत्नी की अस्वाभाविकता को समझा, तो चुप हो गई।

"इनसे मिलो--मेरी पत्नी हैं, मधुर।... और मधुर!... यह रेशमा है, मेरी बचपन की साथी।" मैंने दोनों का परिचय कराया। रेशमा ने दोनों हाथ जोड़कर मेरी पत्नी को सम्मानित किया। पत्नी के लिए इंच-भर मुस्करा देना भी कठिन था। आस-पास के लोगों की वजह से भी उसकी कठिनाई और बढ़ रही थी। मैंने तब भी पूछा, "रेशमा! तारा कैसी हैं?"

"कम्बख्त है बाबू जी!... देह से चिपटी पड़ी है, छोड़ती ही नहीं...उसके जिसम को तो रोग खा गया है, मगर अब भी कभी-कभी बड़बड़ाने लगती है--मेरे अशुए को ढूँढ़ लाओ !"

मुझे लगा -- मेरे तब के किये गये अपराध का दंड, इससे बड़ा नहीं हो सकता !

रेशमा कह रही थी, "बाबू जी!... हम छोटे लोग हैं... जिन्दगी-भर हक मांगते रहते हैं... मगर आज मैं आपसे भीख माँग रही हूँ-- आप एक बार उसे देख आयें, तो वो डायन चैन से देह छोड़ देगी-- आप दोनों को देखकर, उसकी रूह को सकून मिलेगा, बाबू जी।... बाबू जी..." रेशमा सिसक उठी थी।

***

तारा !

…मैं आज भी सोचता हूँ, तो उसका पीला, सफेद-जर्द पड़ा चेहरा मेरी आँखों के सामने घूम जाता है, मैं जिसे अब कभी नहीं धकेल पाता... पारदर्शी चमड़ी के पीछे छिपा हड्डियों का कंकाल... अचेत-सा पड़ा था। उसके दोनों हाथों की हथेलियाँ हिलने की भी स्थिति में नहीं थीं। बनारसी पत्तों की सुर्खी सूखकर, काली पड़ चुकी थी। बेतरतीब बिखरे हूए दूधिया सफेद बाल, रेशमा के ‘डायन‘ शब्द को सार्थक कर रहे थे। उसकी फटी-फटी-सी आँखें, थोड़ी देर खुली रहीं... फिर दोनों आँखों के कोरों से, पानी की एक-एक बूँद दोनों गालों की उभरी हूई हड्डियों पर लुढ़क आई थीं। उसने धीरे-से अपनी आँखें बन्द कर ली थीं...

जब मैंने उसे आखिरी बार देखा था !

****

संजय से संध्या होने तक

मैं उसे तब से जानता हूँ, जब मैनें उसे पहली बार देखा था । एक ढीले-ढाले पाजामे के साथ कुर्तानुमा कमीज । बाल करीने से कटाये हुए और होठों पर एक गुलाबीपन । शायद नकली । मायूसी के माहौल में भी एक भीनी-सी मुस्कराहट । चेहरे पर सादगी और संजीदगी । उम्र यही कोई 23-24 साल । मैं ठीक-से उसे कुछ समझ नहीं पाया था ।

तारा ने देह छोड़ दी थी । मैं उसी की मातमपुर्सी में गया था । तारा माँ के भोज के दौरान ही रेशमा ने मेरा उससे परिचय कराया था − ‘बाबू जी, ये है मेरी चेली संध्या !’ मैं चौंक गया था – मर्दाने लिबास में जनाना नाम, यानी ‘दरमियाना’ ! वही था या शायद थी जो अब तक मुझसे भोज करने का आग्रह कर रही या रहा था । शायद रेशमा ने उसे मेरा परिचय पहले ही दे दिया था । एक बेटे के रूप में, मुझसे जो कुछ कहा गया था, वह मैं कर चुका था । यह उनकी रस्म अदायगी थी – सिवाय उत्तराधिकारी की रस्म पगड़ी के । वह अधिकार मेरा नहीं था । शायद रेशमा का था .... और उसकी इस रस्म में शामिल होने का अधिकार मुझे नहीं था ।

संध्या के भोजन का आग्रह मैंने टाल दिया था । ऐसे किसी भी अवसर पर मैं यह भोज नहीं करता । यूँ भी मन नहीं था । मैंने तारा माँ को खोया था, वह भी इतनी तकलीफों के बाद । वहाँ उन जैसे लगभग सभी की निगाहें मुझ पर थीं । विशेष रूप से संध्या का फोकस मुझी पर था । उस भीड़ में कुछ चेहरे मैं पहचानता था, मगर ज्यादातर मेरे लिए अजनबी थे । फिर भी, मेरा विशेष ध्यान रखने की जिम्मेदारी उसी की थी । मेरा परिचय जान चुकने के बाद उसकी निगाहें न जाने क्या-क्या संदर्भ और अर्थ तलाशती-सी लग रही थीं । हालांकि मैं काफी लम्बे अरसे के बाद फिर से तारा और रेशमा के संपर्क में आया था । तारा के देह छोड़ने से पहले । मगर ‘संध्या’ से मेरा यह पहला परिचय ही था । भले ही रेशमा ने उसका नाम ‘संध्या’ बताया हो, मगर मैं उसे इस पहचान के साथ स्वीकार नहीं कर पा रहा था । ‘इस रूप में’ मैं केवल तारा और रेशमा को ही स्वीकार कर पा रहा था – या उन जैसे अन्य को । इस ‘संध्या’ को तो बिल्कुल नहीं, क्योंकि उस में अभी भी ऐसा कुछ महसूस हो रहा था, जो मुझे ‘संध्या’ के रूप में स्वीकार्य नहीं था ।

हालांकि उसकी आवाज कुछ-कुछ कर्कशाने लगी थी और उसके हाथों की हथेलियाँ भी उसी तरह अठखेलियाँ करतीं, जैसा कि तारा या रेशमा की हथेलियाँ । यधपि उसकी हथेलियों में उम्र की नजाकत अभी बाकी थी । आवाज भी, यदि पूरी तरह जनाना नहीं हो पायी थी, तो मर्दाना भी नहीं रह गई थी । मैंने अपने आसपास बच्चों को किशोर होते और फिर युवा होते हुए उनकी आवाज के परिवर्तन को भी महसूस किया है, किन्तु यह आवाज कुछ-कुछ ‘दरमियाने’ लगी थी । मैं नहीं जानता, क्यों !

इसी जनाने और मर्दाने होने के बीच कुदरत कभी-कभी खुद ऐसा घालमेल कर देती है कि इन दोनों ही संदर्भों को स्पष्ट रूप से विभाजित करके नहीं समझा जा सकता । ऐसा ही खुद उस समय मुझे संध्या के बारे में लगा था । कम से कम पूरी तरह से इधर या उधर हो जाने तक तो बिल्कुल भी नहीं… और इसी परिवर्तन की प्रक्रिया को समझने का अवसर भी मुझे संध्या ने ही दिया था ।

***

मैं तारा के लिए ‘अशुए’ था । उसका बेटा, मगर रेशमा के लिए ‘बबुआ’ था । वैसे मैं तारा माँ से कम ही मजाक करता, मगर रेशमा और मेरे बीच छेड़छाड़ चलती रहती । हालांकि पहल उसी की ओर से होती, मगर मैं भी कभी-कभी हाथ फेर देता था । गुदगुदा देता या कोई चुहल कर बैठता । रेशमा मुझसे दस बरस तो बड़ी होगी ही । फिर भी जब वो मुझे बाँहों में भर लेती या पान से रंगे अपने होठों से मेरे गाल चूम लेती तो मुझे भी ‘कुछ-कुछ’ होता था । हल्की रुएँ जैसी मूछें आने लगी थीं । बदन भी कुछ भरने लगा था । कसरत मैंने शुरू कर दी थी । माशा-अल्लाह सूरत-सीरत भी बुरी नहीं थी ।

किन्तु उस रोज, जब एक अरसे बाद रेशमा मुझे मेरी पत्नी मधुर के साथ अचानक टकरा गई थी, तब लजा कर उसने मुझे ‘बाबू जी’ कहा था और मधुर को ‘बहुरिया’ । इसके बाद तारा की मौत तक मेरे और रेशमा के संबंध औपचारिक ही रहे थे । वो पहले वाली चुहल अब नहीं रह गई थी । पता नहीं क्यों ? या तो मैं बड़ा हो गया था, या फिर रेशमा ज्यादा संजीदा हो गई… और या फिर मधुर की मौजूदगी ने हमारे संबंध की उस सहजता को रोक दिया था । वह मुझे अब ‘बाबू जी’ ही कहती और एक अनकही-सी दूरी बनाये रखती । उसकी वह शोखी और चपलता अब नहीं रह गई थी । मैं भी झिझकने लगा था । ऐसा दोनों की बढ़ती उम्र की वजह से हुआ हो या अपने-अपने वर्ग में सिमट जाने के कारण, कहना मुश्किल था । इसीलिए उस दिन संध्या से मेरा परिचय कराते समय रेशमा ने ‘बाबू जी’ ही उद्बोधित किया था । हालांकि उसके अंदाज में एक आत्मीयता थी, मगर व्यवहार में औपचारिकता ।

फिर एक दिन अचानक संध्या मेरे घर आ पहुँची । मधुर ऑफिस जा चुकी थी और बच्चे स्कूल । घर की घंटी बजी, तो मैंने दरवाजा खोला । इस समय किसी का आना अपेक्षित नहीं था, इसलिए मैं भी अनमने मन से उठा था । सामने एक सुंदर-सी युवती खड़ी थी ।… गुलाबी, रेशमी जरी वाली साड़ी । सिर पर पल्लू । होंठ सुर्ख लाल । आँखों में अभिसारिकाओं की-सी खुमारी । कानों में दोनों तरफ अठखेलियाँ करती-सी बाली । नाक की लौंग भी लश्कारा मार रही थी । बाल कटे, मगर करीने से संवारे हुए । तराशी हुर्इ कमान-सी भवें । एक स्मित-सी लकीर खींचती मुस्कराहट । मैं पहचान नहीं सका था ।… पर हाँ, शरारत भरी व गहरी-सी बड़ी-बड़ी आँखें मुझ ही पर टिकी थीं ।

"अरे तुम !"मेरे लिए अनपेक्षित था । वह भी इस रूप में । मगर उन आँखों ने ही मुझे उसका परिचय दे दिया था ।

"मैं नहीं तो और कौन ?… किसी और का इंतजार कर रहे थे क्या ?" एक साधिकार बेबाकी । उसके हाथों की अदाओं में भी एक लय थी । ताली से उसने अपना परिचय नहीं दिया था । शायद यह मेरा घर था, इसलिए । मगर दोनों भवों को उसने बारी-बारी से आरोह-अवरोह के भाव दिये थे । मैं अपलक उसे देखता ही रह गया था । रेशमा ने ठीक ही कहा था – संध्या ! यानी दिवस का संधिकाल । मुझे अवाक् देख उसने फिर पूछा था, "घर में कोई नहीं क्या ?"

मैं नहीं जानता, यह अनुमान उसने कैसे लगाया था । फिर इससे पहले कि मैं कुछ कह पाता, वह बेहिचक भीतर चली आई थी । अब तक मैं भी संभल गया था । सो कहा, "हाँ, अभी तक मैं ही था, मगर अब तो तुम भी हो ।… बैठो !" वह मुस्कराई थी । मैं रसोई की तरफ बढ़ा, तो बेतकल्लुफी-से वह मेरे पीछे चली आई थी । मैंने पानी दिया, तो उसने गैस पर रखे पानी को उबलता देख पूछा था, "क्या बना रहे हो ?"

"मैगी... " मैंने कहा, "बस यही बनाना आता है ।... खाओगी ?"

"चलेगा, 'बाबू जी'..." फिर खुद ही खिलखिला उठी, "क्या यार, ये ‘बाबू जी’ कुछ अजीब नहीं लगता क्या ?" उसके इस सपाट-से सवाल से मैं अचकचा गया था । क्या था उसके मन में ? मुझे तारा और रेशमा की याद हो आई । उनके सम्बोधन, और सम्बोधन के अर्थ भी ज़हन में उभरने लगे । इसकी उम्र, रूप-रंग और कुल मिलाकर निमंत्रण देती-सी इसकी आँखें !... अब इसके तहत अपना मैं कोई क्या नाम दूँ । खुद ही सोच ले -- बलमा, साजन, सैंया, जांनू -- या जैसा ये चाहे ।

तभी वह जोर-से खिलखिला उठी, "अच्छा, मैं भैया पुकारूँ... चलेगा ?" मैं सकपका गया था । इस उम्र की कोई सुंदर-सी ‘युवती’ भैया पुकारे, तो कैसा लगेगा ?... पर हमने भी समझदारी से काम लिया, "देख लो, घाटे में रहोगी !"

उस दिन दो-तीन घंटे कुछ इसी तरह की बातों, हँसी-मजाक और एक-दूसरे को समझने में चले गए । घर पर कोई नहीं था, इसलिए हम दोनों ही बेतकल्लुफी से बतियाते रहे । मधुर होतीं, तो शायद मैं इतना सहज नहीं हो पाता और शायद वह भी । इसलिए पहली ही इस मुलाकात में मैंने संध्या को उन्मुक्त रूप से जाना था । तारा और रेशमा से बिल्कुल अलग—इसमें कुछ और ही अपनापन-सा लगा था ।

पहले हमने मैगी खाई, फिर चाय उसी ने बनाई थी । रसोई में भी वह सहज ही लगी थी । चाय-चीनी उसे जरूर पूछना पड़ा था, मगर दूध उसने खुद ही फ्रिज से निकाला था । उसी दिन बातचीत से मैंने जाना कि उसने आगरा से इंटर किया है । वहीं उसका परिवार भी है । एक बूढ़ी माँ है, छोटी बहन और एक छोटा भाई भी । पिता अब नहीं हैं । ‘संजय’ से ‘संध्या’ बनने प्रक्रिया के इस आघात को वे नहीं झेल पाये थे । परिवार में वही बड़ा था, इसलिए यह सदमा भी उनके लिए बड़ा ही था । बाकी बचे परिवार के अन्य लोगों ने कमोबेश उसे स्वीकार कर लिया था ।

किन्तु मैं उसे ‘संजय’ स्वीकार नहीं कर पा रहा था । कम से कम इस रूप में तो नहीं । हालांकि जब रेशमा ने उससे मेरा परिचय कराते हुए ‘संध्या’ कहा था, तब मुझे अटपटा लगा था... और अब, जब उसने ‘संजय’ बताया, तो मैं यह भी सहज स्वीकार नहीं कर पा रहा था । ‘संध्या’ और ‘संजय’ में बहुत कुछ गड्ड-मड्ड हो गया था । मैं बहुत गहरायी-से उसके भीतर झाँकने की कोशिश कर रहा था, ताकि किसी एक नतीजे पर पहुँच सकूँ ।… जनाने और मर्दाने के बीच यह ‘दरमियाना’ कहाँ है, मैं समझ नहीं पा रहा था, जबकि तारा और रेसमा को मैं इसी ‘तीसरे’ रूप में ही जानता था । मैं नहीं समझ पा रहा था कि उसे इस रूप में, स्वीकार करूँ, जैसा कि उसे देख रहा था, महसूस कर रहा था ।… या फिर उस रूप में, जैसा कि उसने अभी-अभी बताया था ।

चलते समय उसने कहा था, "अभी मैं चलती हूँ ।... ‘सात्रे’ में हूँ न, आपके लिए भी मुश्किल हो जाएगी ।... कभी ‘कड़े ताल में’ आऊगी--फिर बहुत सारी बातें करेंगे । अभी चलती हूं ।... जरा सौ रुपये देना... " मेरी पगार ही तब सात सौ रुपये थी ।

मैंने सौ रुपये तो दे दिये -- मगर बहुत कुछ उलझ गया था । मैं कुछ भी नहीं समझ पा रहा था । न उसके ‘संध्या’ रूप को.... और न ‘संजय’ को ।.... न उसके इस तरह अचानक आ जाने... बहुत-से सवाल छोड़ जाने... और सौ रुपये लेकर चले जाने को -- मैं किसी भी रूप में नहीं समझ पा रहा था । वह क्या कह गई थी, यह भी नहीं जान पा रहा था । एक साथ उसके सभी संदर्भ गड़बड़ा गये थे । मैं हतप्रभ था -- क्या मैं 'यूज' किया गया था ?

*****