दास्ताँ ए दर्द ! - 14 Pranava Bharti द्वारा सामाजिक कहानियां में हिंदी पीडीएफ

दास्ताँ ए दर्द ! - 14

दास्ताँ ए दर्द !

14

इस बार प्रज्ञा अपने मन पर एक ऐसा बोझ लेकर लौटी जिसको उतारना उसके लिए बेहद ज़रूरी था | वह दिन-रात असहज रहने लगी थी | एक ऎसी बीमारी से ग्रसित सी जिसका कोई अता-पता न था फिर भी भीतर से वह उसे खाए जा रही थी | सत्ती कभी भी उसे झंझोड़ देती और वह चौंककर, धड़कते हुए हृदय से उसके साथ हो लेती | सत्ती रातों को उसे जगाकर जैसे झंझोड़ डालती और जैसे उससे पूछती --बस, हो गया शौक पूरा ?

जीवन में अनजाने, अनचाहे ऐसे मोड़ आ जाते हैं जो मनुष्य को सहज तो बिलकुल रहने ही नहीं देते | प्रज्ञा के जीवन में कुछ ऐसा ही मोड़ आ गया था | वह जानती थी कि वह तब तक सत्ती से परेशान रहेगी जब तक उसे पन्नों पर उतार नहीं लेती किन्तु सत्ती तो जीवन भर उस पीड़ा से भरी रहेगी, उसके जीवन में पीड़ा हमेशा के लिए थेगली सी चिपकी हुई थी | वह तो अपनी उम्र में उससे मुक्त हो ही नहीं सकती थी |कुछ चीज़ें केवल समय के हाथ में होती हैं, मनुष्य के हाथ में नहीं !

टूटे हुए मन से, उसकी कलम ने सत्ती की कहानी लिखनी शुरू की | कहानी क्या थी, एक दास्तान थी रिसते हुए घाव की !

पँजाब का होशियारपुर का इलाका जो अपने समृद्ध गाँवों व हरी-भरी फ़सलों से एक मीठी बयार सी कशिश से भरा रहता था, वहीं के छोटे से गाँव में एक मध्यमवर्गीय किसान के घर सत्ती का जन्म हुआ था |तीन भाइयों की लाड़ली, इकलौती बहन जिसे खरोच भी आ जाए तो सारे मुहल्ले में शोर मच जाए ! इतनी रोती-गाती कि जब तक मुहल्ले की चाची-बुआएँ उसकी खबर लेने न आ जाएं तब तक गला फाड़ना तो बनता ही था |

चौदह बरस की सत्ती दिनों दिन खूबसूरती में निखरती जा रही थी | अपने यौवन के प्रति सचेत सत्ती के मन व बदन के परिवर्तनों ने उसके भीतर एक अजीब सी अदा भर दी थी | गाँव के मनचले उसके इर्द-गिर्द बने रहने के बहाने ढूँढ़ते | जाने कैसे न कैसे दो बरस मुश्किल से निकले जैसे पूरा गाँव ही उसकी खूबसूरती और अल्हड़पन का दीवाना हो गया था | कोई घर ऐसा न था जो उसे अपने घर की बहू न बनाना चाहता हो |

परिवार के लड़के अपनी माँओ के आगे-पीछे घूमते, सत्ती का रिश्ता उनके लिए माँग लो | अब सत्ती एक और चाहने वाले न जाने कितने ! चौदह साल की हुई नहीं थी कि चाहने वालों की लाईन लगती जा रही थी |

होशियारपुर पँजाब के प्रमुख शहरों में से वह गाँव था जो संतों के नाम से भी पहचाना जाता और अपनी खिखिलाती उपजाऊ भूमि से भी | पुरवाई झूमती हुई वहाँ के हर गाँव को छूती और आनंद के माहौल में भँगड़े, गिद्दे से सराबोर बंदे टप्पों के राग अलापते |

खेती-बाड़ी का समृद्ध इलाका जहाँ ख़ुशहाली का भरपूर साधन मुहैया था, वहाँ की बिटिया थी सत्ती !

बल्ली, बलविंदर मुखिया का पुत्तर, जिसकी ताड़ हरेक गाँव की हर यौवना को चीर डालती, हर लड़की उससे दूर भागती नज़र आती |

खेतों में बालियाँ फूटतीं, रंग-बिरंगी मुस्काते फूलों सी ये लड़कियाँ टोलियाँ टप्पे गाते हुए, चुहलबाज़ी करते खेतों में निकल जातीं | सत्ती सबकी लीडर ठहरी ! शैतानी में सबसे बढ़-चढ़कर, दुप्पटा लहराता हुआ कहाँ जा रहा, उसे खबर ही न रहती |

एक दिन बलविंदर के हाथों सत्ती अकेली पड़ गई, उसने सत्ती का लहराता दुपट्टा खींचने की कोशिश की | वह डरी, सहमी नहीं बल्कि एक करारा तमाचा रसीद कर दिया उसके गाल पर | टोली की और सहेलियों के पीशहे से आने पर सत्ती को और साहस मिल गया और वह अपनी मस्ती में लहराती वहाँ से चल दी |

बल्ली की तो आन पर आ बनी, अब तो लगा जब तक सत्ती से बदला न ले, चैन कैसे पड़े ? बल्ली की रातों की नींद हराम हो गई और हर समय उसके सीने पर साँप लोटने लगा | वह अच्छी तरह जानता था कि उसने अगर ज़रा ज़्यादा चूँ-चपड़ की तो सत्ती के हट्टे-कट्टे भाई उसका कचूमर निकाल देंगे | बल्ली ने अपने पिता से भी बहुत झख मारी, वो गया भी सत्ती के घर उसका हाथ माँगने ! मगर सत्ती ने रो-रोकर बुरा हाल कर दिया |

माँ -बाप ने बहुत समझाया, मुखिया का पुत्तर है, सभी फ़ायदे में रहेंगे, आखिर ब्याह तो करना ही था!, सोलह साल की तो हो चुकी थी मरी ! सत्ती के दो भाई उससे काफ़ी बड़े थे, पर उससे ऊपर का भाई कोई दो-एक साल ही बड़ा था | दोस्ती भी ख़ासी थी उससे | सो उसे उसने बल्ली की हरकतें बता दी थीं | वैसे अधिकतर सब वाकिफ़ थे उसके शोहदेपन से ! किसी तरह एक साल और निकल गया | अब सत्ती सत्रह साल की हो चुकी थी | सातवीं पास कर ली तो फिर से ब्याह का सवाल उठ खड़ा हुआ |

बल्ली ने पूरे सालों में कोशिश ज़ारी रखी पर उसकी एक न चली और उसके पास के गाँव के मुखिया के लड़के से सत्ती का ब्याह सत्रह साल की उमर में कर दिया गया |सत्ती रोती-गाती रह गई पर उसकी किसी ने न सुनी |दूसरे गाँव का मुखिया बहुत सभ्य व शिक्षित था, इकलौता बेटा था | वह भी अपने बेटे की मर्ज़ी से सत्ती का हाथ मांगने आया था |

पुरवाई सी अल्हड़ सत्ती का ब्याह परविंदर सिंह उर्फ़ बिंदर से कर दिया गया | ब्याह कर सत्ती ससुराल पहुंची तो क्या भव्य स्वागत हुआ था उसका ! सत्ती मन ही मन खिल गई, उसका पति भी कम रूपवान नहीं था | फिर उसके गाँव से यह गाँव ज़्यादा बड़ा था, परिवार का रसूख़ भी ख़ूब था और उसके लिए सबके मनों में प्यार भी सरसों की बालियों की तरह लहलहा रहा था| बड़ी सुन्दर थी दोनों की जोड़ी, जो भी देखता आँख में भर लेता | माँ हर समय बलैयां लेती रहती | बिंदर ने भी उसे पल्ला भरकर प्यार ही दिया | उस पर जान लुटाने को सब तैयार ! खूब खेती-बाड़ी, कई नौकर-चाकर, ट्रैक्टर, बिंदर के पास मोटरसाइकिल, जो पूरे गाँव में केवल दो के पास ही थीं ---सब कुछ तो था | धीरे-धीरे सत्ती का मन घर में लगने लगा, चार महीने हुए नहीं थे कि उसके गर्भ ठहर गया |

अब तो घर में ढोल-ताशे बजने लगे, बधाईयाँ दी जाने लगीं | बिंदर के पैर तो ज़मीन पर पड़ते ही नहीं थे, बाप जो बनने वाला था |उधर सत्ती के मायके वाले भी खूब खुश थे |शादी के बाद से सत्ती अपने पिता के घर खूब सुन्दर कपड़े, ज़ेवर ओढ़-पहनकर ठाठ से पति की मोटरसाइकिल पर बैठकर ठसके से आती |

उधर से सास, इधर से माँ सत्ती को खूब समझाती रहतीं | नवें महीने में सत्ती का मोटरसाइकिल पर बैठना बंद हो गया लेकिन उधर से कोई न कोई उसकी खोज-ख़बर लेने आता ही रहता था |

समय पर सत्ती ने अपने जैसी खूबसूरत बिटिया को जन्म दिया | गाँव भर में न्योते भेजे गए | कई दिनों तक दावतें चलीं, ढोल बजे, टप्पे-गीत गाए गए, भंगड़े पड़े ---और जो भी खुशियों के परचम थे, सब लहराए गए |

सवा महीने तक आस-पास के लोग बधाइयाँ देने आते रहे और सत्ती के सास-ससुर के साथ उसका पति और ख़ुद वह भी जैसे किसी और ही दुनिया में विचरण करने लगी जैसे कोई दुनिया ही नई थी | एक नन्ही सी जान ने अपनी किलकारियों से घर भर में उजाला कर दिया था |

नन्ही बिटिया तीन महीने की हो चली थी | उस गुलाबी सी परी का नाम पिंकी रखा गया |

दादा जी घर में घुसते तो कोई न कोई खिलौना उनके हाथ में होता जबकि बच्ची के पास खूब खिलौने इक्क्ठे हो गए थे | पर उनका मन ही नहीं मानता, जो दिखाई देता, उठा लाते |

खूब अच्छी कद-काठी के थे मुखिया जी ! सुबह-सवेरे पाँच बजे उनका दिन निकल जाता और पिंकी -पिंकी का शोर मच जाता | मुखियाइन भी पाँच बजे उठकर घर के कामों में लग जाती थी |नन्ही पिंकी सुबह चार बजे से कुनकुन करने लगती थी सो दादी अपनी लाड़ली को सत्ती के पास से उठा लाती और उसे सोने के लिए कह आती |रात भर ठीक से सो नहीं पाती उनकी लाड़ली नू ----(बहू )!

गाय-भैंस दुहने वाले नौकर आते, उनसे चारा कटवाती, डलवाती फिर चाय बनाकर पति को आवाज़ देती जो बरामदे में पड़े मूढ़े पर बैठकर पिंकी को खिलाते रहते थे |वहीं एक सफ़ेद निवाड़ के पलँग पर रेशमी, कढ़ाई वाला पिंकी का मुलायम बिस्तर पड़ा रहता था जिस पर लेटी वह हाथ-पैर मारती रहती थी, खूब किलकारी मारने लगी थी बच्ची !

आज कुछ ज़्यादा देर तक सोती रही पिंकी, उसके कुनकुन करने की आवाज़ देर से आई बड़बड़ाती हुई दादा को उठाने के लिए पिंकी को गोदी में भरकर गईं, दादा का एक हाथ छाती पर था और एक पलँग से नीचे लटक रहा था |पिंकी को दादी ने पलँग पर लिटाया और दादा जी को झंझोड़ डाला |

ज़ोर से चिल्लाकर मुखियाइन ने आवाज़ लगाई लेकिन आवाज़ कमरे में घूमती रह गई |पिंकी घबराकर ज़ोर से रोने लगी थी |

पल भर में घर चीत्कार भर उठा| नौकर दौड़ा गया, गाँव के डॉक्टर को बुला लाया लेकिन उस हट्टे -कट्टे शरीर में कुछ भी न था |

समय की करवट कब बदल जाए, कोई नहीं जानता |रात में दस बजे तक मुखिया पिंकी के साथ खेलते रहे थे, अच्छे-ख़ासे सोए थे --अचानक ही चिराग़ कैसे बुझ गया ? इकलौता बेटा जिसको अभी काम की कोई समझ दी ही नहीं गई थी | बिंदर का चेहरा देखते ही बनता था, जैसे किसीने सारा ख़ून निचोड़ डाला हो | उसकी आँखें सपाट सी हो गईं थीं |

कहानी ख़त्म हो चुकी थी | बिंदर पढ़ा-लिखा था लेकिन दुनियादारी में एक बड़ा सा शून्य ! लोगों ने इसीका फ़ायदा उठाया और बड़े तायाऔर उनके बेटों ने उसे ज़मीन-जायदाद के चक्कर में फँसाकर सब कुछ अपने नाम करवा लिया |पिता के सामने तो बड़े ताया जी अपने छोटे भाई को बहुत पूछते थे, गाँव के सामने उसकी तारीफों के पुल बाँधते कि हमारे छोटे ने अपनी मेहनत से परिवार का नाम ऊँचा किया है |मुखिया के पास कितना भी पैसा व शोहरत आ गई हो, वह हर काम में अपने बड़े भाई को ही पहले पूछते, उन्हें हर काम में आगे रखते |

माँ को लगा, जेठ हैं, उनका भला ही चाहेंगे | उनके हाथ में उसने सारे निर्णय सौंप दिए, छोटे के जाते ही उनकी ऊत खोपड़ी में न जाने कहाँ कहाँ के कुत्सित विचारों ने ऐसे करम करवाए कि छोटे भाई के परिवार को लगभग 'बेचारा' ही बना दिया |बिंदर के पास अब केवल एक घर और थोड़ी सी ज़मीन रह गई थी, वह भी ताया ने शायद गाँव वालों को दिखाने के लिए उसके पास छोड़ दी गई थी | बिंदर ने कभी कुछ किया ही नहीं था | हमेशा घर में नौकर-चाकर रहे, वह कुछ न कर सका |

ताया जी के बेटे पहले से ही बिगड़े हुए थे |बिंदर का पिता अपने बेटे को उनसे अलग ही रखता | वह जानता था कि उसके बड़े भाई के बेटों का काम रोज़ का ही खाना-पीना और लफ़ंगेबाज़ी करना, इससे अधिक और कुछ न था |

बाप के होने तक बिंदर किसी भी बुरी संगत में नहीं पड़ा था, अब उसके तयेरे भाई जैसे बहुत से मिल गए थे जो उसे सपने दिखाने लगे और वह एक बार उस संगत में डूबा तो डूबता ही चला गया |

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pradeep Kumar Tripathi

pradeep Kumar Tripathi मातृभारती सत्यापित 2 साल पहले

S Nagpal

S Nagpal 2 साल पहले