रिसते घाव (भाग-४) Ashish Dalal द्वारा फिक्शन कहानी में हिंदी पीडीएफ

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रिसते घाव (भाग-४)

उस वक्त उम्र रही होगी राजीव की बीस की, जब सुरभि ने अपने बावीसवें बसंत में कदम रखते ही अपनी जिन्दगी का एक बेहद संजीदा फैसला लिया था । एक ब्राह्मण की लड़की किसी राजपूत के लड़के के साथ भाग गई तो पूरी बिरादरी में हड़कंप सा मच गया ।
‘पण्डित रामप्रसाद शुक्ला की लड़की भाग गई ।’
बिरादरी में सम्मानजनक स्थान रखने वाले पण्डित रामप्रसाद शुक्ला अपनी बेटी के इस कदम की वजह से अपमान के कड़वे घूंट तो पी गए लेकिन फिर इस कड़वे घूंट से बने जहर की बूंदों से बेटी को फिर से घर दहलीज में ना लाने की लक्ष्मण रेखा भी खींच दी ।
अपना कदम घर की दहलीज से बाहर रखने से पहले अपने प्रेम प्रकरण की बात जब सुरभि ने घर में कही तो पिता पिता की भूमिका से निकलकर जज बन गए और भाई भाई न रहकर पहरेदार बन गया । अपनी खुशी के लिए अपने बीस वर्षों के सम्बन्धों के समीकरण अचानक ही बदलते देख सुरभि का भावुक मन विद्रोह कर उठा और चतुर्दशी के दिन राजीव को गणेश मन्दिर साथ आने का बहाना कर मन्दिर में दर्शन के नाम पर महिलाओं की भीड़ में गुम होकर अपने प्रेमी के संग वहाँ से गायब हो गई ।
बहन द्वारा किया गया विश्वासघात राजीव के मन को छलनी कर गया और पिता की तरह ही उसने फिर कभी जिन्दगी में बहन का मुँह न देखने की कसम खा ली ।
एक छोटे से वाकये के साथ सुरभि लगभग हमेशा के लिए अपने परिवार से दूर हो गई और फिर कभी किसी ने उसकी खोज खबर लेने की कोशिश भी न की ।
‘भाई साहब ! आपके नाते रिश्तेदारों को खबर करना हो तो कर दीजिए । मैंने तो कभी इस घर में किसी रिश्तेदार को आते नहीं देखा ।’ सहसा मनीष जी का स्वर सुनकर राजीव अपने अतीत के घावों को कुरेदता हुआ वापस वर्तमान में आ पहुँचा ।
‘मनीष जी, जरा बाहर आईये तो ।’ राजीव अच्छी तरह से जानता था कि उसकी बहन एक अवसाद से गुजर रही थी और उसी अवसाद की वजह से शायद उसने असमय अपनी जिन्दगी पूरी करने लेने का आत्मघाती निर्णय लिया था लेकिन फिर श्वेता से हुई बात के आधार पर वह मनीष के मन को भी कुरेदकर देखना चाहता था ।
‘चलिए । लेकिन ऐसी तो क्या बात है जो आप मुझसे अकेले में करना चाहते है ?’ कमरे से बाहर निकलते हुए मनीष ने राजीव से पूछा ।
‘जी बताता हूँ । पहले आप बताईये आप मेरी बहन को कब से और कितना जानते है ?’ हॉल से बाहर निकलकर सीढ़ियों के पास खड़े होकर राजीव ने इत्मीनान से मनीष से पूछा ।
‘आप जानना क्या चाहते है ? आप किसी बात को लेकर शंका तो नहीं कर रहे है मुझ पर ?’ मनीष ने जवाब देने की बजाय उल्टे राजीव को घूरा ।
‘अरे नहीं । ये तो श्वेता ने बताया कि सुरभि दीदी कभी कभी अपने मन की बात आपके समक्ष खोल लेती थी तो जानना चाह रहा था कि किस परिस्थिति में उन्होंने ऐसा फैसला ले लिया ।’ राजीव ने अपनी बात स्पष्ट करते हुए कहा ।
‘देखिए ! ये बात एक भाई होने के नाते आपको अच्छी तरह से पता होनी चाहिए । पड़ौसी होने के नाते मैं उनकी जितनी मदद कर सकता था, कर देता था । जो कुछ भी हो लेकिन वह बहुत अकेलापन महसूस करती थी और शायद उसी अकेलेपन की वजह से आगे जिन्दगी उन्हें जीने जैसी न लगी ।’ मनीष ने सधे हुए शब्दों में जवाब दिया और अपनी आँखों उभर आये आँसुओं को राजीव से नजर चुराते हुए पोंछने लगा ।
मनीष की बात सुनकर राजीव को अपने बहन के प्रति रखे गए शुष्क व्यवहार को लेकर एक असंतोष के साथ प्रायश्चित की अनुभूति होने लगी ।
‘इस शहर में हमारे कोई नाते रिश्तेदार नहीं है । जो कुछ हूँ मैं और श्वेता ही हैं । एक बार श्वेता से पूछना होगा अगर उसके या दीदी के फ्रेण्ड सर्कल में किसी को खबर करनी है या नहीं ।’ राजीव अब तक काफी संयत हो चुका था ।
‘ठीक है । आप श्वेता से बात कर लीजिए । तब तक मैं फोनकर सुरभि जी की मृत देह को श्मशान तक पहुँचाने की व्यवस्था करवाता हूँ ? उगते सूरज के संग इनका अग्निसंस्कार हो जाएगा तो इनकी आत्मा को पुण्य मिलेगा ।’ मनीष ने कहा और अपने मोबाइल पर किसी का नम्बर जोड़ने लगा । राजीव अन्दर चला गया ।
श्वेता और आकृति उठकर सुरभि के पार्थिव शरीर के पास जाकर बैठ गई थी । राजीव श्वेता के नजदीक जाकर बैठ गया ।
‘तुम्हारें या दीदी के किसी दोस्त को इत्तला करनी है तो कर दो ।’ उसने धीमे से श्वेता के कान में कहा ।
नौकरी छोड़ने के बाद तो मम्मी खास किसी से ज्यादा मिलती नहीं थी और इनके कार्यक्षेत्र में भी इन्होंने अपना कहलाने वाले कोई दोस्त नहीं बनायें । मेरे कुछ दोस्त है मैं उन्हें वाट्सएप कर देती हूँ ।’ श्वेता ने कहा और मोबाइल पर मैसेज भेजना शुरू कर दिया ।
कुछ ही देर में सुरभि के अंतिम संस्कार की सारी तैयारियाँ हो गई और एक अजनबी की तरह सुरभि का पार्थिव देह घर की दहलीज से बाहर निकालकर शववाहिनी में रखवा दिया गया । श्वेता के पाँच छह दोस्तों के अलावा इंसानियत के नाते इस्कोन आइकोन रेसीडेंसी के चार पाँच लोग राजीव और मनीष के साथ श्मशान तक आए । सुबह आठ बजते बजते सुरभि की देह राख में परिवर्तित हो चुकी थी ।
श्मशान से घर आकर राजीव और रागिनी के लिए अब श्वेता को लेकर प्रश्न था । सुरभि ने भले ही अपने प्रश्नों के घेरे से राजीव को मुक्ति दे दी थी लेकिन साथ ही अपनी जवान बेटी की जिम्मेदारी भी वह कहे बिना उसके कन्धों पर डाल गई ।