आखर चौरासी - 11

आखर चौरासी

ग्यारह

सन 1469 ई., कार्तिक पूर्णिमा को लाहौर से 15 कोस दूर तलवण्डी में जन्मा वह मुस्काता बालक उम्र के साथ-साथ बड़ा हो रहा था। लोग-बाग जहाँ उसके विचित्र कौतुकों को आश्चर्य से देखते, उसके सार्थक तर्कों से चमत्कृत होते। वहीं उसके दुनियादार पिता बड़े परेशान रहते। पिता चाहते थे कि वह घर-बार की चिन्ता करे, परन्तु उसने तो सारे संसार की चिन्ता करनी थी।

समाज में चारों ओर अज्ञानता का अंधकार छाया हुआ था। उस समय विभिन्न धर्म अपने-अपने तरीके से स्वर्ग की राह बतला रहे थे। लेकिन सच्ची रोशनी किसी ओर से नज़र नहीं आ रही थी।

समाज और आम आदमी की गिरती दशा की चिन्ता करने वाला कोई न था। उस काल में यह चिन्ता की तो उसी बालक ने, जो बड़े होने पर सिक्खों के प्रथम गुरु, गुरु नानक देव के रुप में जाने गए। लोक कल्याण की उस कठिन राह पर आगे बढ़ने से घर-परिवार का मोह भी उन्हें ना रोक सका। पत्नी तथा दो बेटों श्रीचन्द और लक्ष्मीचन्द को पीछे छोड़ वे जग का अंधकार दूर कर लोक कल्याण के लिये अपनी यात्राओं पर निकल पड़े।

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दृश्य बदलता है। संगम पर बड़ी भीड़ है। स्नान कर रहे लोग उगते सूर्य को जल अर्पण कर रहे हैं। गुरु नानक ने सूर्य की तरफ पीठ की और पश्चिम की ओर जल चढ़ाने लगे।

वहां मौजूद एक पंडे ने उन्हें टोका, ‘‘सूर्य तो पूरब में है। तुम्हें नहीं दिखता क्या, जो उधर पीठ कर जल चढ़ा रहे हो ?’’

गुरु नानक ने सहजता से पूछा, ‘‘आपका जल सूर्य के लिए है न !’’

‘‘हाँ, बिल्कुल ! यहाँ सभी लोग सूर्य को ही जल चढ़ा रहे हैं।’’ पंडे ने उनकी नासमझी का मखौल उड़ाया।

वह उत्तर पा कर गुरु जी पुनः बोले, ‘‘जब आपका जल पृथ्वी से करोड़ों मील दूर सूर्य तक पहुँच सकता है, तब मेरा जल इसी पृथ्वी पर मौजूद पंजाब में मेरे खेतों तक जरुर ही पहुँच जाएगा। मैं अपने सूखे खेतों को सींच रहा हूँ।’’

उस तर्क का कोई उत्तर नहीं था। गुरु जी ज्ञान का प्रकाश फैलते अपने मार्ग पर आगे बढ़ गए।

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दृश्य फिर बदलता है। अपने दोनों शिष्यों, बाला तथा मरदाना के साथ हिन्दू-मुस्लिम को एकता के सूत्र में जोड़ता अपनी राह चलता वह पथिक अपने अगले पड़ाव पर मक्का जा पहुँचा। शाम होने को आई थी। सारा दिन पैदल चलने वाला वह पथिक उस दिन इतना थक चुका था कि ज़मीन पर लेटते ही उसकी आँख लग गई। उसने यह भी न देखा कि उसका सिर किधर है और पाँव किधर ....दरअसल उसके पाँव पवित्र काबा की ओर हो गये थे। वैसा होना बिलकुल भी स्वीकार्य नहीं था ।

वह गलती होती देख जगीर सिंह ने उन्हें सावधान करना चाहा, आगे बढ़ कर उन्हें रोकना चाहा। परन्तु न तो उनके मुँह से आवाज़ निकली और न ही उनके पैर आगे बढ़े। ...और तुरन्त ही उन्हें स्मरण हो आया कि वह उनका समय नहीं था। वे इतिहास के मौन दर्शक मात्र गो सकते हैं, कोई हस्तक्षेप नहीं कर सकते।

तभी उधर से गुजर रहे मौलवी सा’ब ने जब वह दृष्य देखा तो बड़ा क्रोधित हुआ। वह कुपित स्वर में चिल्लाया, ‘‘यहाँ कौन काफिर सो रहा है ? क्या तुम्हें इतना भी नहीं दिखता कि तुम्हारे पैर खुदा के घर की तरफ हैं ?’’

थके–मांदे गुरु नानक देव ने विनम्रता से उत्तर दिया, ‘‘मैं दूर-देश का यात्री हूँ। इतना अधिक थका हुआ हूँ कि अब मैं अपना शरीर भी नहीं हिला सकता। मेहरबानी करके मेरे पैर उधर कर दो जिधर खुदा का घर ना हो !’’

उस उत्तर ने मौलवी सा’ब के क्रोध कि अग्नि में घी का काम किया। उसने गुस्से से गुरु नानक की टाँगें पकड़ कर दूसरी ओर घुमा दीं।

‘’ईधर तो खुदा का घर नहीं है ना !’’ गुरु नानक ने मुस्करा कर पूछा।

उस सवाल पर मौलवी चौंका और जब वह पलटा तो हैरान रह गया। अब उसे काबा पूर्व स्थल पर नहीं दिख रहा था। मौलवी को काबा अब भी गुरु नानक के पैरों की ओर ही दिख रहा था। गुरु नानक की मुस्कान से उसका क्रोध और भी बढ़ गया उसने गुरु नानक के पाँव पुनः दूसरी ओर घुमाए।

‘’ईधर तो खुदा का घर नहीं है ना !’’ गुरु नानक ने पुनः पूछा।

परिणाम फिर वही था। चारों दिशाओं में पाँव घुमा लेने के बाद भी मौलवी वह दिशा न पा सका जिधर खुदा का घर न हो। ...और उसे सत्या का भान हुआ कि गुरु नानक नाम का वह इंसान कोई साधारण मानव नहीं हैं, अन्ततः वह अपनी भूल जानकर गुरु नानक के कदमों में गिर पड़ा।

‘‘खुदा तो हर जगह है !’’ कहते हुए गुरु नानक पुन: अपनी यात्रा पर चल पड़े।

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दृष्य फिर बदला। पिता ने गुरु नानक को समझा-बुझा कर घर वापस लाने के लिए लहना को उनके पास भेजा। लहना उन्हें वापस तलवंडी ले जाने के लिए आया था। परन्तु उनकी बातों में ऐसा रमा कि स्वयं भी वापस जाना भूल गया। उसने स्वयं को गुरु जी की सेवा में समर्पित कर दिया। गुरु नानक को जो कुछ अपने पुत्रों श्रीचन्द व लक्ष्मीचन्द में भी नहीं मिला था, वह सब उन्हें लहना में नज़र आया।

आगे चल कर सन् 1539 ईस्वी में 70 वर्ष की आयु पर गुरु नानक देव के गुरु-गद्दी त्यागने के बाद वही लहना उत्तराधिकारी के रूप में सिक्खों के दूसरे गूरु, गुरु अंगद देव के रुप में गुरु-गद्दी पर बैठाए गए। गुरु नानक देव स्वयं अपना शेष जीवन बिताने को करतरपुर प्रस्थान कर गये।

...और गुरु नानक देव के विचार प्रकाश बन कर पीढ़ी दर पीढ़ी चारों ओर फैलने लगे।

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जगीर सिंह की नींद खुल गई। उन्हें ज़ोरों की प्यास लगी थी। वे पानी पी कर पुनः बिस्तर पर आ गये। ‘वाहेगुरु ....वाहेगुरु’ बोलते हुए वे सोचने लगे, ये उन्हें आज कैसे-कैसे सपने आ रहे हैं। लेकिन सपने में ही सही गुरु जी के दर्शन होने से वे प्रसन्नचित्त अनुभव कर रहे थे। रात अभी बहुत बाकी थी, ‘वाहे गुरु ....वाहे गुरु’ जपते हुए उन्होंने बिस्तर पर लेट कर पुनः आँखें बन्द कर लीं। जल्द ही उन्हें फिर नींद आ गई। कमरे की दीवार पर लगी घड़ी तो अपनी सामान्य गति से चल रही थी लेकिन प्रकाश वर्ष की गति से दौड़ते सपनों वाली नींद की तीव्र राहों ने उन्हें पुनः सुदूर अतीत में पहुँचा दिया।

इस बार वे जिस दृष्य का हिस्सा बने, वह पच्चीस मई सन् सोलह सौ पचहत्तर की तारीख थी। चक नानकी में एक जगह एकत्र हुए लोग बड़े ध्यान से ‘ग्रंथ साहिब’ के शबद श्रवण कर रहे थे। गुरु नानक की गुरु-गद्दी का नौवाँ वारिस अपने आसन पर बैठा वह तेजस्वी महापुरुष बीच-बीच में रुक कर उन शबदों का अर्थ बताता चल रहा था। जगीर सिंह ने महसूस किया कि भले ही उस तेजस्वी का चेहरा अलग है परन्तु उस पर छाया तेज वही है जो सदा ही गुरु नानक के साथ बना रहता था।

तभी कुछ लोगों ने वहाँ प्रवेश किया, अचानक ही वहाँ का शांत वातावरण अशांत हो गया। पंडित कृपा राम के नेतृत्व में सोलह कश्मीरी ब्राह्मणों का एक समूह वहाँ आया था।

‘‘गुरु जी हमें बचा लीजिए !’’ हाथ जोड़े कृपा राम की आँखों से पीड़ा छलक रही थी, ‘‘ औरंगजेब के आदेश से इफ्तिखार खान बड़े अत्याचार कर रहा है। लोगों को जबरन इस्लाम कबूल करवाया जा रहा है। ... हमारा धर्म और जीवन खतरे में है, हमें बचाइए !’’

उनकी बातें सुन कर सारा वातावरण बोझिल हो गया। गुरु जी के मस्तक पर चिन्ता की लकीरें उभर आयीं। कुछ पलों के मौन के पश्चात् उनका गंभीर स्वर उभरा, ‘‘इसका एक ही उपाय है। किसी सच्चे व्यक्ति को अपना बलिदान देना होगा।’’

अभी उनका वाक्य पूरा ही हुआ था कि पास बैठे उनके चौदह वर्षीय पुत्र ने तपाक से कहा, ‘‘पिता जी तब तो इस बलिदान के लिए आपसे बढ़ कर योग्य भला और कौन होगा ?’’

अपने पुत्र के मुँह से निकली बात सुन कर गुरु जी के चेहरे पर एक मुस्कान फैल गई। वे थे सिक्खों के नौंवे गुरु, गुरु तेग बहादुर तथा वह बालक था, गोबिन्द दास जो आगे चल कर सिक्खों के दसवें गुरु, गुरु गोबिन्द सिंह बने।

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दृष्य बदला। तारीख बदली। सन् सोलह सौ पचहत्तर नवंबर माह की ग्यारह तारीख। दिल्ली के तत्कालीन शासक औरंगजेब के हुक्म से गुरु तेगबहादुर को सरेआम दिल्ली के चाँदनी चौक पर कत्ल कर दिया गया। चारों तरफ अजीब सी अफरा-तफरी, गम और आक्रोश फैलता चला गया।

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कमल

Kamal8tata@gmail.com

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Komal

Komal 5 महीना पहले

kalpana joshi

kalpana joshi 6 महीना पहले

A Gaurav Pithwa

A Gaurav Pithwa 6 महीना पहले