चूका बीच - ख़ूबसूरत पर्यटन स्थल Neelima Kumar द्वारा यात्रा विशेष में हिंदी पीडीएफ

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चूका बीच - ख़ूबसूरत पर्यटन स्थल



     दोस्तों ! हमारा भारत वर्ष संस्कृति एवं परंपराओं, प्राचीन धरोहरों एवं प्राकृतिक सौंदर्य के लिए जाना जाता है। आज मैं आपको उत्तर प्रदेश के एक ऐसे प्राकृतिक सौंदर्य की ओर लेकर चलती हूँ जो अभी तक पर्यटकों से अछूता है। दो वर्ष पूर्व फरवरी माह 2017 में हम लोग इस जगह पर 2 दिन गुजार कर आए हैं। हमें लगा कि इस जगह के बारे में ज्यादा से ज्यादा लोगों को मालूम होना चाहिए, तो बस इसी प्रेरणा के साथ मैंने यह लेख लिख डाला।
     उत्तर प्रदेश के पीलीभीत जिले में शारदा नदी पर बनाई गई एशिया की सबसे बड़ी झील है। इस इलाके में पानी की कमी के कारण वर्षों पूर्व अंग्रेजों ने सिंचाई हेतु शारदा के पानी को रोककर झील तैयार की और नहरों का निर्माण किया। झील के एक किनारे पर है "दुधवा नेशनल पार्क" और दूसरे किनारे पर है " टाइगर रिज़र्व, चूका इको टूरिज़्म स्पॉट, महोफ रेंज, पीलीभीत"। इसी झील पर बने " शारदा डैम " के किनारे के जंगलों में सन् 2001 में "चूका इको स्पाॅट" को विकसित किया गया। पीलीभीत की सीमा खत्म भी नहीं होती है और वन्य जीवों से भरा प्राकृतिक जंगल प्रारंभ हो जाता है। पीलीभीत से माधव टांडा होते हुए लगभग 25 कि•मी•जंगल में अंदर पहुंच जाने पर एक पक्का पुल और उसके नीचे बहती पक्की शारदा नहर दिखाई पड़ती है। अंग्रेजों की बनाई यह पक्की नहर बहुत गहरी और चौड़ी है, बस इसी पक्के पुल को पार करते ही "चूका इको टूरिज़्म स्पॉट " का प्रमुख द्वार दिखाई पड़ता है। इस द्वार पर प्रवेश शुल्क  ₹ 300 एवं प्रति व्यक्ति 100 रुपए एक बार देय होता है। इसी द्वार से प्रारंभ होती है लगभग 6 किलोमीटर की कच्ची, काली घुमावदार सड़क जो कि रेत और काली मिट्टी से बनाई गई है। बिना हाॅर्न एवं शोर किए हुए शांति के साथ लगभग डेढ़ किलोमीटर इस सड़क पर आगे बढ़ते ही शारदा डैम की उठती-गिरती बड़ी-बड़ी लहरों की कल कल ध्वनि हमारे कानों में पड़ने लगती है। घना जंगल, सर्पीली कच्ची सड़कें, मीलों फैली खामोशी में चहचहाते पंछियों का कलरव, हमें देख डर कर कुलाचें मार कर भागते हिरन एवं बारहसिंघों का झुंड, ठंडी हवाओं में पंख फैलाकर नाचते- झूमते मोर हमारे मन को झूमने के लिए मजबूर कर देते हैं। इन्हीं एहसासों के बीच से गुजरते हुए हम आ पहुँचते हैं जंगल के बीच बनाए गए इस ढाई हेक्टेयर वाले चूका इको स्पाॅट के बीचो-बीच, जहाँ प्रकृति के गोद में ही पर्यटकों के रहने की व्यवस्था की गई है। इस इलाके में थारू जाति के आदिवासी निवास करते हैं इसीलिए वन विभाग ने पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए सन् 2001 में पहली थारू हट बनवाई । धीरे-धीरे इसे बढ़ाया गया। 9 जून 2014 को यह पर्यटक स्थल टाइगर रिजर्व क्षेत्र में शामिल हुआ। इस पर्यटक स्थल का संचालन वहाँ की local society  " संयुक्त वन प्रबन्ध समिति , मुस्तफाबाद " कर रही है।
      दोस्तों ! जिन लोगों को शांति, प्राकृतिक सुँदरता, भोर की उगती हुई किरणें, ढलते सूरज की लालिमा, पेड़ों के हरे - हरे पत्तों के बीच से छनकर आती सुनहरी किरणें, पंछियों का कलरव, जंगली जानवरों की आवाजें, साइबेरिया से आए दुर्लभ पक्षियों की ख़ूबसूरती को निहारने की तमन्ना, टाइगर से प्यार भरी मुलाकात की हसरतें, रात के अंधेरे में पेड़ों की सरसराहट, दूर-दूर तक फैले सन्नाटे में लहरों के थपेड़ों की भयावह आवाजें, तो वहीं दूर तलक झील में फैली चाँद की खूबसूरत चाँदनी, रात तो छोड़िए दिन में भी जमीन पर फैले पत्तों पर कोई निकल जाए तो सूखे पत्तों की चर्र - चर्र की वो आवाज़ें  मन को मोहने के लिए काफी हैं। झील का पानी इतना साफ कि किनारे पर 8 फुट गहराई में भी लहराते शैवाल बहुत ही खूबसूरत और साफ दिखाई पड़ते हैं ।आस पास खड़े पेड़ों की परछांई यह भ्रम पैदा करती है कि शायद यह पेड़ झील की तलहटी में ही लहरा रहा है।  यह झील इतनी बड़ी है कि किनारा नहीं दिखता, बस दूर कहीं आसमाँ और धरती के मिलने का विहँगम दृश्य दिखलाई पड़ता है। अगर कहा जाए कि जिन्हें प्रकृति एवं वन्य जीवों को अपने कैमरे में कैद करना पसंद है, adventure पसंद है, तो उनके लिए यह जगह ideal है।
         हाँ !  एक बात यहाँ यह जरूर बताना चाहती हूँ  कि हमने मात्र एक सफारी ली थी,  किंतु हमारे वहाँ से निकलने के बाद कुछ Americans आए थे जो कि वहाँ 3 दिन रहे और उसमें उन्होंने 5 सफारी ली, जिसमें आखरी दिन उन्हें टाईगर दिखा। कहने का तात्पर्य है कि समय लेकर जाईए। यह जंगली जानवर थोड़ा मनमौजी होते हैं। जी चाहेगा तो अपने आप को हमारे सामने ले आएँगे अन्यथा हमें बिना उनसे मिले ही वापस लौटना पड़ता है।
        कुछ विशेष जानकारी आपके लिए यहाँ दे रही हूँ --  " चूका ईको स्पॉट " घूमने का best season है --  मार्च, अप्रैल एवं मई । इसके बंद होने का समय होता है -- 15 जून से 15 नवंबर तक। जाड़े के मौसम में हाड़- माँस को कंपकंपाने वाली ठंड पड़ती है तो वही गर्मी में सुलगती आग भी बरसती है। मगर क्या करें टाईगर प्रेमियों! टाईगर से मिलना है तो गर्मी में ही जाना होगा और अगर प्राकृतिक सौंदर्य से अपने हृदय को अभिभूत करना है तब जाड़े का मौसम ही अच्छा है।  वैसे भी बासों और मिट्टी से बनी यहाँ की थारू हटें हों,  पेड़ पर बाँस की बनी झोपड़ी हो या झील के अंदर बाँस के जाल पर बनी बाँस की झोपड़ी और उसका बड़ा सा टेरेस हो, आप कहीं भी रहो अपने आप में एक अद्भुत रोमाँचक अनुभव है। फरवरी के महीने में वहाँ से तो एक बहुत गरम रजाई मिली ही थी और हम अपनी भी एक रजाई लेकर गए थे, परन्तु ठण्ड का आलम कुछ ऐसा था कि टोपी भी लगानी पड़ जाती थी। बाथरूम तो बहुत अच्छे थे पर नलों में गरम पानी नहीं था। ब्रश करने के लिए गरम पानी की बाल्टी मंगानी होती थी या यूँ कहें कि फरवरी में वहाँ का मौसम पहाड़ों के मौसम की तरह ही था।  खुद ही सोचिए ! हवा और पानी की आवाजों का संगम हो,  बाँस की झोपड़ी हो, ना कोई TV , न शोर हो, उस पर से बिजली भी ना हो, तो कितना रोमाँचक होगा यह अनुभव।  दरअसल सिर्फ जनरेटर से ही बिजली आती है वह भी मात्र 3 घंटे के लिए, बाकी समय तो आपको solar energy  वाले लैंपों से ही काम चलाना पड़ेगा। हमें भी उस रिहाएशी इलाके में केवल Vodafone के signals ही मिले, जंगलों में तो वो भी नहीं थे। मगर इस सबसे डरने की जरूरत बिलकुल भी नहीं है क्यों कि सुरक्षा के पुख्ता इन्तज़ाम भी हैं।  2.5 हेक्टेयर वाला यह इलाका काँटों वाली बाढ़ के साथ साथ 440 volt  वाली electrical fence से घिरा हुआ है, साथ ही ये fence पूरी तरह से solar power द्वारा back up में भी है। सारा डर तब खतम हो जाता है जब वहाँ का आदमी आपसे ये कहता है कि आप आराम से  सो जाइए मैं बाहर बैठा रहूँगा ।  सुबह और सुहानी लगती है जब आप नाश्ते में गरमा गरम पराठे खाना चाहें या खाने में चूल्हे पर पकाया गया खाना, सब कुछ आपको आपके कमरे में लाकर बड़े प्यार और धैर्य से  खिलाते हैं यहाँ के canteen boy। थोड़ी सी परेशानी non veg n hard drinks वालों को होती है, क्यों कि ये दोनों ही चीजें strictly prohibited हैं।
   अन्य जानकारी अथवा बुकिंग हेतु कुछ नाम और नम्बर लिख रही हूँ  जिनसे आप सीधे संपर्क कर सकते हैं --
श्री रहमत    --     08392857702
श्री अनीस    --    08394054771
श्री जीशान   --   08859889425

On line Booking  site -- 
www.ptr-pilibhit.in

                                               नीलिमा कुमार