निपाह वायरस Neelima Kumar द्वारा स्वास्थ्य में हिंदी पीडीएफ

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निपाह वायरस

निपाह वायरस

( NiV virus ):

लक्षण/उपाय

सावधान रहिए भय मुक्त रहिए

29 May 2018

20:04

नमस्कार दोस्तों !

अपने पिछले लेख " ड़ेंगू या वायरल " की तरह इस बार भी Net और डॉक्टर की मदद से आप सब के लिए साधारण और सरल भाषा में इस लेख को लिखने का प्रयास किया है। उम्मीद करती हूँ कि इस लेख के द्वारा अनजाने निपाह वायरस से डरे हुए लोगों को कुछ दिशा दिख सकती है। केरल के कोझिकोड जिले के पेरामबरा गांव में निपाह वायरस ( NiV ) से जुड़ी हुई कई मौतें हुई हैं। यह वायरस कहां से आया, कैसे फैलता है और क्या है इसको रोकने का उपाय वगैरा-वगैरा, आइए जानते हैं कुछ सरल एवं भयमुक्त शब्दों में। इस वायरस को समझने के लिए हमें पहले एक दूसरे वायरस को समझना पड़ेगा जो कि निपाह से भी ज्यादा खतरनाक है और वह वायरस है हमारे अँदर बैठा हुआ डर। जी हाँ .... अगर हम अपने दिमाग और व्यवहार को शाँत रख पाएँ तो हम स्वयं देखेंगे कि इतना भी मुश्किल नहीं होता है किसी भी आपदा से लड़कर उस पर विजय पाना। बस जरूरत होती है तो थोड़े से धैर्य सावधानी और सूझबूझ की। किसी भी खबर को हमारे पास तक कैसे और किन शब्दों का प्रयोग करके पहुँचाया जा रहा है, हमारा डर बस इसी पर निर्भर करता है। आप सभी से अनुरोध हैं शाँत रहकर इस लेख को अंत तक पढ़ें और भयमुक्त होकर इस वायरस से मात्र सावधान रहें, सब कुछ अपने आप ही सरल लगने लगेगा।

निपाह वायरस है क्या ? --

सर्वप्रथम सन् 1998- 99 में सिंगापुर - मलेशिया के एक गाँव कम्पंग सुंगाई निपाह में एक बीमारी फैली। इसकी चपेट में एक व्यक्ति आया और लगभग 24 घंटे बाद ही उसकी मृत्यु हो गई। विश्व स्तर पर इस वायरस की जानकारी किसी भी डॉक्टर को नहीं थी इसलिए निपाह गाँव के डॉक्टरों ने गाँव के ही नाम पर इस वायरस का नाम निपाह वायरस रखा। निपाह वायरस का अगला आक्रमण सन् 2001 में भारत के पश्चिम बंगाल के सिलीगुड़ी क्षेत्र में हुआ जिसमें 66 लोग संक्रमण का शिकार हुए एवं उसमें से 45 लोगों की मौत हो गई। इसके बाद सन् 2007 में पश्चिम बंगाल के ही नदिया इलाके में 5 मामले दर्ज हुए जिसमें उन पांचों की मौत हो गई। इसके बाद थाईलैंड, कंबोडिया और फिलीपींस में भी यह वायरस पहुँचा। इतने वर्षों बाद सन् 2018 अप्रैल में अब फिर से एक बार मलेशिया में यह वायरस पहुँचा और उसके बाद वहाँ से भारत में केरल राज्य के कोझिकोड जिले के पेरामबरा गाँव में पहुँचा। शुरुआत में एक ही परिवार के तीन व्यक्ति इस वायरस के शिकार हुए,और फिर धीरे धीरे गाँव के काफी लोग इसकी चपेट में गए।

निपाह वायरस को medical term में NiV virus कहा जाता है। REBONUECLICK ACID ( RNA ) नामक ये वायरस PARAMYXOVIRIDAE family का है और हेंड्रा वायरस से मेल खाता है। पता कैसे लगाएँ --

इसका पता मरीज के खून की जाँच करने पर ही पता चल सकता है। किसी भी प्रकार के वायरस की जाँच केवल वायरोलाजी लैब में ही की जा सकती है। वैसे तो पूरे भारत में कई लैब होंगी किन्तु बड़ी लैब दो जगह ही हैं--

1• NATIONAL INSTITUTE OF VIROLOGY, PUNE

2• NATIONAL CENTER FOR DISEASE CONTROL, NEW DELHI

पेरमबरा गाँव में मरीज के blood की जाँच पहले भोपाल स्थित वायरोलॉजी लैब में की गई थी लेकिन डॉक्टरों ने उस सैंपल को National institute of virology, PUNE में दोबारा भेजा। यहाँ की लैब में यह वायरस ब्लड में पाया गया।

निपाह वायरस का स्रोत --

यह एक पशुजन्य रोग है। सभी जानते हैं कि चमगादड़ पेड़ पर रहते हैं। चमगादड़ों में एक प्रजाति पाई जाती है जो फल और फलों के रस को पीती है, साथ ही पाम के पेड़ों पर खुले बर्तनों में जो ताड़ी अर्थात कच्ची शराब बनाई जाती है उसे भी पीती है। इस नस्ल को " फ्रूट बैट " कहा जाता है। कुदरती तौर पर निपाह वायरस चमगादड़ों की इसी फ्रूट बैट नस्ल में पाए जाते हैं। इस चमगादड़ के मल, मूत्र एवं लार से वायरस बाहर निकलते हैं। मूलतः इस चमगादड़ के द्वारा खाए गए फल या ताड़ी को जो भी इंसान खाता या पीता है, उसमें निपाह वायरस प्रवेश कर जाते हैं। जमीन में झूठे पड़े फल एवम मल को सूअर खाता है और पेड़ पर टंगे उस झूठे फल को पक्षी खा लेता है इसलिए यह वायरस उन स्वस्थ पक्षियों एवं पशुओं के अंदर चले जाते हैं। पक्षियों के खाए हुए फल जब बाजार में आते हैं तो कोई नहीं जानता कि यह फल वायरस युक्त हैं। उसी तरह सुअर संक्रमित है या नहीं ये जान पाना भी मुश्किल है। इन संक्रमित पशु अथवा पक्षियों के संपर्क में आया व्यक्ति भी इस वायरस का शिकार हो जाता है जैसा कि निपाह गांव में हुआ। इस गाँव में मुख्यतः सुअर पालन का कार्य होता है।

लक्षण--

निपाह वायरस से संक्रमित व्यक्ति के अंदर 5 से 14 दिनों के भीतर यह वायरस एक्टिवेट हो जाते हैं अर्थात शरीर पर लक्षण दिखाई देने लगते हैं। इसके प्रारंभिक लक्षणों में तेज सिर दर्द एवं तेज बुखार, साँस लेने में तकलीफ, थकान, बेहोशी, सिर में जलन, मतली का महसूस होना आदि प्रकट होते हैं। इसके बाद इसकी तीव्रता बढ़ने पर मानसिक भ्रम, मस्तिष्क में सूजन, विचलन, पेट दर्द, आंखों में धुंधलापन, गले में फंदा जैसा लगना और उल्टी होना दिखाई पड़ता है और तीसरे चरण में मरीज का कोमा में जाना होता है। एक बार अगर व्यक्ति कोमा में जाए तो मरीज को बचाना मुश्किल हो जाता है। विशेष ध्यान देने योग्य बात है कि प्रारंभिक लक्षण दिखने के बाद 24 से 72 घंटे के मध्य कोमा की संभावना बढ़ जाती है। एक तरह से इसे घातक इंसेफ्लाइटिस या दिमागी बुखार कहा जा सकता है।

बचाव के तरीके --

1• सहायक दवाइयाँ और पेलीएटिव केयर अर्थात मरीज को पूर्णतया डॉक्टरों की निगरानी में छोड़ दें जिससे डॉक्टर अपने हिसाब से सहायक दवाइयों के साथ उचित देखभाल कर सके।

2• फल खरीदते समय कुतरा हुआ फल ना खरीदें।

3• जूस पीना खतरनाक हो सकता है क्योंकि यह पता करना जरा मुश्किल होगा कि फल कहीं चमगादड़ द्वारा कुतरा हुआ तो नहीं था।

4• उत्तर भारत में खजूर और केला मुख्यतः केरल के कालीकट और पेरामबरा गाँव से ही आते हैं क्योंकि इन्हीं जगहों पर इनकी खेती होती है। साथ ही इस वक्त आने वाला आम भी लगभग उसी क्षेत्र के पास से आता है। डरे नहीं बस जरा देख कर खरीदारी करें।

5• जब तक संक्रमण का आतंक खत्म नहीं होता फलों और सब्जियों को गर्म पानी अथवा पोटाश से धोकर खाएं।

6• पाम के पेड़ पर खुले बर्तन बाँधकर ताड़ी अर्थात कच्ची शराब बनाई जाती है, उसे भूल कर भी ना पिएं।

7• माँसाहारी खाने वाले इस समय माँसाहारी खाना ना खाएँ। हो सकता है कि जो माँस आप खा रहें हों वह किसी निपाह वायरस संक्रमित पशु का हो।

8• संक्रमण वाला रोग होने की वजह से मरीज के संपर्क में ना आएँ।

9• मरीज की देखभाल करने वाला व्यक्ति नाक- मुँह पर मास्क पहने एवं सिर से पाँव तक अपने पूरे शरीर को ढक कर ही मरीज के पास जाएं। कुछ इस तरह से >

10• हर बार मरीज को छूने के उपरांत एंटीसेप्टिक साबुन से हाथ धोएँ,भले ही मरीज को गिलास उठाकर ही क्यों दिया हो। एक बेहतर तरीका और भी है कि हाथों में दस्ताने पहन लिए जाएं।

11• कपड़े, बिस्तर, बर्तन के अतिरिक्त बाथरूम में साबुन से लेकर बाल्टी तक हर सामान मरीज का अलग कर दिया जाए।

12• मरीज को अलग कमरे में रखा जाए।

13• दुर्भाग्यवश अगर मरीज की मौत हो जाती है तो अंतिम संस्कार से पूर्व स्नान अन्य की जाने वाली विधियों के दौरान अपने शरीर को हाथ लगाने की भूल कभी ना करें।

14• मृतक के गले लगे एवं पैरों को हाथ लगाएं।

15• अंतिम यात्रा के दौरान भी मुंह पर मास्क पहने एवं पूरा शरीर ढक कर रखें।

16• अगर आपका कोई पालतू जानवर इस संक्रमण की जद में गया है तो उसकी भी इसी प्रकार देखभाल करें।

विशेष तथ्य --

ऐसी सावधानियाँ बरतने का यह अर्थ बिल्कुल नहीं है कि आप अपने मरीज से प्यार नहीं करते हैं। इस कुंठा को कभी मत पालें। जरा सोचिए ! आप बहुत प्यार करते हैं इसीलिए आप अब तक उनके पास हैं और उनकी सेवा कर रहे हैं।

एक सलाह मरीज के लिए--

अगर कोई इस वायरस का शिकार हो गया है तो अपने घर वालों के प्रति उबलते हुए प्यार में वह यह ना भूलें कि वह सब उनके अपने हैं। अतः सभी घरवालों का स्वयं उत्साहवर्धन करें कि वह सब उनसे दूर रहें और सावधानी बरतें ना कि इस बात के लिए मरीज अपने परिवारजनों से शिकायत करें।

ये सभी सावधानियाँ चमगादड़ और सुअर बाहुल्य क्षेत्र के लिए हैं, या फिर उत्तर भारत के लिए।

मेडिकेशन --

1• अभी तक पेरामबरा गाँव के लिए मलेशिया से RIBAVIRIN नामक दवाई मंगाई जा रही है, जो फिलहाल काफी हद तक प्रभावित साबित हो रही है।

2• इसके साथ ही होम्योपैथ की बेलाडोना दवा सुबह- सुबह खाली पेट 4 से 5 गोली खाएँ तो इसका असर भी प्रभावी हो सकता है। ऐसा सुनने में रहा है।

3• मैं एक COLOUR THERAPIST हूँ इसलिए एक इलाज मैं भी बताना चाहती हूँ। नीले रंग में किसी भी तरह के जहर अथवा वायरस को खत्म करने की अद्भुत क्षमता होती है। अगर आप संक्रमित वातावरण या उसके आसपास के दायरे में आते हों तो कृपया एक छोटा सा उपाय करें। 100 watt का एक बल्ब लें, उसके ऊपर नीली पन्नी double करके बाँध दें। ( नीली पन्नी जिसे हम शादी में फलों की टोकरी पर बाँधते हैं ) अब इस बल्ब को घर के सबसे छोटे कमरे में जला लें। कमरे में अन्य किसी भी प्रकार की रोशनी नहीं होनी चाहिए। शरीर का जितना ज्यादा हिस्सा खुला रहेगा उतना ही अच्छा रहेगा अतः कपड़े उसी हिसाब से पहनें। अब घर के सभी सदस्य इस कमरे में आएँ और थोड़ी दूरी बनाते हुए नीले बल्ब के सामने 8 मिनट के लिए आँखें बंद करके खड़े हो जाएँ। विशेष ध्यान रखना है कि आपकी आँखें बन्द होनी चाहिए एवं 8 मिनट से ज्यादा किसी भी हालत में नीली रोशनी में नहीं रहना है। आप ये प्रक्रिया दिनभर में एक बार किसी भी समय कर सकते हैं। इस प्रक्रिया को लगातार 3 दिनों तक करें, उसके बाद 2 दिन के लिए बन्द कर दें। ज्यादा से ज्यादा एक महीने तक आप इस प्रक्रिया को कर सकते हैं। 8 साल से छोटे बच्चों को 3 मिनट से ज्यादा नीली रोशनी में नहीं रखना है।

दोस्तों ! इस संक्रमण से जीतने का एक ही उपाय है लक्षणों पर ध्यान दें प्रारंभिक लक्षणों के दिखते ही 15 मिनट और देखते हैं या 15 मिनट और इन्तज़ार कर लेते हैं, ऐसा बिल्कुल सोचें बल्कि उस 15 मिनट को हॉस्पिटल जाने के लिए इस्तेमाल करें। अगर हम समय रहते धैर्य और समझदारी के साथ डॉक्टर और अस्पताल का सहारा लें तो संभवता हमारा मरीज जिंदगी और मौत की इस लड़ाई को जीत सकता है।

नीलिमा कुमार