जूठी दादी

बुढ़ापा और बीमारी दोनों कष्ट-दायक अवस्थाएँ मानी जाती हैं| अधिकतर लोग इन परिस्थितिओं में टूट कर बिखर जाते हैं, लेकिन इस छोटी सी कहानी की खुराफाती दादी तो किसी और मिट्टी की बनी है| इन अम्माजी को तो टेंशन लेने में नहीं पर देने में मज़ा आता है| खुद की तकलीफ में दुसरे चिंता करें, दिन में हर दम स्पॉट-लाइट इन पर ही रहे, खाना बने तो पहली थाली इनकी सझे, कोई फैसला हों तो सब से पहले इन की सलाह ली जाये, ऐसी सोच रखने वाली खुर्राट दादी की कहानी अब शुरू होती है|

घर की बड़ी बेटी होने के कारण दादी बचपन से हुकम चलाने की आदि रही| छोटी बहने काम करती यह महारानी हुकम झाडती, बड़ी होने के कारण शादी भी पहले हुई, तो ससुराल में जेठानी बन कर रौब झाड़ा| अब तो जैसे बुढ़ापे में दादी को हुकूमत चलाने का चस्का सा लग गया| जब भी कोई बात उनकी मर्ज़ी के विरुद्ध जाती तो वह साम दाम दंद भेद सब टोटके / तुक्के आजमा कर वह, हवा का रुख अपनी और मोड़ लेती| लेकिन समय तो सब को खेल दिखाता है|

सुबह सुबह उठ कर दादी नें मुर्गा बांग देते हुए इश्वर (भगवान्) को भी झटके से नींद से जगा दिया| अब भगवान् तो फ़रियाद करने से रहा, लेकिन उनका बेटा मगन गुस्से से लाल-पिला हुआ और बोला, ओ माई कल रात 3 बझे ड्यूटी ख़त्म कर के सोया हूँ, ज़रा धीरे चिल्लाओ...

अब दादी नें मगन की बात ऐसे अनसुनी कर दी जैसे भारत पाकिस्तान की युद्ध धमकी नज़र अंदाज़ कर देता है| घर की बहु सुबह सुबह पानी भरने और कचरा साफ़ करने में व्यस्त थी तभी दबंग दादी फिर चिल्ला उठी...

अरे ओ कमला अब,,, गरारे करने के लिए पानी तू लाएगी या, तेरे ससुराल फोन कर के मांगना पड़ेगा? कमला अपना काम छोड़ कर दादी के लिए नमक वाला पानी लोटे में भर लाती है और जाने लगती है तभी दादी पास पड़ी लाठी ज़ोर से ज़मीन पर पटकती है और घुर्रा कर बोलती है...

अब बासी मुह से गरारे यही खटिया पर करने लगु क्या? बरामदे तक मुझे कौन ले जायेगा? कमला तुरंत दादी को सहारा देते हुए बरामदे तक ले जाती है| इसी दौरान मगन (दादी का बेटा) कंटाल कर उठ जाता है| वह फिर एक बार अपनी अम्मा (दादी) से कम चिल्ला कर बोलने की गुजारिस करता है, तब दादी मुह में भरे गरारे (पानी) की पिचकारी बेटे मगन की और उछालते हुए बोलती है अपना काम कर मुझे मत सिखा बीवी के गुलाम|

अब बच्चे भी स्कूल जाने के लिए उठ जाते हैं| तभी दादी बिना सहारे लकड़ी उठा कर बाथरूम में घुस जाती है| कमला उसे बार बार समझाती है की, बच्चों को स्कूल के लिए तैयार करना है| आप बादमें नहा लेना| लेकिन दादी तो दादी है|

अब जैसे तैसे कर के कमला सब काम निपटा कर सुबह का नाश्ता तैयार कर लेती है| बच्चों का टिफिन भर के उन्हें स्कूल रवाना कर देती है| अब मगन और उनकी माँ के लिए वह नाश्ता परोसने लगती है| इतने में कमला से एक गलती हो जाती है की, वह दादी से पहले मगन की प्लेट में नाश्ता डाल बैठती है|

दादी के दिमाग की नस खीचने के लिए इतनी गलती काफी थी, दादी बिना ब्रेक की खटारी की तरह शुरू हो जाती है| बड़ों का मान नहीं है.... तुम लोगों को मेरी ज़रूरत नहीं है... भुगतो गे तुम सब... बुढापे में तुम लोगों को भी मेरी तरह कोई पूछेगा नहीं... यह वोह फलाना,ढिमका....|

यह सब आलाप सुन कर मगन के नाक कान के बाल बुरी तरह जल जाते हैं, और वह बिना नाश्ता ठुसे घर के बाहर दौड़ जाता है| मगन के बाहर जाते ही ढोंगी दादी बड़े बड़े निवाले गटकने लगती है वह भी बिना डकार लिए|

अब दो पहर हो जाती है| मगन अब भी सुबह की बात से चिड़ा हुआ होता है| वह जैसे ही घर आता है तो दादी उसे ओय... निकम्मे बोल कर अपनी खटिया के पास बुला लेती है| फिर अपने बेटे मगन के बाल खीचते हुए बोलती है की, यह क्या किंग कोंग फिल्म के गुस्साए गोरिले जैसा मुह फुला रखा है| माँ के डांटे का भला कोई बुरा मानता है क्या? चल अब खाना खाते हैं|

इस बार कमला ध्यान से दो पहर का खाना दादी को धरती है| उसके बाद मगन की थाली लगाती है|

शाम होने पर बच्चे भी घर लौट आते हैं| पूरा परीवार घर पर साथ होता है| मगन अब अपनी नाईट शिफ्ट नौकरी पर जाने की तयारी कर रहा होता है तभी दादी फुट फुट कर रोने लगती है| कमला और मगन उनके पास आ कर रोने का कारण पूछते हैं तो दादी बोलती है की उन्हें दादा (अपने पती) की याद आ रही है| वह रोज़ दादी को शाम को घुमाने ले जाते थे|

बेचारा मगन एक घंटे की छुट्टी ले कर दादी को बाग़ पर टहलाने ले जाता है| उसके बाद काम पर जाता है| शाम ढलने के बाद अब दादी को टीवी देखना है| उसी समय बच्चे भी अपना होम वर्क कर के टीवी देखने आते हैं|

जैसे ही दादी नें आस्था, भक्ति, आरती वाली धार्मिक चैनल लगायी, छोटू-मोटू नें उनके हाथ से रिमोट लपक के छीन लिया और पोगो चैनल लगा दिया| दादी के सब्र का बाँध इंस्टेंट मैगी के जैसे पक गया और फिर एक बार वह चिल्ला चिल्ला कर रोने लगी|

इस बार तो कमला भी गुस्सा हो गयी| उसने कहा की अब आप भगवान् का नाम जपिए| बच्चें ज़िद करे तो अच्छे लगते हैं, आप इस उम्र में ऐसे धमाल करती हैं आस-पडौस ले लोग क्या सोचेंगे| थोड़ी तो शर्म कीजिये| आप टीवी सुबह में देख लेना जब, बच्चें स्कूल गए हों|

दादी इतना सुन कर आग बबूला हो गयी| उसने फ़ौरन प्लान-बी आजमाया| घर के फोन से मगन को कॉल कर दिया और कहा की बहु मुझसे जगडा कर रही है| मेरी छाती में दर्द हो रहा है| मै शायद आज ही मर जाउंगी| तू जल्दी से घर आजा|

बेचारा मगन फिर एक बार काम-छोड़ चालू नौकरी से भागता हुआ घर आता है और कमला पर टूट पड़ता है| वह उसे दादी का ख्याल ना रखने पर खूब सुनाता है| तब कमला रोती हुई रसोई में चली जाती है| दादी मगन के कान इस कदर भरती है की दो दिन तक मगन कमला से सीधे मुह बात तक नहीं करता है|

इस घटना के बाद दादी के हाथ से बच्चों नें भी रिमोट छिनने की कोशिश नहीं करी| कमला नें भी बच्चों को समझा कर दूर कर लिया| घमंडी दादी अपनी इस ओछी हरकत को अपनी जित समझ कर मन ही मन इतराती रही|

दादी दिन पर दिन ऐसे छोटे मोटे जगड़े मगन और कमला के बीच लगवाती रही| तभी एक दिन कमला नें बच्चों के साथ अपने मायके चले जाने का निश्चय कर लिया| मगन इस बात से काफी दुखी था लेकिन दादी को किसी बात की फ़िक्र नहीं थी| वह तो जाते जाते भी कमला पर एकाद वार कर के उसे भेजना चाहती थी|

शाम की गाडी से बच्चे और कमला जा रहे थे| इस वक्त मगन की नौकरी पर छुट्टी थी| दादी लकड़ी के सहारे खडी हो कर बरामदे की और जट से जाने लगी और एक बड़ा लोटा पानी भर के वही फिसलन भरी ज़मीन पर उड़ेल दिया| फिर अपनी लकड़ी फेंक कर वही धीरे से बैठ गयी| और चिल्लाने लगी,

दादी का इरादा यह था की जाते जाते भी मगन कमला पर हाथ उठाए या उसे बुरी तरह डांटे| वह कमला पर यह आरोप सिद्ध करना चाहती थी की उसी नें वहां फर्श गिला रक्खा जिस कारण दादी (खुद) फिसल पड़ी|

अब ऊपर वाला सब को पाठ पढाता है. संजोग-वश जब दादी यह सब खुराफ़ाती कर रही थी तब कमला रसोई की खिड़की से देख रही थी और मगन गलियारे पर दूर खड़े खड़े देख रहा था| मतलब दादी की चोरी पकड़ी गयी| अब मगन पूरी तरह अपनी अम्मा को जान गया था|

वह तुरंत वहां आया और बोला, क्या अम्मा चोट आई है? यहाँ पास में ही एक अच्छा सा जानवर का डॉक्टर है, वह आप को बड़ी सी सुई लगाएगा, फिर कडवी कडवी दवाई देगा, और आप जैसे ही ठीक हुई में आप को, तूफानी वृद्धआश्रम छोड़ आता हूँ, ठीक है? चूँकि यहाँ तो कमला आप का खयाल रखती नहीं, बच्चे आप को तंग करते हैं| और में काम-काज में व्यस्त रहता हूँ और इन्सान के डॉक्टर से आप की मोटी खाल का इलाज होगा नहीं|   

इतना सुन कर जूठी दादी फुदक कर खडी हो गयी और फिर से बेटे और बहु को बुरा भला बोलने लगी| जूठ-मूठ मगरमच्छ के आंसू भी बहाने लगी| मगन यह सब देख कर इतना तिलमिला गया की, वह दादी के कपडे गठरी में बांधनें लगा| कमला बीच बचाव करने आई तो उसे भी डांट कर दूर कर दिया|

मगन नें रिक्शा बुलाई और दादी को सामान सहित रिक्शा में बिठा दिया| अब मगन रिक्शा में दादी को वृद्ध आश्रम ले आया| जहाँ पर उस संस्था के संचालक से मगन नें अपनी आप-बीती कही|

पूरी बात सुनने के बाद वहां के अधकारी नें मगन से कहा की, आप बिलकुल चिंता ना करें, आप की अम्मा को इस वृद्ध आश्रम पर एक सप्ताह का महेमान बनने दीजिये| उसके बाद आप उन्हें घर ले जाइएगा| आप सिर्फ अपने पत्नी से हुआ जगडा सुलझा लीजिये| दादी को पटरी पर लाने की ज़िम्मेदारी अब हमारी|

मगन जानता था की बेटे के जीते जी माँ को वृद्ध आश्रम छोड़ना बुरी बात है| लेकिन वह ये भी समझता था की अपना घर बचाना है और दादी (अपनी माँ) की बुरी आदतों को सुधारना है तो उसे यह कठिन कदम लेना ही होगा| वह घर जा कर अपनी पत्नी से अच्छे से सुलह कर लेता है| और कमला को भी समझा देता है की एक सप्ताह बाद माँ को घर ले आयेंगे|

दादी नें वृद्ध आश्रम में एक दो दिन तो उधम मचाया, लेकिन उनकी तूफानी हरकतों के कारण वहां उन्हें कड़े नियम पालन करने पर लगा दिया गया| जैसे की सुबह में  6 बझे उठ जाना, समय पर नहाना, थोड़ी देर चलना फिरना, कम बोलना, पूजा पाठ करना, तीखा, मसाला वाला खाना कम खाना, दो पहर की नींद समय पर लेना, शाम को 7 बझे खाना खा लेना, फिर एक या दो घंटा टीवी देखना और समय पर सो जाना|

अब इतने सारे नियम तो दादी को जेल की तरह लगने लगे| 7 दिन होते ही दादी नें मगन को फ़ोन किया और उसे कहा की, बेटा मेरी गलती मुझे समझ आ गयी| परीवार के बड़े होने का मतलब यह नहीं है की हर समय रौब झाडें, मिल झूल कर रहना ही सही है| तू मुझे घर वापिस ले आ| मुझे यहाँ नहीं रहना|

मगन अपनी माँ से कहता है की, मैं तुम्हे कभी वृद्ध आश्रम दाखिल करने ले कर ही नहीं गया था| मेरा तो उद्देश यह था की तुम अपनी बहु और हमारे बच्चों संग घुल-मिल कर रहों और हम सब की कीमत समझो| तुम वहां पर एक सप्ताह के लिए ही हो, जो की पूरा हुआ| आज रात ही में और कमला तुम को घर लेनें आ रहे हैं|

यह सुन कर दादी की आवाज़ में जान आ गयी, वह बोली हाँ यह अच्छा है, लेकिन अपनी बीवी को समझा दे की मेरे साथ चपड़-चपड़ कम किया करे, बीमारों वाली सब्ज़ी मुझे ना खिलाया करे, मेरा बिस्तर टाइम टाइम पर साफ़ करे, नाश्ता मुझे गरम दिया करे| पूजा पाठ के समय अपनी मिक्सी ना घुमाया करे|

यह सब सुन कर मगन मन ही मन हस पड़ता है| और बोलता है की,,, ठीक है अम्मा में उसे समझा दूंगा| उसी रात कमला और मगन दादी को वापिस घर ले आते हैं|

अब दादी तो सुधरने से रही| वह छोटे मोटे पटाके फोडती ही रहती है| लेकिन जब जब उसे लगता की बात, तूफानी वृद्ध आश्रम में दाखिल होने तक पहुँच चुकी है तो वह, बड़ी फुरती से अपना स्वभाव सुधार लेती और घर के सभी सदस्यों के साथ घुल-मिल जाती|

सारांश – बेटा या बेटी जीवित है तब तक माँ-माप वृद्ध आश्रम नहीं जाने चाहिए, लेकिन कई बार ऐसे संजोग बन जाते हैं की, गलत व्यक्ति को सही राह पर लाने के लिए कठिन कदम लेने आवश्यक हो जाते हैं| कपट और जूठ की आयु बड़ी छोटी होती है| सामने वाले का दर्द समझे और मिल-झूल कर रहें| - कहानी पूरी पढने के लिए धन्यवाद|         

***

रेट व् टिपण्णी करें

Suraj Harshe 1 महीना पहले

Nimavat Bhargavbhai 2 महीना पहले

Vaishali Kher 2 महीना पहले

kirti.v.bhanushaligmail.com 2 महीना पहले

Pinki Samriya 3 महीना पहले