जीवन के रंग... Vinita Shukla द्वारा लघुकथा में हिंदी पीडीएफ

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जीवन के रंग...

आकाश में, कोई छुपा प्रिज्म हो शायद...जिसने प्रकाश को, सात रंगों में छितराया था. अम्बर के सीने को मथकर, रंगीन धाराएँ फूट पड़ीं! वर्षा ने गगन को धो- पोंछकर चमकाया और रंग इन्द्रधनुषी वक्र में सिमट आये. नन्हीं बदलियां उसे छूते हुए निकलतीं... इन्द्रधनुषी आभा में स्नान करतीं... मंथर गति से, गगन में डोलती हुईं- यथा रैंप पर सुंदरियां! “ममा” अंतरा के स्वर ने, वर्तिका की तंद्रा भंग कर दी. वह चौंकी और बिटिया की तरफ देखा. अंतरा बहुत उत्तेजित जान पड़ती थी, “ममा बड़ी मम्मी से बोलो- यहाँ से चली जाएँ.”

“क्या हुआ भई... सुबह सुबह इतना हाई टेम्परेचर?? बड़े गुस्से में है हमारी बिट्टो!!”

“ममा कभी वे नानू को जीब्रा कहती हैं कभी कहती हैं वो बस्टर्ड की तरह दिखती थीं...इट्स सो मीन ऑफ़ हर!!” जेठानी के कटाक्ष में छुपा अर्थ भांपकर, वर्तिका का दिल काँप उठा. बस्टर्ड से अम्मा की तुलना कितनी भयावह थी... कितनी क्रूर!! सफेद चित्तियों वाला वह भूरा कुत्ता, उनके सुख दुःख का साथी था. उनके जाने के बाद, भगवान ने उसे भी जल्द बुला लिया. मासूम अंतरा के मन में, आतंक बोना चाहती थी उसकी बड़ी मम्मी उर्फ़ मंगला! गुजरा हुआ तूफ़ान मानों फिर उमड़ आया- सारी कायनात को हिलाते हुए...बिजली सी कड़की, बादल गरजे, वृक्ष उखड़ गये और मन...मन किसी पत्ते सा डोलने लगा!! मां को बेचैन पाकर, तसल्ली देने को, अंतरा उसकी गोद में जा बैठी. “ममा डोंट वरी...देखो तो मैं क्या लायी हूँ, आपके लिए!!” वर्तिका ने देखा, एक नन्हा कागज का टुकड़ा अंतरा ने थामा हुआ था. आड़ी तिरछी रेखाओं में, ग्लोइंग स्टिक से लिखे गये अनगढ़ शब्द, “हैप्पी मदर्स डे टु द बेस्ट मॉम ऑफ़ दिस वर्ल्ड” वर्तिका ने अपनी नन्हीं सी जान को भींच लिया. आँखों से गर्म पानी बह निकला.

ममता की गर्मी पाकर, अंतरा की आँखें मुंदने लगीं. मां की गोद में सिमटकर, ज्यों सपनों की परियों को न्यौत दिया हो! मदर्स डे का कार्ड बनाने को, यूँ भी वह जल्दी उठी थी. थकान उस पर हावी थी. इधर आंसुओं में घिरी वर्तिका, मंगला की बात पर गौर फरमा रही थी. बस्टर्ड के साथ जो स्थूलकाय महिला रात के अँधेरे में टहलती थी, वह उसकी माँ ही तो थी... दिलफरेब दुनियां से कटी हुई स्त्री और उसका कुत्ता! दोनों तभी बाहर आते जब कॉलोनी के प्रायः सब जीव या तो सो गये होते या फिर सोने की तैयारी में होते. स्ट्रीट लाइट की मद्धम रौशनी में, उनके शरीर के भूरे सफेद चकत्ते, चमक चमक जाते!! सालों बाद वर्तिका ने, वैसा ही एक पिल्ला, बाजार में देखा तो बिना सोचविचार उसको खरीद लायी. नाम भी वही रखा- बस्टर्ड...बस्टर्ड- उसके निर्मम अतीत का हिस्सा!! सायास ही दृष्टि, अंतरा के ‘मदर्स डे कार्ड’ पर जा टिकी. मन में घंटियां सी बजीं.

गुलाबी फ्रॉक पहने छोटी सी एक लड़की- ख्यालों पर छा गयी. इठलाती हुई, हाथ हिला हिलाकर, कॉलोनी की दीदियों से बतलाती, “पता है मेरी मम्मा को कल क्लब ने, मोस्ट एट्रेक्टिव लेडी डिक्लेअर किया”

“ओहो जस्ट सी- हाउ मम्माज़ बेबी इज़ बोस्टिंग” कोई जलकुकड़ी हसद से तंज कसती. तो दूसरी कह उठती, “जब लड़के वाले इसे देखने आयेंगे तो इसकी बजाय ममा को ही पसंद कर लेंगे” मिलेजुले ठहाकों के बीच तीसरी आवाज़ गूंजती, “माँ हंसिनी और बेटी क्व्वी”

“यू आल आर जेलस... किसी की ममा मेरी ममा जितनी क्यूट नहीं!” वह मुंह फुलाकर अम्मा के पास भाग आती और उनसे मुंहफट लडकियों की शिकायत करती. माँ हंसते हंसते दोहरी हो जातीं, “बहुत भोली है तू...वे सब बस तेरी टांग खींचती हैं. ऐसी बातों को दिल से नहीं लगाते”

“लेकिन अम्मा; क्लब के फंक्शन में आपको मोस्ट एट्रेक्टिव लेडी का टाइटल मिला है...और वे एप्रिशियेट तक नहीं करतीं”

“क्यों करेंगी?! क्या लगती हूँ मैं उनकी?? हमारी फॅमिली मेम्बर तो नहीं हैं ना” अम्मा के बहलाने पर, वह झट बहल जाती. कोई जादू की छड़ी थी उनके पास. हर परेशानी, उनसे बात कर छूमंतर हो जाती. वर्तिका ने उचाट नजर, शोकेस पर डाली. अम्मा बाऊजी की तस्वीर सामने थी. अंतरा की नानी, जिन्हें वह नानू कहती है; कबकी गुजर चुकी थीं. तस्वीर में वे, बला की सुन्दरी जान पड़ती थीं. उनके इसी रूप से परिचय था अंतरा का. उस दूसरे रूप की वह कल्पना तक नहीं कर सकती जो मंगला उसे दिखाना चाहती थी!

हाँ अम्मा पर नजर ही तो लग गयी थी! लोगों की ही नहीं अपनों की भी! बाऊजी तक को ईर्ष्या थी उनसे. अम्मा का संजना -संवरना, उन्हें रास ना आता. वह सुंदर मुख, कंटीले नैन- नक्श और सुरुचिपूर्ण पहनावा; उनके वजूद को बौना कर देते. बाऊजी का उलटे तवे जैसा रंग, मोटी नाक और होंठ, पत्नी की छवि से मेल ना खाते. कमतरी का एहसास, उनकी बातों में फूट पड़ता, “देखो संजना; बेटी १७ की हो गयी है. बनाव सिंगार थोड़ा कम करो. सयानी लड़की की माँ हो. बढ़ती उम्र की, अपनी अलग गरिमा होती है” नादान अम्मा उन मनोभावों को पढ़ ना पातीं और पलटवार करतीं, “अजी ये तो खेलने खाने के दिन हैं. बुढ़ापा आने के पहले ही बूढ़ी हो जाऊं??”

‘खेलने खाने के’ दिनों में ही तो, तकदीर ने वह संगदिल खेल खेला...सुख के सुनहरे पलों का हिसाब, बेहिसाब दर्द से चुकाना पड़ा! वही दिन थे जब अचानक, पारिवारिक मित्र शिवनाथ जी का प्रस्ताव मिला. अपने बेटे विभव के लिए, वर्तिका का हाथ माँगा था उन्होंने. अम्मा, बाऊजी मानसिक रूप से इसके लिए तैयार ना थे. वर्तिका उनके लिए अभी भी गोलूही थी. पल में हंसने, पल में रोने वाली गुड़िया! कभी अल्हड़ हंसी के मोती बिखेरती; कभी मचलकर ठुनकने लगती. बारहवीं की परीक्षा देते ही रिश्ता आ गया. १८ ही तो पूरे किये थे उसने.

शिवनाथ जी बाऊजी से बोले थे, “अभी कोई जल्दी नहीं है सूरजभान जी. लेकिन आप जानते ही हैं कि जमाना खराब है. इधर लड़के की नौकरी लगी नहीं कि उसे बरगलाने की कोशिशें शुरू. कहीं गलत जगहन फंस जाए, यह डर लगा रहता है. आपका घर परिवार संस्कारी है , जाना पहचाना है. बिटिया भी सुशील है. इसी से सगाई करके छोड़ सकते हैं. इस बीच हमारे सुपुत्र भी अपनी ट्रेनिंग पूरी कर लेंगे. गोलू भी पढ़ाई जारी रखे...हमें कोई आपत्ति नहींइंडियन मिलिट्री एकेडमी की डेढ़ साल की ट्रेनिंग के बाद, विभव को आर्मी अफसर बन जाना था. सूरजभान बेटी की अधूरी पढ़ाई को लेकर, चिंतित अवश्य थे; किन्तु बैठे बिठाए अच्छा रिश्ता मिलना, एक दुर्लभ संयोग था. ऐसे में उसे ठुकराना भी तो व्यवहारिक ना था.

फिर सोचा कि ट्रेनिंग की कवायद में, डेढ़ दो साल तो यूँ ही निकल जायेंगे. गोलू के ग्रेजुएशन का, साल भर रह जाएगा. अपने कॉलेज में दाखिला करवा दिया तो हाजिरी की समस्या भी नहीं रहेगी. नैया तो पार हो ही जायेगी! किसनगढ़ के इकलौते डिग्री कॉलेज में, लेक्चरर थे सूरजभान. स्थानीय लोगों में, उनकी साख बहुत ऊंची थी. वे किसी से जल्दी प्रभावित ना होते; परन्तु विभव के आकर्षक व्यक्तित्व ने, उन्हें भी मोह लिया. अफसर बनने के बाद, वह ठसक और बढ़ जानी थी. बेटी का विभव के लिए खिंचाव देखकर, रही सही हिचक भी जाती रही.

नियत समय पर, धूमधाम से सगाई हुई थी. शिवनाथ की पत्नी मेघना, थोड़ी मुंहफट थीं पर साथ ही खुशमिजाज़ भी. उन्होंने तब हंसी हंसी में, पति की खिंचाई करते हुए कहा था, “बहुरिया तो क्या, समधी जी का बस चले तो खूबसूरत समधन भी ले उड़ें” उनके यह बोलते ही, कई जोड़ी आँखें, अम्मा पर गड़ गयीं. अम्मा सकुचा उठीं थीं. बेटी की सगाई पर, संजना ने बहुत हल्का मेकअप किया था. डर था कि कहीं वह खुद ही दुल्हन ना लगने लगे. लेकिन रूप और गंध छुपाये नहीं छुपते! दुर्भाग्य भी ऐसा ही है...जब जकड़ लेता है, उसकी दस्तक दूर तक सुनाई देती है. कौन जानता था कि अमंगल होने वाला है!!

क्लब की पार्टी में, अम्मा ने डीप- नैक वाला ब्लाउज पहना था. ब्लाउज की डोरी कहीं फंस गयी. उन्होंने शर्मा आंटी से उसे छुड़ाने का अनुरोध किया था. छुड़ाने की प्रक्रिया में डोरी खुली और कुछ देखकर आंटी की पुतलियाँ फ़ैल गयीं थीं. उन्होंने झट डोरी बाँधी और अम्मा को कोने में ले जाकर फुसफुसायीं, “मिसेज़ दास, आपकी पीठ पर एक बहुत अनयूजुअल सा धब्बा है”

“व्हाट डू यू मीन?”

“मिसेज़ दास...इट्स वाइट इन कलर!”

“ओहो मिसेज़ शर्मा...ये भी कुछ ऐसा ही कह रहे थे. बट नथिंग टु वरी अबाउट”...अम्मा आसानी से बात को पचा नहीं पा रहीं थीं, “मैंने उनसे भी कहा- खरोंच का निशान होगा. मेरा जो इम्पोर्टेड कुरता है ना, उसकी ज़िप से मुझे लम्बी खरोंच लगी थी”

“बट इट डजंट लुक लाइक दैट...आई थिंक आपको चेक करवा लेना चाहिए” इस पर अम्मा भी तनाव में आ गयी थीं. और फिर वही हुआ जिसका डर था!! डॉक्टर ने लेंस से उस दाग का निरीक्षण किया...कुछ देर गम्भीर मुद्रा बनाये बैठे रहे फिर घोषणा की थी, “संजना जी...यह विटिलिगो है. आप समझ रहीं हैं ना- मैं क्या कह रहा हूँ?!” अम्मा रोने रोने को हो आयीं. इस पर वे तसल्ली देते हुए बोले, “डोंट पैनिक...कई बार यह अपनेआप ठीक हो जाता है. लेट मी सी, व्हाट आई कैन डू” जीवन को सबसे सुंदर वरदान माना जाता है पर वही सबसे अधिक भयावह अभिशाप भी होता है!

अम्मा ने डीप नैक वाली ड्रेसें पहनना बंद कर दीं थीं. लेकिन क्या एक धब्बा छिपा लेना काफी था ?? वे भयानक धब्बे धीरे धीरे पूरे शरीर में फैलने लगे. पहले गर्दन, फिर हाथों में, यहाँ तक कि उँगलियों, पलकों और होठों पर भी. कुरूपता का ऐसा भयंकर तांडव, शायद ही किसी ने देखा हो! सुंदर सलोना चेहरा, इतना विद्रूप हो गया कि विद्रूपता भी दहल उठे!! संजना की पूरी देह पर सफेद स्याही पुत गयी थी, बस कहीं कहीं भूरे चकत्ते नजर आते. रात में कोई उनका मुंह देख ले तो डर जाए! कहने को तो रोग संक्रामक नहीं था पर अम्मा की सभी सहेलियाँ उनसे कटने लगीं. क्लब की पार्टियों में छाई रहने वाली संजना, अब घर तक से बाहर नहीं निकलती.

ऐसा नहीं था कि ‘सोशल बायकाट’ केवल संजना का हुआ हो. परिवार के सभी सदस्यों पर इसका असर पड़ा. वर्तिका की सहेलियाँ और उसके भाई मानस के दोस्त अब घर नहीं आते थे. कॉलोनी की जूही कभी कभी, उधर का रास्ता भूल जाती. एक समय था, जब अम्मा को वह लड़की एक आँख नहीं भाती थी. सुना था कि जब वह कॉलेज हॉस्टल में थी, उसका किसी लड़के से अफेयर और फिर ब्रेकअप हुआ था. अम्मा उस बदनाम लड़की से कतरा कर निकलतीं थीं लेकिन अब उसी के लिए, देसी घी के लड्डू बनाकर तैयार रखतीं. जूही भी अपने घरवालों की बेरुखी से तंग थी. वर्तिका के घर में, उसकी स्नेह की भूख शांत होती.

वक्त कठिनाइयों में गुजर रहा था. हौले हौले वर्तिका और उसके परिवार ने, हालात से समझौता कर लिया. ऐसे में एक दिन, जब वह अपने फ्लैट की सीढ़ियाँ चढ़ रही थी; उसने सामने वाली भैरवी आंटी और जूही की मम्मी को बात करते सुना. भैरवी कह रही थीं, “भाभीजी पहले तो मैं संजना जी के हाथ का बना खा लेती थी पर जबसे उनके हाथ में दाने हुए हैं मैं वो खाना, तुलसी वाले गमले में डाल देती हूँ... कह रहीं थीं कि गर्मी से दाने हुए हैं पर क्या पता, यह उनके रोग की एडवांस स्टेज हो”

“मैं भी जूही से कहती हूँ कि वहां ना जाया करे पर ये लड़की मानती नहीं. संजना का क्या! एक बार शिष्टाचार के नाते, उन्हें अपने यहाँ गेट- टुगेदर में बुला लिया था. मानस हमारे राहुल का दोस्त है ना, इसी से...”

“फिर??”

“फिर क्या.... जाते जाते हमें गले लगा लिया. सच कहूं भाभीजी बहुत अजीब सी फीलिंग हुई! उनके जाने के बाद हमने रगड़ रगड़ कर नहाया!” आगे नहीं सुन सकी थी वर्तिका. बिल्डिंग के पिछवाड़े जाकर, अपने आंसुओं को सुखाने का जतन करती रही. थोड़ी देर बाद जब सहज हुई तो घर जाने की सोची. अम्मा उसकी लाल आँखें देख हैरान रह गयीं थीं, “क्या हुआ गोलू...किसी ने कुछ कहा” उनकी बात का जवाब ना देकर, वह सीधे बाथरूम में घुस गयी. बंद दरवाजे के पीछे, हिलक हिलक कर रोई. मुंह धोकर जब बाहर निकली, अम्मा की उससे कुछ भी पूछने की हिम्मत ना हुई.

जीवन के कुछ और रंग बाकी थे जो अनदेखे रह गये. गोलू की सगाई वाली अंगूठी लौट आई. मेघना, बुआ की ससुराल वाली नातेदार हैं. सो बुआ ही बता रही थीं, “मेघना सबसे कहती घूम रही है कि माँ की बीमारी इतनी सीवियर है...जो बेटी को भी लग सकती है. वह तो कह रही थी कि वर्तिका के शरीर में, ऐसे धब्बे छुपे हो सकते हैं...अब कोई उसकी, डॉक्टरी जांच तो करवाएगा नहीं!” संजना अनचाहे ही खलनायिका बन गयी थी. सूरजभान भी रहरहकर पत्नी को दोष देते. इस सबके बीच, मानस मूकदर्शक बना रहता. एक गोलू ही थी जो अम्मा के समर्थन में उठ खड़ी हुई, “ मुझे नहीं करनी शादी- वादी! मुझे तो पढ़- लिखकर, अपनी अम्मा का सहारा बनना है” बेटी से मिले भावनात्मक सम्बल ने ही, संजना को बरसों तक हिम्मत दी और टूटने से बचाया.

नौ- दस साल यूँ ही निकल गये. वर्तिका १८ से अट्ठाईस की होने वाली थी. अभी तक विवाह का योग नहीं बना था. घर में व्याप्त अशांति के चलते, वह मेडिकल एंट्रेंस में सफल नहीं हो पायी. लिहाजा बी. एस. सी . नर्सिंग के बाद, एक अस्पताल में, मैनेजमेंट का हिस्सा बन गयी. सूरजभान, संजना से दैहिक ही नहीं, मानसिक तौर पर भी दूर हो गये थे. वे छोटे भाई की विधवा से जुड़ गये; जिसके तहत, गाँव आना जाना लगा रहता. उनके संग, ताऊजी की लड़की, रोली भी आ जाती थी. मानस का झुकाव, रोली की तरफ होने लगा. गोलू को यह अटपटा लगता. किन्तु उनकी बिरादरी में, कजिन से शादी मान्य थी, इसी से अम्मा बाऊजी भी कुछ नहीं कहते. सब अपनी अपनी खिचड़ी पका रहे थे. मानस उसका छोटा भाई था पर बड़ी बहन की परवाह उसे ना थी. परिवार के माहौल ने, वर्तिका को अवसाद से भर दिया. समाज में उसकी अपनी स्थिति, दयनीय होती जा रही थी. जूही भी शादी करके सेटल हो गयी लेकिन उसे कोई पूछने वाला नहीं. एक दिन जूही ने बताया, “रिनी दी कह रही थीं कि वर्तिका के साथ मूवी देखने मत जाया करो. बताओ... तुम्हें ‘प्रोवोक्ड’ जैसी फिल्म दिखाना चाहती है! वह खुद में उलझी हुई है... ऐसी सब बकवास ही देखेगी. तुम तो फेमिनिस्म वाली पिक्चर्स के फेर में मत पड़ो. दिमाग फिर जाएगा... अपने ही पति की खिलाफत करोगी!”

विषाद ने उसे दीमक की तरह खाना शुरू कर दिया. दिलोदिमाग पर काबू रखना भी मुश्किल था. एक दिन वह, बेबात ही अम्मा पर बरस पड़ी. वह दिन और आज का दिन; अम्मा को कभी फिर, किसी ने ना देखा! पता चला कि वे आश्रम गयीं थीं गुरूजी के पास. उनसे दीक्षा भी ली थी... किन्तु उसके बाद, उनका कुछ अता पता नहीं!! वर्तिका के नाम एक पत्र था जिसमें उन्होंने दिल खोलकर रख दिया. उसकी बदकिस्मती का जिम्मेवार, उन्होंने खुद को माना. यह कि उनके कारण ही, उसका ब्याह नहीं हो पाया. जाते जाते मायके से मिली पैतृक सम्पत्ति, उसके नाम कर गयीं थीं.

गोलू ने रो रोकर आँखें सुजा ली थीं. संजना के लिए दर्द, उसके अलावा भला और किसे था! वक्त ने करवट बदली. उसके अस्पताल में, मरीज के तौर पर भर्ती हुआ था शिरीष. वह केमिकल्स वाली फैक्ट्री में काम करता था. एक दिन फैक्ट्री में आग लगी. उन लपटों में, उसका चेहरा और देह, बुरी तरह झुलस गये थे. विकट हीनभावना ने घेर लिया था उसे. वर्तिका भी तो हीनता से ग्रस्त थी! हीनता ही, उनके बीच का सेतु बन गयी. सादे समारोह में, वे एक- दूजे के हो गये थे.

शिरीष के चीखने की आवाज़ से, वर्तिका चौंकी और वर्तमान में वापस आ गयी. उसने पाया कि पति और जेठानी में जोरदार बहस हो रही थी. शिरीष कह रहे थे, “आपको हर बात पर शक क्यों होता है भाभी? अंतरा को गहरी चोट लगी थी, चोट का निशान तो पड़ेगा ही. कल वर्तिका भी प्रेस से जल गयी थी... जले का दाग सफेदी लिए होता है- कौन नहीं जानता!”

“पर लल्ला जी” मंगला कुछ सहम सी गयी. “इस सबमें, गोलू की माँ कहाँ से आयीं??!! मैं जानता हूँ कि मेरी पत्नी और बच्ची को कुछ नहीं हुआ...और कल को कुछ हुआ भी तो” कहते कहते उसने एक गहरी दृष्टि वर्तिका पर डाली और आगे का वाक्य पूरा किया, “तो भी मैं उनका साथ नहीं छोडूंगा” शिरीष की मुस्कान ने, उसे भीतर तक भिगो दिया. “लल्ला जी मैं तो यूँ कह रही...” मंगला की ढिठाई, देखने लायक थी. “भाभी, गोलू ने मेरी प्लास्टिक सर्जरी के लिए, अपनी माँ से मिली सम्पत्ति तक बेच दी. दुनिया की कोई भी शै, हमें अलग नहीं कर सकती...आप यहाँ से जाइए भाभी! फिर अपनी शकल... हमें कभी मत दिखाइएगा!!”

इसके साथ ही शिरीष ने, कठोरता से मंगला का हाथ पकड़ लिया और एक झटके में उसे घर के बाहर कर दिया. ना जाने क्यों वर्तिका को लगा- फोटो फ्रेम में जड़ी हुई अम्मा, मुस्करा उठी थीं!!!