कहानी - ज़रूरतें Lovelesh Dutt द्वारा सामाजिक कहानियां में हिंदी पीडीएफ

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कहानी - ज़रूरतें

“अब फैसला आपको करना है। मेरी बात मानेंगे तो दोनों की ज़रूरतें पूरी हो जाएँगी, वरना...” कहकर स्मृति चली गयी।

विवेक अभी तक मुँह नीचे किये बैठा था। उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करे? इसमें कोई शक नहीं कि स्मृति की बात मानने से उसकी कई ज़रूरतें पूरी हो जाएँगी लेकिन स्मृति की ज़रूरत को पूरा करना, ‘नहीं, नहीं यह नहीं हो सकता’ सोचकर वह स्मृति की केबिन से बाहर निकल आया और अपनी मेज पर बैठकर फाइलें देखने लगा।

विवेक पिछले छह साल से इस कम्पनी में नौकरी कर रहा था। इस नौकरी में यूँ तो सबकुछ सामान्य था लेकिन मँहगाई के अनुपात में उसका वेतन नहीं बढ़ रहा था। खर्चे दिन-प्रति-दिन बढ़ते चले जा रहे थे। वैसे उसका परिवार बहुत बड़ा नहीं था। माता-पिता, पत्नी और दो बच्चे, बस इतना-सा था उसका परिवार, लेकिन इतने लोगों का भरण-पोषण करने में अब उसे समस्या आ रही थी क्योंकि वेतन कम पड़ने लगा था। घर का राशन, बिजली-पानी और फोन का बिल, बच्चों की फीस, माता-पिता की आवश्यकताएँ और भी छोटे-मोटे खर्च का भार अकेले विवेक पर था। अभी तीन साल पहले तक तो उसका वेतन इतने खर्चों के लिए पर्याप्त था। उसमें से धन बचाकर वह वर्ष में एकबार सपरिवार घूमने भी चला जाया करता था, लेकिन अब तो घर का खर्च चलाना भी मुश्किल हो रहा था। दो-तीन महीने में उसे या तो वेतन में से कुछ धनराशि अग्रिम लेनी पड़ती या फिर किसी सहयोगी से या मित्र से उधार लेना पड़ता था, जिसको किश्तवार वह अपने वेतन से ही निकाला करता। तंगी बढ़ने लगी। परिणामस्वरूप घर में कलह रहने लगा। पत्नी की इच्छाओं की पूर्ति न होने से वह भी समय-समय पर तीक्ष्ण वाणी का प्रयोग करने के साथ-साथ विवेक के काम और वेतन पर ताने मारने लगी। कुछ समय बाद पत्नी ने अपनी ज़रूरतों को पूरा करने के लिए दूसरे शहर में नौकरी कर ली। पत्नी से प्राप्त उपेक्षा और घर के कलह के कारण विवेक को मानसिक तनाव रहने लगा। पत्नी ने भी उससे सारे सम्बन्ध समाप्त से कर दिए। परिणामस्वरूप सदैव हँसने-मुस्कुराने वाला और चुलबुले स्वभाव का विवेक खोया-खोया रहने लगा। हर समय घर-परिवार के खर्चों और कर्ज़ों की चिन्ता के कारण उसके शरीर में विकृति आने लगी और वह बीमार रहने लगा। विवेक की ऐसी स्थिति देखकर उसके कार्यालय के लोग उसकी बीमारी और उदासी का कारण पूछते तो वह ‘कुछ नहीं बस तबियत ठीक नहीं है’, ‘यार थोड़ा थक गया हूँ’ या ‘रात में नींद पूरी नहीं हुई थी’ जैसे बहाने बना देता। वह अपने दिल की बात कहता भी तो किससे?

उसकी कम्पनी में कुछ दिन पूर्व नियुक्त हुए विशाल और उसमें बहुत आत्मीयता हो गयी थी। वे दोनों अच्छे मित्र बन गये। अब कभी-कभी विवेक अपने मन की बात विशाल को बताने लगा था। धीरे-धीरे उसके परिवार के बारे में विशाल बहुत कुछ जान चुका था। जब कभी विवेक अधिक परेशान होता या किसी समस्या में होता तो विशाल उसकी हर संभव सहायता भी करता। उस दिन विशाल ने देखा कि विवेक स्मृति के केबिन से बाहर निकला तो कुछ उदास और चिन्तित दिखाई दिया। उसने फाइल तो खोल ली लेकिन उसका ध्यान कहीं और था। उसे इस प्रकार चिन्तित देखकर विशाल उसके पास आ गया और पास ही पड़ी कुर्सी पर बैठ गया। उसके कंधे पर हाथ रखते हुए बोला, “क्या बात है विवेक सर...क्या हुआ? एनी प्राब्लम?”

“कुछ नहीं यार...क्या बताऊँ?” विवेक ने उत्तर दिया।

“बता दो यार, मन हल्का हो जाएगा...और फिर हो सकता है मैं कोई सोल्यूशन निकाल सकूँ” मुस्कुराते हुए विशाल ने कहा।

“क्या सोल्यूशन निकालोगे यार? मैं बड़ी अजीब हालत में हूँ। समझ ही नहीं आ रहा कि क्या करूँ?” विवेक ने गहरी साँस छोड़ते हुए और फाइल बन्द करते हुए अपने आसपास बैठे अन्य कर्मचारियों की ओर नज़र दौड़ाते हुए कहा।

विशाल समझ रहा था कि अवश्य ही कुछ ऐसी बात स्मृति मैडम ने कही है जो विवेक यहाँ बताने में हिचक रहा है। अतः स्थिति को समझकर उसने विवेक के हाथ पर अपना हाथ रखते हुए कहा, “चलिए ठीक है अभी आप कुछ मत बताइए। आज ऑफिस के बाद हम कहीं चलते हैं, वहाँ आप मुझे सबकुछ बता सकते हैं। मुझे भी तो पता लगे कि आपकी प्राब्लम क्या है?”

ऑफिस के बाद दोनों एक कॉफी शॉप में गए। कॉफी का आर्डर देकर विवेक ने अपने और स्मृति के बीच हुई कुछ बातें विशाल को बताईं। साथ ही यह भी बताया कि “आजकल ऑफिस का काम भी बढ़ गया है। न जाने क्यों स्मृति मैडम दिन पर दिन इतना काम मुझे देती जा रही हैं? एक अकेले आदमी से चार लोगों का काम लेती हैं। समय-असमय भी नहीं देखतीं और फाइल्स लेकर अपनी बँगले पर बुला लेती हैं। वह भी उस समय जब मैं बहुत थका-हारा अपने घर जाने की तैयारी कर रहा होता हूँ। मन नहीं करता फिर भी उनके यहाँ जाना पड़ता है। सच कहूँ तो मेरा अब नौकरी करने का मन ही नहीं होता।”

इस पर विशाल ने उसे समझाया, “अरे यार! यह सब तो लगा ही रहता है। जो भी नया बॉस आता है, वह अपने अनुसार ही काम करवाता है। रही बात नौकरी न करने की तो यह गलत है यार...तुम्हारा घर परिवार है, माता पिता हैं, बच्चे हैं। अगर नौकरी छोड़ दी तो फिर क्या करोगे? काम तो हर जगह ही होता है और हो सकता है कहीं और इससे भी अधिक खराब स्थितियाँ हों।” कॉफी की चुस्की लेकर कुछ क्षण के लिए मौन होकर विशाल ने फिर कहा, “पर, मुझे लगता है कि तुम इस बात से परेशान नहीं हो क्योंकि काम तो पहले भी बहुत हुआ है और तुमने उसे बहुत आराम से किया है। बात कुछ और ही जो तुम्हें परेशान किये हुए है। अगर सही समझो तो मुझे बता दो।” कहकर विशाल ने विवेक के कंधे पर अपना हाथ रखा। विशाल की इस आत्मीयता से विवेक भावुक हो उठा। उसकी आँखें नम हो गयीं। वह भर्राए गले से बोला, “यार! स्मृति मैडम ने मुझे प्रपोज़ किया है।”

“रियली...वाओ...क्या किस्मत है तुम्हारी, जियो गुरू...जियो,” विशाल ने मस्ती भरे अंदाज़ में कहा।

“मैं मज़ाक के मूड में नहीं हूँ यार...अगर सीरियसली सुनना है तो सुनो नहीं तो चलो यहाँ से,” विवेक ने खीझते हुए कहा।

“अच्छा सॉरी! बताओ माजरा क्या है?” विशाल ने गंभीर होते हुए कहा।

“पिछले शनिवार को जब मैं कोठी पर गया तो स्मृति मैडम मुझे ड्राइंग रूप में मिली। शायद घर पर कोई नहीं था। मैंने एक-एक करके फाइल्स उन्हें दिखाई और वह बिना वजह उसे पढ़ने लगी। समय ज़्यादा हो रहा था तो मैने कहा, ‘मैडम! मैं फाइल्स यहीं छोड़े जा रहा हूँ। आप पढ़ लीजिएगा। मुझे देर हो रही है। आज बेटी का जन्मदिन है इसलिए जल्दी घर जाना है। बच्चे वेट कर रहे होंगे।’ इस पर मैडम ने कहा, ‘हाँ श्योर...’ और ‘वेट अ मिनिट’ कहकर अन्दर चली गयी। कुछ क्षण बाद एक पैकेट मुझे दिया और कहा कि ‘बेटी के लिए कुछ है। उसे दे दीजिएगा। और हाँ यदि आप चाहें तो कल सुबह दस बजे आ जाइएगा। कुछ इम्पोर्टेंट डिस्कशन करना है।’ मैं अगली सुबह दस बजे फिर कोठी पर पहुँचा। मैडम मुझे ड्राइंग रूम में ही मिली। चाय की चुस्की लेते हुरए टी0वी0 देख रही थी। मैंने एक नज़र फाइलों पर डाली तो समझ गया कि एक भी फाइल नहीं पढ़ी गयी थी, सब वैसे ही पड़ीं थीं जैसे कल रात छोड़कर गया था। मुझे देखते ही मैडम ने टी0वी0 ऑफ कर दिया और फाइलों की तरफ खिसक आई। रसोई की ओर मुँह करके ज़ोर से आवाज़ दी, ‘ताराsss, चाय और नाश्ता ले आओ यहीं’ फिर एक फाइल उठाकर मुझसे बोली, ‘कैसी रही किड्स पार्टी?’ मैंने उनका दिया पैकेट उन्हें लौटते हुए कहा, ‘मैडम! प्लीज़ यह वापस ले लीजिए।’ ‘क्यों’ उन्होंने कहा, ‘यह तो आपकी बेटी के लिए है। आपने उसे दिया नहीं?’ ‘मैडम इसमें तो ग्यारह हजार रूपये हैं। इतने रूपये क्यों दिए आपने? और फिर मेरी बेटी तो अभी चार साल की है वह इनका क्या करेगी?’ मैंने कुछ सकुचाते हुए कहा। ‘मुझे पता है विवेक जी, सब पता है। यह भी पता है कि आपकी पत्नी के घर छोड़कर जाने के बाद आप माँ और पिता दोने की ज़िम्मेदार सँभाले हुए हैं। जानती हूँ कि नौकरी की सेलरी से आपका गुज़ारा नहीं हो पाता। और यह भी पता है कि आपके माता पिता अक्सर बीमार रहते हैं। उनके इलाज में काफी पैसा खर्च हो जाता है। मैं जानती हूँ कि ऑफिस के कई लोगों से आपने उधार लिया है। सच में तो ये पैसे आपके ओवरटाइम करने के हैं। मुझे मालूम था कि आप पैसे नहीं लेंगे। इसलिए बेटी के जन्मदिन के नाम पर दिए। आप इन पैसों को उसके ही नाम बैंक में डलवा दीजिएगा।’ ‘पर मुझे...’ मैंने कहना चाहा लेकिन तब तक तारा चाय-नाश्ता लेकर आ गयी और मैं चुप हो गया। उसके जाने के बाद इससे पहले कि मैं कुछ कहता, मैडम बोल पड़ी, ‘विवेक जी मुझे आपकी खुद्दारी और आपके व्यक्तित्व से लगाव है। मैं प्रेक्टिकली सोचती हूँ, इमोशनली नहीं। पैसे की ज़रूरत पैसा ही पूरी करता है, लेकिन और ज़रूरतों को लिए कभी-कभी पैसा काम नहीं आता। आपको पैसों की ज़रूरत है और मुझे आपकी। अगर आप मेरी बात मानेंगे तो हम दोनों की ज़रूरतें पूरी हो सकती हैं। खैर, मैं बिना किसी भूमिका के सीधे-सीधे पको प्रपोज़ कर रही हूँ। इफ यू हैव नो प्राब्लम।’ मैं हक्का-बक्का रह गया कि मैडम यह क्या कह रही है? मुझ जैसे साधारण आदमी को प्रपोज़ कर रही है। मैंने चाय का प्याला मेज़ पर रख दिया और उठ खड़ा हुआ। ‘मैडम प्लीज़...आई एम ए मैरीड पर्सन एंड हैविंग टू चिल्ड्रन’ मैंने कुछ आवेश में कहा। ‘बैठ जाओ विवेक हाइपर होने की ज़रूरत नहीं। मैंने बहुत शान्ति से अपनी बात कही है। और फिर कहती हूँ कि मुझे तुम्हारे प्यार और सहारे की ज़रूरत है। मैं तुमसे शादी करने को नहीं कह रही हूँ। बस तुम्हारा साथ चाहती हूँ। मैं बहुत अकेली और टूटी हुई हूँ, मुझे सँभाल लो विवेक प्लीज़! मैं तुम्हारी सारी ज़रूरतें पूरी कर सकती हूँ लेकिन तुम्हें मेरी बस एक ज़रूरत पूरी करनी है...होप यू अण्डरस्टैण्ड’ कहते-कहते वह मेरे बहुत पास आ चुकी थी। मै स्तब्ध था। मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा था। हाँ, यह सच है कि मुझे पैसों की सख्त ज़रूरत है, लेकिन यह तो कई तरीका नहीं है अपन ज़रूरत पूरी करने का। कैसी औरत है यह? आज फिर अपने केबिन में बुलाकर वही कहने लगी। हाऊ डिस्गस्टिंग” विवेक ने विशाल को सब बता डाला।

विशाल कुछ क्षण मौन रहा फिर बोला, “तो यह बात है...फिर क्या सोचा तुमने?”

“व्हाट...आर यू मैड?” विवेक ने कहा।

“इसमें पागलपन की क्या बात है? ठीक ही तो कह रहा हूँ। मेरी मानों तो तुम प्रपोज़ल एक्सेप्ट कर लो। तुम्हें फायदा होगा” विशाल ने बहुत शान्ति से कहा।

“दिमाग़ खराब हो गया है तुम्हारा, चलो उठो, घर जाना है मुझे” विवेक ने थोड़ा ज़ोर से कहा और उठकर खड़ा हो गया।

विशाल शान्त ही बैठा रहा फिर विवेक का हाथ पकड़कर बोला, “बैठो यार, सुनो! स्मृति मैडम गलत नहीं है। वह सच कह रही है। उसकी ज़रूरत को समझो। उसकी किस्मत ने उसके साथ मज़ाक किया है। उसकी शादी अभी आठ महीने पहले ही हुई थी। कोई फेसबुक फ्रेण्ड था, दिल्ली का रहने वाला। किसी मॉडलिंग कम्पनी में काम करता था। छह महीने तक फेसबुक पर बातचीत और प्यार चलता रहा, फिर दोनों ने शादी कर ली। लेकिन शादी वाली रात ही स्मृति को पता चला कि लड़का गे है और उसे औरतों में कोई इंट्रेस्ट नहीं। वह स्मृति को खुश नहीं रख सकता। बस फिर क्या था दो चार दिन बाद ही स्मृति ने उसे छोड़ दिया। कुछ समय बंगलौर में रही और अब यहाँ आ गयी है। अपने बॉस उसके सगे मामा हैं। समझे कुछ? उसकी ज़रूरत को समझो विवेक।”

“व्हाट...तो मैं क्या करूँ? क्या मैं ही मिला हूँ इस सबके लिए? उसे किस चीज़ की कमी है? बहुत मिल जाएँगे” विवेक ने चिढ़ते हुए कहा।

“हाँ...उसे बहुत मिल जाएँगे। लेकिन तुम्हारे जैसा ज़िम्मेदार, ईमानदार और सच्चा इंसान नहीं मिलेगा। ऊपर से तुम ज़रूरतमंद भी हो। सच पूछो तो भाभी को जाने के बाद क्या तुम्हें किसी के साथ की ज़रूरत महसूस नहीं होती?” विशाल ने पूछा।

“नहीं...” विवेक ने नज़रें विशाल से हटाते हुए कहा।

“झूठ मत बोलो...तुम्हारी मेडिकल रिपोर्ट पढ़ी है मैंने। तुम्हें किसी साथी की सख़्त ज़रूरत है। तुम्हारा शरीर अन्दर ही अन्दर घुल रहा है। सच कह रहा हूँ मैं...तुम्हें कोई बीमारी नहीं है, बस कुंठा है। शायद यौन कुंठा। स्मृति की तरह। जिसका निकलना बहुत जरूरी है, तुम दोनों के लिए ज़रूरी है...वरना तुम...” कहकर विशाल कुछ क्षण के लिए चुप हो गया।

“त...तुम...लेकिन यार...” हिचकते हुए विवेक ने कुछ कहना चाहा लेकिन विशाल फिर बोल उठा, “प्लीज़ यार! स्मृति कुछ गलत नहीं चाहती। बस अपना कुछ समय उसे दे दो। इसमें तुम दोनों की ही भलाई है। विवेक मेरी बात मानों यह मेडिकली प्रूव है कि हमारे शरीर की भी कुछ ज़रूरतें होती हैं जिनको न पूरा न करने पर ये ऐसी बीमारी का रूप ले लेती हैं जिनका इलाज केवल शरीर ही है, कोई दवा या ट्रीटमेंट नहीं।”

“इट्स नॉट पॉसिबल,” विवेक ने कहा।

“दैन मेक इस पॉसिबल...ट्राई टू अण्डरस्टैण्ड...अगर अपनी कुंठा के कारण उसने तुम्हें नौकरी से निकाल दिया या फिर किसी भी प्रकार का हैरासमेण्ट या किसी और बात का आरोप लगाकर बदनाम कर दिया फिर क्या करोगे? कहीं के नहीं रहोगे। फिर अपनी ईमानदारी और भलमनसाहत को लेकर बैठे रहना कोई भी तुम्हें नौकरी नहीं देका। मत भूलो कि इस ऑफिस में केवल तुम ऐसे हो जो स्मृति के केबिन में दिन में दस बार और उसके घर सप्ताह में चार बार जाते हो। वह पैसे वाली है, कुछ भी कर सकती है। ठण्डे दिमाग से सोचो” कहकर विवेक और विशाल दोनों अपने-अपने घर चल दिये।

रातभर विवेक को नींद नहीं आई। स्मृति की बातें, ग्यारह हजार का लिफाफा और ऐसी ही न जाने कितने लिफाफे उसकी आँखों के सामने आ रहे थे। इसके साथ ही विशाल की बातें भी उसके कानों में गूँज रही थीं। उसकी बातें अजीब ज़रूर थीं लेकिन सच थीं। विवेक फैसला नहीं ले पा रहा था। आज स्मृति ने जो कुछ कहा उसका साफ मतलब था कि ‘मेरी बात मानों नहीं तो अंजाम भुगतने को तैयार रहो’। विवेक इसी उधेड़-बुन में था कि उसकी चार साल की बेटी ने सोते-सोते अपने नन्हें पाँव विवेक की छाती पर रख दिए। विवेक ने उसकी ओर देखा और पाँव सीधे करके उसे अपने सीने से लगाकर ऐसे आँखें बन्द कर लीं जैसे उसे परमशान्ति का अनुभव हुआ हो।

अगली सुबह विवेक बहुत प्रसन्नता के साथ ऑफिस जाने को तैयारी कर रहा था कि रोज़ की तरह उसके मोबाइल पर स्मृति का मैसेज आया, ‘गुड मार्निंग...आई मिस यू।’ लेकिन रोज़ की तरह विवेक ने मैसेज डिलीट नहीं किया बल्कि उसका जवाब दिया, ‘गुड मार्निंग मैडम...सी यू इन ऑफिस।’ उसने रूपयों को पैकेट उठाया और बैग में रखकर ऑफिस की ओर चल दिया।

ऑफिस में अपनी कुर्सी पर बैठा ही था कि चपरासी ने सूचना दी कि मैडम बुला रह है। विशाल ने देखा कि आज वह मैडम के केबिन से बाहर निकला तो उसका चेहरा खिला हुआ था और उसके जाने के बाद चपरासी मेज़ की फाइलों का ढ़ेर हटा चुका था। पूछने पर पता चला कि ‘विवेक सर ने रिज़ाइन दे दिया है’।