मरीज़-ए-इश्क़ Lakshmi Narayan Panna द्वारा कविता में हिंदी पीडीएफ

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मरीज़-ए-इश्क़

मिजाजी शायरी

1

न बादशाह हूँ न शहंशाह, कि कोई फरियाद रक्खेगा ।

मगर तूफान हूँ ऐसा, ये जमाना याद रक्खेगा ।।

2

लड़ी है जंग दुनिया से जिसके लिए अब तक,

उसी ने आज मुझको अपना दुश्मन बना लिया ।

अकेला छोड़ देते हैं मुझे मुश्किल घड़ी में जो,

हमने भी दूर रहने का उनसे मन बना लिया ।।

3

क्यों उड़ाते हो मजाक मेरी सादगी का बार-बार,

जो कहते तपाक से बड़े मिलनसार हैं जनाब ।

यहाँ फुर्सत कहाँ किसी को मिलने की और से,

बस इतना समझ लीजै कि बेकार हैं जनाब ।।

4

मेरी तरक्की से जलने वालों आबाद हो जाओगे,

एक बार मेरी राह तो चुनो ।

बेजा परेशान होते हो मेरी मुस्कराहट से बार-बार,

कम से कम एक बार मेरी आह तो सुनो ।।

5

हम तो छप्पर में गुजर करके, महलों के शौक रखते हैं ।

हम लुटेरे नही हैं दरबदर के यारों, कि दिन-रात खौफ रखते हैं ।।

6

जमीं पर जब शहंशाह यह खुशी से खिलखिलाया था ।

असमां में सितारों संग चाँद तब मुस्कराया था ।।

7

मेरी तरक्की से ओ जलता है उसकी तबीयत खराब है ।

डूब कर पैमाने में अब ओ पीता शराब है ।

मेरी हस्ती मिटाने को ओ घर में बारूद बो रहा है,

कोई जा कर उसे कह दो कि ये आदत खराब है ।।

8

हम परिंदे हवाओं से बात करते हैं,

बादलों का सफर करके आसमां नाप लेते हैं ।

कोई पूछे अगर मुझसे तेरी औकात ही क्या है,

निंगाहें तेज हैं मेरी शिकारी और शिकार भांप लेते हैं ।।

9

हमें वो नीच कहते हैं जो उनकी सोंच नीची है,

हम उनको ऊँच कहते हैं हमारी सोंच ऊँची है ।

सुवर मल-मूत्र खायेगा उसकी आदत बनी है जो,

हंस मोती ही खाता है उसकी औकात ऐसी है ।।

10

मेरी हस्ती मिटाने की हसरत उन्हें है,

जिनसे अपना ही दामन सम्भलता नही।

उनसे कह दो कि हम एक तूफ़ान हैं,

गर उठे तो उड़ा कर ही ले जाएंगे ।।

11

फ़कीरों का न कोई घर न कोई आशियाँ होता ।

जमीं उनका बिछौना और चादर आसमां होता ।

12

न आदत है हारने की, न कोई शौक़ छीनने का ।

हम उल्फ़त के शहंशाह हैं, दिलों को जीत लेते हैं ।।

13

नबाबों के शहर से हूँ …, नबाबी मुझमें दिखती है ।

मैं उल्फत का शहंशाह हूँ, मोहब्बत मुझमें बसती है ।।

14

अब ओ कहते हैं आपका रसूख अच्छा है,

जो मुफ़लिसी में मुझको हक़ीर कहते थे ।

अपनी दौलत के तकब्बुर में बेचश्म हो गए थे,

मुझको सड़कों का नंगा फकीर कहते थे ।।

15

फ़सादी फ़साद के बीज बोते रहे,

बड़े दरख़्त भी अपनी शाख खोते रहे ।

मेरा घर फूकने की हसरत में बेशाख़ हो गए,

जलाकर खुद की खुद हस्ती वो रोते रहे, रोते रहे ।।

16

मोहब्बत की सजा हमने भी क्या खूब पाई है,

वफादारी भी मजबूरी की चादर ओढ़ आई है ।

आखिरी वक़्त उनकी आँख का आँसू नही भुला,

थाम जिसको पला बचपन ओ उंगली याद आई है ।।

17

मेरी हस्ती है कोई लकीर नही जिसे यूं ही मिटा दोगे,

हमने किस्मत को अपनी मेहनत से तराशा है

यूं ही पन्ना नही बनता है कोई राँह का पत्थर,

अंदाज-ए-बयाँ

1

वो सुनकर मेरी उल्फत की कहानी आंहें भरते हैं,

मोहब्बत करके देखेंगे तो शायद मर ही जायेंगे ।

मैंने तो सह लिया हर दर्द आंशू पी गया गम के,

देखकर सुर्ख आंखों में वो आंशू डर ही जायेंगे ।।

2

मैं शायर हूँ अपनी नाकामियों को शेर कहता हूँ ।

मुक़म्मल इश्क़ किसका है कोई इतना बताए तो ।।

3

हर घड़ी खुशी-खुशी जिया करो,

घोलकर शराब में गम मत पिया करो ।

बड़ा मुश्किल है यारों सफर जिंदगी का,

कभी मुश्किल में भी हंस लिया करो ।।

4

उसके रसूख पर कोई एहतिमाल करे कैसे,

जो फ़राखदिल न सही मगर उसकी लहर है ।

फ़ख्त बदनाम कर रक्खा है बीड़ी शराब को,

दरअसल ……चाय में, भी होता ज़हर है ।।

5

मजहबी आग में जलता हुआ शहर देखा है,

हमने इन्शान पर इन्शान का कहर देखा है ।

सियासत घुल के जहन में बिगाड़ देती है मिजाज सबका,

हमने अपनों को अपनों को देते ज़हर देखा है ।।

6

मेरा घर फ़ूकने की हसरत तो उन्हें है,

मगर उनका भी छप्पर मेरे पड़ोस में है ।।

7

खड़ी करते पत्थरों से वो अपने मन की दीवारें,

मजहबी आग जो बोते उनकी औकात ही क्या है ।

बांटते हैं जो इंशानों को नशलों में हैं वो जाहिल,

अगर इन्शान नही हैं वो तो उनकी जात ही क्या है ।।

8

कौन है ? जो कहता है इश्क़ नही किया उसने ।

बुजदिल हैं वो लोग जो उल्फत छुपाया करते हैं ।।

9

वक़्त ने बाँध रक्खी हैं मेरे पैरों में बेडिंयाँ ।

वरना दोस्तों से हम कभी भी दूर न होते ।।

10

धर्म उसका हो कोई भी, उसमें इन्शान होना चाहिए ।

ओ खुद को जिंदा समझता है तो, ईमान होना चाहिए ।।

11

जब से सफेद मुर्गा तरकारी हो गया ।

यारों तब से ही मैं शाकाहारी हो गया ।।

12

कौन कहता है अंडे खाने वाला मांसाहारी है,

अंडे की जर्दी में होता है प्रोटीन ।

बेवजह बदनाम कर रक्खा है शाकाहारियों को,

तभी तो प्लास्टिक का अंडा बना रहा है चीन ।।

13

अब तो फूलगोभी चावल प्लास्टिक का ही है बीन,

पॉलीमर के अनुप्रयोग पर ध्यान दे रहा चीन ।

प्राकृतिक औषधी दवाई भूल रहे सब दीन,

लेकिन बाबा बड़ा सयाना पिला रहा यूरिन ।।

14

कुछ लोग जहर बोते हैं कुछ व्यापार करते हैं,

हम तो इन्शान हैं जिंदा इन्शानियत से प्यार करते हैं ।

कज़ाक हुक्मरानों से कहा दो की हम गुलाम नही हैं,

हम हर बार नई सरकार पर विचार करते हैं ।।

15

हम तो कहते हैं पास बैठो, दो निवाले साथ खाएंगे,

ओ कब्जेदार हैं, हिस्सेदारी कहाँ देंगे ।

उनकी आदत है तिजोरियां लूटने की, भरोसा कहाँ है,

हम ईमानदार हैं, जिम्मेदारी कहाँ देंगे ।।

16

मन्दिर बना लो या बना लो शिवाले,

चाहे पत्थर की मूरत में ठूंसों निवाले ।

मगर बेटियों का बहुत ख्याल रखना,

देखना वो न मन्दिर न जाएं शिवाले ।।

17

सब्जियों के भाव पर मंहगाई को रोने वालों,

पहले घूसखोरों के मालामाल हाथ देख लो

हर मोड़ पे जिनको नोंचने बैठे हैं भेड़िये,

सबसे पहले किसानों के हालात देख लो ।।

18

यूं ही झूठ बोलने से कोई महान नही होता,

हर इन्शान दिखने वाला इन्शान नही होता

शहर की हर गली में होते हैं शमसान यारों,

महज शमशान ही शमसान नही होता ।।

19

उसको मेरी हुकूमत से तकलीफ है,

क्योंकि उल्टी कहानी शुरू हो गई

सिर झुकाने में उसको सरम रही,

अब जो हरिया की बेटी गुरू हो गई ।।

20

इश्क़ जीने का सलीका जिंदगी एक दर्द है

गर दीवाना दिल नही तो आदमी खुदगर्ज है ।।

21

किसी ने नींद चुराई होगी, और बाजार में बेचा होगा

क्योंकि अब दर्द घर में, नींद बाजारों में बिका करती है।।

22

मुस्करा के नजरों से तीर चलती रही

हम उसके वार को मोहब्बत समझ बैठे ।।

23

महबूब की आरजू पे अपनी जान दे बैठे

मगर अफ़सोस कि मुर्दों से को कोई प्यार नही करता ।।

***

मेरी उल्फ़त

1

उसके होंठों की पैबशती के खयालात बाकी हैं,

मेरे दिल पर उसकी धड़कन के निशानात बाकी हैं ।

बहालात अपने वादे की मुलाकातें बाकी हैं,

कई उसके तो कई मेरे भी सवालात बाकी हैं ।।

2

उनको मिलने की हमसे हसरत तो बड़ी थी ।

ओ छोड़ कैसे देती जो सामने दौलत पड़ी थी ।।

3

ओ रोज दिल की घण्टी बजाकर चली जाती थी,

एक रोज बाँह पकड़ लिया ।

पूछ डाली तबीयत चूमकर होंठ उसके,

जो कसके बाँहों में जकड़ लिया ।।

4

उनके रुख़सारों पे ख़ुश्की नजर आने लगी है अब तो ।

क्योंकि सरकार ने मेकप पे जी एस टी लगाई है ।।

5

मोहब्बत चीज ऐसी है दीवाना कर ही देती है ।

इश्क़ की आग यारों को बेगाना कर ही देती है ।।

6

चलो अच्छा हुआ याद करना भी छोड़ दिया उसने ।

रोज-रोज की हिचकियों से छुटकारा तो मिल गया ।।

7

हमने तो कई बार इनकार किया मगर ओ प्यार करती रही ।

हम दूर जाते रहे उससे मगर ओ इंतजार करती रही ।।

8

अजीब नफरत है उसके दामन को मेरे दामन से,

जो करीब होकर भी मेरे पास ओ आती नही ।

जख़्मी दिल कर भी देती ओ तो कबूल था मुझे ,

दगा देकर भी जो दूर ओ जाती नही ।।

9

जिन्हें जिंदगी समझता था ओ ख्वाब हो गए,

कहीं दूर असमां के ओ आफताब हो गए ।

अब भी जिंदा समझते हैं कुछ लोग मुझको,

दरअसल यहाँ मुर्दों के शहर आबाद हो गए ।।

10

मुझे ओ भूल जाये फिर भी इतना याद रक्खेगी,

उसके होंठों की तलब फिर से एक फरियाद रक्खेगी ।

मेरे दिल ने उसके दिल से ये वादा ले लिया था जो,

मैं उसको याद रक्खूँगा ओ मुझको याद रक्खेगी ।।

11

वक्त जो छीन ले मुझसे मोहब्बत हो नही सकता,

जिसे दिल में छुपाया है उसे मैं खो नही सकता ।।

उसे लगता है वादे की वो कसमें तोड़ दीं मैंने,

भुला दूँ उसकी उल्फत को नही ये हो नह सकता ।।

12

उम्र भर मुझको यूं ही चाहना आसान नही था,

तेरी राहों की मुश्किलों से मैं अन्जान नही था ।

मेहमां हूँ तेरे दिल में आता जाता रहूँगा,

मैं जानता हूँ तेरे दिल में मेरा मकान नही था ।।

13

कोई इल्जाम न दे उसमें मोहब्बत अब भी बाकी है,

ओ मुझको भूलने की जिद में मुझको याद करती है ।

ओ मुझसे बात करने को अगर राजी नही तो क्या,

ओ ख्वाबों में मेरे दिल से सदा फरियाद करती है ।।

14

जो पहले सोचकर डरता था कहीं बदनाम न हो जाऊं मैं ।

मगर अब डर ये लगता है कहीं गुमनाम न हो जाऊं मैं ।।

15

पता पूछा नही उससे जो मेरे दिल में रहती थी,

मैं उसको जान कहता था ओ मुझको जान कहती थी ।

16

अंधेरे में चिरागों की न कोई जुस्तजू होती,......

नज़ाकत उसकी काफी थी अगर क़ुरबत मेरे होती ।।

17

मयस्सर तू मेरे क़ुरबत निकलकर ख्वाब से आई …।

तसब्बुर ही सही मेरा जो तेरी रुनमाई है …।।

18

इल्तज़ा है बहारों से, उसको पैग़ाम दे देना …।

कोई प्यासा न मर जाये, चली आए घटा बनकर …।।

19

आईना देखती होगी ओ मेरा दीदार करने को ।

जो मेरे अक्स को उसने निंगाहों में बसाया है ।।

20

मेरी खामोशियों से बात करके जो छेड़ते हैं,

ओ कहते हैं तुझमें मोहब्बत अब बाकी नही है ।

कैसे कहूँ उनसे कि तलब जिंदा अभी भी है,

काटते हैं मुझे पैमाने जो अब ओ साकी नही है ।।

21

वही जाने किसी का दर्द जिसने दर्द पाया है,

मगर वह खुश बहुत होगी जो ऐसा मर्द पाया है ।

22

ऐसी आवाज मैं दूँगा तुझे तड़पा ही जाएगी,

दौड़कर तू मेरे क़ुरबत मयस्सर आ ही जाएगी ।

मैं शायर भी नही था, शायरी मालूम न थी,

दर्द बनकर ग़ज़ल निकली तुझे समझा ही जाएगी ।।

23

अभी-अभी तो डूबा हूँ उसकी उल्फत में,

मुझको कोई आवाज न दो ।

टूटकर घुंघुरूओं सा बिखर जाऊंगा,

वादकों अपनी वीणा पे साज न दो ।।

24

मैं तो मौसम हूँ पल में बदल जाता हूँ,

तू कली है बहारों में खिल जाती है ।

मोम से है बनी मेरे दिल की जमीं,

तेरे छूने से ही वो पिघल जाती है ।।

25

कुछ देर ठहरती तो बात हो जाती,

मौसम बदलते ही बरसात हो जाती ।

मैं तो निकल ही पड़ा था तेरी तलाश में ।

तू आशियां न बदलती तो मुलाकात हो जाती ।।

26

तू हक़ीक़त में मयस्सर हो, हंसी रात हो जाये ।

मुसलसल अगर हो रात, तो कोई बात हो जाये ।।

27

उसने अब तक तो तोहमत लगाई नही

कुछ तो कह दद ओ खामोशियाँ तोड़कर ।

ओ अगर मुझसे कह दे गुनहगार हो,

मैं चला जाऊंगा ये जहाँ छोड़कर ..।।

28

आफरीन……! बस इतना ही निकलता है उसको देखकर,

क्यों…? क्या मोहब्बत हुई है मुझको…।

आवाज तो भीतर से है ! कौन है…? जिसे जुस्तजू है उसकी,

उसने तो दिल से निकल दिया था मुझे …!!

29

मैं कहूँगा नही माफ़ कर दे मुझे,

गर ख़ता है मेरी तो सजा देने दो ।

बुझ तो जाऊंगा अपने ही अश्कों से मैं,

ओ जलाती है तो खुलकर जला लेने दो ।

***

ओ अगर खुश है मुझको भुला करके भी,

रोज तकियों के अस्तर भिगोती है क्यों …?

भूल जाती वो उल्फ़त के किस्से सभी …,

फिर अकेले में छुप छुप के रोती है क्यों …??

***

ओ ग़ज़ल बनके मुझमें अमर हो गई,

उसकी हसरत में मैं जन्म लेता रहा ।

क्या ख़ता है जो इतनी.. है नाराजगी ,

ओ बिखरती गई मैं…पिरोता रहा...।।

30

इतना बेखुद नही हूँ कि अपना बयान भूल जाऊं,

इंसानियत मरी नही है मुझमें कि इन्शान भूल जाऊं ।

भूल कर भी उसे भूलने की भूल नही कर सकता,

इतना बेबस भी नही हूँ कि अपनी जान भूल जाऊं ।।

31

उनके रुख़सारों पे ख़ुश्की नजर आने लगी है अब तो,

क्योंकि सरकार ने मेकप पे जी एस टी लगाई है ।।

32

मैं तेरे लिए ही तो लफ़्ज़ों से ग़ज़ल तराशता हूँ,

तू है कि नाराजगी से नजाकत छुपाए बैठी है ।

उन्हें फेंक दे या जला दे, खुद को तो न जला ऐसे,

क्यों …! मेरे ख़त के टुकड़े तू मुट्ठी में दबाए बैठी है ।।

33

इस रंग बदलती दुनिया में मेरी अपना पहचान कहाँ,

गिरगिट खुद को इन्शान कहे तो मैं ऐसा इन्शान कहाँ ।

खाली कर दूं उसके दिल को, उससे नाता तोड़ चलूँ,

मैं भी तोडूं वादे, कसमें, मैं इतना भी बेईमान कहाँ ।।

34

ऐसी आवाज मैं दूँगा तुझे तड़पा ही जाएगी,

दौड़कर तू मेरे क़ुर्बत मयस्सर आ ही जाएगी ।

मैं शायर भी नही था…शायरी मालूम न थी,

दर्द बनकर ग़ज़ल निकली तुझे समझा ही जाएगी ।।

35

हमने दिलों बनाये जो घर हैं ……,

दोनों तरफ से इशारा तो होगा …।

जिस्म की जिस्म से कोई हसरत अगर है,

रूह ने रूह को तब पुकारा तो होगा ।।

36

पास रहकर जो नजरें चुराता न मैं,

दूर जाके ओ मुझको रुलाती नही ।

मान लेता जो दिल की वो बातें कभी,

रूह ख्वाबों में आकर सताती नही ।।

37

माना हूँ पत्थरदिल मगर बेजान नही हूँ,

तेरे शहर की मस्तियों से अनजान नही हूँ ।

वो अदा तेरी अदा में शामिल भी है तो क्या,

मैं भी फंस जाऊं…! तेरे जाल में नादान नही हूँ ।।

38

ओ बेवफा हरगिज न थी, कि वादे से मुकर जाए ।

मुझको भूल जाने की वजह कुछ और ही होगी ।।

39

तसब्बुर ही नही, अपना वादा था यह,

दिल से दिल में उतरना न छोड़ेंगे हम ।

जिस्म से जान रुखसत भी होगी नही,

बिन कहे उससे मुँह कैसे मोड़ेंगे हम ।।

40

यूँ तो पत्थर था ठोकरें खाईं, मगर टूटा नही मैं ।

बस एक उसकी बेरुखी से बिखरता चला गया ।।

41

मेरे वादे पे यक़ीन रखना, बेवफ़ा न समझ लेना मुझको ।

बाद-ए-रुखसत भी हवा में घुल के तेरे पास आऊँगा ।।

42

मैं तो ख़्वाबों में उसके लिए महल तराशता रहा,

उसने मुर्दा समझकर भुला दिया मुझको ।

ओ मेरी जान थी रुख़सत कहाँ हुई थी दिल से,

उसने ही तो जिंदा जला दिया दिल को ।।

43

वक़्त-ए-रुख़सत हम बहुत याद आएंगे ।

दोस्त मत समझ लेना मुझे, दुश्मन हैं बहुत तड़पायेंगे ।।

44

मुझे गर भूलना ही था तो फिर क्यों याद आती है ।

चली जाती मेरे दिल से बहाना करके कोई भी ।।

45

मुन्तज़िर था चाँद निकले और आँखें चार हो जाएं ।

बहारें हो गवाही और उल्फ़त--इज़हार हो जाएं ।।

46

उसकी यादों के पैमाने पिये जा रहा हूँ ।

धीरे धीरे ही सही जिंदगी जिये जा रहा हूँ ।।

47

रूठ करके ओ मुझसे बिछड़ जो गई ।

ख़्वाब बनकर ओ मेरे करीब आ गई ।।

48

तड़प करके मोहब्बत भी कहीं दुश्मन न बन जाए ।

चली आना अगर तुझको कभी फुर्सत जो मिल जाए ।।

49

ये उल्फत का नशा है या जुनून-ए-इश्क़ है ।

ओ दवाखाना लगी और हम मरीज़-ए-इश्क़ हैं ।।

50

जीते मुल्क जमीन जीती तो क्या जीता ।

जो जीते दिल हकीकत में वही जीता ।।

51

बाद-ए-रुख्शत मेरे यारों उसे पैगाम दे देना,

दीवाना मरते दम तक बस यही फरियाद करता था ।

तेरे वादे पे यकीन था उसे तो दरियाफ़्त क्या करता,

याद तू कर रही होगी सोंचकर याद करता था ।।

52

चाँद सा हो मेरा महबूब दुआ क़बूल हो गई ।

अरे क्या हो गया मुझसे बड़ी ये भूल हो गई ।।

53

मोम का दिल अगर मेरा तो फौलादी इरादे हैं ।

मोहब्बत के शहर के हम दीवाने शहजादे हैं ।।

54

मेरे महबूब की गली में दीवाने कई होंगे ।

यक़ीनन उस शहर में आज भी मैख़ाने कई होंगे ।।

शम्मा जल रही होगी उसके बदन में जो ।

यक़ीनन उस शहर में अब भी परवाने कई होंगे ।।

55

मेरा महबूब शातिर, उसकी निंगाहें कातिलाना ।

मार डालेगी अदा से, उसके कूचे में न जाना ।।

56

बहारों इस दीवाने पर अगर थोड़ा रहम खाओ ।

मेरे महबूब के दिल मे सोये अरमां जग जाओ ।।

57

जख़्म दिल पर अभी भी हैं फिर से मरहम लगा जाओ ।

तसब्बुर में जिऊँ कब तक आके मुझको जगा जाओ ।।

58

दिल में तूफान है मेरे ओ घर बनाएगी कैसे ?

रूठना आदत नही मेरी ओ मनाएगी कैसे ?

रूठ जाती है ओ कि दिवाना तड़पकर आएगा ।

तड़पकर मर ही जाऊंगा तो मिल पाएगी कैसे ?

59

ओ तन्हा हुस्न का प्याला शराबी तलाशता होगा

कि छलकते हुस्न को होंठों से लगा ले कोई

60

तू नशीला हुस्न है तो मैं शुरूर-ए-इश्क़ हूँ ।

है अदा कातिल तेरी तो मैं जुनून-ए-इश्क़ हूँ ।।

61

अदा कातिल तेरी आशिक कई कुर्बान हो गए ।

सजा-ए-इश्क़ हैं हम भी अगर बेईमान हो गए ।।

62

उसे मैं भूल तो जाता मगर ऐहसास बाकी है ।

हमारे दरमियां कुछ खास बाकी है ।।

उसके बदन को छूकर आती हैं जो हवाएं ।

घुल करके मुझमें आज भी साँस बाकी है ।।

63

मुझसे नफ़रत भी ये तेरी मोहब्बत की निशानी है,

हमारे दरमियां फिर भी खड़ी दीवार है नफ़रत ।।

तेरी नफ़रत बयाँ करती है तेरी दीवानगी की हद,

हमारे बीच जो बाकी रही वह ड़ोर है नफरत ।।

64

कदम तुमने बढ़ाये और हम भी तो करीब आए,

फ़ासले खत्म ही तो थे अगर तुम रूठ न जाती ।

हम उल्फ़त के आसमां में पतंगों की तरह उड़ते,

अगर कमजोर धागे की तरह तुम टूट न जाती ।।

65

उल्फ़त के शहंशाहों में मुझको सुमार होने दो,

शुरूर-ए-इश्क़ है उसको अभी खुमार होने दो ।

तड़पकर आ ही जाएगी हक़ीम-ए-दिल हुँ मैं,

पहले पूरी तरह से उसको भी बीमार होने दो ।।

66

मेरे दिल में किरायेदार थी, उसका जाना नशीब था ।

कोई रिश्ता जरूर था उससे, जो इतना करीब था ।।

67

हाई हील के सैंडिल पहिने जब चले मटक के

आशिक सारे मर जाते हैं भइया लटक लटक के ।।

68

तुझे जाना है तो शौक से जा, मेरा दिल छोड़ के

मैं किसी और को बसा लूँगा दिल में ताला तोड़ के ।।

69

तेरी तलब ने ही तो मुझको शायर बनाया है,

वरना मुफ़लिसी ने मुझको कायर बना दिया होता

तेरे इश्क़ के बदौलत शोहरत कमा रहा हूँ

वरना ठोकरों ने मुझको घायल बना दिया होता ।।

70

अभी जिंदा हूँ कि उसकी तलब जिंदा है,

तलब जब भी खत्म होगी शहंशाह ख़ाक में होगा ।।

71

मेरी हस्ती तुम्हारी करजदार है, दिल अभी भी तुम्हारा तलाबदर है

यूं तो महफ़िल में मेरी बहुत भीड़ है, फिर भी तन्हा तुम्हारा ये सरदार है।।

***