तुनक मिजाजी Lakshmi Narayan Panna द्वारा मनोविज्ञान में हिंदी पीडीएफ

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तुनक मिजाजी

तुनक-मिजाजी

( A Mental Sickness )

तुनक मिजाजी एक ऐसा भाव है जो हमको अक्सर ही कहीं न कहीं किसी न किसी व्यक्ति में देखने को मिल ही जाता है । यह जरूरी नही कि जो व्यक्ति किसी को तुनक मिजाजी समझता है स्वयं तुनक मिजाजी नही है । यह एक ऐसा मनोवैज्ञानिक भाव है जो लगभग सभी में कुछ न कुछ हद तक होता ही है, मात्र संयोग कुछ अतिबुद्धिमान व्यक्ति ही इस मनोदशा के शिकार नही होते या वे लोग नही होते जिनमे सोंचने समझने की क्षमता बहुत ही कम होती है ।

इस मनोदशा से पीड़ित व्यक्ति को सदैव ऐसा लगता है कि जो वे सोंचते हैं वह ही सही है । जब तक सामने वाला व्यक्ति उनकी बात को स्वीकार न कर ले उनको ऐसा लगता है कि सामने वाला व्यक्ति या तो मूर्ख है या तुनक मिजाजी या फिर उनका विरोध कर रहा है ।

यह भी जरूरी नही की प्रत्येक तुनक मिजाजी व्यक्ति गलत निर्णय ही लेता है ।निर्णय सही है या गलत यह बात व्यक्तिगत ज्ञान पर निर्भर करती है । कभी कोई ऐसा व्यक्ति जो हमेशा सोंच समझकर पूर्ण विवेक का उपयोग करते हुए सही निर्णय लेता है या कोई सही बात किसी को समझना चाहता है और लोग उसकी बात को स्वीकार करने के बजाय उसकी खिल्ली उड़ा देते हैं । तब उस व्यक्ति का तुनक जाना स्वाभाविक है ।

इसके अतिरिक्त कभी-कभी कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो भली-भाँति यह जानते हैं कि उनका निर्णय या उनकी बात गलत है फिर भी अपनी तुनक मिजाजी चाल के द्वारा अपने को सही साबित करना चाहते हैं । सामान्यतः ऐसे लोग अपनी बात मनवाकर ही दम लेते हैं ।

तुनक मिजाजी एक मानसिक व्याधि है जो कुछ लोगों में hypertension(अति-तनाव) तथा कुछ लोगों में praudiness(घमण्ड) का कारण बन जाती है । सामान्यतः यह स्थिति स्वयं के जीवन के लिए अधिक हानिकारक नही होती है, इसलिए लोग इस पर ध्यान नही देते हैं । परंतु इस दोष का प्रभाव किसी व्यक्ति में अधिक होने पर वह अपने परिवेश पर बहुत बुरा प्रभाव डालता है ।

अधिकतर परिवार इसी तुनक मिजाजी के कारण पारिवारिक कलह का सामना करने को मजबूर हो जाते हैं । जीवन के लिए अधिक खतरनाक न होने के कारण कोई भी व्यक्ति इस मानसिक स्थिति का इलाज भी नहीं करवाता है । इस दोष के कारण जब भी किसी परिवार में कलह उत्पन्न होती है तो बड़े बुजुर्ग एक पुरानी कहावत को पेश करके मामले को टाल देते हैं ।

“जहाँ चार बर्तन होंगें तो खनकेंगें जरूर “

इस प्रकार सनै सनै वह आपसी झगड़ा कुछ समय के लिए या कुछ दिनों के लिए शांत हो भी जाता है । तुनक मिजाजी एक ऐसी मानसिक दशा है जिसे हल्के में लेने वाला नही है, जो कलह कुछ समय के लिए शांत हो जाती है वह पुनः किसी दिन बड़ा आकार लेकर फिर सामने आ खड़ी होती है ।

यह दोष भले ही व्यक्तिगत स्वास्थ्य के लिए अधिक हानिकारक न हो परन्तु समाज और परिवार के लिए अति हानिकारक होता है । इसलिए समय पर इसका इलाज़ होना बहुत आवश्यक है । बहुत सारे सामाजिक अपराध तुनक मिजाजी का ही परिणाम हैं । आज जो मै इस दशा का वर्णन कर रहा हूँ तो यह सत्य है कि मै भी इस दशा का शिकार रहा हूँ । इसका इलाज व्यक्ति स्वयं ही कर सकता है । यदि हम मान लें कि आखिर क्यों कोई व्यक्ति हमारी बात को स्वीकार कर ले ? भले ही हम अपनी जगह बिलकुल सही हैं । क्योंकि हर व्यक्ति के अपने स्वतंत्र विचार होते हैं । हर कोई अपने विवेक से निर्णय करता है । अतः मैं अपने विचार किसी पर क्यों थोपूं ?

हमें अपना विचार लोगों के समक्ष सिर्फ प्रस्तुत करना चाहिए । कोई हमारे विचारों को स्वीकार करे या न करे यह उस पर निर्भर करता है । हमे तो अपना कर्तव्य करना चाहिए । क्योंकि सन्त कबीर जी ने बताया है कि …”बुरा जो देखन मैं गया बुरा न मिलया कोय ।

जो तन झाँका आपने मुझसे बुरा न कोय ।।“

इस प्रकार हमें तकलीफ नही होगी साथ ही साथ सामने वाला व्यक्ति तुनकेगा भी नही । यह तो अपने – आप को इस मनोदशा से मुक्त करने की एक स्व-उपचार विधि है ।

परन्तु यह बात समझाकर भी हम किसी व्यक्ति को इस मनोदशा से छुटकारा नही दिला सकते बल्कि ऐसा करके हम अगले व्यक्ति को और नाराज कर देंगें । फलस्वरूप वह और भी तुनक जायेगा क्योंकि एक पुरानी कहावत है कि ….

“ काने को काना कहोगे तो वह और भड़केगा “

इस दोष से पीड़ित किसी अन्य व्यक्ति का उपचार करने के लिए कुछ खास उपायों का उपयोग करना होता है, साथ ही उपचारकर्ता को बहुत ही धैर्य रखने की आवस्यकता पड़ती है । यह भी सुनिश्चत करना आवश्यक होता है कि क्या वाकई वह व्यक्ति तुनक मिजाजी है या नही ?

अगर व्यक्ति तुनक मिजाजी है । तो, क्या उसकी बात जायज है या नही ?

यह सब जानने के लिए हमें बड़ी सावधानी पूर्वक व्यक्ति की बातों और निर्णयों पर ध्यान देना होगा । एक व्यक्ति जो अपनी जगह सही है, उसका निर्णय सही है । परंतु उसकी बात को स्वीकार नही किया जा रहा है तो स्वाभाविक ही वह तुनक मिजाज हो जायेगा । ऐसे में यदि कोई उसकी बात को पूर्ण सहमति प्रदान करते हुए समझाने का प्रयास करे की आप सही हैं । परंतु यदि कोई आपकी बात को नही मानता तो क्या ? आपने अपना कार्य तो किया और जो आज आपकी बात नही मान रहा, वह स्वयं एक दिन पश्चाताप करने के लिए विवश होगा । इस प्रकार धीरे धीरे व्यक्ति अवश्य स्वीकार कर लेगा कि किसी को अधिक समझाने की आवस्यकता नही है और न ही सही मार्ग दिखाने की ।

अगर कोई व्यक्ति अपने गलत निर्णयों को मनवाने के लिए अक्सर ही तुनक मिजाजी का सहारा लेता है, तो इसके लिए जरूरी है कि उस व्यक्ति का विरोध तुरन्त न किया जाए । व्यक्ति की बात को उसके सामने स्वीकार करने के बाद उचित निर्णय लिया जाए और उस व्यक्ति से छिपाकर, तो धीरे – धीरे वह स्वयं समझ जायेगा कि उसकी तुनक मिजाजी अब चलने वाली नही है । जब व्यक्ति की बात को मानकर अनसुना कर दिया जायेगा तो वह स्वयं धीरे धीरे अपने व्यवहार में परिवर्तन करेगा ।

यह दोष स्वभाव में अचानक नही आता है । तुनक मिजाजी बाल्यकाल से ही धीरे - धीरे करके व्यक्तिगत स्वभाव का एक हिस्सा बन जाता है । बुद्धिमान बालकों में यह दोष इस प्रकार आता है कि जब परिवार या परिवेश के लोग उसकी बातों को महज बच्चे की बातें मानकर नकार देते हैं और बाद में उसकी बात सही साबित होने पर भी कुछ खास तबज्जो नही देते हैं ।

इसके अलावा अन्य लोगों में यह दोष परिवार और परिवेश के लोगों के अति-लाड प्यार के कारण आता है । अक्सर ही कुछ परिवारों में बच्चों की हर जायज या नाजायज जिद्द को मान लिया जाता है । उनकी किसी भी बात को अस्वीकार नही किया जाता, न ही उन्हें उनकी गैर जायज जिद्द के लिए समझाया जाता है । धीरे धीरे बाल-स्वभाव की जिद्द तुनक मिजाजी के रूप में व्यक्ति का विशेष गुण बन जाती है ।

आजकल के व्यस्त जीवन में हर कोई मशीन हो गया है । जो कार्य करने वाले हैं, सही निर्णय लेने वाले हैं उनके पास समय कम है । अन्य लोग अपना समय मौज मस्ती में बिता रहे हैं । किसी के पास समय नही है कि वे अपने बच्चों का सही मार्ग दर्शन करें । वे तो स्वयं छोटी छोटी बातों को लेकर तुनक जाते हैं ।

एक समय था जब कुछ विचारकों ने यह कहा था कि यदि एक परुष शिक्षित होगा तो वह स्वयं शिक्षित होगा परन्तु यदि एक स्त्री शिक्षित होगी तो एक परिवार शिक्षित होगा ।

पहले मैं भी इस विचार से सहमत था परंतु अब मुझे भी इस विचार की मंशा पूर्ण होते नही दिख रही है । आज जब महिलाओं का शैक्षिक स्तर मजबूत हुआ है, तो परिवार से संस्कार चलते बन रहे हैं । बच्चे बड़ों का आदर सम्मान करना छोड़ रहे हैं । उन पर पाश्चात्य सभ्यता का असर इस कदर हावी हो रहा है कि वे दिखावे की जिंदगी जीने लगे हैं । वास्तविकता उनसे कोसों दूर होती जा रही है । अक्सर ही कुछ बच्चे स्वदेशी वस्तुवों से घृणा करते हुए दिख जाते हैं ।

उपरोक्त विचार की असफलता का क्या कारण हो सकता है ?

जहाँ तक मेरा मत है कि आज के समय में जो महिलाएं शिक्षित हो रही हैं, आत्मनिर्भर होने के लिए स्वयं नौकरी करती हैं, साथ ही साथ अपना जीवन साथी भी नौकरीपेशा या व्यवसायी ही चुनती हैं । अधिकतर लोगों में यह धारणा भी बनती जा रही है कि जब पति पत्नि दोनों नौकरीपेशा होंगें तो परिवार की आर्थिक स्थिति अच्छी होगी । ऐसे में परिवार का भरण पोषण अच्छे से होगा और पारिवारिक कलह भी नही होगी । परन्तु क्या आपको ऐसा नही लगता कि आपके नन्हे मुन्नों के लिए न तो माँ के पास समय है न ही पिता के पास । और तो और ये लोग एकल परिवार में ही रहना पसंद करते हैं । बड़े बुजुर्गों की देखभाल के लिए या तो नौकर लगा देते हैं या फिर उन्हें बृद्धाश्रम में रखते हैं ।

बच्चों की देखभाल सामान्यतः पेड दाई करती है । जिसका काम होता है बच्चों के खाने पीने का ध्यान रखना । वह तो नौकर है अपने संस्कार भी तो नही सीखा सकती अगर ओ ऐसा करे भी तो फिर छोटा मुँह बड़ी बात वाली कहावत चरितार्थ होगी ।

ऐसे में बच्चों को संस्कार कौन दे ?

कौन है जो उनके जीवन को दिशा दिखा सकता है ?

परिवार रहा नही, दादा – दादी, नाना – नानी, गाँव – मोहल्ले के बड़े - बुजुर्ग सब तो विकास की दौड़ में कहीं खो गए हैं ।

न जाने कैसा होगा आने वाला समय ?

पहले के समय में जब मनुष्य कृषि पर निर्भर था तब पुरुषों के साथ – साथ स्त्रियां और बच्चे भी घरेलू और कृषि कार्यों में सहयोग करते थे । काम के साथ – साथ वे एक – दूसरे की समस्याओं, सुख – दुख को सुनते थे और सलाह मशविरा भी साझा करते थे । बच्चे बड़ों को देख – सुनकर अनुक्रिया करते थे और अपने से बड़ों के व्यवहारों को अपने जीवन में शामिल करते थे । इसके अलावा यदि कोई बच्चा किसी प्रकार का गलत व्यवहार करता था तो बड़े – बुजुर्ग उसे समझाते थें, क्योंकि उनके पास पर्याप्त समय और अधिकार था ।

अब जब लोगों के पास इतना भी समय नही है कि वे खुद के बारे में सही निर्णय लें सकें तो वे आने वाली पीढ़ी को क्या संस्कार दे पाएंगें ? वास्तव में लोग पढ़ – लिखकर नौकरीपेशा तो हो गए हैं परंतु सद्गुणों और सुसंस्कारों से अनभिज्ञ रह जा रहे हैं । संस्कारों की कमी नई पीढ़ी में बढ़ती जा रही तुनक – मिजाजी का कारण है ।

मेरे विचार से नई पीढ़ी को तुनक – मिजाजी नाम की भयानक स्थिति से बचाने के लिए उनमें सद्गुणों और सुसंस्कारों का विकसित होना उतना ही जरूरी है जितना की आजकल प्रतियोगी परीक्षा पास करने के लिए गणित, विज्ञान और रीजनिंग है ।