आहुती किसकी Ved Prakash Tyagi द्वारा लघुकथा में हिंदी पीडीएफ

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आहुती किसकी

आहुती किसकी?

फरवरी के आखिरी सप्ताह में हल्का सा सर्द मौसम, पेड़ों की नई कोंपलें निकल आई थी। विश्वविद्यालय में टेसू के पेड बहुत थे, सभी पेड़ नारंगी फूलों से लदे थे जो स्वयं में मनमोहक लग रहे थे। टेसू के फूलों की सुगंध से तो विश्वविद्यालय के बाहर का वातावरण भी महक रहा था।

विद्यार्थी पाँच-पाँच, छः-छः को टोली में बैठे अलग-अलग विषयों पर बातें कर रहे थे। प्रत्येक टोली में लड़के और लड़कियां मिल कर आने वाली परीक्षा की तैयारी भी कर रहे थे।

समाज शास्त्र के विद्यार्थियों की टोली आपस में कुछ इस तरह बतिया रहे थे........

“अच्छा यह बता तेरा नाम आहुति क्यों रखा, तुझे पता भी है आहुति का अर्थ क्या होता है?” विवान ने आहुति को चिढ़ाने के लिए यह प्रश्न पूछा था, उसके इस प्रश्न को सुनकर धैर्य, शिवा, रुद्र और निशा ज़ोर से हंस पड़े लेकिन आहुति बड़े ही सहज भाव से बोली, “चल पहले चौखम्बा पर चल कर सबको विशाल के दो दो समौसे खिला, एक एक कॉफी पिला फिर मैं तुझे विस्तार से सारी कहानी बताऊँगी।”

सभी ने आहुति की हाँ में हाँ मिलाई और विवान को घसीटते हुए चौखम्बा की तरफ लेकर चल दिये। कमला नगर में चौखम्बा पर विशाल के समौसे बहुत प्रसिद्ध थे, हमेशा उसके यहाँ खाने वालों और पैक करवा कर ले जाने वालों की भीड़ लगी रहती थी, कभी कभी तो घंटों प्रतीक्षा करने के बाद ही नंबर आता था।

खा पीकर चारों लड़के और दोनों लड़कियां वापस आकर विश्वविद्यालय कैम्पस मे बैठ गए एवं परीक्षा के बारे में चर्चा करने लगे।

धैर्य – इस बार इस विषय पर कई प्रश्न पूछे जा सकते हैं कि ‘भारत में हिन्दू मुसलमानों से क्यों डरता है?’

रुद्र – भाई मैं तो नहीं डरता।

शिवा – अच्छा अगर नहीं डरता तो किसी मुसलमान बहुल क्षेत्र में कमरा किराए पर लेकर वहाँ रहकर दिखा।

निशा – कह तो यह ठीक ही रहा है, क्यों एक मुसलमान हिंदुओं के बीच में सुरक्षित रहता है लेकिन एक हिन्दू कभी भी स्वयं को मुसलमानों के बीच सुरक्षित महसूस नहीं करता।

विवान – कैसे सुरक्षित महसूस कर सकता है, मुसलमानों ने भारत पर छः सौ साल राज किया, जितना अत्याचार उन लोगों ने हिंदुओं पर किया उसके बारे में तो सोच कर भी हिंदुओं की आत्मा काँप उठती है।

आहुति – हाँ, मैं अभी की ताज़ा घटना बताती हूँ, “हमारे मोहल्ले की एक लड़की का चक्कर मुसलमान लड़के के साथ चल गया, लड़की के घर वालों ने मना कर दिया, लड़की भी मान गयी लेकिन वह लड़का नहीं माना और दस पंद्रह हथियार बंद मुसलमानों को लेकर आया जबर्दस्ती लड़की को उठाकर ले गया, लड़की का बाप और भाई बुरी तरह जख्मी हो गए, मोहल्ले वाले सब अपने अपने दरवाजे बंद करके घरों में छुप गए और मुसलमानों ने उस लड़की को मस्जिद में ले जाकर जबर्दस्ती उसका निकाह करवा दिया, उसका धर्म भी बदलवा दिया। उसके बाप और भाई दोनों अस्पताल में मौत से जूझ रहे थे लेकिन उन मुसलमानों ने उस लड़की को अस्पताल तक भी नहीं जाने दिया।”

धैर्य - लेकिन सोचने वाली बात यह है कि किसी भी मोहल्ले वाले हिन्दू ने उनका साथ नहीं दिया।

आहुती – देते भी कैसे, उन सब के पास हथियार थे और हमारे तो पूरे मोहल्ले में किसी भी घर में एक डंडा तक नहीं था।

रुद्र – हाँ भाई, यह हमारा डर ही तो है जो हम हमेशा कहते रहते हैं हिन्दू मुस्लिम भाई भाई, जबकि सच यह है हम डर की वजह से मुस्लिमों को भाई बोलते हैं लेकिन आज तक कोई भी मुसलमान किसी हिन्दू को भाई नहीं समझता, वह तो हिंदुओं को सिर्फ काफिर समझता है और काफिर को मारना उनके धर्म में जायज है।

शिव – लेकिन भाई, जो भी हिन्दू विदेशों में जाकर बस गए वे सब तो बड़े मजे में हैं और ना ही किसी से डरते हैं।

निशा – ऐसा इसलिए कि भारत में हिंदुओं के विरुद्ध एक माहौल बनाया हुआ है, हिंदुओं के मंदिरों को तोड़ कर मस्जिदें बनाई, हिंदुओं के गुरुओं को तरह तरह की यतनाएं देकर मार डाला, हिंदुओं की लड़कियों को जबर्दस्ती उठाकर उन्हे अपने हरम में रखा और बाद में वेश्या बनने के लिए मजबूर कर दिया।

विवान – आज हम इतना डर गए हैं कि अपने ही देश में अपने भगवान श्री राम का मंदिर नही बना सकते। ज़्यादातर हिन्दू तो मंदिर बनाने के लिए इसलिए राजी नहीं होते कि हिन्दू मुस्लिम दंगा हों जाएगा, मुसलमान हमें और हमारे बच्चों को मार डालेंगे।

रुद्र – लेकिन किसी को तो आगे आना ही पड़ेगा, कुछ ऐसा करने के लिए जिससे भारत में हिंदुओं के मन से मुसलमानों का डर निकाला जा सके, किसी को तो आहुति देनी होगी।

विवान – नहीं, मैं आहुति नहीं दूंगा, आहुति मेरी है, मैं उससे प्यार करता हूँ।

आहुती – अबे ओए, दो समोसे खिलाकर आहुति तेरी हो गई?

विवान – दो नहीं, बारह समोसे खिलाये हैं और छः कॉफी भी पिलाई हैं, उन्हे कैसे भूल गए?

रुद्र – अच्छा तो यह बता, परसों जो मैंने सबको छैना राम के छोले भटूरे खिलाये थे?

निशा – हंसी मज़ाक बहुत हो गया अब थोड़ा उस विषय पर गंभीर होकर सोचा जाए, वास्तव में यह एक बहुत बड़ी समस्या है, मुसलमान सिर्फ भारत में अपनी जनसंख्या बढ़ाने में लगे हैं, रोहिङ्गियाओं और बांग्ला देश से आए मुसलमानो को बसा कर वे एक दिन हिंदुओं से ज्यादा हों जाएंगे और फिर यह भाई भाई वाला नारा धरा रह जाएगा जब हिंदुओं को काफिर बता कर मारा जाएगा।

निशा – वैसे अगर देखा जाए तो हिन्दू दयालु है, दूसरे धर्मों का सम्मान भी करता है, लेकिन आपस में जात पांत में बंटा हुआ है।

आहुति – हाँ, यही तो हमारी सबसे बड़ी कमजोरी है। अभी कुछ दिन पहले मुजफ्फर नगर में हिन्दू मुसलिम दंगे हुए थे उन दंगो को हिन्दू मुस्लिम नाम दे दिया गया जबकि उसमे मुसलमानों ने जाटों को निशाना बनाया था।

निशा – क्या हुआ था वहाँ पर? इसका शोर तो काफी मचा था।उस समय तो वहाँ पर सरकार भी मुस्लिम परस्त थी।

आहुति – हाँ, उसका ही तो लाभ मिला वहाँ के मुस्लिमों को। नरवाना गाँव में एक जात की लड़की को मुसलमानो ने जबर्दस्ती उठा लिया, लड़की के पिता और भाई ने विरोध किया तो उन दोनों को वहीं सबके सामने गोली मार दी। इसके बाद वहाँ के जाटों ने इकठ्ठा होकर मुसलमानों के गाँव वजहारा से लड़की को मुक्त कराया, इसके लिए उन्हे थोड़ा बलप्रयोग करना पड़ा लेकिन सरकार ने उल्टा जाटों को ही पकड़ कर जेल में डाल दिया।

धैर्य – तो वहाँ जाटों की सहायता करने कोई और हिन्दू बिरादरी नहीं आई?

आहुति – हाँ, यही तो सोचने की बात है, अगर जाटों के साथ झगड़ा हुआ तो सिर्फ जाट ही लड़ें और उधर मुसलमान सब एक हो गए।

शिव – कब तक? आखिर कब तक हम जाट, गूजर, राजपूत, त्यागी और दलित में बंट कर अकेले अकेले पिटते रहेंगे?

रुद्र – यही तो विडम्बना है, हम हिंदुओं को जाति के नाम पर पहले मुग़लों ने बाँटा, फिर अंग्रेज़ो नें बाँटा और आज़ादी के बाद भी सत्ता ऐसे लोगों के हाथ में आ गयी जिंहोने कभी भी हिन्दू को हिन्दू नहीं बनने दिया।

आहुति – हमारी दयालुता की तो कोई सीमा ही नहीं, वहीं का एक किस्सा है। मुसलमान का एक लड़का शाहिद उन दिनों जाटों के एक गाँव बझाई में फंस गया, भाग्यवश उसी गाँव में उसका एक मित्र धीरज रहता था। धीरज भी जाट था और उसे पता था कि मुसलमान और जाटों का आपस में झगड़ा चल रहा है, झगड़ा भी ऐसा कि दोनों एक दूसरे के खून के प्यासे हैं। मुसलमानों के गाँव में अगर कोई हिन्दू गलती से भी चला गया तो वह जिंदा वापस नहीं आया था लेकिन धीरज ने जब देखा कि शाहिद दंगों में फंस गया है तो धीरज ने शाहिद को दस दिन अपने घर पर रखकर सुरक्षा दी।

विवान – फिर क्या हुआ?

आहुति – जब थोड़ी शांति हो गयी तो शाहिद ने अपने घर वापस जाने की इच्छा जताई लेकिन धीरज से विनती की कि वह उसके साथ उसके घर तक चले। धीरज ने शाहिद की बात मान ली और शाहिद को उसके गाँव वझारा छोडने चला गया।

वझारा में जब धीरज को मुस्लिमों ने देखा तो वे उसको काफिर काफिर करके मारने लगे। धीरज ने उनको काफी समझाया लेकिन उनकी समझ में नहीं आया, उनको तो बस एक ही बात समझ आ रही थी कि यह काफिर है और काफिर को मारने से उसके धरम में शबाब मिलता है।

धीरज ने शाहिद से कहा कि भाई तू ही इनको कुछ समझा दे तो शाहिद बोला, “भाई, मैं इसमे कुछ नहीं कर सकता, यह तो धरम का मामला है।”

धीरज समझ गया कि वह अपनी दयालुता का शिकार हो गया है लेकिन घर से निकलते समय धीरज अपनी माउज़र को पूरी तरह लोड करके ले गया था।

जब धीरज के पास बचने का कोई भी रास्ता ना रहा तो उसने अपना माउज़र निकाला और पहली गोली शाहिद के सीने में उतार दी, उसके बाद जो भी सामने आया उसको मारते हुए वहाँ से बच कर निकल आया।

धीरज बच कर तो आ गया लेकिन उस मुस्लिम परस्त सरकार की पुलिस ने धीरज को पकड़ कर जेल में डाल दिया।

सोचने की बात है कि शाहिद जब तक धीरज के घर पर रह रहा था तो वह भाई भाई थे लेकिन जैसे ही धीरज शाहिद के घर पर गया वह काफिर हो गया, एक कट्टर दुश्मन हो गया।

रुद्र, शिवा, विवान, निशा और धैर्य ने एक साथ कहा ‘very sad‘ लेकिन भाई हमे धीरज के लिए कुछ करना होगा। आज हम छः शपथ लेते हैं कि आज के बाद हम अपनों की आहुति नहीं देंगे, हम प्रण करते हैं कि यज्ञ हमारा होगा और आहुति उनकी होगी जो मानवता के कट्टर दुश्मन हैं।