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कबिरा खड़ा बजार में

कबिरा खड़ा बजार में....

आशीष कुमार त्रिवेदी

एक फक्कड़ साधू जो अपने करघे पर कपड़े के साथ सामाजिक एकता का ताना बाना भी बुनता था। जो अनपढ़ होकर भी उस रहस्य को समझता था जिसे बड़ी बड़ी पोथियां पढ़ने वाले भी नहीं समझ सके। सारे आडंबरों को परे हटा कर जिसने निराकारी घट घट वासी राम से नाता जोड़ा। वह संत जो सबको सहज रूप से उपलब्ध था। जिसने डंके की चोट पर समाज के पाखंड पर चोट की। ऐसा विलक्षण पुरुष हमारे भारतवर्ष की भूमि पर पैदा हुआ। जिसकी वाणी ने मानव समाज के कल्याण की बात करी। वह महान संत थे कबीरदास।

कबीरदास के जन्म को लेकर कई किवदंतियां प्रचलित हैं। लेकिन सर्वमान्य है कि उनका जन्म 1440 में हुआ था। वह एक विधवा ब्राह्मणी के पुत्र थे जिसने लोकलाज के कारण इन्हें त्याग दिया। वह उस नन्हें शिशु को लहरतारा ताल के पास फेंक आयी। यह शिशु नीरू नामक एक जुलाहे को मिला। वह उसे घर ले गया। वहाँ उसकी पत्नी नीमा ने उसे अपनी संतान की तरह अपना लिया।

कुछ लोगों का यह भी कहना है कि कबीरदास नीरू और नीमा की ही संतान थे। जो भी हो वह जुलाहे का काम करते थे। कबीर ने इसी रूप में अपना परिचय दिया है।

"जाति जुलाहा नाम कबीरा

बनि बनि फिरो उदासी।"

रामानंद कबीरदास के गुरू थे। स्वामी रामानंद मध्यकालीन भक्ति आंदोलन के एक महान संत थे। उन्होंने रामभक्ति की धारा को समाज के वंचित तथा शोषित लोगों तक पहुँचाया। उन्होंने तत्कालीन समाज में प्रचलित कुरीतियों जैसे छूयाछूत, ऊंच-नीच और जात-पात का विरोध किया। इस बात पर ज़ोर दिया कि ईश्वर सर्वत्र है।

कबीरदास द्वारा उन्हें अपना गुरू बनाए जाने के संबंध में भी एक कथा प्रचलित है। कबीरदास रामानंद के पास इस अनुरोध से पहुँचे कि उन्हें अपना शिष्य बना लें। लेकिन उन्होंने मना कर दिया। कबीरदास ने ठान लिया था कि वह स्वामी रामानंद से ही दीक्षा लेंगे। स्वामी रामानंद प्रतिदिन प्रातःकाल गंगा स्नान के लिए जाते थे। कबीरदास जाकर घाट की सीढ़ियों पर ऐसी जगह लेटे जहाँ स्वामी रामानंद रोज़ आते थे। ब्रह्म मुहूर्त में अंधेरा होने के कारण स्वामी रामानंद उन्हें देख नहीं सके। उनका पैर कबीरदास पर पड़ गया। अचानक पैर पड़ जाने के कारण उनके मुख से 'राम राम' निकला। उनके मुख से उच्चरित राम नाम को ही कबीरदास ने गुरूमंत्र मान लिया।

इस राम नाम को कबीर ने अपने ह्रदय में उतार लिया। राम कबीर की भक्ति का केंद्र बन गए। किंतु कबीर के ह्रदय में बसे राम रघुवंशी राजा राम नहीं थे। वह तो कण कण में बसने वाले निराकार ब्रह्म थे। राम सभी जीवों के अंदर बसने वाली आत्मा थे। उन्हें हर वस्तु व जीव में राम दिखते थे।

"व्यापक ब्रह्म सबनिमैं एकै, को पंडित को जोगी। रावण-राव कवनसूं कवन वेद कोरोगी।"

सर्वत्र रमने वाले राम से कबीर ने व्यक्तिगत संबंध बनाया था। लेकिन ऐसा करते समय भी उन्होंने ने राम के अविनाशी सर्वशक्तिमान रूप को नहीं भुलाया। बल्कि उसकी महिमा का बखान करते हुए उनसे मानवीय संबंध स्थापित किया। कबीरदास के लिए राम सगुण निर्गुण से भी परे थे। कबीरदास ने राम को व्यापक बना दिया। उन्होंने राम को कर्मकांडों से बाहर कर सभी के लिए सुगम्य बना दिया।

निर्गुण राम के साथ कबीरदास सहज रूप से मानवीय रिश्ते स्थापित करते हैं। कभी वह राम को पती और स्वयं को पत्नी के रूप में प्रस्तुत करते हैं।

“दुलिहिनी गावहु मंगलचार

मोरे घर आए हो रजा राम भरतार

कबीरदास राम के साथ स्वयं के दांपत्य संबंध के बारे में कहते हैं

“हरी मेरा पिउ, मैं हरी की बहुरिया

राम बहे मैं छूटक लहरिया.”

इसी तरह कभी वह राम को माता मानकर कहते हैं

हरि जननी मैं बालक तोरा'।

कभी वह दास्य भाव धारण कर राम को अपना स्वामी मान लेते हैं। निर्गुण निराकारी राम से वह विविध संबंध बना लेते हैं।

जिन लोगों को इस बात का संशय है कि निर्गुण के साथ मानवीय रिश्ते कैसे जोड़े जा सकते हैं उन्हें समझाते हुए कहते हैं

"संतौ, धोखा कासूं कहिये। गुनमैं निरगुन, निरगुनमैं गुन, बाट छांड़ि क्यूं बहिस हैं।

अपने राम से मिलने की उनमें गहरी चाह थी। राम के विछोह में वह स्वयं को विरहणी की तरह पेश करते हैं।

वह उस दिन की प्रतीक्षा में तड़पते हुए कहते हैं

“वे दिन कब आवेंगें माई

जा कारन हम देह धरी है मिलिबो अंग लगाइ

हौं जानू जो हल हिलमिलि खेलू तन मन प्राण समहैं।

बिना अपने राम पिया के उनके लिए यह संसार निस्सार है। उनके अनुसार मनुष्य की गति जगत की माया त्याग राम से लगन लगाने में है। जब मनुष्य उस स्थिति में पहुँच जाता है जहाँ उसे संसार सूना जान पड़ता है। जब वह प्रेमी से विलग प्रेमिका की तरह विरह में जलने लगता है। ईश्वर के अतिरिक्त सब कुछ बेकार लगता है। उस स्थिति में ही वह राम को पा सकता है।

'प्रेम जगावै विरह को, विरह जगावै पीउ, पीउ जगावै जीव को, जोइ पीउ सोई जीउ।'

इसी तरह वह कहते हैं

“इस तन का दीया करो, बाती मेलौं जीव

लोहीं सीचौ तेल ज्यों, तब मुख देखों पीव.”

कबीरदास के अनुसार सभी संबंधों मे जीव (मनुष्य) तथा परमात्मा (राम) का संबंध ही सच्चा व स्थाई है। इस संबंध को जानकर वह भवसागर से तर जाता है।

कबीरदास पढ़े लिखे नहीं थे।

'मसि कागद छूवो नहीं, कलम गही नहिं हाथ।'

लेकिन हिंदी साहित्य के लिए वह अपने दोहे, पद, छंद के रूप में एक विशाल भंडार छोड़ गए हैं। वह जब भी किसी दोहे या छंद की रचना करते उनके शिष्य उसे लिख लेते थे।

कबीर की वाणी का संकलन `बीजक' के नाम से किया गया है। बीजक मुख्यतः तीन भागों में विभाजित है

१. साखी

२. सबद

३. रमैनी

साखी धर्मोपदेश हैं। कबीरदास ने अपनी शिक्षाओं को साखी के रूप में प्रस्तुत किया है। यह मुख्यतः दोहे हैं लेकिन कहीं कहीं सोरठे का भी प्रयोग हुआ है।

कबीरदास ने अपने ईश्वर प्रेम को सबद के रूप में प्रदर्शित किया है। सबद संगीतमय पद हैं जो गाए जा सकते हैं।

कबीरदास ने दर्शन एवं रहस्यवाद को छंदों व चौपाइयों के रूप में प्रकट किया है। इन्हें ही रमैनी कहते हैं।

कबीरदास फक्कड़ साधू थे। अतः इसकी झलक उनकी भाषा में भी मिलती है। कबीरदास की भाषा पंजाबी, राजस्थानी, खड़ी बोली, अवधी, पूरबी, व्रजभाषा आदि कई भाषाओं की खिचड़ी है।

कबीरदास ने बोलचाल की भाषा का ही प्रयोग किया है। जिससे साधारण लोग उसे समझ सकें। उनके सारे उपदेश भारत की आम जनता के लिए थे।

कबीरदास के समय भारतीय समाज में बहुत ही हलचल मची हुई थी। इस्लाम ने कुछ समय पहले ही भारत की भूमि पर कदम रखा था और अपनी जड़ें जमानी आरंभ की थी। बाहर से आए मुस्लिम शासक यहाँ की जनता पर अधिकार करना चाहते थे। इसका एक रास्ता उन्हें इस्लाम में परिवर्तित करना भी था। वह भारत के लोगों पर अत्याचार करते थे।

दूसरी तरफ सदियों से चली आ रही वर्ण व्यवस्था को इससे सबसे बड़ा खतरा था। अतः उसे बनाए रखने के लिए धार्मिक कर्मकांडों का और भी अधिक कड़ाई से पालन किया जाने लगा।

इस सब के बीच आम जन दो पाटों के बीच पिस रहा था। इस विकट स्थिति में कबीरदास भक्ति की ऐसी रसधारा लेकर आए जिसमें अमीर गरीब, ऊंच नीच सभी डुबकी लगाकर आत्मिक शांति पा सकते थे। कबीरदास ने भारतीय जनमानस के ह्रदय में बसे सगुण राम को निर्गुण ब्रह्म के रूप में पेश कर भक्ति को प्रेममय बना दिया। इस प्रेम में व्यक्ति बिना किसी जातिगत बंधन के सीधे अपने आराध्य से जुड़ सकता था।

संत कबीर एक समाज सुधारक थे। अपने दोहों के माध्यम से उन्होंने समाज में व्याप्त कुरीतियों पर कड़ा प्रहार किया। उनकी भाषा की सरलता के कारण उनके दोहों ने जनमानस पर गहरा असर किया।

कबीरदास की वाणी में एक तीखा और अचूक व्यंग्य झलकता है। उनकी सोंच शुद्ध रूप से बौद्धिकता की कसौटी पर आधारित थी।

कबीरदास ने तत्कालीन दो संप्रदायों हिंदू तथा मुसलमानों के बीच आपसी सौहार्द पैदा करने की भी पुरज़ोर कोशिश की।

कबीरदास ने दोनों ही संप्रदायों में व्याप्त कुरीतियों को आड़े हाथों लिया।

हिंदू समाज मे व्याप्त जांति पांति को उन्होंने मिथ्या बताया। उनका कहना था कि ईश्वर के लिए सभी मनुष्य एक हैं। कबीरदास कहते हैं

'' जो तू बाम्हन, बाम्हनी जाया।

आन बाट व्है क्यों नहीं आया।।''

मूर्ति पूजा पर प्रहार कहते हुए वह कहते हैं

" पाथर पूजै हरि मिलें, हम लें पूजि पहार।

घर की चाकी कोई न पूजै, पिस खाय ये संसार।"

मुस्लिम समुदाय से वह कहते हैं

"काँकर-पाथर जोरि के, मस्जिद लई चिणाय ।

जा चढ़ी मुल्ला बाँग दे, का बहरा हुआ खुदाय ।। ‘

कबीरदास आडंबरों की अपेक्षा मन की शुद्धता पर अधिक जोर देते थे। उनका मानना था कि ईश्वर आडंबरों या ग्रंथों के अध्यन से नहीं मिलते बल्कि प्रेम से ही उन्हें पाया जा सकता है।

"पोथी पढ़-पढ़ जग मुआ, पंडित भया न कोए

ढाई अक्षर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होए ।।"

वह हर तरह की प्रचलित मान्यता जिसका कोई आधार ना हो का विरोध करते थे। मान्यता थी कि बनारस में मरने से मुक्ति मिलती है। इसका खंडन करने के लिए वह अंतिम दिनों में बनारस छोड़ कर मगहर चले गए। वहीं 1518 में 119 वर्ष की आयु में उनकी मृत्यु हुई।

मध्यकाल मे कबीरदास के नाम से चलाया गया संप्रदाय कबीरपंथ कहलाता है। इसका मुख्य उद्देश्य कबीरदास की शिक्षाओं का प्रचार प्रसार करना था। इसकी स्थापन कबीरदास के शिष्य धर्मदास ने की थी। कबीरदास के उपदेशों के अनुसार कबीरपंथी लोग जाति तथा धर्म के विभाजन को नहीं मानते हैं। वह कबीरदास के बताए मार्ग पर चलते हैं। कबीरपंथी लोग किसी भी आडंबर को नहीं मानते हैं।

लेकिन समय के साथ साथ कबीरपंथ भी धीरे धीरे एक धार्मिक संप्रदाय बन गया। इसके अनुसार कबीर की कल्पना एक अलौकिक अवतारी पुरुष के रूप में की जाने लगी।

भारत में कबीर पंथ की मुख्यतः तीन शाखाएँ मानी जाती हैं। काशी (कबीरचौरा) वाली शाखा, धनौती वाली भगताही शाखा और छत्तीसगढ़ी वाली शाखा। इन शाखाओं के संस्थापक क्रमशः श्रुति गोपाल साहब, भगवान गोसाईं तथा मुक्तामणि नाम साहब को माना जाता है।

कबीरचौरा कबीरदास को समर्पित एक प्रमुख स्थान है। कबीरदास को मानने वालों के लिए यह तीर्थस्थान है। यहाँ कबीरदास का मंदिर भी है।

कबीरदास एक महान संत थे। जिनकी वाणी ने वह अमृत बरसाया जिसमें आज भी कई झुलसती आत्माएं तृप्ति पाती हैं। संसार रूपी मरुथल में भटकते लोगों को उनके उपदेशों ने सही राह दिखाई।

कबीरदास की वाणी आज के इस विषम समय में भी उतनी ही प्रभावी है जितनी उस समय थी। आज का समाज भी धर्म व जाति के दायरों में बंटा हुआ है। दिन पर दिन यह दायरे और संकुचित हो रहे हैं। धर्म का अभिप्राय ईश्वर भक्ति नहीं बल्कि महज़ पूजा पाठ तथा अन्य धार्मिक कार्यकलापों तक ही सिमट कर रह गया है। ऐसे में कबीरदास की उस वाणी की बहुत आवश्कता है जो हमारी धर्मभीरुता पर करारा प्रहार कर हमें धर्म के संकीर्ण रूप से बाहर निकाल कर सही राह दिखा सकें।

कबीरदास के कुछ प्रमुख दोहे

पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय,

ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय।

चाह मिटी, चिंता मिटी, मनवा बेपरवाह,

जिसको कुछ नहीं चाहिए वह शहनशाह।

बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय,

जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय।

माटी कहे कुम्हार से, तू क्या रौंदे मोये

एक दिन ऐसा आयेगा मैं रौंदूंगी तोय।

धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय,

माली सींचे सौ घड़ा, ॠतु आए फल होय।

दुःख में सुमिरन सब करे, सुख में करै न कोय।

जो सुख में सुमिरन करे दुःख काहे को होय।

साधु ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय,

सार-सार को गहि रहै, थोथा देई उड़ाय।

माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर,

कर का मनका डार दे, मन का मनका फेर।

गुरु गोविन्द दोनों खड़े, काके लागु पाए,

बलिहारी गुरु आपनो, गोविन्द दियो मिलाय।

कबीर संगत साधु की, नित प्रति कीजै जाय |

दुरमति दूर बहावासी, देशी सुमति बताय |

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