पुजारिन के बेटी Ved Prakash Tyagi द्वारा लघुकथा में हिंदी पीडीएफ

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पुजारिन के बेटी

पुजारिन की बेटी

भुवन जैसे ही मंदिर के दरवाजे में घुसा, वैसे ही अवनी माथा टेककर पीछे घूमी, तो भुवन अवनी को देखता ही रह गया, और वह यह भी भूल गया कि वह मंदिर में आया है। चका-चौंध करने वाली खूबसूरती से भुवन का अप्रत्याशित सामना पहली बार ही हुआ था। अवनी भुवन के बराबर से होते हुए मंदिर से बाहर निकल गयी और भुवन भी माथा टेकने के लिए मंदिर में आगे बढ़ गया, लेकिन जैसे ही आंखे बंद की सामने अवनी का सुंदर चेहरा घूमने लगा।

“माँ! मैं जा रही हूँ,” अवनी ने कहा, “और इस बार तो मैं हॉस्टल से वापस वार्षिक परीक्षा के बाद ही आऊँगी।”

माँ ने कहा, “अच्छा बेटा अपना ध्यान रखना, मेरी चिन्ता मत करना, मैं ठीक हूँ, एक पंडितजी को मैंने पूजा पाठ के लिए मासिक वेतन पर रख लिया है, क्योंकि लोगों को पुजारिन से करवाई गयी पूजा पाठ पर विश्वास ही नहीं होता था।”

अवनी के पिता इसी मंदिर के पुजारी थे, प्रकांड पंडित, सुंदर व्यक्तित्व के मालिक लेकिन कैंसर जैसी बीमारी ने ऐसा घेरा कि छः महीने में ही सबको छोड़ कर वहाँ चले गए, जहां से कोई भी वापस नहीं आता।

भुवन जान गया कि अवनी पुजारिन की ही बेटी है, जो कहीं बाहर हॉस्टल में रहकर पढ़ाई कर रही है अतः भुवन प्रतिदिन मंदिर आने लगा और देर तक वहीं बैठता, पुजारिन से बातें करता। कुछ दिन बाद भुवन पुजारिन से काफी घुल मिल गया, उनका ख्याल भी रखने लगा।

एक दिन जब भुवन माँ के पास बैठा था तभी एक व्यक्ति माँ को पच्चीस हजार रुपए की भेंट देने आया, माँ ने काफी मना किया लेकिन वह व्यक्ति नहीं माना एवं अपनी पत्नी व नए जन्मे बेटे को आशीर्वाद देने को कहने लगा और बोला, “माताजी! यह मेरा बेटा आपके आशीर्वाद से ही हुआ है, हमने पहले ही बोल रखा है कि अगर आपके आशीर्वाद से हमारे बेटा हुआ तो हम आपको पच्चीस हजार रुपए भेंट देंगे। अब आप हमारी यह तुच्छ भेंट स्वीकार कर लीजिये और हम तीनों को सुखी भविष्य का आशीर्वाद दीजिये।”

उसके जाने के बाद भुवन ने पूछ लिया, “माँ यह क्या है? आप बेटा होने का आशीर्वाद भी देती हैं जबकि आपकी तो एक बेटी है।” माँ बोली, “नहीं बेटा! इनको गलत फहमी हो गयी है, कुछ दिन पहले जब यह स्त्री गर्भवती थी तो ये दोनों मंदिर में आए थे, इनहोने मेरे पैर छूकर आशीर्वाद मांगा कि हमारी मनोकामना पूरी हो। मैंने इनको अपने पूरे मन से आशीर्वाद देते हुए कहा कि भगवान तुम्हारी मनोकामना अवश्य पूरी करेंगे। मुझे तो पता भी नहीं था कि इनकी इच्छा क्या है लेकिन पूरी हो गयी तो इसका कारण मेरे आशीर्वाद को मान रहे हैं।”

थोड़ी देर बाद पंडितजी उस दिन के चढ़ावे का हिसाब देने आ गए, पैसे कम थे, पुजारिन माँ तो सब पर नजर रखती थी और उन्हे यह भी ज्ञात था कि कौन कितना चढ़ावा चढ़ाता है, माँ को पता चल गया कि पंडितजी ने हेराफेरी की है अतः माँ ने पूछा, “पंडितजी! बाकी के पैसे कहाँ गए?” तो पंडितजी बोले, “वो तो जिजमान ने मेरे हाथ में दिये थे।” माँ बोली, “तो क्या वह मंदिर का चढ़ावा नहीं था? अब पंडितजी चाहे तो तंख्वाह ले लें या चढ़ावे मे से हिस्सा, दोनों बातें तो चलेंगी नहीं।”

पंडितजी ने बाकी के पैसे निकाल कर माँ के हाथ में रख दिये और कहने लगी, “बेटा! अगर यह पण्डित वेतन भी लेगा और चढ़ावे में भी हेराफेरी करेगा तो मैं मंदिर की देख रेख कैसे कर पाऊँगी, यहाँ तो हर चीज के लिए पैसे लगते हैं।” भुवन माँ की बात समझ गया और हाँ में सिर हिला दिया।

चढ़ावा चढ़ाने वाले भी अजीब अजीब प्रकार के होते हैं, एक व्यक्ति रात में जुआ खेलता और जीत जाता तो आधे पैसे मंदिर की खिड़की से रात में ही अंदर डाल जाता, सुबह जब माँ मंदिर खोलती और देखती तो समझ जाती कि आज वो जुए में जीत गया।

कुछ दिन बाद अवनी की परीक्षा समाप्त हो गयी और वह घर पर आ गयी, मंदिर के साथ ही उनका घर भी था, अवनी की पढ़ाई पूरी हो चुकी थी अब तो उसका काम कोई अच्छी सी नौकरी ढूँढना था।

अवनी के आने से भुवन काफी खुश था, वह तो पहले से ही उससे बहुत प्यार करता था, अवनी इस सब से अनभिज्ञ थी लेकिन अवनी को कहीं भी जाना होता तो वह भुवन के साथ ही जाती थी, पुजारिन माँ को भी यह सब अच्छा लगता था।

भुवन की एक छोटी सी कीर्तन मंडली थी जिसे लेकर वह भजन कीर्तन जागरण आदि करता रहता था जिससे उसकी जीविका चलती थी, समय होने पर मंदिर में भी कीर्तन करता था, उसकी मधुर आवाज सुनने को काफी लोग मंदिर में आने लगे थे।

बचपन से अवनी भी अपनी माँ के साथ मंदिर में भजन कीर्तन करती रहती थी अतः वह भी भुवन के साथ मंदिर में भजन गाने लगी। इस तरह दोनों एक दूसरे के और भी नजदीक आ गये, अब अवनी को लगने लगा कि भुवन के न रहने पर मन कुछ परेशान क्यों हो जाता है।

एक दिन पुजारिन माँ ने अवनी के सामने प्रस्ताव रखा, “बेटा! अगर तुझे अच्छा लगे तो मैं भुवन के साथ तेरी शादी की बात कर लूँ? सुंदर स्वस्थ सुशील लड़का है ब्राह्मण कुल से है, इतने दिनों से यहाँ आता है मैंने तो उसमे कोई बुराई देखी नहीं।”

अवनी शर्मा कर अंदर चली गयी तो माँ समझ गयी कि अवनी की हाँ है, यही बात माँ ने भुवन से काही, “भुवन बेटा अपने माँ पापा से पूछ कर देख लो अगर सब राजी हों तो यह शुभ काम करके मैं भी अपनी ज़िम्मेदारी से मुक्त हो जाऊँ।”

भुवन ने कहा, “माँ! मेरे माँ पापा तो बचपन में ही एक दुर्घटना के शिकार हो गए थे, मेरे मामा मुझे अपने साथ यहाँ दिल्ली ले आए थे, अब तो मामा मामी भी नहीं रहे, मैं अकेला ही रहता हूँ तभी आपको माँ समझकर आपके पास समय बिताने आ जाता हूँ।” इतना कहकर भुवन रोने लगा तब माँ ने उसका सिर अपनी गोदी में रखकर, प्यार से उसके सिर पर हाथ फेरा और आँसू पोंछ कर कहा, “हाँ बेटा, मैं तेरी भी माँ हूँ।”

अवनी यह सब देख रही थी, अवनी के मन में भुवन के प्रति प्यार और भी गहरा हो गया। माँ ने एक दिन शुभ मुहूर्त निकाल कर दोनों की सगाई कर दी।

भुवन ने कहा, “अवनी! आज दोनों माओं ने मेरी मनोकामना पूरी कर दी, मैं जब पहली बार इस मंदिर में आया था तो मुझे मंदिर के द्वार में घुसते ही भगवान से पहले तुम्हारे दर्शन हुए थे, उस दिन मैंने जीवन में तुम्हें प्यार के रूप में पाने की मनोकामना की थी और प्रतिदिन भगवान को देवी माँ को यही प्रार्थना करता था कि मेरी मनोकामना जल्द से जल्द पूरी कर दो, आज भगवान ने देवी माँ नें और पुजारिन माँ ने मेरी कामना पूरी कर दी, आज मैं धन्य हो गया हूँ।”

आज अवनी भी अपने भाग्य पर इतरा रही थी कि उसको इतना प्यार करने वाला जीवन साथी मिला है और मन ही मन भगवान से प्रार्थना करने लगी, “हे भगवान! हे देवी माँ! हमारे प्यार को किसी की नजर न लगे।” रात काफी हो गयी थी, आंखे नींद से बोझिल हो रही थीं सोचते सोचते नींद आ गयी। अवनी तो सो गयी लेकिन भुवन को रात में माता का जागरण करना था।

आज जागरण का इतना भव्य पंडाल सजा था, भुवन ने कभी पहले इतने बड़े जन समूह के बीच जागरण नहीं किया था, शहर के सभी अमीर लोग, बड़े अधिकारी, राजनेता व फ़िल्मकार भी आए हुए थे। भुवन की आवाज से प्रभावित होकर एक फ़िल्मकार ने उसे अपनी फिल्म मे गाने का मौका दे दिया लेकिन शर्त यह रखी कि उसे उसकी बेटी से शादी करनी पड़ेगी।

भुवन दुविधा में पढ़ गया, एक तरफ उसका चकाचौंध करने वाला भविष्य एवं दूसरी तरफ उसका मन्नतों से मांगा गया प्यार, और फिर एक बार चाँदी के टुकड़े किसी के दिल के टुकड़े टुकड़े कर गए।

भुवन एक बहुत बड़ा स्टार बन चुका था, बंगला गाड़ी, नौकर चाकर सब थे उसके पास, अवनी की तो उसे याद भी नहीं थी और न ही उसे इस बारे में सोचने की फुर्सत थी, लेकिन अवनी अभी भी भुवन की उम्मीद में बैठी थी।

शायद भुवन अभी भी उसको अपना लेगा यह सोच कर अवनी मुंबई में भुवन के बंगले पर गयी लेकिन उसके लिए बंगले का दरवाजा नहीं खुला, अवनी रोते सिसकते बंगले के दरवाजे को ज़ोर ज़ोर से पीट रही थी और आवाज लगाए जा रही थी, “भुवन दरवाजा तो खोलो, एक बार, बस एक बार मुझ से मिल तो लो, मैं एक बार तुम्हें देख कर तुम्हारे दर्शन करके चली जाऊँगी, इतना कह कर अवनी ज़ोर ज़ोर से रोने लगी।”

माँ ने आकर अवनी को हिला हिला कर जगाया और पूछा कि क्या हो गया, क्यों इतने ज़ोर ज़ोर से रो रही हो? अपनी रुंधी आवाज में अवनी कहने लगी, “माँ! वो भुवन!” माँ बोली, “हाँ बता क्या हुआ भुवन को? कोई बुरा सपना देखा क्या?” “हाँ माँ! वो भुवन चला गया मुझे छोड़ कर, वो अब फिल्मों में गाएगा, बड़ा आदमी बन कर, वहीं शादी कर लेगा और मुझे भूल जाएगा।”

दिन काफी चढ़ गया था। तब तक भुवन भी मंदिर में पूजा करने आ गया, मंदिर में पूजा करने के बाद वह सीधा ही पुजारिन माँ के घर में आ गया और जा कर अवनी के सामने खड़ा हो गया, अवनी बड़ी बड़ी आंखे खोल कर भुवन को देखती रह गयी, फिर फुर्ती से बिस्तर से उठी और भुवन से लिपट गयी, “पहले वादा करो मुझे छोड़ कर तो नहीं जाओगे, भुवन अब मैं तुम्हारे बिना नहीं जी सकती।”

भुवन ने अवनी को अपने बाहुपाश में लेकर उसके माथे को चूमते हुए वादा किया, “अवनी! तुम मेरी मन्नत हो, मनोकामना हो, आरजू हो, मेरा प्यार हो और तुम ही मेरी ज़िंदगी हो, मेरी पुजारिन माँ की बेटी हो, मैं तुम्हें छोड़ कर कभी भी कहीं नहीं जाऊंगा।”