मीरा भक्तिन Dr kavita Tyagi द्वारा लघुकथा में हिंदी पीडीएफ

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मीरा भक्तिन

मीरा भक्तिन

सविता अपने माता—पिता की तीन संतानों में सबसे छोटी थी। घर में उसके ऊपर किसी प्रकार का कोई दायित्व—भार नहीं पड़ा था। शायद इसीलिए शारीरिक—मानसिक रूप से पूर्णतः स्वस्थ होने के बावजूद वह किशोरवयः तक अपनी बाल प्रकृति से मुक्त नहीं हो पायी थी। घर का सारा कार्यभार उसकी माँ, भाभी और बड़ी बहन के कंधों पर रहता था । यद्यपि सविता को घर के कार्यों में हाथ न बँटाने के लिए अनेक बार माँ की डाँट खानी पड़ती थी तथापि वह सदैव अध्ययन करने में या अपने अध्ययन के आधार पर अपने पिता के साथ तक—वितर्क और विचार—विश्लेषण में व्यस्त रहती थी। घर में सबसे छोटी होने के कारण अन्य अनेक बातों को लेकर भी प्रायः उसे सभी की डाँट पड़ती रहती थी। फिर भी उसने न तो कभी किसी डाँट को गम्भीरता से लिया था और न ही कभी भी परिवार के किसी व्यक्ति की डाँट से उसके हृदय में क्षोभ उत्पन्न हुआ था। अपने परिवार में स्वयं पर पड़ने वाली डाँट उसको कभी क्षुब्ध नहीं करती थी, परन्तु जब वह अपने आस—पास के किसी बच्चे को माता—पिता से पिटाई होने पर रोते हुए, किसी स्त्री को पति या अन्य ससुराल वालों से प्रताडि़त होकर क्षुब्ध होते हुए और किसी दलित को दबंग—सवर्ण के समक्ष गिड़गिड़ाते हुए देखती थी, तो उसका मनःमस्तिष्क अपनी आयु के अनुरूप खेलों से हट जाता था और तब वह अधिक विचारशील हो जाती थी। उसके आस—पास घटने वाली घटनाओं में से कुछ घटनाएँ ऐसी होती थी, जो प्रायः उसके चित् को विचलित करती थी। ये कुछ घटनाएँ जब प्राणी—मात्र को उसके प्राकृतिक अधिकारों से वंचित करके उनकी पीड़ा का कारण बनती थीं, उस समय उनकी पीड़ा देखकर सविता की संवेदना जाग्रत हो जाती थी और हृदय के साथ—साथ मस्तिष्क भी उसी विषय पर क्र्रियाशील हो जाता था। तब संभवतः सविता का मनःमस्तिष्क विद्रोह कर उठता था —

“यह अनुचित है। ऐसा नहीं होना चाहिए।”

अपने संवेदनात्मक विचारों को वह अनेक बार अपने परिवार के समक्ष भी अभिव्यक्त करती थी, परन्तु अपनी अभिव्यक्ति के फलस्वरूप परिवार से मिली प्रतिक्रिया से कभी भी उसको संतोष नहीं हो सका था। अपने परिवार से सदैव उसको दो बातें सुनने को मिलती थीं। पहली — प्रत्येक मनुष्य को अपने कर्मों का फल भोगना ही पड़ता है। जो अनुचित कर्म कर रहा है, वह अपने इन कर्मों का फल आगे चलकर अवश्य भोगेगा। दूसरी — जिसके साथ अनुचित व्यवहार हो रहा है, वह अपने पूर्व समय के अनुचित कर्मों का फल भोग रहा है।

यदि किसी अप्रिय घटना का उत्तरदायी पूरा समाज होता था, तो सविता के पिता खेद व्यक्त करते हुए कहते — ‘यह तो समाज की व्यवस्था है, इसमें हम कुछ नहीं कर सकते हैं। हाँ, हम अपने अनुचित व्यवहारों पर नियंत्रण अवश्य रख सकते हैं। अपने व्यवहारों को नियंत्रित रखते हुए हम सदैव ध्यान रखते हैं कि हम या हमारे परिवार का कोई सदस्य राह भटक कर किसी प्रकार का कोई अनुचित कार्य—व्यवहार न करे।’ यद्यपि उसका परिवार सदैव यह प्रयास करता था कि उनके किसी कार्य से किसी का अहित न हो और परिवार का प्रत्येक सदस्य परस्पर प्रेम और सद्भावना रखते हुए सदैव ऐसे कार्य—व्यवहारों के प्रति कृतसंकल्प रहता था, जिनसे सभी का हित—कल्याण हो सके, परन्तु सविता अपने परिवार के इस दृष्टिकोण से, जो सात्विक होते हुए भी अपने पारिवारिक क्षेत्र तक सीमित था, संतुष्ट नहीं हो पाती थी। उसका हृदय सदैव एक प्रकार की अतृप्ति का अनुभव करता रहता था। वह न तो पिता की इस बात से सहमत थी कि समाज की व्यवस्था, जो अधिकांश व्यक्तियों के लिए कष्टकारक है, उसे परिवर्तित करने में और सामाजिक रूढि़यों से मुक्त होने में एक व्यक्ति या परिवार कुछ नहीं कर सकता है। न ही वह अपने पिता की इस बात से सहमत थी कि दुर्बल व्यक्ति सबल व्यक्ति के अत्याचारों को इसलिए सहन करता रहे कि उसकी दुर्दशा उसके पूर्व जन्म के कर्मों का फल है अथवा किसी सबल व्यक्ति को दुर्बल व्यक्ति पर अत्याचार करने के लिए इसलिए छूट मिल जा जाए कि उसके कर्मों का दंड उसे ईश्वर अवश्य देगा ! सविता अपने पिता की इस बात से तो प्रायः सहमत हो जाती थी कि प्रत्येक व्यक्ति की दशा उसके कर्मों का परिणाम है, परन्तु वह उन कर्मों का आशय व्यक्ति के पुरुषार्थ से सम्बन्धित करते हुए भाग्योदय को पुरुषार्थ का परिणाम मानती थी। वह मनसा—वाचा—कर्मणा पुरुषार्थ करके भाग्य को प्रकाशित करने की पक्षपाती थी और पुरुषार्थ के भाव का विस्तार चाहती थी। वह उन लोगों के सुसुप्त विवेक को जाग्रत करके पुरुषार्थ के लिए प्रेरित करने का स्वप्न देखती थी, जो अत्याचार सहन करना अपना धर्म मानते थे। उसके मस्तिष्क में धर्म की एकमात्र परिभाषा यह ही थी कि “प्रत्येक मनुष्य को एक मनुष्य की भाँति जीवन—यापन करने का अधिकार है और दूसरों से मान—सम्मान तथा सहायता की अभिलाषा रखने वाले प्रत्येक सामाजिक प्राणी को यह सब कुछ दूसरों को देना भी चाहिए !”

अपने परिवेश में सविता को इसके विपरीत धर्म देखने को मिलता था। वह देखती थी, एक व्यक्ति दूसरे के साथ अत्याचार की सीमा तक दुव्र्यवहार करता है और पीडि़त व्यक्ति अपना विरोध भी प्रकट नहीं करता है । वह मूक होकर उन अत्याचारों को सहन करता है, क्योंकि उसको लगता है कि अत्याचार सहना उसका धर्म है। धर्म की यह धारणा सविता ने एक परिवार के अन्दर रहने वाले अनेक सदस्यों के बीच, कहीं—कहीं दो परिवारों के बीच, जो दूर रहते हुए भी रक्त—सम्बन्धी थे तथा विस्तृत समाज के अनेक वर्गों के बीच देखी थी। धर्म की इस धारणा को बदलने के लिए वह बेचैन—सी रहती थी।

समय अपनी गति से आगे बढ़ रहा था और सविता धीरे—धीरे बड़ी हो रही थी। अब भी उसके परिवेश में दिन—प्रतिदिन छोटी—बड़ी घटनाएँ घटित हो रही थी। अब उसने पिता से इस प्रकार के प्रश्न करना बन्द कर दिया था। उसको विश्वास था कि बड़ी होकर वह अपने प्रश्नों का उत्तर स्वयं ढूँढ लेगी।

समय के साथ सविता बड़ी हो गयी थी। शरीर के विकास के साथ—साथ उसका बौद्धिक तथा संवेदनात्मक विकास भी हुआ था। अब वह अपनी बाल्यावस्था के प्रश्नों का उत्तर ढूँढने में सक्षम हो गयी थी । परन्तु यह समय तब आया था, जब वह अपने पिता से दूर अपने पति के घर गृहस्वामिनी बनकर चली गयी थी। अब, जबकि वह मानसिक रूप से पूर्ण परिपक्व हो चुकी थी, तब प्रसंगवश कभी भी उसके मानस पटल पर अनायास ही वे घटनाएँ चित्रित होने लगती थी, जिन्होने बाल्यावस्था में उसके चित् पर गहरा प्रभाव डाला था।

सविता के विवाह को दो महीने हो चुके थे। इस समयान्तराल में वह अपने पिता के घर केवल एक बार चार दिन के लिए गयी थी। शेष समय अपनी ससुराल में व्यतीत करने पर भी वह अभी तक इस बात का अनुभव नहीं कर पा रही थी कि वह घर उसका अपना है ; उस घर के सभी लोग उसके अपने हैं और वे सभी लोग उसको अपना समझते हैं, जो उसके ससुराल पक्ष से सम्बन्ध रखते हैं। यद्यपि वह प्रति—क्षण प्रयास करती थी कि अपन सेवा-भाव और मैत्री-व्यवहार से ससुराल के प्रत्येक व्यक्ति के हृदय में अपना स्थान बनाये, परन्तु बहू के सम्बन्ध में ससुराल वालों की कुछ रूढ़ धारणाएँ उसके प्रयास के प्रतिफलन में बाधक बन रही थी।

एक छोटे से शिक्षित—परिवार में पली—बढ़ी सविता के मनःमस्तिष्क में कभी ससुराल पक्ष के प्रति नकारात्मक भाव विकसित नहीं किये गये थे, इसलिए उसने ससुराल में मिलने वाले कष्टों के प्रतिरोध की कभी कल्पना नहीं की थी। वह सदैव एक आदर्श ससुराल की कल्पना करती थी। पति के रूप में वह सदैव उस रामचन्द्र जैसे पुरुष की कल्पना करती रही थी, जो अपनी पत्नी—सीता की अभिलाषा को पूर्ण करने के लिए स्वर्ण—हिरण बनकर विचरण करते हुए मारीच का शिकार करने के लिए तत्पर हो गया था और छले जाने पर सेना संगठित करके जिसने राक्षसों के साथ युद्ध करके अपनी प्रिय पत्नी को राक्षसों से मुक्त कराया था। स्वयं सविता में एक आदर्श बेटी, आदर्श पत्नी तथा आदर्श बहू के संस्कार विकसित किये गये थे, इसलिए उसमें एक अद्वितीय आत्मविश्वास था। उसे विश्वास था कि ससुराल में वह अपनी सर्वगुण सम्पन्नता से सबका हृदय जीत लेगी, इसलिए सदैव उसको स्नेह और सम्मान प्राप्त होता रहेगा ।

परन्तु, ससुराल में जाकर सविता का विश्वास डगमगाने लगा। आत्मविश्वास से परिपूर्ण उसका हृदय ससुराल पक्ष से मिलने वाले उपेक्षापूर्ण व्यवहारों से तथा कटु—व्यंग—वाणों की वर्षा से आहत हो उठा। उसके विश्वास को नित्य प्रति नये—नये झटके लगने लगे थे। उसके विश्वास को सबसे बड़ा झटका तब लगा था, जब उस समाज की रूढ़ और त्याज्य विचारधारा के विषय में सविता को अपने पति के व्यवहार के माध्यम से ज्ञात हुआ। उस दिन एक छोटी सी ऐसी गलती के लिए सविता के पति ने उसे थप्पड़ मार दिया था, जो वास्तव में सविता ने की ही नहीं थी, बल्कि उसके पति को उसका भ्रम हुआ था। यह बात स्पष्ट हो जाने पर कि उसने कुछ अनुचित नहीं किया है, सविता को अपने पति रवि से अपेक्षा थी कि पत्नी के साथ दुर्व्यवहार करने की भूल स्वीकारते हुए उसको क्षमा माँगनी चाहिए, अथवा कम—से—कम खेद तो अवश्य ही प्रकट करना चाहिए।

पत्नी के समक्ष खेद व्यक्त करना रवि के संस्कारों के प्रतिकूल था। उसकी अहंमन्यता भी इसमें बाधा बन रही थी, क्योंकि जिस समाज में रवि पला—बढ़ा था, उस समाज में स्त्री को ‘पैर की जूती’ माना जाता था। उस समाज से रवि ने यही सीखा था कि स्त्री को आरम्भ से ही नियत्रण में रखना चाहिए, अन्यथा वह सिर पर चढ़कर तांडव करने लगती है। स्त्री की उचित बात का भी विरोध करना उस समाज की परम्परा थी । उस विरोध के पक्ष में तर्क दिया जाता था कि ‘स्त्री की बुद्धि गुद्दी (गर्दन) के पीछे (पृष्ठ भाग) होती है। इसका आशय था कि स्त्रियों की सोच अपेक्षाकृत कम तथा नकारात्मक होती है। अपने दम्भ को सुरक्षित रखते हुए उस समाज के लगभग सभी पुरुष इस परम्परा का अनुपालन करते थे। रवि भी उन्हीं पुरुषों में से एक था। उस समाज का एक अंश होते हुए भी जो पुरुष इस परम्परा का अनुपालन नहीं करते थे, उन्हें वह समाज ‘जोरु का गुलाम’ की संज्ञा से अभिहित करता था और प्रायः मनोरंजन के साधन के रूप में उस नाम की चर्चा करता था।

चूँकि रवि अपने बचपन से उस समाज का अभिन्न अंग रहा था, इसलिए उस समाज के प्रत्येक नियम और मान्यता का सम्मानपूर्वक पालन करते हुए अपनी प्रतिष्ठा में उत्तरोत्तर वृद्धि करना उसका लक्ष्य था। परन्तु, अपने भ्रम का शिकार होकर सविता को थप्पड़ मारना स्वयं उसके चित्त को बार—बार अशान्त कर रहा था। अब उसका चित्त द्विधा विभाजित हो गया था। अपने समाज की परम्परा का पालन करके अपनी प्रतिष्ठा तथा अहंभाव की रक्षा करे या पत्नी के समक्ष अपनी भूल को स्वीकार करे ? पर्याप्त समय तक वह ऊहापोह में फँसा रहा। अन्त में उसका दम्भ विजयी हुआ और वह सविता से बोला— “तुम स्त्रियों की सबसे बड़ी कठिनाई यही है ! पहले गलती करना, फिर जुबान लड़ाना, उसके बाद किसी ने जरा—सा कुछ कह दिया, तो घर सिर पर उठा लेना !”

रवि का वक्तव्य सुनकर सविता ने कुछ नहीं कहा। उसके पास अब कहने के लिए कुछ शेष नहीं रह गया था या शायद वह उस समय रवि के साथ तर्क—वितर्क करना चाहती थी, क्योंकि कुछ मिनट पूर्व रवि के क्रोध का शिकार होकर वह उसका थप्पड़ खा चुकी थी, जबकि वह स्वयं की निर्दोषता सिद्ध करने का प्रयत्न कर रही थी, जिसे रवि की अहंकृति ने अपना अपमान अनुभव किया था। अतः सविता ने उस समय रवि का विरोध करते हुए अपने पक्ष में कुछ न कहना ही उचित समझा। सविता को शान्त देखकर रवि थोड़ा—सा विचलित हो गया और उसने पुनः कहना आरम्भ किया —

“मैंने तुझे एक थप्पड़ मार दिया, तो कौन—सा पहाड़ टूट पड़ा ! तू मेरी पत्नी है, मेरा इतना तो अधिकार बनता है !” सविता अब भी चुप रही। उस पर पति का कितना अधिकार है ? वह इस विषय पर बहस नहीं करना चाहती थी, क्योंकि उसका अपना विचार था कि वह किसी के अधिकार की वस्तु नहीं हो सकती ; वह कोई निर्जीव वस्तु नहीं है, बल्कि उसका अपना अस्तित्व है ; वह एक बुद्धिजीवी-संवेदनशील मनुष्य है ! वैसे भी, अपने जीवन में आज तक सविता ने अधिकारों की अपेक्षा कर्तव्यों को ही प्राथमिकता दी थी।

अपने विचारों में तल्लीन सविता के चेहरे को भाव—शून्य देखकर रवि ने अपने अधिकार—क्षेत्र को पुनः प्रमाणित करने का प्रयास किया —

“एक हल्का—सा थप्पड़ लगने पर सुबह से तेरी त्यौरी चढ़ी हुई हैं ! प्रेमा चाची को देखो ! अरे, वही, सोनू की मम्मी, जो दिन में कई बार माँ के पास आती रहती है ! समझ गयी न ?......जब से सोनू—मोनू बड़े हो गये हैं, तब से तो चाचा ने बन्द—सा ही कर दिया है, वरना, वे चाची को इतना पीटते थे कि हमारे घर तक उनके पीटने की आवाज आती थी। ऐसा लगता था, जैसे किसी पशु को पीट रहे हों ! चाची चीखती—चिल्लाती रहती थी और चाचा थे कि जितना चाची चिल्लाती थी, उतना ही अधिक मारते थे !” कहते हुए रवि के चेहरे के भाव बता रहे थे कि उसके हृदय को कभी भी चाची की पीड़ा ने द्रवित नहीं किया था। उसने उस समय भी चाचा की पाशविक वृत्ति को सराहा होगा और आज भी वह उसी वृत्ति का आनन्द लेते हुए सविता के समक्ष उसका वर्णन कर रहा था। अपनी कहानी का समापन करते हुए रवि ने हँसी का एक हल्का—सा ठहाका लगाया और बोला—

“जब कभी अपने घर का या पास—पड़ौस का कोई भी व्यक्ति उनके उस व्यवहार पर प्रश्नचिह्न लगाता था, चाचा कहते थे कि हमारे बड़े बुजुर्ग कह गये हैं —

ढोल, गँवार, शूद्र, पशु, नारी ।

ये पाँचों हैं डंडे के अधिकारी ।।

चाचा के इस तर्क के आगे सबकी बोलती बन्द हो जाती थी।” अपनी बात समाप्त करके रवि ने पुनः एक ठहाका लगाया और इस आशा से सविता की ओर देखने लगा, जैसे वह सविता के चेहरे पर संन्तोष मिश्रित प्रसन्नता का भाव देखना चाहता था कि उसका पति उसको चाचा की भाँति नहीं मारता—पीटता है अथवा अभी तो कम—से कम ऐसा नहीं किया है। सविता का चेहरा अब भी भाव—शून्य था। रवि उसकी भाव—शून्यता से बेचैन था, किन्तु उसका दम्भ पत्नी को यथोचित प्रेम और सम्मान देने में बाधक बना हुआ था। उसे लगता था कि पत्नी के साथ नम्रता और प्रेमपूर्वक व्यवहार करने से पत्नी को अनावश्यक सम्मान तथा उसका स्वयं का अपमान हो जायेगा ! शायद अपने इसी विभ्रम के चलते वह सविता के प्रति अपने हृदयस्थ भावों को अभिव्यक्त नहीं कर पा रहा था। पत्नी के प्रति अपने हृदयस्थ प्रेम—भाव को प्रकट करने के मार्ग में भी उसका दम्भ रोड़ा बन रहा था। चूँकि सविता का मौन अब उसके लिए असह्य बन गया था, इसलिए अहंकारपूर्ण शैली में प्रेम प्रकट करते हुए उसने सविता से कहा —

“चल, थोड़ी—सी देर तू मेरे पैर दबा दे, बहुत तेज दर्द हो रहा है आज पैरों में । माँ तुझे हमेशा कहती रहती है, पति के पैर दबाया करते हैं, पर तू उनकी सुनती ही कब है ! वे पत्नी धर्म सिखाती हैं, तो तुझे उनकी बातें अटपटी लगती हैं ।”

स्त्री के प्रति पति के दृष्टिकोण से सविता हतप्रभ थी। पिता के घर में प्यार—दुलार से पली—बढ़ी और सभी प्रकार के कार्य से मुक्त रहने वाली सविता ने ससुराल में आते ही घर का सारा कार्यभार सम्भाल लिया था, लेकिन परिवार वाले तथा पास—पड़ौस वाले निकट—सम्बन्धी अपनी छिद्रानवेषी प्रवृत्ति के कारण सदैव उसके कार्यों में दोष ढूँढते रहते थे। सविता उनकी इस प्रवृत्ति से अनेक बार तनावग्रस्त हो जाती थी। वह सोचती थी कि समस्या को पति के साथ साझा करके अपना तनाव कम कर ले, किन्तु घर में क्लेष बढ़ने का भय उसको ऐसा करने से रोक देता था। उसके मनोमस्तिष्क में एक भय उत्पन्न हो जाता था कि यदि उसने अपनी समस्याएँ पति के समक्ष प्रस्तुत की, तो अवश्य ही पति उसकी पीड़ा का अनुभव करके कोई ऐसा सक्रिय कदम उठा बैठेगा, जिसका पारिवारिक सम्बन्धों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है और परिवार की व्यवस्था छिन्न—भिन्न हो सकता है।

पारिवारिक व्यवस्था के प्रति सचेत—संवेदनशील सविता का अपने पति के प्रति विश्वास अब छिन्न—भिन्न हो गया था। उसके पति ने न केवल उसको थप्पड़ मारा था, अपितु उसके समक्ष स्त्रियों तथा दलितों के प्रति अपने दृष्टिकोंण को भी चाचा का दृष्टान्त देकर भली—भाँति स्पष्ट कर दिया। उस समय सविता ने प्रत्यक्षतः कुछ नहीं कहा, परन्तु, पति के दुव्र्यवहार तथा विकृत विचार—दृष्टि से आहत वह सोचने लगी — “पत्नी पर अत्याचार करने वाला पुरुष इस युग में भी यह अनुभव करता है कि पत्नी के साथ अनुचित व्यवहार करना उसका अधिकार है ! वह अपने अधिकारों के प्रति जितना सचेत है, कर्तव्यों के प्रति उतना ही उदासीन है। वह पत्नी—धर्म को प्रतिक्षण जितनी प्रमुखता से प्रस्तुत करता है, पति—धर्म पर उतनी ही तत्परता से आवरण डालता है। वह अपेक्षा करता है कि पत्नी उसकी तथा उसके परिवार की श्रृद्धासहित सेवा करे ; उसके पैर दबाये ! लेकिन, पत्नी के साथ अपना तथा परिवार का व्यवहार ? पत्नी अपने पति से तथा उसके परिवार वालों से क्या अपेक्षाएं रखती है ? इन प्रश्नों पर रवि तथा उसका समाज पूर्णतया मौन है ! आखिर क्यों ? कब तक पुरुष इस प्रकार संवेदनहीन बनकर स्त्री की पीड़ा का अनुभव नहीं करेगा ? कब तक पुरुष अपने अधिकारों की सूची से स्त्रियों के अधिकारों को ढकता रहेगा ? कब तक वह स्त्री को उसके कर्तव्यों का बोध कराते हुए स्वयं कर्तव्य—विमुख होता रहेगा ?...... नहीं ! इन सब प्रश्नों का उत्तर वह नहीं दे सकता है। उसमें इतनी सामर्थ्य नहीं है कि वह इन प्रश्नों का उत्तर दे सके ! इन प्रश्नों का उत्तर देने में यदि कोई सक्षम है, तो वह स्त्री है। न केवल इन प्रश्नों का उत्तर देने की सामर्थ्य है उसमें, बल्कि यदि वह संकल्प कर ले, तो इन समस्याओं से सदैव के लिए मुक्ति पा सकती है। हाँ ! यह सम्भव है, यदि वह संकल्प कर ले कि उसे अपनी खोयी हुई शक्तियों को जगाकर समाज—हित में उनका सदुपयोग करना है, ताकि सम्पूर्ण समाज का उत्थान हो सके ! हाँ! यह संभव है ! यह संभव है !”

“कहाँ खो गयी ? क्या सोचने लगी ?” सविता को विचारों में डूबी हुई देखकर रवि ने उसको झंझोड़ते हुए कहा।

“ हँ—अँ .., कहीं नहीं खोयी ! पर मैं आपके पैर नहीं दबा पाऊँगी ! दिन—भर घर के कार्य करते—करते मुझे भी थकान का अनुभव होने लगता है, इसलिए मैं भी आराम करना चाहती हूँ ! और हाँ ! जिस पत्नी—धर्म की चर्चा आप प्रायः करते रहते हैं, वह चर्चा न किया करें तो अधिक उचित है, क्योंकि उसमें पुरुष के एकांगी अधिकारों की तथा स्त्री के एकांगी कर्तव्यों की सूचना होती है। इसी विषमता का अनुभव किया होगा राष्ट्र कवि मैथिलीषरण गुप्त ने ! तभी तो उन्हें यह लिखने की आवश्यकता पड़ी —

‘नर कृत शास्त्रों के बन्धन हैं, नारी ही को लेकर ।

अपने लिए सभी सुविधाएँ, पहले ही कर बैठे नर ।।’

वैसे भी, आज युग बदल चुका है। आज की शिक्षित महिला उचित—अनुचित का भेद समझती है। आप को भी युगानुरूप अपनी प्रवृत्ति और विचारों को बदल लेना चाहिए !” चूँकि सविता में कुछ क्षण पूर्व ही अपनी विचारशीलता के परिणामस्वरूप सकारात्मक ऊर्जा का संचार हो चुका था, इसलिए अब उसका व्यवहार सशक्त था एवं शब्द अधिकारपूर्ण शैली में कहे गए थे। अपने विचार प्रकट करके सविता बिस्तर पर लेट गयी और सोने का प्रयास करने लगी । कुछ समय तक सविता सोने का असफल प्रयास करती हुई यह अभिनय करती रही कि वह सो चुकी है। परन्तु, पति का व्यवहार तथा स्त्रियों के प्रति पति के विकृत विचार रह—रह कर सविता के मस्तिष्क में टकरा जाते थे ।

वह रात—भर सो नहीं सकी थी । किन्तु, जागरणावस्था में चिन्तन—मनन करते हुए आज उसे अपने अन्तःकरण में मातृशक्ति का अभूतपूर्व अनुभव हुआ और उसने दृढ़तापूर्वक एक योजना बना डाली। अब उसके समक्ष अपनी योजना को क्रियान्वित करने की एक बड़ी चुनौती थी, जिसके लिए साहस और शक्ति की नितान्त आवश्यकता थी। सविता ने एक बार पुनः अपनी योजना को क्रियान्वित करने का दृढ़ संकल्प किया । उसी क्षण उसको अपनी आत्मा के साथ अपने शरीर में अकथनीय अद्वितीय शक्ति के संचरण की अभूतवूर्व अनुभूति हुई और उसके साहस में वृद्धि होती चली गयी।

प्रातः प्रतिदिन की भाँति सविता ने सबसे पहले बिस्तर छोड़ा और अपने दैनिक कार्यों से निवृत्त होकर पूरे परिवार के लिए नाश्ता तैयार किया। तत्पश्चात् वह घर से बाहर जाने के लिए तैयार हो गयी। आज तक उसको घर से बाहर अकेले जाने की अनुमति नहीं थी, इसलिए सास ने उसकी अधिकार—सीमा का आभास कराते हुए टोका — “बहू ! अकेली कहाँ जा रही है ?”

“मन्दिर ! मन्दिर जा रही हूँ !” सविता ने तल्खी से उत्तर दिया। उसकी सास को उसकी कटुता का कारण ज्ञात नहीं था, लेकिन इतना अवश्य जानती थी कि आज से पहले वह पूजा—उपासना घर में ही करती थी, कहने पर भी कभी मन्दिर नहीं जाती थी, इसलिए उसकी तल्ख मुद्रा के पीछे कोई बड़ा कारण हो सकता है । अपनी शंका के निवारण हेतु सविता की सास उससे कुछ और प्रश्न करती, तब तक सविता घर से बाहर जा चुकी थी। पास—पड़ोस में किसी को सविता की तल्खी के विषय में कुछ ज्ञात न होने पाए, इसके प्रयासस्वरूप सास तेज कदमों से उसके पीछे—पीछे मन्दिर तक जा पहुँची। मन्दिर में सास ने बार—बार सविता से उससे उसकी अप्रसन्नता का कारण पूछा, परन्तु सब विफल रहा। सविता ने मन्दिर में अकेली आने का कारण नहीं बताया । वह मन्दिर-परिसर में साधुओं के लिए बनायी गयी कुटी में जाकर बैठ गयी । यह देखकर सास ने घर की मान—मर्यादा का वास्ता देकर सविता से घर लौट चलने का आग्रह किया, पर वह घर लौट जाने के लिए तैयार नहीं हुई। अपने उत्तर में उसने मात्र इतना कहा — “इस पूरे ब्रह्माण्ड में ईश्वर सबका स्वामी है, उसके द्वार पर आने के लिए किसी को किसी के साथ की या किसी की अनुमति की आवश्यकता नहीं है।”

सविता और उसकी सास के बीच की मान—मनुहार देखकर उधर से जाती—आती स्त्रियाँ भी वहाँ एकत्र होने लगी। जिस बात का डर था, वही हुआ। घर की बात बाहर आ गयी थी, इसलिए सास बहुत दुखी थी। सविता जानती थी, यह बात किसी एक घर की नहीं, घर—घर की है। हर घर में रहने वाली हर स्त्री की है, जो गृह-प्रासाद की नींव में दबी है ; जिस पर घर की सुख—शान्ति का प्रासाद चमकता—दमकता है । परन्तु संवेदनाहीन समाज को परिवार की आधारशिला नींव की इस ईंट के विषय में विचार करने की आवश्यकता का कभी एहसास ही नहीं हुआ। सविता ने संकल्प कर लिया कि परिवार—प्रासाद की नींव — नारी-शक्ति और उसके महत्तव का एहसास वह इस समाज को अवश्य कराएगी । उसको पूर्ण विश्वास था कि जिस महत्तवपूर्ण, किन्तु कठिन कार्य को करने का उसने बीड़ा उठाया है, उसमें उसको सफलता अवश्य मिलेगी।

सुबह से शाम हो गयी। शाम से रात और रात से पुनः सुबह और पुनः रात हो गयी, किन्तु सविता घर नहीं लौटी। मन्दिर में ही उसने पुजारी द्वारा दिया गया प्रसाद ग्रहण करके पेट की ज्वाला शान्त की। गाँव में ग्राम सभा के चुनाव निकट थे। सविता का पति रवि ग्राम—प्रधान पद का प्रत्याशी था। रवि की पत्नी सविता के घर छोड़कर चले जाने से समाज में रवि और उसके परिवार के प्रति एक प्रकार का नकारात्मक संदेश जा रहा था, जिसका शत—प्रतिशत प्रभाव रवि की जीत—हार पर पड़ने की संभावना थी। इसलिए सविता के घर न लौटने से रवि स्वयं तथा उसका पूरा परिवार और अधिक बेचैन थे। इन दो दिनों में सविता के परिवार वालों ने गाँव समाज के समक्ष यह तर्क भी दिया कि जैसे कृष्ण-भक्त मीराबाई मन्दिर में रहकर भगवान के भजन गाती थी, वैसे ही सविता भी भगवान की भक्त है, जो किसी भी प्रकार अनुचित नहीं है। साथ ही सविता को घर लाने के लिए उन्होंने उस पर बल का प्रयोग भी किया, परन्तु सविता पूरे आत्मविश्वास और दृढ़ता के साथ अपने निर्णय पर अटल थी। इन दो दिनों में उसे बिना माँगे अपने परिवार के विरुद्ध गाँव का समर्थन प्राप्त हो गया था, जिसमें से स्त्रियों का समर्थन संवेदनात्मक था और पुरुषों का समर्थन स्वार्थ की राजनीति से प्रेरित था।

इन दो दिनों में सविता मीरा—भक्तिन के नाम से प्रसिद्ध हो गयी थी। उस गाँव की और आस—पास के अन्य गाँवों की स्त्रियाँ अब उसके दर्शनार्थ मन्दिर में आने लगीं। वह दिन—भर भगवान के भजन गाती और आने—जाने वाली स्त्रियों को परमात्मा की शक्ति और भक्ति की महिमा बताती रहती। धीरे—धीरे जैसे—जैसे मन्दिर में आने वाली स्त्रियों की संख्या बढ़ती गयी, वैसे—वैसे सविता का सम्पर्क क्षेत्र भी बढ़ता गया। अब सविता ने मन्दिर में आने वाली स्त्रियों को परम तत्त्व के संबंध में प्रवचन सुनाने का समय निश्चित कर दिया और निर्धारित समय पर प्रवचन करने लगी। एक दिन अपनी योजनानुसार उसने प्रवचन सुनने के लिए मन्दिर के प्रांगण में एकत्र स्त्रियों से कहा —

“आप में से किसी ने कभी अपने मुँह पर किसी का भी थप्पड़ खाया है ? मुँह पर लगने वाले थप्पड़ से होने वाली पीड़ा की अनुभूति कभी हृदय की वेदना बनकर तुम्हें टीसती है ? मेरी बहनों ! हम स्त्रियों को भगवान ने भावुक बनाया है, क्या हम सब पूर्णनिष्ठा के साथ अपनी भावनाओं का परस्पर आदान—प्रदान नहीं कर सकते ?” अपने शब्दों की प्रतिक्रिया जानने के लिए सविता ने वहाँ पर उपस्थित प्रत्येक स्त्री को आशा की दृष्टि से देखा । किन्तु, कुछ स्त्रियाँ अपनी वेदना-विनिमय करने में संकोच कर रही थीं, तो कुछ पीड़ा सहना स्त्रियों की नियति मानकर मौन थी। सविता ने एक क्षण के लिए वैचारिक मुद्रा धारण की और अगले क्षण वहाँ पर उपस्थित प्रत्येक स्त्री को एक—एक करके अपने पास बुलाकर उनके हृदय में दबी वेदना को प्रकट करने के लिए उन्हें प्रेरित किया। कुछ ही समय में सविता ने देखा कि अधिकांश स्त्रियाँ अपनी वेदना का आदान-प्रदान कर रही हैं और वर्षों से दबी हुई हृदयस्थ व्यथा को व्यक्त करके सुखानुभूति कर रही हैं । सविता ने सबको सुना और एक क्षण रुककर पुनः कहना आरम्भ किया —

“पशु—पक्षी, कीड़े—मकोड़े, स्त्री—पुरुष सभी में उसी एक परमात्मा का अंश है। सभी से प्रकृति की शोभा है, सभी का समान महत्तव है, फिर कोई एक किसी दूसरे को पीड़ा देने का अधिकारी कैसे हो सकता है ? स्त्री—पुरुष के समान महत्त्व और समान अधिकारों को नकारने का अर्थ है प्रकृति के विरुद्ध जाना, जो समाज के हित में नहीं है। मैं यह स्वीकार नहीं कर सकती कि स्त्री—पुरुष की शारीरिक बनावट के भेद को आधार बनाकर कोई मेरे अस्तित्व का अपहरण कर ले या प्रकृतिदत्त मेरे अधिकारों का हनन करे ! स्वयं ईश्वर ने स्त्री को इतना शक्तिशाली बनाया है कि सृष्टि का संवर्द्धन—संरक्षण उसके बिना असंभव है। शिशु को जन्म देना, उसका सस्नेह पालन—पोषण करना, आजीवन उसके जीवन को सरस बनाना आदि कार्यों में पुरुष की अपेक्षा स्त्री का अधिक योगदान है । यदि स्त्री को अपनी नैसर्गिक शक्ति का आभास हो जाए, तो वह समाज की रूढ़ व्यवस्था में आमूल—चूल परिवर्तन करके इस धरती को स्वर्ग से सुन्दर प्राणी—मात्र के सुखी रहने योग्य बना सकती है। असंभव को संभव कर सकती है। बस, आवश्यकता है अपनी मातृशक्ति को पहचानकर विचार—परिवर्तन की और उन परिवर्तित विचारों को नित्य—व्यवहार में लाने की ! सोचिए, एक भ्रूण जब माँ के गर्भ में विकसित होते हुए जब अपनी माँ से मातृशक्ति का वैचारिक परिचय ग्रहण करेगा, वही शिशु गोद में खेलते हुए अपनी माँ से मातृशक्ति का व्यवहारिक अनुभव प्राप्त करेगा, तब क्या बड़ा होकर कभी भी वह अपने मनोमस्तिष्क में किसी स्त्री के प्रति दुष्कृत्य—भाव रखते हुए पाशविक आचरण कर सकता है ! किसी निर्बल स्त्री की पीड़ा का कारण बन सकता है ? नहीं, कदापि नहीं ! आप सब मेरे विचारों से सहमत हैं ?” वहाँ पर उपस्थित स्त्री—समूह पर मीरा भक्तिन के शब्दों का प्रायः अनुकूल प्रभाव पड़ा था, इसलिए प्रश्न पूरा होने से पहले ही उपस्थित स्त्री—पुरुषों ने अपना समर्थन प्रकट करने के लिए दोनों हाथ उठाकर जयघोष करना आरम्भ कर दिया।

मीरा भक्तिन के सम्भाषणों से उसके प्रभाव में निरन्तर वृद्धि हो रही थी । ज्यों—ज्यों समय आगे बढ़ रहा था, त्यों—त्यों मीरा भक्तिन के समर्थकों की संख्या बढ़ती जा रही थी। मतदान की तिथि निकट आ गयी थी। मीरा की बढ़ती लोकप्रियता से एक ओर रवि और उसका परिवार परेशान था, तो दूसरी ओर रवि के प्रतिद्वंद्वी तथा अन्य प्रत्याशी मीरा भक्तिन के समर्थकों के मत प्राप्त करने की लालसा लेकर नित्य—प्रति मीरा भक्तिन के दरबार में उपस्थित होकर अपना चुनावी एजेंडा बखान रहे थे। मीरा भक्तिन ने अपने समर्थकों से उस विषय पर विचार—विमर्श किया। सभी समर्थकों ने एक स्वर में कहा — “वर्तमान प्रत्याशियों में से कोई एक भी प्रत्याशी मनुष्य—मात्र के हितार्थ चुनाव जीतने का इच्छुक नहीं है । सभी प्रत्याशी अपने क्षुद्र स्वार्थों से प्रेरित हैं।” मीरा भक्तिन ने अनुभव किया कि उसका मत आज उसके समर्थकों का प्रत्यक्ष मत बन गया है, इसलिए अब परस्पर चर्चा करके सर्वसम्मति से एक योग्य और कल्याणकारी व्यक्तित्व की खोज अनिवार्य हो गयी है । गहन चिन्तन-मनन पश्चात् सविता ने इस विषय पर गम्भीरतापूर्वक विमर्श करने के लिए एक विचार-सभा बुलायी । सभा में लोकतांत्रिक ढंग से सभी लोगों को अपने विचार व्यक्त करने का यथोचित अवसर प्रदान किया गया और बहुमत के आधार पर अन्तिम निर्णय लिया गया । तत्पश्चात् मतैक्य के अनुरूप अन्तिम निर्णय को यथोचित दिशा में क्रियान्वित करने के लिए वर्तमान सभी प्रत्याशियों को अस्वीकार किया गया और उस ग्राम सभा के अस्सी प्रतिशत वयस्क नागरिकों का सहमति—हस्ताक्षरित ज्ञापन डी एम को भेजा गया, जिसमें एक नये नाम का प्रस्ताव भी था। नया नाम था— मीरा भक्तिन।