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फ़हीमा

फ़हीमा

क़ैस जौनपुरी

फ़हीमा एक पागल लड़की है. बहुत ज़्यादा बोलती है. कम समझती है. झगड़ा बहुत करती है. थोड़ी सी अच्छी भी है. सबका ख़याल रखती है. खाना बनाती है. उसे मछली बनाना नहीं आता है. उसकी अम्मी कहती हैं, "सीख लो, नहीं तो शादी के बाद परेशानी होगी."

फ़हीमा को इस बात से कोई फ़रक़ नहीं पड़ता है. वो कहती है, "मैं जो खाती हूँ, वही बनाऊँगी." और फिर हँस के भाग जाती है. उसकी अम्मी उसे बस देखती रह जाती हैं कि, “ये मेरी बेटी है?”

रेहाना फ़हीमा की बड़ी अच्छी दोस्त है. रेहाना की शादी है. रेहाना का मेकअप भी फ़हीमा ने ही किया था. फ़हीमा घर के कामों के अलावा सिलाई का काम जानती है. साड़ी में फ़ॉल लगाना हो तो झट से कर देती है. उसे ब्यूटीशियन का काम भी आता है. दुल्हन का मेकअप करना हो, मेंहदी लगाना हो, सब फ़हीमा को ही बुलाते हैं. लेकिन फ़हीमा दोस्तों से पैसे नहीं लेती, इसलिए उसने रेहाना का मेकअप भी फ्री में किया था. आख़िर वो उसकी दोस्त है, अपनी दोस्त से पैसे कैसे ले सकती है? अच्छा नहीं लगता है ना!

लेकिन बाक़ी लोगों से फ़हीमा एक रुपया भी नहीं छोड़ती है. सारा पैसा वो अपनी अम्मी को देती है. और उसकी अम्मी उसकी शादी के लिए पैसे जुटा रही हैं. कुल मिलाके फ़हीमा एक सीधी-सादी अच्छी सी लड़की है.

शादी की चहल-पहल में फ़हीमा की नज़र वहाब से टकरा गई और हाय अल्लाह!!! फ़हीमा को पहली ही नज़र में प्यार हो गया. उस पगली ने न कुछ जाना, न पूछा, और बेवक़ूफ़ों की तरह वहाब का विज़िटिंग कार्ड ले लिया.

  • “वक़्त मिले तो फ़ोन कीजिएगा.”
  • जब वहाब ने इतनी इज़्ज़त से कहा तो पगली ने मुस्कुरा भी दिया. ये भी नहीं सोचा कि वहाब शादी-शुदा है. उसकी तो जैसे मति ही मारी गई थी. उस मुए वहाब ने भी पता नहीं किस नज़र से देखा था उसे कि उसकी समझ में अब सिवाय वहाब के और कुछ आता ही नहीं था. और वो करमजली फ़ोन करके उसे ‘जानू’, ‘बाबू’ और ‘सजनवा’ बुलाने लगी. आग लगे ऐसे इश्क़ को, जो उम्र भी नहीं देखता.

    फ़हीमा अभी कुल सत्रह की थी. अभी तो वो ठीक से जवान भी नहीं हुई थी, और चल पड़ी थी इश्क़ लड़ाने, वो भी एक ऐसे आदमी से, जो पहले से ही शादी-शुदा था और उम्र में उससे पूरे दस साल बड़ा था. पता नहीं क्या हो गया है ज़माने को? किसी को भी, किसी से भी, बस प्यार हुए जा रहा है. और नहीं तो क्या? भला ऐसा भी होता है कहीं? कली खिली नहीं, और चला आया कोई उसे मसलने!

    ऐसा लगता है, वहाब के बात करने का अन्दाज़ उसे भा गया था. घर पे तो उसे सब “अरे फ़हिमिया! कहाँ मर गई?” और “इतना सारा काम छोड़के कहाँ घूम रही है?” यही सब सुनने को मिलता था. ऐसे में कोई प्यार से “कैसी हो फ़हीमा?” कह दे, तो कोई भी पगला जाएगा. सो हो चुकी थी फ़हीमा पागल, वहाब के प्यार में.

    एक छोटी सी मुलाक़ात के बाद, बस एक फ़ोन ही रह गया था, जो फ़हीमा को वहाब की आवाज़ सुना देता था. वहाब बड़े शहर से था. उसके पास बड़े शहर का बड़ा सा, और महँगा सा फ़ोन था. वहीं फ़हीमा के पास दो फ़ोन थे, लेकिन दोनों मरियल. एक से आवाज़ नहीं आती थी ठीक से, तो दूसरे में मिस्ड कॉल करने के भी पैसे नहीं होते थे.

    लेकिन इसका भी हल उसने ढूँढ़ लिया था. वो अपने भाई के फ़ोन से मिस्ड कॉल करती थी. फिर जब वहाब पलट के फ़ोन करता, तब प्यार से कहती, “जानू! मेरे वाले पे करो ना. इसमें ठीक से आवाज़ नहीं आती.”

    फ़हीमा ‘जानू’ इतने प्यार से कहती थी कि वहाब मना नहीं कर पाता था. फिर दोनों फ़ोन पे घण्टों बात करते. और पता है? एक दिन फ़ोन पे ही सबकुछ हो गया. हाँ! सबकुछ. वहाब ने उससे जो-जो कहा, फ़हीमा ने वो सब किया. बाद में उसे बड़ी शरम आई, जब उसकी शलवार में कुछ गीला-गीला सा हो गया था. उसको तो ये भी पता नहीं था कि ये क्या है? उल्टा उसने वहाब से ही पूछ लिया, “सजनवा! ये क्या हुआ?” और उसके सजनवा को ये जान के उससे ज़्यादा ख़ुशी हुई कि उसने फ़ोन पे ही फ़हीमा का पानी निकाल दिया था.

    फिर ये सिलसिला चलता रहा. फ़ोन पे ही दोनों औरत और मरद के बीच होने वाली सारी बातें कर डालते. लेकिन दोनों को ये नहीं मालूम था कि ये खेल, आग का खेल है. और बड़ी जल्दी ही दोनों इसकी लपट में आ गए. अब मिलना था. लेकिन कैसे? वहाब के पास फ़हीमा के छोटे शहर आने का कोई बहाना नहीं था. जितना मुश्किल दोनों का मिलना था, उतना ही ज़रूरी अब दोनों का मिलना हो गया था. देर हो चुकी थी ना!

    दो महीने बीत गए. कोई रास्ता नहीं निकला. फिर अचानक जैसे दुआ क़ुबूल हो जाए, उसी तरह वहाब के एक दोस्त की शादी पड़ गई, जो फ़हीमा के ही शहर का था. हालाँकि फ़हीमा का घर उसके दोस्त के घर से कोसों दूर था, मगर जिस आग में दोनों जल रहे थे, वो किसी भी हद तक जाने को तैयार थे.

    और फिर तय हुआ कि दोनों मिलेंगे, ‘ठीक सात महीने बाद’. अब वहाब भी क्या करता, बेचैन कर दिया था उसे एक कमसिन सी लड़की ने. शादी के इतने सालों बाद एक सत्रह साल की लड़की उसपे फ़िदा थी. आदमी के ग़ुरूर को इससे ज़्यादा और किस बात से राहत मिल सकती है. बस वो भी सपने देखने लगा, अपनी बाहों में फ़हीमा के नाज़ुक बदन का. अब तो बस दिन काटने थे.

  • “कब आओगे जानू?”
  • फ़हीमा वहाब का मन भिगा देती थी, ये कह के. वहाब ने महसूस किया कि फ़हीमा उससे भी ज़्यादा बेचैन है उससे मिलने के लिए. फिर उसके दिमाग़ में एक ख़याल आया, जिसने उसे थोड़ा सा डरा दिया.

  • “सँभाल पाएगी?”
  • और इस ख़याल ने उसके अन्दर एक ऐसी ठण्डी सी लहर पैदा कर दी जो उसके पैर के अँगूठे से लेकर उसके सिर तक दौड़ गई. ये क्या था? उसे कुछ समझ में नहीं आया. लेकिन उसे कुछ और समझ में आया जिसकी उम्मीद फ़हीमा को नहीं थी.

  • “तुम मुझसे क्यूँ मिलना चाहती हो फ़हीमा?”
  • ये सवाल सुनके फ़हीमा तो हक्की-बक्की हो गई, “आज मेरे ‘जानू’ को क्या हो गया है? वो ऐसी बातें क्यूँ कर रहा है?

  • “क्या हुआ बाबू?”
  • फ़हीमा ने इतने प्यार से पूछा कि वहाब कट्ट से टूट गया. ये प्यार भी बड़ा अजीब है. न माने तो जान भी ले ले. मान जाए तो बस एक आवाज़ ही काफ़ी है. वहाब को समझ में आया कि, “मैं फ़हीमा को ख़राब कर दूँगा. वो तो पगलाई हुई है, कम से कम मैं तो जानता हूँ सबकुछ कि एक बार हम-दोनों के जिस्म मिलेंगे तो फिर क्या होगा?”

  • “तुम्हें नहीं लगता कि तुम मुझे कुछ ज़्यादा ही अहमियत दे रही हो?”
  • फ़हीमा हैरान हो जाती थी वहाब की इन बातों से. वहाब भी खुलके नहीं कह पाता था. इसलिए फ़हीमा ने ही कुरेदा.

  • “अबे, क्या सोचते रहते हो तुम?”
  • ये फ़हीमा की ऐसी अदा थी जो पहली बार तो वहाब को बुरी लगी थी, मगर जब फ़हीमा ने बताया कि “जानू! जिसे मैं अपना समझती हूँ, उससे ही ऐसे बोलती हूँ. सबसे नहीं.”

    और प्यार में आदमी क्या-क्या बर्दाश्त नहीं करता... इसलिए वहाब को अब फ़हीमा का ‘अबे’ उतना बुरा नहीं लगता था. वो कहता था, “जिस दिन मिलोगी ना, उस दिन तुम्हारा सारा ‘अबे’ निकाल दूँगा” और ये सुनके फ़हीमा हँस देती थी.

    लेकिन अब फ़हीमा के रोने का वक़्त आ गया था क्यूँकि वहाब अब उससे मिलना नहीं चाहता था. ये इश्क़ भी अजीब है. कभी-कभी दिल उससे ही मिलना नहीं चाहता है, जिससे मिलने के लिए जान तड़पती है. और इसी तरह फ़हीमा तड़प गई थी ये सुनके कि वहाब उससे नहीं मिलना चाहता है.

  • “बाबू! आप किसी बात से नाराज़ हो?”
  • फ़हीमा की यही ख़ास बात थी, पल भर में बच्ची बन जाती थी और पल भर में इतनी समझदार कि वहाब को भी मात दे देती थी.

  • “मैं तुम्हारी ज़िन्दगी बर्बाद नहीं करना चाहता फ़हीमा.”
  • वहाब ये कहते हुए अपने आप से कह रहा था, “क्यूँ कह रहे हो ये सब?” वो अपने अन्दर के मन से लड़ने लगा था. उसका एक मन फ़हीमा के छोटे-छोटे दानों को मसल देना चाहता था, और वहीं उसका एक और मन था जो कहता था, “जाने दो, बच्ची है अभी, ख़राब हो जाएगी.”

    ये सब बातें वो फ़हीमा से खुलके नहीं कह पाता था. लेकिन जब फ़हीमा ने देखा कि वहाब अब उखड़ा-उखड़ा सा रहता है. अच्छे से बात नहीं करता. उसके दोनों ‘बाबू’ और ‘छोटी फ़हीमा’ का हालचाल भी नहीं पूछता, तब फ़हीमा से नहीं रहा गया.

  • “जानू! मैंने आपसे कुछ तोहफ़े माँग लिए इसलिए आप नहीं मिलना चाहते मुझसे?”
  • फ़हीमा ने एक बात फेंकी थी, जिसमें वहाब फँस गया.

  • “नहीं यार! तुम समझ नहीं रही हो.”
  • वहाब ने सोचा, “अब सब कह देना ही ठीक है.”

  • “सब कुछ मुझे ही दे दोगी, तो अपने आदमी के लिए क्या बचाओगी? कल को तुम्हारी शादी होगी. मैं तुम्हारे साथ ज़िन्दगी भर तो नहीं रह सकता न? फिर तुम मुझे क्यूँ अपना सबकुछ सौंपना चाहती हो?”
  • फ़हीमा फूट-फूट के रोई. ये सब सुनना उसे बिलकुल अच्छा नहीं लगा. वो भी अपने ‘प्यारे जानू’ के मुँह से.

  • “जब मैंने आपसे प्यार किया था, तब नहीं सोचा, तो अब क्यूँ सोचूँ?”
  • फ़हीमा ज़िद पे आ गई थी.

  • “तुम समझ नहीं रही हो जानू! एक बार मिल लेने के बाद तुम परेशान हो जाओगी. कैसे सँभालोगी ख़ुद को? मैं तो तुमसे बहुत दूर रहूँगा. रात को जब तुम्हें सब याद आएगा तो क्या करोगी?”
  • “मैं सँभाल लूँगी अपने आप को. आप उसकी फ़िक्र मत करो जानू. बस मुझे मिलना है. आपको देखना है.”
  • “लेकिन मैं नहीं सँभाल पाऊँगा ख़ुद को फ़हीमा, तुम सामने रहो और मैं... मैंने तुम्हें कहीं छू दिया तो?”
  • “तो छू लेना.”
  • “और फिर मेरा मन कुछ और कर गया, फिर?”
  • “कर लेना बाबू, आपका जो जी करे, सब कर लेना. बस आना ज़रूर."
  • इतना सुनते ही वहाब की आँखों में आँसू आ गए थे. ये कैसा प्यार था? सबकुछ लुटाने को तैयार?

    वहाब को अब इतना तो समझ में आ गया था कि, “फ़हीमा मेरे साथ मस्ती नहीं कर रही है. वो सच में उतर चुकी है उस दुनिया में जिसे जुनून कहते हैं.”

    फिर उसके मन ने उससे कहा, "कोई तुमसे प्यार माँग रहा है. उसे प्यार दो."

    बस फिर सब ठीक हो गया. सारे बादल छँट गए. फ़हीमा ख़ुश. वहाब ख़ुश. फिर से वही सब बातें शुरू कि, “हम मिलेंगे तो ये करेंगे. हम मिलेंगे तो वो करेंगे.”

    अब फ़हीमा को समझ में आया कि वहाब बिल्कुल बच्चे जैसा है. जो चीज़ चाहिए, तो चाहिए. और अगर वो चीज़ न मिले तो नाराज़ तो झट से हो जाता है. जैसे जब वो फ़हीमा से कहता था, "एक 'किस्स' दो ना." तब फ़हीमा उसे बहुत परेशान करती थी. और जब वो देखती थी कि, “अब वहाब नाराज़ हो रहा है” तो उसे ढेर सारे 'किस्स' एक साथ दे डालती थी, और कहती थी, "अरे मेरा बाबू! बड़ी जल्दी नाराज़ हो जाता है." फिर वहाब उससे अपनी मनचाही जगह पे 'किस्स' करने को कहता. वो शर्माती, मगर वहाब की ज़िद के आगे हार जाती. और फिर वहाब की नसों में ख़ून दौड़ जाता. उसे ख़ुद को सँभालने में थोड़ा वक़्त लगता.

    और इस तरह, वो दिन आ गया.

  • "बाबू! आप निकले कि नहीं?" फ़हीमा अब भी डरी हुई थी कि, “कहीं वहाब अपना मन न बदल दे.”
  • इस प्यार की बड़ी बीमारी है. जिसपे पूरा यक़ीन होता है, कभी-कभी उसी पे बिल्कुल भी यक़ीन नहीं होता है.

  • "हाँ, बस तुम्हारा लहँगा लेने के लिए आया हूँ. अच्छा किया तुमने फ़ोन किया. मैं तुमसे पूछने ही वाला था. अब तुम रुको, मुझे पसन्द करने दो. तुम फ़ोन मत काटना."
  • और वहाब अपनी प्यारी सी फ़हीमा के लिए, एक बड़ी सी दुकान में, एक प्यारा सा लहँगा देख रहा था. दुकानदार ने दो-तीन डिज़ाईन दिखाईं और उनमें से वहाब को एक ऐसा लहँगा दिखा, जो एक ही नज़र में पसन्द आ गया. वहाब ने दाम पूछा, तो दुकानदार ने कहा, "दस हज़ार." डिज़ाईन ऐसा था कि वहाब दस हज़ार देने को तैयार था, मगर फ़हीमा फ़ोन पे सब सुन रही थी. उसने वहाब से कहा, "बाबू! मुझे इतना महँगा लहँगा नहीं चाहिए." और दोनों की फ़ोन पे ही बहस हो गई.

    फ़हीमा ने बात को सँभाला. उसने कहा, "बाबू! वो आपको ठग रहा है. हमारे यहाँ इतने में तीन आ जाएँगे. आप रहने दो, मैं इलाहाबाद जाऊँगी, तो वहीं से ले लूँगी."

  • "लेकिन, तुम्हीं ने तो कहा था न कि मुझे बम्बई का लहँगा पहनना है."
  • "हाँ, कहा था. लेकिन मुझे पता नहीं था न कि बम्बई में ऐसा लूटते हैं."
  • "बहुत प्यारा लहँगा है फ़हीमा, ले लेने दो. तुम्हारे ऊपर बहुत अच्छा लगेगा."
  • और तब तक वहाब ने अपने ख़यालों में फ़हीमा को उस लहँगे में देख भी लिया. अभी वो लहँगा दुकान पे था, लेकिन वहाब उतनी ही देर में उसे फ़हीमा को अपने हाथों से पहना के उतार भी चुका था. उसका बड़ा मन हो रहा था कि उसे ख़रीद ले. मगर फ़हीमा थी कि उसे कह रही थी, "बाबू! आपको मोलभाव करना नहीं आता. आप बस उस दुकान से बाहर निकल आओ."

  • "तुम पैसे की वजह से मना कर रही हो ना?"
  • "नहीं बाबू! आप समझ नहीं रहे हैं. आप आदमी हैं, दुकानदार जानता है. वो जितना कहेगा, आप दे देंगे. आप आइए, हम आपके साथ इलाहाबाद चलके अपनी पसन्द से लहँगा लेंगे."
  • वहाब को लगा, “शायद फ़हीमा महँगे की वजह से ऐसा कर रही है.” इसलिए उसने फ़ोन काट दिया. और दुकानदार से मोलभाव करने लगा. दुकानदार आठ हज़ार तक आ गया था. फ़हीमा बार-बार फ़ोन कर रही थी. वहाब ने उससे पूछा कि “अब मैं आठ हज़ार में ले लूँ क्या?”

  • "मैंने चार हज़ार तक सोचा था बाबू. अगर वो चार हज़ार तक दे, तो ले लो, नहीं तो नहीं."
  • वहाब दुकान से बिना लहँगा लिए बाहर आ गया. और वो फ़हीमा को कोसने लगा, "तुम्हें बताना ही नहीं चाहिए था."

  • "बाबू! अब आप वहाँ से निकलो. आप को देर हो जाएगी. आपकी ट्रेन छूट जाएगी.”
  • वहाब वहाँ से निकल गया. लेकिन पता नहीं क्यूँ वहाब का मन उसी लहँगे पे अटका हुआ था. और अपने आप से बहुत लड़ने के बाद भी कि “फ़हीमा गुस्सा करेगी अगर वही लहँगा ख़रीदा तो...” वहाब ख़ुद को रोक नहीं पाया और वापस उसी दुकान पे लौटकर उसने वही लहँगा ख़रीदा और फ़हीमा के पास जा पहुँचा.

    फ़हीमा ख़ुशी-ख़ुशी वहाब से मिलने आई. इतने महीनों का इन्तज़ार अब जाके ख़तम हुआ था. फ़हीमा जब वहाब से मिलने होटल में आई, तब थोड़ी डरी हुई थी. लेकिन थोड़ी ही देर में उसका सारा डर दूर हो गया, जब वहाब ने दरवाज़ा बन्द करते ही उसे अपनी बाहों में ले लिया. फ़हीमा इतनी हल्की थी कि वहाब ने उसे हवा में उछाल के अपनी गोद में उठा लिया. कुल पैंतीस किलो की तो थी वो. इसीलिए वहाब उससे कहता रहता था, “कुछ खाया-पिया करो नहीं तो बर्दाश्त नहीं कर पाओगी मुझे.” और तब फ़हीमा इस क़दर जवाब देती थी कि वहाब का चेहरा ख़ुशी से लाल हो जाता था.

    और फिर थोड़ी ही देर में फ़हीमा बिस्तर पे और वहाब की बाहों में थी. जैसे दोनों बस दरवाज़े के बन्द होने का इन्तज़ार कर रहे थे. वहाब ने फ़हीमा के जिस्म को बेतहाशा चूमना शुरू कर दिया, जैसे अब वो दुबारा नहीं मिलने वाली थी. फ़हीमा को तो कुछ समझ में ही नहीं आ रहा था कि क्या करे? वो तो बस अपने आप को सँभालने में ही लगी हुई थी. वहाब के छूने से उसके बदन में जो सनसनाहट पैदा हो रही थी, उससे उसे सबकुछ बड़ा अजीब लग रहा था. पहली बार किसी मर्द ने उसके कोरे जिस्म को छुआ था. और वहाब तो उसे ऐसे छू रहा था, जैसे उसने औरत का जिस्म पहली बार देखा है.

    और फिर जब वहाब ने भी अपने सारे कपड़े निकाल दिए और फ़हीमा को अपने सीने से लगा लिया, तब तो जैसे आग ही लग गई. फ़हीमा तो भट्टी की आग की तरह भभक उठी. और फिर उसने वहाब के जिस्म के उस हिस्से को देखा, जिसका उसे महीनों से इन्तज़ार था. इसके बाद फ़हीमा के तो पसीने छूट गए. उसके सामने एक हट्टा-कट्टा मर्द खड़ा था. और वो ख़ुद को उसकी मज़बूत बाहों में एक बच्ची सी महसूस कर रही थी. वहाब भी बड़ी कशमकश में था कि आज क्या होने वाला है उसके हाथों. और जैसे ही फ़हीमा ने वहाब के तने हुए जिस्म को अपनी तरफ़ बढ़ते देखा, उसे अपनी ‘छोटी फ़हीमा’ का हश्र दिख गया, और उसको लगा, “नहीं, मेरी तो साँस ही रुक जाएगी.”

    और फिर उसने जिस तरह का बर्ताव किया, वो वहाब को समझ में नहीं आया. वो लगी उसे हाथ-पैर मारने. और जब वहाब ने पूछा, “क्या हुआ?” तब वो रोने लगी, और कहने लगी, “मैं अपनी अम्मी को धोका दे रही हूँ जानू.”

    और ऐसे वक़्त पे इस तरह की बातें सुनके वहाब का तो दिमाग़ खिसक गया. आने से पहले उसने हज़ार बार क़ुबूलवाया था कि, “मैं सबकुछ करूँगा.” और फ़हीमा ने हर बात के लिए “हाँ” भी कहा था. लेकिन जब उसने कहा, “मैं मर जाऊँगी बाबू, अभी मेरा जिस्म इसके लिए तैयार नहीं है. कुछ हो गया तो मैं घर कैसे जाऊँगी?” तब तक वहाब ने उसकी ‘छोटी फ़हीमा’ को देख लिया था, और उसे भी यही लगा था कि, “मुश्किल है.” अब वही बात जब फ़हीमा रो के कह रही थी, तब वहाब को समझ में आ गया कि अब उसे क्या करना है. फिर वहाब उससे बड़े प्यार से पेश आया. उसने फिर कुछ नहीं किया. उसने फ़हीमा को उसके घर छोड़ दिया. और वापस बम्बई आ गया.

    फिर दोनों के बीच बातों का सिलसिला कम हो गया. अब फ़हीमा को महसूस हो गया कि, “वहाब नाराज़ हो गया है.”

    उसने जाते हुए तो कुछ नहीं कहा था. लेकिन अब वो जिस तरह से बात कर रहा था, उससे साफ़ ज़ाहिर था. और पूछने पे उसने साफ़-साफ़ कह भी दिया. उसने इन्हीं बातों के लिए तो पहले आगाह किया था. लेकिन अब कुछ नहीं हो सकता था.

    फ़हीमा को बड़ा अफ़सोस हुआ कि, “मेरा ‘सजनवा’ इतनी दूर से मेरे लिए चलके आया और मैंने उसे ख़ुश भी नहीं किया.”

    फिर उसने वादा किया कि, “अगली बार मैं सबकुछ करने दूँगी.” और फिर कई महीनों के बाद दोनों फिर मिले और बड़ी मुश्किल से वो सब हुआ जो पहली मुलाक़ात में नहीं हो पाया था. वहाब तो ख़ुश होके बम्बई आ गया. मगर फ़हीमा जो बेचैन हुई तो बस पूछिए मत! अब तो उसे फिर से मिलना था. फिर से वही सब करना था, और ज़्यादा ताकत के साथ. लेकिन बीच में सैकड़ों कोस की दूरी जान खाए जा रही थी.

    इसका कोई हल वहाब के पास नहीं था. उसने तो ऐसा कभी सोचा ही नहीं था कि फ़हीमा से रोज़-रोज़ मुलाकात होगी. लेकिन अब फ़हीमा को मिलना था, किसी भी हालत में. और वो पगली, अगली ट्रेन पकड़ के बम्बई आ गई. और अब मुसीबत खड़ी हो गई. वहाब को उसने बम्बई आके फ़ोन किया. पहले बताती तो वो आने नहीं देता. वहाब हैरान हो गया, उसका पागलपन देखके. लेकिन साथ ही साथ ख़ुश भी हुआ कि, “कोई लड़की मेरे लिए इतनी दीवानी है.”

    दोनों फिर मिले. वहाब ने उसके रहने का इन्तज़ाम कर दिया. फ़हीमा के बदन की आग थोड़ी देर के लिए ठण्डी हो चुकी थी लेकिन वो वापस नहीं जाना चाहती थी. वहाब ने बहुत समझाया कि, “ये बम्बई है, यहाँ एक-दो दिन तो ठीक है. लेकिन पूरी ज़िन्दगी बिताना बहुत मुश्किल है.”

    फ़हीमा हर बात के लिए तैयार थी मगर वहाब से दूर जाना उसे मन्ज़ूर नहीं था. वो इस बात पे ही ख़ुश थी कि कभी-कभी की मुलाक़ात ही उसके ज़िन्दा रहने के लिए काफ़ी है.

    वहाब ने उसे फिर से बहुत समझाया मगर वो नहीं मानी. उसने वहाब के ऊपर बोझ न बनने का वादा भी किया. लेकिन बम्बई जैसे शहर में, वो भी एक अकेली लड़की के लिए पेट पालना, मुँह से पहाड़ काटने जैसा है.

    लेकिन कहते हैं ना कि हिम्मत के आगे हर मुश्किल हार जाती है. और फिर फ़हीमा ने वो कर दिखाया, जिसकी ना ख़ुद उसे उम्मीद थी और ना ही वहाब को यक़ीन. मुश्किलों से जूझते-जूझते फ़हीमा एक दिन वहाब के बम्बई शहर में ही, वहाब से भी ज़्यादा मशहूर, और पैसे वाली हो गई. उसकी ब्यूटी पार्लर की कई दुकानें चलने लगीं. उसके इस सफ़र में वहाब ने भी मदद की थी, मगर फ़हीमा इतनी आगे निकल जाएगी, ऐसा किसी ने नहीं सोचा था.

    जुनून इन्सान से हमेशा ऐसे ही कारनामे करवाता है. वहाब से कभी-कभी की मुलाक़ात और अपनी मेहनत से फ़हीमा आज उस मुक़ाम पे थी, जहाँ अपनी ज़िन्दगी में उसे किसी चीज़ की कमी नहीं थी. लेकिन अब एक मुश्किल आ खड़ी हुई. अब उसका वहाब से मिलना थोड़ा मुश्किल हो गया, क्यूँकि वो जहाँ भी जाती, लोग उसे घेर लेते. लड़कियाँ उससे अपने ब्यूटी पार्लर में नौकरी देने की दरख़्वास्त करतीं, और आदमी लोग उसकी तारीफ़. ऐसे में वहाब से उसकी नज़दीकी सबकी आँखों में चुभने लगी, और करते-करते, बात वहाब के घर तक भी पहुँच गई. और अब वहाब का अपने ही घर में उठना-बैठना मुश्किल हो गया. जो प्यार अब तक दुनिया की नज़रों से छुपा हुआ था, अब जग-ज़ाहिर हो गया था.

    फिर वहाब ने अपना घर बचाने के लिए फ़हीमा से दूरी बनाना शुरू कर दिया. उस फ़हीमा को, जिसने ये सबकुछ वहाब से बस कभी-कभी मिलने के लिए किया था, बर्दाश्त नहीं हुआ. उसने कहा, “मैं कुछ नहीं जानती, कोई रास्ता निकालो.” वहाब ने उससे कहा, “शादी कर लो.” फ़हीमा को हँसी आ गई, वहाब के इस सुझाव पे. उसने कहा, “बड़े भोले हो बाबू. शादी ही करनी होती, तो पहले भी कर सकती थी. ख़ैर, कोई नहीं. मैं ही कोई रास्ता निकालती हूँ. फ़िक़र मत करो. मेरी वजह से तुम्हारा घर नहीं टूटेगा.”

    और फिर अगले ही दिन फ़हीमा अपने कमरे में बेहोश पाई गई. उसने ख़ुदकुशी करने की कोशिश की थी, जिसकी भनक वहाब को लग गई थी, और सुबह होते ही वो फ़हीमा को देखने आया, तो उसे बेहोश पाया. फ़हीमा ने आँख खोली तो उसे बड़ी तसल्ली हुई कि, “मेरा ‘सजनवा’ मुझसे अभी भी उतना ही प्यार करता है.”

    वहाब ने उससे ऐसा फिर कभी न करने का वादा लिया. फ़हीमा का कहना बस इतना ही था कि, “मुझसे मिलने आओगे ना बाबू?” और वहाब इस सवाल पे न चाहते हुए भी चुप हो जाता था. तब फ़हीमा कहती, “जब तुम ही नहीं मिलोगे, तब जी के क्या करुँगी?”

  • “हम फिर से वहीं मिलेंगे, जहाँ पहली बार मिले थे.”
  • वहाब ने दुनिया की नज़रों से बचने की एक तरकीब निकाली थी जो फ़हीमा ने मन्ज़ूर कर ली. और फिर दोनों इलाहाबाद के उसी होटल में मिले, जहाँ पहली बार फ़हीमा ने जाना था कि ज़िन्दगी क्या है. इस बार भी उसने जी भर के वहाब को जीया और प्यार किया.

    फिर सुबह जब वहाब ने वापस बम्बई चलने के लिए हाथ बढ़ाया, तो फ़हीमा ने कहा, “नहीं बाबू, अब नहीं.” वहाब को कुछ समझ में नहीं आया.

  • “मैं यहीं से आगे बढ़ी थी जानू. अब यहीं रुक जाना चाहती हूँ. आपको बहुत परेशान किया मैंने. अब और नहीं करना चाहती.”
  • वहाब को अब सब समझ में आ गया. वो बहुत देर तक, वहीं फ़हीमा के सामने बैठा रोता रहा, और सोचता रहा कि, “ज़िन्दगी में हम जिसे सबसे ज़्यादा चाहते हैं, एक वही हमारे पास नहीं होता है. बाक़ी पूरी दुनिया सीने पे सवार रहती है. ज़िन्दगी ऐसी क्यूँ है? क्यूँ इसके आगे कोई और रास्ता नहीं है?”

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