दीलीप कुमार Khushi Saifi द्वारा जीवनी में हिंदी पीडीएफ

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दीलीप कुमार

Chapters

  • भूमिका
  • शुरुआती ज़िन्दगी का सफर
  • मधुबाला और दिलीप कुमार
  • सायरा बानो से शादी
  • पिता न बनने का दुःख
  • फ़िल्मी दौर
  • पुरुस्कार
  • फिल्में
  • मशहूर अभिनेताओं की ज़ुबानी
  • अफवाहें
  • भारतीय सिनिमा का एक एसा नाम जो आज 21वी सादी में भी सब के दिलो पर राज़ करते हैं वे अपने आप में सेल्फ मेड मैन (स्वनिर्मित मनुष्य) की जीती-जागती मिसाल हैं। उनकी 'प्राइवेट लाइफ' हमेशा कौतुहल का विषय रही, जिसमें रोजमर्रा के सुख-दुःख, उतार-चढ़ाव, मिलना-बिछुड़ना, इकरार-तकरार सभी शामिल हैं। उस महान शख्सियत का नाम “जनाब दिलीप कुमार” है।

    भारतीय सिनेमा में ट्रेजडी किंग नाम से मशहूर दिलीप कुमार एक महान लोकप्रिय अभिनेता है, दुखद सीन में अपनी मार्मिक एक्टिंग से सबके दिल को छु लेने की वजह से इन्हें ट्रेजडी किंग कहा गया। जन्म से उनका नाम मोहम्मद युसूफ खान था, हिंदी सिनेमा में आने के बाद इन्होनें अपना नाम दिलीप कुमार रख लिया, दिलीप कुमार जी एक प्रतिष्ठित अभिनेता हैं, जिन्होंने हिंदी सिनेमा जगत में 5 दशक की लम्बी पारी खेली है, भारतीय सिनेमा के गोल्डन एरा के समय के ये एक अग्रिम अभिनेता रहे है। दिलीप कुमार जी ने बॉलीवुड में 1940 में कदम रखा था, उस समय हिंदी सिनेमा अपने शुरुवाती दौर में था, उस समय ना ज्यादा एक्टर हुआ करते थे और ना फिल्म बनाने वाले डायरेक्टर, देश की आजादी के पहले फिल्म देखने वाला दर्शक वर्ग भी काफी सिमित था। एसे दौर में भी अपने नाम का लोहा मनवाने वाले दिलीप कुमार हिन्दी फिल्मों के एक प्रसिद्ध और लोकप्रिय अभिनेता हुए जो भारतीय संसद के उच्च सदन राज्य सभा के सदस्य भी रह चुके है। दिलीप कुमार को उनके दौर का बेहतरीन अभिनेता माना जाता है, सिर्फ इतना ही नही उन्हें भारतीय फिल्मों के सर्वोच्च सम्मान “दादा साहब फाल्के” पुरस्कार से सम्मानित किया गया है, इसके अलावा दिलीप कुमार को पाकिस्तान का सर्वोच्च नागरिक सम्मान “निशान-ए-इम्तियाज़” से भी सम्मानित किया गया है।

    शुरुआती ज़िन्दगी का सफर

    दिलीप कुमार जी का जन्म पाकिस्तान के पेशावर में लाला गुलाम के यहाँ हुआ था, इनके 12 भाई बहन थे, इनके पिता फल बेचा करते थे और अपने मकान का कुछ हिस्सा किराये में देकर जीवनयापन करते थे, दिलीप कुमार जी ने अपनी स्कूल की पढाई नासिक के पास के किसी स्कूल से की थी। 1930 में इनका पूरा परिवार बॉम्बे में आकर रहने लगा। 1940 में अपने पिता से मतभेद के चलते उन्होंने मुंबई वाले घर को छोड़ दिया और पुणे चले गए यहाँ उनकी मुलाकात एक कॅटीन के मालिक ताज मोहम्मद शाह से हुई, जिनकी मदद से उन्होंने आम क्लब में एक सैडविच का स्टाल लगा लिया। कॅटीन का कॉन्ट्रेक्ट खत्म होने के बाद दिलीप जी 5000 की सेविंग के साथ वापस अपने घर बॉम्बे लौट आये, इसके बाद अपने पिता की आर्थिक मदद करने के लिए दिलीप जी नया काम तलाशने लगे।

    1943 में चर्चगेट में इनकी मुलाकात डॉ मसानी से हुई, जिन्होंने उन्हें बॉम्बे टॉकीज में काम करने का ऑफर दिया फिर इसके बाद इनकी मुलाकात बॉम्बे टॉकीज की मालकिन देविका रानी से हुई, जिनके साथ उन्होंने 1250 रूपए सालाना का अग्रीमेंट कर लिया, यहाँ उनकी मुलाकात महान अभिनेता अशोक कुमार जी से हुई जो दिलीप जी की एक्टिंग से बहुत मोहित हुए। शुरुवात में दिलीप जी कहानी व् स्क्रिप्ट लेखन में मदद किया करते थे, क्यूंकि उर्दू व् हिंदी भाषा में इनकी अच्छी पकड़ थी। देविका रानी के कहने पर ही दिलीप जी ने अपना नाम युसूफ से दिलीप कुमार रखा था जिसके बाद 1944 में उन्हें ज्वार भाटा फिल्म में लीड एक्टर का रोल मिला, इसे दिलीप जी की पहली फिल्म माना गया।

    ममधुबाला और दिलीप कुमार

    दिलीप कुमार जी को सबसे पहले एक्ट्रेस कामिनी कौशल से प्यार हुआ था लेकिन किसी परेशानी की वजह से उनकी शादी नहीं हो पाई। इसके बाद इनकी मुलाकात मधुवाला से हुई जिनसे उन्हें गहरा प्यार हो गया, दिलीप जी उनसे शादी भी करना चाहते थे लेकिन मधुवाला के पिता इस बात के सखत खिलाफ थे, इसका कारण ये माना जाता है कि मधुवाला अपने परिवार में एक लोती कमाने वाली थी, उनके चले जाने पर परिवार के खाने पीने के लाले पड़ जाते। दिलीप कुमार व मधुवाला को साथ में बहुत से डायरेक्टर्स लेना चाहते थे लेकिन जब मधुवाला के पिता को उनके प्यार के बारे में पता चला तो उन्होंने दिलीप जी के साथ उनके काम करने में पाबंधी लगा दी। दोनों ने साथ में मुगल ए आजम जैसी महान फिल्म भी की थी, ये वो दौर था जब दोनों के प्यार के चर्चे जोरों पर थे लेकिन पिता की मनाही की वजह से दोनों अलग हो रहे थे। मुगल ए आजम फिल्म भी कुछ इसी तरह की थी जिस वजह से फिल्म का हर एक सीन रियल बन गया और फिल्म हिंदी सिनेमा की महान पसंदीदा फिल्म बन गयी।

    जितनी ज़बान उतनी बातें, कुछ का कहना है कि दिलीप कुमार और मधुबाला के अलग होने की ये वजह नही बल्कि कुछ और ही है सुनने में ये भी आया कि दरअसल मधुबाला के पिता चाहते थे कि दिलीप और मधुबाला सिर्फ़ उनके प्रोडक्शन हाउस के लिए फ़िल्में करें और दिलीप कुमार एक कलाकार होने के नाते इस बात को ग़लत मानते थे। दिलीप कुमार के मुताबिक़ वो मधुबाला के पिता के हाथों का खिलौना नहीं बनना चाहते थे।

    1956 में निर्माता-निदेशक बी आर चोपड़ा ने अपनी फ़िल्म ‘नया दौर’ की योजना बनाई। इस फ़िल्म के लिए दिलीप कुमार के साथ मधुबाला को कास्ट किया गया, शुरुआत अच्छी हुई, मुहूर्त से लेकर कारदार स्टूडियो में पहले दस दिन की शूटिंग भी मजे - मजे में हो गई। इसके बाद बात आई आउटडोर शूटिंग की, इस फ़िल्म की अधिकांश शूटिंग असल लोकेशन पर ओपाल के पास बुधनी कस्बे में कोई दो महीने तक चलनी थी। बीआर चोपड़ा की इस बात से खान साहब सहमत नहीं थे, वो चाहते थे कि बम्बई के ही किसी स्टूडियो में गांव का सेट लगाकर शूटिंग की जाए लेकिन चोपड़ा साहब इस बात पर बिल्कुल तैयार न थे, यह विवाद इतना गहराया कि आखिर तैश में आकर चोपड़ा साहब ने मधुबाला की जगह वैजयंती माला को साइन कर लिया। दिलीप कुमार इस पूरे मामले में चोपड़ा साहब के साथ खड़े रहे, उनका विचार था कि अताउल्ला उनकी वजह से मधु को ओपाल जाने नहीं दे रहे लेकिन मधुबाला के पिता का कहना था कि अपनी बीमार-सी लड़की को शूटिंग के लिए इतनी दूर नहीं भेज सकते। चोपड़ा ने वैजयंती माला को साइन कर लिया और मधुबाला के विरुद्ध कोर्ट में मुकदमा कर दिया। मधुबाला ने इस मुद्दे पर दिलीप कुमार को समझाने की कोशिश की, लेकिन वो नहीं माने और इस तरह से दोनों एक दूसरे से दूर होते चले गए।

    इन्हीं अदालती झगड़ों की सुनवाई के दौरान दिलीप कुमार को गवाही के लिए बुलाया गया। बाक़ी तमाम सारे सवालों के अलावा एक सवाल यह भी पूछा गया कि क्या वे मधुबाला से प्यार करते हैं तो दिलीप कुमार ने मजिस्ट्रेट आर एस पारख की अदालत में सबके सामने कहा, "हां मैं मधु से प्यार करता हूं और उसे हमेशा प्यार करता रहूंगा".

    कैसी विडंबना है कि जिस दिन दिलीप कुमार ने सरे आम इस प्यार का इज़हार किया था उसी दिन इस प्रेम कहानी का अंत भी हो गया।

    इस पूरी कहानी से जुड़ी एक बेहद अहम बात यह है कि इस कथित अंत के बाद भी फिल्म ‘मुग़ल-ए-आज़म’ की शूटिंग में दोनों साथ ही साथ काम करते रहे। मोहब्बत के मंज़र तो देखिए कि फ़िल्म के सीन करके वे एक-दूसरे से मुंह फेर लेते थे लेकिन एक सीन ऐसा भी आया जब सलीम अनारकली को ग़ुस्से में एक थप्पड़ जड़ता है, इस सीन में दिलीप कुमार ने मधुबाला को ऐसा करारा तमाचा मारा था कि सेट पर मौजूद तमाम लोग हिल गए थे, मधुबाला को भी अपने होश संभालने में बड़ा वक़्त लगा।

    फ़िल्म ‘तराना’ में ही लता मंगेशकर का गाया एक और गीत था – “मोसे रूठ गयो मोरा सांवरिया, किसकी लगी ज़ुल्मी नज़रिया” काश कभी किसी भी मोहब्बत को ऐसी नज़र न लगे कि बात नफ़रत में बदल जाए।

    मधुबाला सन् 1951 से 60 के बीच कुल 4 फिल्मों में दिलीप कुमार की नायिका बनीं - तराना, संगदिल, अमर और मुगल-ए-आजम। इनके प्रेम संबंधों के टूटने का कारण भी दिलीप कुमार (और बी.आर. चोपड़ा) की फिल्म 'नया दौर’ बनी जो बोहोत बमियाब हुई।

    सायरा बानो से शादी

    अपनी पारिवारिक जिम्मेदारियों के कारण दिलीप कुमार ने वैवाहिक जीवन में प्रवेश करने का निर्णय अपेक्षाकृत विलंब से स्वीकार किया। 11 अक्टूबर 1966 को जब उन्होंने 25 वर्षीय अभिनेत्री सायरा बानो के साथ शादी की, तब उनकी उम्र 44 की हो गई थी जबकि उनके दर्शक दो दशकों से उनके विवाह की प्रतीक्षा कर रहे थे। स्वयं दिलीप कुमार भी “द मोस्ट इलिजिबल बैचलर” संबोधित किए जा रहे थे। विवाह की घोषणा से सिनेमा जगत में खुशी की लहर दौड़ गई थी। निकाह परंपरागत मुस्लिम रीति से हुआ। बरात की अगुवाई पापा पृथ्वीराज कपूर ने की थी, दूल्हे मियाँ सेहरा बाँधकर घोड़ी पर चढ़े थे और आजू - बाजू राज कपूर, देव आनंद चल रहे थे। इस विवाह का खूब प्रचार हुआ था और बड़ी संख्या में लोग आए थे। संगीत और आतिशबाजी की धूमधाम के बीच जोरदार दावत हुई थी।

    सुनने में ये भी आया कि विवाह से पूर्व थोड़े समय सायरा और जुबली स्टार राजेंद्र कुमार के बीच रोमांस भी चला था। नसीम (सायरा की माँ) और मुखर्जी के कहने पर दिलीप कुमार ने सायरा को शादीशुदा और बाल - बच्चेदार राजेंद्र कुमार से दूर रहने के लिए प्यार से समझाया था और बदले में खूद दिलीप कुमार ने सायरा को अपनी खातून - ए - खाना ( धर्मपत्नी ) बनाया।

    पिता न बनने का दुःख

    बॉलीवुड में ट्रेजडी किंग के नाम से फेमस दिलीप कुमार की कोई संतान नहीं है। यह बात सभी जानते हैं, लेकिन कम ही लोगों को पता होगा कि वे पिता क्यों नहीं बन सके। इसका जवाब उन्होंने अपनी ऑटोबायोग्राफी “द सबस्टांस एंड द शैडो” में दिया था। बुक में दिलीप कुमार ने कहा है "सच्चाई यह है कि 1972 में सायरा पहली बार प्रेग्नेंट हुईं। यह बेटा था (हमें बाद में पता चला)। 8 महीने की प्रेग्नेंसी में सायरा को ब्लड प्रेशर की शिकायत हुई। इस दौरान पूर्ण रूप से विकसित हो चुके भ्रूण को बचाने के लिए सर्जरी करना संभव नहीं था और दम घुटने से बच्चे की मौत हो गई” दिलीप की मानें तो इस घटना के बाद सायरा कभी प्रेग्नेंट नहीं हो सकीं।

    1980 में दिलीप कुमार ने आसमा रहमान नाम की महिला से दूसरी शादी की। यही वह दौर था जब मीडिया में इस तरह की चर्चा शुरू हुई कि सायरा मां नहीं बन सकतीं और बच्चे की चाह में दिलीप ने यह कदम उठाया। ऑटोबायोग्राफी में दिलीप ने इस खबर का खंडन किया है और असली वजह बताई है कि सायरा क्यों मां नहीं बन सकीं। बता दें कि आसमा से शादी के बाद दिलीप और सायरा के रिश्ते में दूरियां आ गई थीं। हालांकि, दो साल बाद ही यानी कि 1982 में दिलीप ने आसमा को तलाक दे दिया।

    फिल्मी दौर

    उनकी पहली फिल्म 'ज्वार भाटा' थी, जो 1944 में बनी फिल्म अंदाज़ की सफलता ने उन्हे प्रसिद्धी दिलाई, इस फिल्म मे उन्होने राज कपूर के साथ काम किया। दिदार (1951) और देवदास (1955) जैसी फिल्मो मे दुखद भूमिकाओं के मशहूर होने के कारण उन्हे ट्रेजिडी किंग कहा गया। मुगले-ए-आज़म (1960) मे उन्होने मुग़ल राजकुमार जहांगीर की भूमिका निभाई। यह फिल्म पहले श्वेत और श्याम थी और 2004 मे रंगीन बनाई गई। उन्होने 1961 मे गंगा-जमुना फिल्म का निर्माण भी किया, जिसमे उनके साथ उनके छोटे भाई नासीर खान ने काम किया।

    1970, 1980 और 1990 के दशक मे उन्होने कम फिल्मो मे काम किया। इस समय की उनकी प्रमुख फिल्मे थी: विधाता (1982), दुनिया (1984), कर्मा (1986), इज्जतदार (1990) और सौदागर (1991)

    1998 मे बनी फिल्म किला उनकी आखरी फिल्म थी। उन्होने रमेश सिप्पी की फिल्म शक्ति मे अमिताभ बच्चन के साथ काम किया। इस फिल्म के लिए उन्हे फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार भी मिला।

    सभ्य , सुसंस्कृत , कुलीन इस अभिनेता ने रंगीन और रंगहीन ( श्वेत - श्याम ) सिनेमा के पर्दे पर अपने आपको कई रूपों में प्रस्तुत किया। असफल प्रेमी के रूप में उन्होंने विशेष ख्याति पाई, लेकिन यह भी सिद्ध किया कि हास्य भूमिकाओं में वे किसी से कम नहीं हैं। वे ट्रेजेडी किंग भी कहलाए और ऑलराउंडर भी। उनकी गिनती अतिसंवेदनशील कलाकारों में की जाती है, लेकिन दिल और दिमाग के सामंजस्य के साथ उन्होंने अपने व्यक्तित्व और जीवन को ढाला। वे अपने आप में सेल्फमेडमैन (स्वनिर्मित मनुष्य) की जीती जागती मिसाल हैं। उनकी प्राइवेट लाइफ हमेशा कौतुहल का विषय रही, जिसमें रोजमर्रा के सुख - दुख, उतार - चढ़ाव, मिलना बिछुड़ना, इकरार - तकरार सभी शामिल थे। इन सब ने दिलीप कुमार को साहित्य, संगीत और दर्शन की अभिरुचि ने गंभीर और प्रभावशाली हस्ती बना दिया।

    फिल्म फेयर ने जिन छह अन्य फिल्मों के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का पुरस्कार दिया वे हैं आजाद ( 1955 ) , देवदास ( 1956 ) , नया दौर ( 1957 ) , कोहिनूर ( 1960 ) , लीडर ( 1964 ) तथा राम और श्याम ( 1967 )

    1997 में उन्हें भारतीय सिनेमा के बहुमूल्य योगदान देने के लिए एनटी रामाराव अवॉर्ड दिया गया, जबकि 1998 में समाज कल्याण के क्षेत्र में योगदान के लिए रामनाथ गोयनका अवॉर्ड दिया गया।

    आज ज्यादातर लोगों को इस बात पर आक्षर्य होता है कि इस महानायक ने सिर्फ 54 फिल्में क्यों की लेकिन इसका उत्तर है। दिलीप कुमार ने अपनी इमेज का सदैव ध्यान रखा और अभिनय स्तर को कभी गिरने नहीं दिया इसलिए आज तक वे अभिनय की के पारसमणि ( टचस्टोन ) बने हुए हैं जबकि धूम - धड़ाके के साथ कई सुपर स्टार, मेगा स्टार आए और आकर चले गए।

    पुरुस्कार

  • 1983 - फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेता पुरस्कार -शक्ति
  • 1968 - फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेता पुरस्कार - राम और श्याम
  • 1965 - फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेता पुरस्कार -लीडर
  • 1961 - फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेता पुरस्कार -कोहिनूर
  • 1958 - फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेता पुरस्कार - नया दौर
  • 1957 - फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेता पुरस्कार -देवदास
  • 1956 - फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेता पुरस्कार -आज़ाद
  • 1954 - फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेता पुरस्कार – दाग
  • फिल्में

  • सौदागर (1991 फ़िल्म)
  • आग का दरिया (1990 फ़िल्म)
  • इज्जतदार (1990 फ़िल्म)
  • कानून अपना अपना (1988 फ़िल्म)
  • कर्मा (1986 फ़िल्म)
  • धर्म अधीकारी (1986 फ़िल्म)
  • मशाल (1984 फ़िल्म)
  • दुनिया (1984 फ़िल्म)
  • मज़दूर (1983 फ़िल्म)
  • शक्ति (1982 फ़िल्म)
  • विधाता (1982 फ़िल्म)
  • क्रांती (1981 फ़िल्म)
  • बैराग (1976 फ़िल्म)
  • फिर कब मिलोगी (1974 फ़िल्म)
  • सगीना (1974 फ़िल्म)
  • अनोखा मिलन (1972 फ़िल्म)
  • दास्तान (1972 फ़िल्म)
  • कोशिश (1972 फ़िल्म)
  • गोपी (1970 फ़िल्म)
  • सगीना महातो (1970 फ़िल्म)
  • आदमी (1968 फ़िल्म)
  • साधु और शैतान (1968 फ़िल्म)
  • संघर्ष (1968 फ़िल्म)
  • राम और श्याम (1967 फ़िल्म)
  • दिल दिया दर्द लिया (1966 फ़िल्म)
  • लीडर (1964 फ़िल्म)
  • गंगा जमुना (1961 फ़िल्म)
  • मुगल-ए-आज़म (1960 फ़िल्म)
  • कोहिनूर (1960 फ़िल्म)
  • पैगाम (1959 फ़िल्म)
  • मधुमती (1958 फ़िल्म)
  • यहुदी (1958 फ़िल्म)
  • मुसाफिर (1957 फ़िल्म)
  • नया दौर (1957 फ़िल्म)
  • आजाद (1955 फ़िल्म)
  • देवदास (1955 फ़िल्म)
  • इंसानियत (1955 फ़िल्म)
  • उडन खटोला (1955 फ़िल्म)
  • अमर (1954 फ़िल्म)
  • फुटपाथ (1953 फ़िल्म)
  • शिक्स्त (1953 फ़िल्म)
  • आन (1952 फ़िल्म)
  • दाग (1952 फ़िल्म)
  • संगदिल (1952 फ़िल्म)
  • दिदार (1951 फ़िल्म)
  • हलचल (1951 फ़िल्म)
  • तराना (1951 फ़िल्म)
  • आरजू (1950 फ़िल्म)
  • बाबुल (1950 फ़िल्म)
  • जोगन (1950 फ़िल्म)
  • अंदाज (1949 फ़िल्म)
  • शबनम (1949 फ़िल्म)
  • अनोखा प्यार (1948 फ़िल्म)
  • घर की इज्जत (1948 फ़िल्म)
  • मेला (1948 फ़िल्म)
  • नदिया के पार (1948 फ़िल्म)
  • शहीद (1948 फ़िल्म)
  • जुगनू (1947 फ़िल्म)
  • नौका डूबी (1947 फ़िल्म)
  • प्रतिमा (1945 फ़िल्म)
  • ज्वार भाटा (1944 फ़िल्म)
  • मशहूर अभिनेताओ की ज़ुबानी

    हिंदी फ़िल्म इंडस्ट्री के कई नामचीन कलाकार उन्हें अपना प्रेरणा स्रोत मानते हैं। ऐसे ही कुछ कलाकारों ने दिलीप कुमार के बारे में और उनसे हुई कुछ दिलचस्प मुलाक़ातों के बारे में बातें की, सुनते हैं उन्हीं कलाकारों की ज़बानी....

    अमिताभ बच्चन-

    “उनके बारे में क्या बोलूं, वो बचपन से ही मेरे आदर्श रहे हैं। गंगा जमुना उनकी सबसे बेहतरीन फ़िल्म थी लेकिन इसके लिए उन्हें कोई अवॉर्ड नहीं मिला। मुझे याद है जब फ़िल्म शक्ति में मैं उनके साथ काम कर रहा था तो कितना रोमांचित था। उसी दौरान मैं एक सीन के लिए रिहर्सल कर रहा था तो वहां बड़ा शोर हो रहा था। तब दिलीप साहब आए और ज़ोर से चिल्लाकर कहा, चुप हो जाओ। देखते नहीं, अमित रिहर्सल कर रहा है। शक्ति मेरे और उनके दरमियां तनाव की कहानी थी लेकिन कैमरे के पीछे हमने बेहतरीन वक़्त बिताया। एक दफ़ा मैं, सलीम और जावेद साहब रात को दो बजे उनसे मिलने चले गए। ज़ाहिर है वो सो रहे थे, लेकिन जब उन्हें पता चला कि हम आए हैं तो वो फ़ौरन उठकर ड्राइंग रूम में आ गए और फिर दो घंटे हमसे गप्पें लगाईं। दिलीप साहब को किसी सीन में देखकर लगता है कि इस सीन को इसके अलावा और किसी तरीके से किया ही नहीं जा सकता”

    धर्मेंद्र-

    “दिलीप साहब को स्क्रीन पर देखते ही ऐसा महसूस होता था जैसे वो मेरे भाई हैं जो शायद बिछड़ गए थे। जब हमारी मुलाक़ात पहली दफ़ा हुई तो मैंने कहा भी था कि हम पैदा तो दो मांओं की कोख से हुए हैं लेकिन मुझे लगता है कि हम भाई ही हैं। तब उन्होंने मुझे गले लगाकर कहा, "हां धरम हम भाई ही हैं"

    60 के दशक में जब मैं उनसे मिलने पहली बार उनके घर गया तो उस वक़्त काफी ठंड थी। उन्होंने मुझे एक स्वेटर दिया. वो स्वेटर आज भी मैंने संभाल कर रखा है। उस दिन के बाद से उनके घर पर कोई भी फ़ंक्शन हो मैं फ़ट से पहुंच जाता हूं, मेरा उनका रिश्ता बड़ा रूहानी किस्म का है”

    मनोज कुमार-

    “मैं दिलीप कुमार से ज़बरदस्त प्रभावित था. लेकिन फिर उस दौर में मीडिया ने कहना शुरू कर दिया कि मैं उनकी नकल करता हूं, मैंने इस बात का कभी बुरा नहीं माना। मैंने उनके साथ फ़िल्म आदमी की थी, जिसमें मैंने अपनी मौलिकता बनाए रखी। मुझे ख़ुशी है कि मुझे अपने इस आइडल को निर्देशित करने का मौक़ा मिला फ़िल्म क्रांति में। वो बड़े सहज कलाकार थे और उन्होंने मुझे कभी महसूस नहीं कराया कि वो मेरे सीनियर हैं, कोई भी सीन उन्हें मैं समझाता कि साहब इसे ऐसे करना है तो वो बिलकुल मान जातेन। इतना बड़ा कलाकार कितना नम्र होता है ये मैंने उनसे जाना”

    कादर ख़ान-

    “मैं दिलीप कुमार और अमिताभ बच्चन का ज़बरदस्त प्रशंसक हूं। लेकिन अमिताभ, दिलीप साहब से दो बातों में पीछे रह गए। मुझे लगता है कि पर्दे पर मर्द को सही तरीके से रोना और हंसना आना चाहिए वर्ना वो बड़ा फूहड़ लग सकता है। दिलीप साहब में ये दोनों हुनर कमाल के थे.उनसे बेहतर ये काम कोई नहीं कर पाया। बाद में बच्चन ने भी उनसे प्रेरणा लेकर पर्दे पर ग़ज़ब ढाया”

    नसीरूदीन शाह-

    “मैं दिलीप साहब के शुरुआती दौर के काम से बड़ा प्रभावित था। मैं ये नहीं कहूंगा कि उन्हें देखकर मैंने उनके जैसा बनना चाहा लेकिन इस बात से इनकार नहीं कि उनके काम का मुझ पर असर पड़ा”

    कमल हसन-

    “मुझे शिवाजी गणेशन साहब के अलावा अगर किसी ने एक्टिंग सिखाई है तो वो यूसुफ़ साहब ही हैं, मैं अब भी उनकी एक्टिंग देखकर चकित रह जाता हूं कि कोई इंसान ऐसा कैसे कर लेता है, वो अपने समय से बड़े आगे के अभिनेता थे”

    अफवाहें

    2011 में दिलीप जी की तबियत अचानक खराब हो गई किसी ने उनकी मौत तक की खबर सब जगह फैला दी। इसके बाद उनकी पत्नी सायरा जी ने सबको ये बताया कि वो ठीक है उन्हें कुछ नहीं हुआ है। 2013 में इन्हें फिर हार्ट अटैक आया, जिससे उन्हें होस्पिटल में भर्ती किया गया। अभी कुछ समय पहले अप्रैल 2016 में दिलीप जी की फिर तबियत ख़राब हो गई थी, जिस वजह से उन्हें अस्पताल में भर्ती किया गया। सायरा जी ने सबको बताया कि वे अब ठीक है।

    हम सभी प्रसिद्ध अभिनेता दिलीप जी के अच्छे स्वास्थ्य की कामना करते हैं, भारतीय फिल्म में उनके योगदान के लिए देश उन्हें हमेशा याद रखेगा।