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Bauncer

बाउंसर

संजय कुंदन

लगता है इस शहर से जल्दी ही नाता टूटने वाला है। हालांकि तीन-चार महीने में इस शहर से कोई रिश्ता बन भी कहां पाया है। यह सोचते ही गोपी को यह शहर अचानक बड़ा आत्मीय लगने लगा। वह कई बार सोचता था कि मौका निकालकर घूमने जाएगा। दिन भर लाल किले में भटकेगा, पुराने किले में नाव का मजा लेगा, कुतुबमीनार पर चढ़ेगा, प्रगति मैदान में मेला देखेगा पर मौका कहां मिला। बस चांदनी चौक में जलेबी खाने के अलावा कुछ और कहां कर पाया वह। कमबख्त नौकरी के चक्कर में समय ही कहां मिल पाता है। लेकिन अब तो लग रहा है यह नौकरी भी उससे नहीं हो पाएगी। श्यामलाल ने उसे आखिरी मौका दिया है। बस एक मौका और। उसने एक तरह का अल्टीमेटम दिया है उसे-‘सुधर जा गोपी, नहीं तो आगे तेरी कोई मदद नहीं कर पाऊंगा।’

क्या सचमुच गोपी ने कोई गलती की है? श्यामलाल को भी समझना चाहिए कि वह नया-नया आया है। यहां के चाल-चलन समझने में उसे देर लगेगी। अब गोपी क्या जाने कि नौकरी करने के लिए अपने को इतना बदलना पड़ता है। इससे अच्छा तो गांव ही था, ठीक है कि वहां नौकरी नहीं थी। पैसे कम थे पर गोपी अपनी मर्जी का मालिक था। यहां तो इससे मत बोलो, उसके साथ मत हंसो। अरे भाई आदमी हैं हमारा भी मन है। आदमी दूसरे आदमी को देखकर खुश होता है, उससे बात करना चाहता है। लेकिन नहीं, यहां आदमी आदमी में भी फर्क है। यहां बोलना भी है तौलकर, हंसना भी है नाप-जोखकर। मतलब यह कि हर समय अपने पास बटखरे रखे जाएं और हमेशा वजन करके बात और हंसी खर्च की जाए।

क्या करे गोपी। मन उद्विग्न हो रहा था। वह उठकर खड़ा हो गया और खिड़की से बाहर देखने लगा। बाहर हल्की सी रोशनी फैली थी जैसे पूरे शहर में बस एक लालटेन जल रही हो। गजब की शांति थी। उसका कमरा उसे अपने शरीर के अनुपात में काफी छोटा लगता रहा है। जब श्यामलाल उसे यह कमरा दिखाने लाया था तो वह घबरा गया था। उसे समझ में नहीं आ रहा था कि वह अपना भारी-भरकम शरीर लेकर इसमें अंटेगा कैसे। जब श्यामलाल ने उसे कहा कि उसके साथ एक और लड़का रहेगा तो वह परेशान हो गया। उसने साफ कह दिया कि चाहे जितना किराया लगे वह रहेगा अकेले ही। शुरू-शुरू में उसे इसमें घुटन होती थी पर अब आदत होने लगी थी।

किससे बात करे वह कि थोड़ी शांति मिले। अम्मा ही उसके मन की बात समझती थी। अगर उससे वह अपने मन का हाल बताए तो वह जरूर कहेगी, ‘आ जा बेटा वापस, छोड़ दे नौकरी।’ हालांकि उसकी नौकरी लगने के बाद से अम्मा काफी खुश रहने लगी थी। पिछली बार जब उसका फोन आया था तो उसकी आवाज में खनक थी। अगर वह नौकरी छोड़ देगा तो अम्मा को दुख होगा। वह गोपी की खुशी के लिए भले उसे वापस आने को कह दे पर अंदर-अंदर इस बात को पचा नहीं पाएगी। फिर गोपी क्या करे? अपने को बदल डाले। जैसा श्यामलाल कह रहा है, वैसा ही बन जाए। हो सकता है श्यामलाल ठीक कह रहा हो। अब नौकरी का यही रिवाज ही है तो क्या किया जाए। वैसे एक रास्ता तो यह हो सकता है कि वह कोई दूसरा काम तलाशे। लेकिन क्या यह इतना आसान है? एक नौकरी तो इतनी मुश्किल से मिली है। दूसरी कहां से मिलेगी इतनी जल्दी।

आज से चार महीने पहले गोपी अपने पड़ोस के गांव में एक बारात में गया हुआ था। जब वह खाने में जुटा था तभी उसकी पीठ पर किसी ने हाथ रखा। वह भड़का। खाते समय किसी का हस्तक्षेप उसे बर्दाश्त नहीं था। जब भोजन सामने हो तो वह आसपास से बेखबर हो जाता था और बिना इधर-उधर देखे भोज्य पदार्थ को उदरस्थ करता रहता था, इसलिए अपनी पीठ पर किसी के हाथ का स्पर्श पाकर उसने क्रोध में सिर उठाया। बगल में श्यामलाल खड़ा था। उसके बचपन का साथी। वह गोपी से उम्र में दो साल छोटा जरूर था पर दोनों साथ खेलते थे। डील-डौल में वह गोपी से थोड़ा ही कम था। गोपी ने कई बार बचपन में उसे उठाकर पटका था।

उसे वर्षों बाद देखकर गोपी का गुस्सा झट उतर गया। उसने चहककर पूछा, ‘अरे श्यामलाल, तू कहां है यार आजकल?’ श्यामलाल ने कहा, ‘मैं दिल्ली में हूं।’ गोपी ने उसे ऊपर से नीचे देखा। श्यामलाल एकदम बदल चुका था। उसने मूंछें साफ करवा ली थीं और बाल-बाल छोटे-छोटे करवा रखे थे। चेहरे पर चिकनाई आ गई थी।

‘तू तो खिलाड़ी है न, वेट लिफ्टिंग करता है। सुना है कि तू ओलिंपिंक में जाने वाला है।’ गोपी की इस बात पर श्यामलाल ने एक फीकी हंसी हंसते हुए कहा, ‘सोचा तो यही सब था यार लेकिन कहां हो पाया। वो सब करने के लिए बहुत कुछ चाहिए। पर यहां तो अपनी मजबूरियां हैं यार...।’

‘तो तू करता क्या है?’ गोपी ने बात काटते हुए पूछा।

‘एक सिक्युरिटी एजेंसी चला रहा हूं। ठीकठाक कमाई है उसमें।’

‘क्या मेरे लिए भी कोई जुगाड़ है?’

‘बिल्कुल है।’ यह सुनते ही गोपी एकदम से उठ खड़ा हुआ। ऐसा पहली बार हुआ था जब वह खाना छोड़कर बीच में उठ गया हो। वह श्यामलाल को पकड़कर एक कोने में ले गया और उस पर सवालों की बौछार कर दी, ‘बताओ, किस तरह का काम मिलेगा? क्या करना होगा? कितना वेतन मिलेगा, कहां रहना होगा?’ श्यामलाल ने कहा, ‘देखो यह सब बातें यहां नहीं हो सकती। मैं अभी दो दिन और हूं गांव में। कल तू मेरे घर आ, आराम से बात करते हैं?’ गोपी बारात से जब घर लौटा तो अम्मा ने पूछा, ‘कैसी रही बारात? क्या सब खाया पीया?’

‘वो सब छोड़ न अम्मा। आज एक खास बात हुई। मेरे बचपन का साथी मिला श्यामलाल। वह दिल्ली में रहता है। उसने कहा है कि वह मुझे नौकरी दिलाएगा।’

‘हूं, तुझे सब ऐसे ही कहते हैं और तू मान भी लेता है। वो मास्टर साहब भी तुझे नौकरी दिलवा रहे थे। दिलवा दिया न।’ अम्मा ने मुंह बिचका कर कहा।

‘अम्मा, वह मेरा दोस्त है, हमलोग साथ खेले हैं। जब वह कह रहा है तो...।’

‘ठीक है ठीक है जब तक कोई चीज हाथ में न आ जाए तब तक उस पर भरोसा करना ठीक नहीं है। जब नौकरी मिल जाएगी तब मानूंगी।’ अम्मा ने उसके उत्साह पर पानी फेर दिया। हालांकि वह बात तो ठीक ही कह रही थी। इससे पहले कई लोग उससे नौकरी दिलाने का वादा कर चुके थे लेकिन किसी ने वादा निभाया नहीं। खुद उसका छोटा भाई ही टालमटोल कर रहा था। ऐसे में अम्मा की नाराजगी स्वाभाविक है लेकिन श्यामलाल ने जब बुलाया है तो उससे बात कर लेने में क्या हर्ज है।

उसने देखा कि अम्मा सोने की तैयारी कर रही है। उसने पास जाकर फुसफुसाकर कहा, ‘अम्मा एक बात कहूं?’

‘क्या है?’

‘मुझे भूख लगी है।’

‘अबे करमजले। तू कैसी बारात में गया था। क्या वहां तुझे किसी ने खाने को ना पूछा। रघुवीर ने न जाने किन कंगालों के घर रिश्ता किया है।’

‘अम्मा, असल में वो नौकरी वाली बात होने लगी न तो मैं खा नहीं पाया। एकाध रोटी तो पड़ी होगी न।’

‘हां पड़ी होगी, जाके खा।’ यह कहकर अम्मा लेट गई। गोपी ने रसोई में जाकर देखा तो दो रोटी रखी थी। उसने रोटी ली और अचार के साथ खाने लगा। हालांकि दो रोटी से बात बनी नहीं। वह डिब्बे खोल-खोल कर देखने लगा। घर में खाने-पीने की कुछ चीजें तो पड़ी ही रहती थीं। उसे एक डिब्बे में मठरी मिल गई। वह मठरी खाते हुए श्यामलाल के बारे में सोचने लगा। बचपन की कई बातें याद आने लगीं। फिर वह बाहर दालान में आ गया, जहां गाय बंधी थी। गाय चुपचाप सिर झुकाए आंखें बंद किए बैठी थी जैसे समाधि की अवस्था में हो। गोपी ने धीरे-धीरे उसकी पीठ सहलाई तो उसने आंखें खोलकर सिर ऊपर उठा लिया। गोपी ने हमेशा की तरह अपनी दोनों मुट्ठी बांधी और उसके आगे बढ़ा दी। एक मुट्ठी नौकरी मिलने के लिए थी और दूसरी नहीं मिलने के लिए। गाय ने नौकरी मिलने वाली मुट्ठी को चाटा। गोपी की बांछें खिल उठीं। पिछले दो वर्षों में पहली बार उसकी गाय ने स्पष्ट कोई संकेत दिया था। उसने गाय को थपथपाया और उठ खड़ा हुआ। उसने सोचा कि अम्मा को यह बात बताई जाए लेकिन लगा कि उसकी नींद खराब करना ठीक नहीं होगा। गोपी लेटने के इरादे से ज्यों ही घर के अंदर आया कि बाहर उजाला फैल गया। उसने सोचा अब सोने का क्या मतलब है। चला जाए श्यामलाल के घर। वह उससे मिलने को उतावला था। फिर उसे लगा इतनी जल्दी जाना ठीक नहीं होगा। क्या ठिकाना वह सो रहा हो। अब वह शहर में रहने लगा है। देर तक सोने की आदत हो गई होगी। वैसे भी बारात से बहुत देर से लौटा है। तब तक अम्मा उठ गई थी। गोपी कुछ देर यूं ही लेटा रहा लेकिन उसका मन नहीं माना। वह उठकर चल पड़ा। बहुत देर तक इधर-उधर भटकता रहा फिर थोड़ी धूप निकल आई तो श्यामलाल के घर पहुंच गया।

श्यामलाल अभी-अभी उठकर चाय पी रहा था। गोपी ने बिना किसी भूमिका के बात शुरू की, ‘हां तो बता श्यामलाल क्या कह रहा था।’

श्यामलाल ने मुस्कराकर कहा, ‘तेरे भीतर कोई चेंज ना आया अभी तक।’ फिर श्यामलाल ने अपनी मुखमुद्रा गंभीर बनाई और कहने लगा, ‘देख भाई गोपी, मोटे लोगों को लगता है कि वे जिंदगी में कुछ ना कर सकते। लोग तुम्हें ही हाथी या भीमसेन वगैरह क्या-क्या कहते हैं लेकिन भइया जमाना बदल गया है। अब तो कुछ नौकरी केवल मोटे-ताजे लोगों को ही मिलती है।’

‘ऐसी कौन नौकरी है भाई?’ गोपी ने आंखें फाड़े हुए पूछा।

‘बाउंसर की नौकरी।’

‘बाउंसर!’ गोपी ने आश्चर्य से पूछा।

‘बाउंसर का मतलब जानता है?’ श्यामलाल ने पूछा।

‘हां, सुना तो है।’ गोपी ने दिमाग पर जोर डालते हुए कहा, ‘क्रिकेट में बाउंसर गेंद फेंकी जाती है।’

‘मैं दूसरे बाउंसर की बात कर रहा हूं। यह एक तरह की नौकरी होती है। जैसे शहरों में होटल होते हैं न होटल। उसमें बाउंसर रखे जाते हैं लोगों को संभालने के लिए ताकि कोई पीकर हंगामा न करे मारपीट न करे। बड़ी-बड़ी पार्टियां होती हैं, उसमें बाउंसर की ड्यूटी लगती है।’

‘तो साफ बोल न कि सिपाही का काम करना है।’

‘अरे यार ये सिपाही नहीं है।’

‘तो क्या है?’

‘बाउंसर है बाउंसर। बाउंसर मारपीट नहीं करता। वह लोगों को हटा देता है। यानी झगड़ा सलटाता है। भीड़ को मैनेज करता है।’

गोपी समझने की कोशिश कर रहा था। श्यामलाल कहे जा रहा था, ‘बाउंसर के लिए दो बातें जरूरी हैं। एक तो तगड़ा शरीर और दूसरा ठंडा दिमाग। वैसे तेरे पास तो दिमाग है ही नहीं इसलिए कोई प्रॉब्लम नहीं है।’

‘मतलब एक तरह का सिपाही ही हुआ न।’

‘नहीं। सिपाही तो चिरकुट होता है पर बाउंसर की बड़ी इज्जत है। वह शानदार कपड़े पहनता है। उसे अंग्रेजी भी आनी चाहिए। उसे तनख्वाह भी ठीकठाक मिलती है।...अब तुझ कैसे समझाऊं कि वह सिपाही से अलग है। हालांकि जो बाउंसर थोड़ा सीनियर हो जाता है, वह हथियार भी रखता है।’

‘वो तो ठीक है लेकिन तनख्वाह कितनी मिलेगी?’

‘तुझे कितनी चाहिए।’ श्यामलाल के इस प्रश्न पर गोपी सोच में पड़ गया। वह तय नहीं कर पा रहा था कि उसे कितनी तनख्वाह चाहिए। उसने थोड़ा सकुचाते हुए कहा, ‘अब जो तू दिला देगा वो ले लूंगा।’

‘तो करेगा न काम?’

‘हां हां क्यों नहीं?’

‘लेकिन यह इतना आसान भी नहीं है। तुझे अंग्रेजी सीखनी होगी तौर-तरीके सीखने होंगे। आखिर तुझे बड़े-बड़े लोगों से डील करना होगा। ऐसे काम करना होगा कि वे नाराज न हों और मामला भी शांत हो जाए।’

गोपी एक योग्य शिष्य की तरह सुनता जा रहा था। फिर तय हुआ कि दो दिन बाद वह श्यामलाल के साथ दिल्ली चलेगा। उस रात गोपी को नींद नहीं आई। वह कभी अतीत में तो कभी भविष्य डूब उतरा रहा था। उसने सोचा भी नहीं था कि इस तरह एक दिन अचानक उसकी मुश्किलों का हल निकल आएगा। उसने तो एक तरह से हार ही मान ली थी। उसे लगता था कि उसकी जिंदगी में अब कोई बदलाव नहीं आने वाला। तीस से भी ज्यादा उम्र हो गई पर उसका जीवन व्यवस्थित नहीं हो पाया। न नौकरी लगी न घर बसा। जबकि उसका छोटा भाई मिलिट्री में कैप्टन और दो बच्चों का बाप बन चुका था। कई बार अम्मा ताने मारती थी कि उसकी जीभ नौ हाथ की है। उसकी जीभ ही उसे ले डूबी। बचपन से ही खा-खाकर उसका शरीर भी मोटा हो गया और दिमाग भी। तभी तो वह दसवीं में तीन बार फेल हुआ और आखिरकार पढ़ाई को ही अलविदा कह दिया। अब क्या करे वह। खाद्य पदार्थ देखते ही वह अपने भीतर एक अजीब तूफान सा महसूस करता था। यह तूफान बहुत कुछ उड़ाकर ले जाता था-उसका दुख-तकलीफ, अतीत-वर्तमान। बस बचता था वह और सामने का भोजन। भोजन करने के बाद जो तृप्ति मिलती थी, उसका कोई जोड़ न था। लोगों ने कई बार टोका-समझाया पर वह अपने ऊपर नियंत्रण नहीं कर पाया।

उसकी असली समस्या तब शुरू हुई जब उसका भाई कॉलेज में चला गया और पढ़ाई पूरी करते ही उसकी नौकरी लग गई। लोग गोपी का मजाक उड़ाते। गोपी ने भी अपने पैरों पर खड़े होने की कोशिश शुरू कर दी। पर उसे यही नहीं समझ में आ रहा था कि वह करे क्या। वह तो कोई भी छोटा-मोटा काम करने को तैयार था पर हर बार उसका भाई अड़ंगा लगा देता और कहता, ‘आप यह काम करोगे। आखिर मेरी भी कोई इज्जत है। लोग क्या कहेंगे कि कैप्टन का भाई इतना छोटा काम करता है।’ वैसे जब तक पिताजी थे तब तक उसे विश्वास था कि थोड़ी बहुत खेती-बारी के सहारे और दूध वगैरह बेचकर उसका गुजारा हो जाएगा लेकिन पिता के मरने के बाद खेती-बारी का मामला भी गड़बड़ाने लगा। छोटे भाई को पढ़ाने में भी कुछ जमीन निकल गई थी। फिर गांव के सारे नौजवान शहर का रुख कर चुके थे। ऐसे में उसे गांव में पड़े रहना अच्छा नहीं लग रहा था।

भाई की नौकरी लग जाने के बाद एक और मुश्किल आ गई थी। उसके भाई के लिए रिश्ते आने लगे। लेकिन गोपी को कोई नहीं पूछता था। अम्मा ने साफ कह दिया कि पहले बड़े बेटे की शादी होगी। खैर, पड़ोस के ही एक गांव में उसकी बात चल निकली। लेकिन एक दिन अचानक लड़की वाले पलट गए। गोपी को बाद में पता चला कि लड़की ने ही शादी से मना कर दिया है। उसने धमकी दी कि अगर वहां शादी हुई तो वह जहर खा लेगी। असल में वह गोपी के गांव में मेला देखने आई थी वहीं उसने गोपी को देख लिया और अपना इरादा बदल लिया। गोपी को यह जानकर बड़ा झटका लगा। फिर उसने ऐलान कर दिया कि वह कभी शादी नहीं करेगा। उसने यह कहानी प्रचारित की कि उसे बजरंग बली ने सपने में कहा है कि तू तो मेरा शिष्य है। तू शादी कैसे कर सकता है। तुझे तो ब्रह्मचारी रहना है। उसके बाद से गोपी गांव के मंदिर पर अक्सर ध्यान लगाए रहता और हनुमान जी की पूजा-आराधना करता। उसने एक बार रामलीला में हनुमान का रोल भी किया। अम्मा ने उसे बहुत समझाया पर वह शादी के लिए तैयार नहीं हुआ। हारकर अम्मा ने उसके छोटे भाई की शादी कर दी।

लेकिन गोपी को अपने छोटे भाई से कोई शिकायत नहीं थी। वह उसे बहुत प्यार करता था। उसके बच्चों के प्रति भी उसके मन में अपार स्नेह था। उसे जब भी मौका मिलता वह अपने भाई को फोन करता और उसका हालचाल पूछता। कई बार भाई के रवैये से लगा कि वह गोपी से बचना चाह रहा है लेकिन फिर भी गोपी के मन में कोई कड़वाहट कभी नहीं आई। गोपी ने सोचा कि जब वह कमाने लगेगा तो वह अपने भाई, बहू और उसके बच्चों के लिए अच्छे-अच्छे कपड़े खरीद कर देगा। पिछली बार वह खाली हाथ ही भाई से मिलने जोधपुर चला गया था। तब बहू ने उस पर खाली हाथ आने के कारण व्यंग्य भी किया था। उसकी ज्यादा खुराक का मजाक भी उड़ाया था। लेकिन गोपी ने बुरा नहीं माना।

सुबह उठकर गोपी श्यामलाल के घर पहुंच गया। श्यामलाल ने उससे कहा कि वह अंग्रेजी बोलने की प्रैक्टिस शुरू कर दे। थैंक्यू, एक्सक्यूज मी, वेलकम, गुड नाइट वगैरह को घोलकर पी जाए। जब गोपी ने इन शब्दों का उच्चारण करके श्यामलाल को दिखाया तो श्यामलाल ने कहा कि उसका लहजा देहाती है। फिर श्यामलाल ने उसे सही लहजा बताया। फिर यह भी समझाया कि कब गुड इवनिंग बोलना है और कब गुड नाइट। किसी के थैंक्यू कहने पर किस तरह वेलकम या ओके कहना है, यह भी समझाया। उसने यह भी बताया कि कुछ दिन गोपी को किसी और बाउंसर के साथ ट्रेनिंग लेनी होगी। दिन भर गोपी इसका अभ्यास करता रहा। आखिरकार वह घड़ी आ ही गई जिसका गोपी को इंतजार था। वह श्यामलाल के साथ दिल्ली पहुंचा और वहां एक बाउंसर के रूप में उसने नौकरी की शुरुआत की। काली पैंट और टीशर्ट पहनकर जब उसने आईना देखा तो उसे अपना चेहरा एकदम अलग लगा। जैसे एक गोपी दूसरे गोपी को देख रहा हो। फिर एक गोपी ने दूसरे गोपी से कहा, ‘गोपी भाई मुबारक हो मुबारक।’

गोपी को लगा यह उसका पुनर्जन्म है। वह एक अलग दुनिया में चला आया। यह ऐसा संसार था जिसकी थोड़ी बहुत झलक उसने अब तक कुछेक फिल्मों में ही देखी थी। उसे लगता था यह एक मायावी संसार है जो असली नहीं है। वह जो कुछ सामने देख रहा था वह सब उसे जादुई लग रहा था। कई बार शक होता कि यह सब कहीं स्वप्न तो नहीं। दिल्ली के एक पब में उसकी ड्यूटी लगी थी। हल्की रोशनी में अजनबी संगीत की धुन में थिरकते-चहकते लोग उसे कभी-कभी छायाओं की तरह नजर तो आते थे तो कई बार प्लास्टिक के पुतलों की तरह। गोपी जब कुछ बोलता तो उसे खुद यकीन नहीं होता कि यह आवाज सचमुच उसके भीतर से आ रही है या नहीं। कई बार लगता जैसे उसके शरीर में कुछ है ही नहीं। उसका भारी-भरकम शरीर हवा में झूल रहा है। उसे पता ही नहीं चल पाता कि कब वह अपने कमरे से निकलकर पब में पहुंच गया और कब पब से फिर वापस अपने कमरे में। नींद में भी तेज संगीत बजता रहता, शोर-शराबा होता रहता। एक के बाद एक चेहरे उसके सामने आते रहते। उसके मन के पर्दे पर तरह-तरह के दृश्य उभरते रहते, वह देखता एक खूबसूरत लड़की बाल लहराती चली आ रही है। फिर वह नशे में अंगड़ाई ले रही है।...दो होंठ एक-दूसरे की ओर खिंचे चले आ रहे हैं।... थिरकते पैर, झूलती बांहें। तरह-तरह की गंध उसके नथुनों में भरी रहती। हर समय लगता जैसे सब कुछ हिल रहा है। वह एक ट्रेन में बैठा है जो चली जा रही है इस दुनिया से दूर।

एक दिन उसके जी में आया कि वह एक लड़की को छूकर देखे कि वह वास्तव में हाड़-मांस की है या नहीं। वह जानना चाहता था कि वह कहां से आती है। कहीं ऐसा तो नहीं कि यह कोई परी हो और यहां आकर इंसानों के बीच रह रही हो और लोगों को इसका अंदाजा तक न हो। अगर ये साधारण लड़की है तो इसके मां-बाप कौन हैं। यह कैसे इतने लोगों के साथ खुलेआम उठती-बैठती है, दारू पीती है। क्या इसके मां-बाप कुछ नहीं कहते? क्या इसकी शादी हो चुकी है? अगर नहीं तो क्या इसे इस बात की चिंता नहीं कि इन हरकतों को देखकर कोई इससे ब्याह नहीं करेगा। अगर इसकी शादी हो गई तो यह अपने पति को ठेंगे पर रखेगी।

एक दिन उस परी ने गोपी को आवाज दी। गोपी को यकीन नहीं हुआ। वह ऊपर से नीचे तक कांप गया। फिर साहस करके उसकी ओर गया। उसने कहा, ‘आपकी मदद चाहिए।’ वह नशे में चूर थी। होंठ कांप रहे थे। उसने कहा, ‘जरा मेरी गाड़ी को धक्का लगा देंगे।’

‘चलिए।’ गोपी ने कहा। वह बाहर सड़क पर आया। आधी रात को वह सड़क पर इस परी के साथ अकेले है, इस ख्याल से ही उसे सिहरन हुई। वह गाड़ी में बैठ गई। गोपी गाड़ी को ठेलने लगा। थोड़ी देर में गाड़ी स्टार्ट हो गई। उस लड़की ने खिड़की से सिर निकालकर कहा, ‘थैंक्यू।’ गोपी ने झट जवाब दिया, ‘वेलकम।’ गाड़ी धुआं छोड़ती हुई तेजी से भागी फिर अदृश्य हो गई। गोपी बड़ी देर तक उस दिशा में देखता रहा। गोपी को संदेह हुआ कि यह सब सच नहीं है। क्योंकि घर लौटने के बाद भी उसे लगा कि एक बार फिर वह गाड़ी को धक्का लगा रहा है। परी ने सिर निकालकर पीछे देखा और कहा, ‘थैंक्यू।’ गोपी ने कहा, ‘वेलकम।’ ऐसा कई दिनों तक होता रहा।

इस बीच श्यामलाल उससे मिलने आया। उसने कहा, ‘और गोपी भाई, कैसा चल रहा है?’

गोपी समझ नहीं पा रहा था कि वह अपने मन की बात कैसे कहे। वह इतना ही कह पाया, ‘यार मुझे तो यहां का कुछ समझ में नहीं आ रहा।’

‘कोई प्रॉब्लम हो तो बताना।’ श्यामलाल ने कहा। अब गोपी क्या बताए। यह परी उसके सिर पर नाचने लगी थी। दिन रात लगता जैसे वह उसी के साथ है। एक शाम जब वह आई तो उसने गोपी को ‘हैलो’ कहा। गोपी ने अपने भीतर एक अजीब सी बात महसूस की। उसे लगा कि उसका हाथ परी की ओर अपने आप बढ़ता जा रहा है। उसने बड़ी मुश्किल से अपने पर काबू किया। एक बार फिर वह इस दृश्य को कई बार सपने में देखता रहा।

एक दिन परी ने पब में अपना बर्थडे मनाया। उसके कई दोस्त आए थे। परी केक बांट रही थी। वह अचानक केक लेकर गोपी के पास चली आई और उसकी ओर बढ़ाती हुई बोली, ‘लो भइया आप भी खाओ।’ उसने केक ले लिया। तभी बिजली की तरह उसके भीतर एक विचार कौंधा। उसने उस पर तत्काल अमल किया। उसने केक वहीं एक कुर्सी पर रख कहा, ‘एक्स्क्यूज मी मैम।’ फिर उसने हाथ बढ़ाते हुए कहा, ‘हैप्पी बर्थडे।’ परी ने भी हाथ आगे बढ़ा दिया। उसका हाथ अपने हाथ में लेते ही गोपी ने महसूस किया कि सब कुछ ठहर गया है। पृथ्वी अपने अक्ष पर घूमना छोड़ उन दोनों को देखने लगी है। तभी परी ने तेजी से अपना हाथ छुड़ाया और चली गई। गोपी ने मुट्ठी बंद कर ली ताकि परी के स्पर्श को अपने पास सुरक्षित रखे।

उस दिन से उसकी परेशानी और बढ़ गई। अपने जन्म दिन के बाद जब वह कई दिनों तक नहीं दिखी तो गोपी को अपने भीतर एक कमी का अहसास हुआ। वह सड़क पर या मार्केट में किसी लड़की को कार में बैठते या उससे उतरते देखता तो उसे लगता कि यह वही परी है। लेकिन इस दौरान उसे अपनी इस हालत पर सोचने का भी मौका मिला। उसे याद आया कि वह तो हनुमान जी का भक्त है फिर इस तरह एक औरत के पीछे पागल होने का क्या मतलब है। वह तो अपने को ब्रह्मचारी घोषित कर चुका है फिर यह सब...। पिछले कुछ वर्षों से वह तो किसी औरत के बारे में सोचता तक न था, उसने अपने मन को मना लिया था कि उसे स्त्रियों से दूर रहना है फिर यह सब क्या है? उसी दिन अम्मा ने फोन किया और हालचाल पूछा। वह कैसे रहता है, क्या खाता-पीता है, क्या ड्यूटी है, यह सब विस्तार से जानना चाहा। फिर अंत में उसने एक ऐसी बात कह दी जिससे गोपी के भीतर तरंगें उठने लगीं। मां ने पूछा, ‘बेटा अब तो तेरी नौकरी लग गई। क्या तेरी शादी की बात चलाऊं?’

उसके मन में आया कि कह दे कि ‘हां हां मां।’ लेकिन फिर उसके सामने बजरंग बली की मूरत घूम गई। कहीं बजरंग बली नाराज हो गए तो...। लेकिन क्या करे वह। बजरंग बली को मनाया भी जा सकता है। उनसे क्षमा मांग लेगा वह। लेकिन गांव के लोग भी मजाक उड़ाएंगे। कहेंगे, ‘बड़ा भगत बनते थे। शहर जाते ही लंगोटी ढीली हो गई।’ अब वे कहें तो कहें। आखिर वह अपने मन को क्यों मारे। किसी को पसंद करना कोई गुनाह तो नहीं है, शादी करना कोई पाप तो नहीं है। फिर भी उसने अपने पर काबू करते हुए कहा, ‘मां, अब थोड़े दिन रुक जाओ।’

लेकिन उसी दिन उसने एक कड़ा फैसला किया। वह श्यामलाल के पास गया और बोला, ‘भइया मेरी ड्यूटी कहीं और लगवा दो।’ श्यामलाल चौंका, ‘अरे क्या बात हो गई भाई। कोई प्रॉबल्म हो गई है क्या?’

‘मुझे अच्छा नहीं लगता यार।’

‘तुम पहले आदमी हो जो यह कह रहे हो। बाकी लोग तो वहां ड्यूटी के लिए तरसते हैं।’

गोपी कैसे समझाए कि उसे क्या दिक्कत है। उसे लग रहा था कि अगर वह सचाई बता देगा तो श्यामलाल उसकी खिल्ली उड़ाएगा।

‘मैं समझ गया तू नाइट ड्यूटी से घबरा रहा है।’ श्यामलाल ने कहा।

गोपी को बहाना मिल गया। उसने कहा, ‘हां यार। रात में जगने की आदत नहीं है न। इस कारण खाना हजम नहीं हो पा रहा है।’ श्यामलाल ने लंबा भाषण पिलाया कि नौकरी में आदमी को क्या-क्या नहीं करना पड़ता है। रात में जगना तो मामूली बात है। श्यामलाल ने उसे आश्वासन दिया कि वह उसकी ड्यूटी कहीं और लगवा देगा। गोपी को राहत मिली। उसने सोच लिया कि जी कड़ा करके वह परी से अलग हो जाएगा। चाहे जो हो। अगर वह उसके आसपास रहा तो उसके साथ कुछ भी गड़बड़ हो सकती है। अभी वह इस शहर में नया-नया आया है। बहुत संभलकर रहना है।

परी से उसका पीछा छूटा। श्यामलाल ने उसकी ड्यूटी बदल दी। अब उसे एक कंपनी के मालिक सिंहानिया साहब के साथ लगाया गया। काम कुछ खास नहीं था। सिंहानिया साहब के साथ उनके दफ्तर आना था, फिर उनके चैंबर के बाहर एक कुर्सी पर चुपचाप बैठे रहना था। श्यामलाल और सिंहानिया साहब की बातों से गोपी को यही पता चला कि सिंहानिया साहब को अपने ही कर्मचारियों से बचाना है। यानी गोपी को यह देखना है कि कोई कर्मचारी उनके बेहद करीब न आ जाए, उनके साथ बदतमीजी या हाथापाई न करे। श्यामलाल का निर्देश था कि कभी अगर कोई आदमी गलत नीयत से सिंहानिया साहब की तरफ बढ़ता नजर आए तो गोपी को उस व्यक्ति को पीछे धकेल देना है। गोपी जब पहली बार कंपनी में आया तो उसने इसके कर्मचारियों को उत्सुकता से देखा। वहां ज्यादातर नौजवान लड़के-लड़कियां थे। सभी पढ़े-लिखे शरीफ परिवारों के थे। गोपी समझ नहीं पाया कि ये लोग कैसे बदतमीजी या मारपीट कर सकते हैं। इनसे भला ंिसंहानिया साहब को क्या खतरा हो सकता है।

जब गोपी सिंहानिया साहब के चैंबर के बाहर एक कुर्सी पर बैठा तो एक-एक कर सारे कर्मचारी उसे देखने आए जैसे वह कोई अद्भुत जीव हो। गोपी को बहुत बुरा लग रहा था। उसे याद आया एक बार उसके गांव में एक मेले में चार टांगों वाले एक बच्चे को दिखाया जा रहा था। उसे देखने के लिए भीड़ लग गई थी। सब आंख फाड़े देख रहे थे। गोपी का कुछ वैसा ही हाल हो रहा था। उसे बड़ी शर्मिंदगी महसूस हो रही थी। लेकिन उसे श्यामलाल की हिदायत याद आई कि उसे सीरियस रहना है, जरा भी मुस्कराना नहीं है। हो सके तो बीच-बीच में मूंछों पर ताव देते रहना है। गोपी ने वैसा ही किया।

उसे लेकर खुसर-फुसुर हो रही थी। एक ने कहा, ‘यार हद हो गई। अब यहां बाउंसर आ गया। क्या सिंहानिया इतना डरपोक है।’ दूसरे ने कहा, ‘जो दो नंबर का आदमी होता है न उसे हर किसी से डर लगता है।’ किसी ने पूछा, ‘तो क्या यह सिंहानिया हमलोगों को पिटवाएगा?’ गोपी ने सिर उठाकर देखा। वह चौंक गया। सामने जो लड़का खड़ा था वह बिल्कुल उसके छोटे भाई जैसा लग रहा था। गोपी के जी में आया कि वह उसे कंधे पर बिठाकर जोर-जोर से कहे-‘जय कन्हैया लाल की हाथी घोड़ा पालकी।’ ठीक उसी तरह जैसे वह बचपन में किया करता था। लेकिन उसने खुद को समझाया कि वह अपने बचपन से बहुत दूर आ चुका है।

यहां दिन भर बैठे-बैठे कई बार उसे घुटन होने लगती थी। तब वह परेशान होकर चक्कर काटने लगता। जब वह केवल चक्कर काटने के ख्याल से कंपनी के भीतर के कमरों में दाखिल होता तो वहां कम्प्यूटर खटखटाते या उस पर नजरें टिकाए लड़के सचेत हो जाते और उसे अजीब नजरों से घूरने लगते, फिर फुसफुसाते, ‘देखो! आ गया पहलवान। ंिसंहानिया ने भेजा होगा उसे हम पर नजर रखने के लिए।’ उस वक्त गोपी चाहता था कि उन्हें समझाए कि ऐसा कुछ नहीं कहा है सिंहानिया साहब ने। लेकिन वह कुछ कहने से डरता था।

एक दिन उनमें से एक लड़के ने संवाद की शुरुआत की। उसने गोपी से कहा, ‘क्यों भइया हमें मारोगे क्या?’

गोपी ने कहा, ‘नहीं, नहीं मारूंगा क्यों?’ तभी सामने की टेबल पर बैठी एक लड़की अपना टिफिन बॉक्स खोलने लगी। वह अल्युमिनियम का टिफिन बॉक्स था जो बहुत सख्त बंद हो गया था। लड़की ने पास बैठे एक लड़के की ओर उसे बढ़ाया। लड़के ने उसे खोलने की कोशिश की पर वह उसे खोल न पाया। फिर उसने किसी और की ओर बढ़ाया। उसने भी प्रयास किया पर वह भी सफल न हो सका। गोपी से रहा नहीं गया। उसने कहा, ‘लाइए मैं कोशिश करता हूं।’ लड़की ने टिफिन बॉक्स गोपी की ओर बढ़ा दिया। गोपी ने उसे घुमा-घुमाकर खोल डाला। उसके खुलते ही आलू पराठे की खुशबू फैल गई। ऐसी खुशबू कितने दिनों बाद गोपी को मिली थी। वह मुस्कराता हुआ जब वहां से जाने लगा तो उस लड़की ने कहा, ‘अरे भइया कहां चल दिए। थोड़ा सा आप इसमें से टेस्ट तो करो।’ गोपी ने मना किया तो लड़के कहने लगे, ‘ले लो यार, ले लो।’ लड़की ने पराठे का एक बड़ा टुकड़ा गोपी की ओर बढ़ाया। गोपी ने कहा, ‘थैंक्यू।’ पराठे का टुकड़ा मुंह में रखते ही वह अपना अकेलापन और अवसाद भूल गया। कितने दिनों बाद देसी घी का यह स्वाद उसे मिला था। अपने गांव के खाने का यह स्वाद उसे यहां भी मिल सकता है, यह उसने सोचा ही नहीं था। जी में आया कि उस लड़की के पैर पकड़कर कहे कि अपने दोनों पराठे दे दो पर ऐसा करना नामुमकिन था।

एक दिन एक लड़के को शकरपारे खाते देख उसकी ऐसी ही हालत हो गई। वह शकरपारे पर जान छिड़कता था। जब वह गांव में था तो उसकी जेब शकरपारे से भरी रहती थी। लेकिन यहां आकर वह शकरपारे के लिए तरस गया था। जब उसने उस लड़के को शकरपारे खाते देखा तो उससे रहा नहीं गया। गोपी उस लड़के को देखकर मुस्कराया। लड़के को गोपी का इस तरह पास आना थोड़ा अटपटा लगा लेकिन उसने अपने को संभाला और कहा, ‘हूं! कहिए, सिंहानिया साहब का क्या हाल है?’ यह सवाल गोपी के लिए अप्रत्याशित था। लेकिन इसका कुछ न कुछ जवाब तो देना ही था। गोपी बोला, ‘क्या हाल रहेगा।... वो बड़े आदमी हैं।’

‘हरामी चीज है वह।’ उस लड़के ने मुंह बनाकर कहा। गोपी उसके पास शकरपारे के लोभ में आया था पर उस लड़के ने माहौल को कड़वा बना दिया। गोपी को पछतावा हुआ। उसे लगा उसने इस लड़के को टोककर गलती की। लड़के का चेहरा लाल होता जा रहा था। उसने कहा, ‘लेकिन हमलोग भी उसको छोड़ेंगे नहीं।’ तो श्यामलाल ठीक कह रहा था। सिंहानिया साहब को अपने ही कर्मचारियों से खतरा है। गोपी घबरा गया। वह नहीं चाहता था कि यहां कभी कोई अप्रिय स्थिति पैदा हो और उसे वह सब कुछ करना पड़े जो एक बाउंसर से अपेक्षा की जाती है। वह तो चाहता था कि किसी तरह सब कुछ शांतिपूर्वक बीत जाए। उसने वहां से कट लेना चाहा तो लड़के ने कंधे पर हाथ रख दिया और बोला, ‘यह आदमी कहता है कि इसे मुनाफा नहीं हो रहा इसलिए हमें नौकरी से निकालना चाहता है। हम दो महीने की तनख्वाह मांग रहे हैं तो वह भी नहीं देना चाहता। फिर मुनाफा न होने की बात भी गलत है। अगर फायदा नहीं हो रहा है तो यह आदमी धड़ाधड़ प्रॉपर्टी कहां से खरीद रहा है।’

गोपी ने कहा, ‘ठीक है मैं चलता हूं।’

‘रुको यार लो ये शकरपारे खाओ।’ गोपी को हैरत हुई कि आखिर उस लड़के ने कैसे ताड़ लिया था कि गोपी शकरपारे के लिए उसके पास आया था। लेकिन अब गोपी का मूड बदल चुका था। शकरपारे खाने का उसका उत्साह खत्म हो गया था। वह किसी तरह उस लड़के से पीछा छुड़ाना चाहता था। उसने कहा, ‘नहीं-नहीं।’

‘सॉरी यार, मैने पता नहीं क्या-क्या कह दिया। मन में बहुत सी चीजें थीं, निकल गईं। बाई द वे... तुम्हारा नाम क्या है?’

‘गोपी...।’ गोपी ने सिर झुकाकर कहा।

‘शरद श्रीवास्तव।’ यह कहकर उस लड़के ने मुस्कराते हुए अपना हाथ गोपी की तरफ बढ़ा दिया। पहली बार इस शहर में किसी ने गोपी से उसका नाम पूछा था और अपना परिचय देते हुए उससे हाथ मिलाया था। अब शरद के चेहरे पर कुछ सेंकेंड पहले वाली कड़वाहट नहीं रह गई थी। गोपी को शरद की मुस्कान शकरपारे की तरह मीठी लगी। गोपी ने अपनी हथेली शरद की तरफ बढ़ा दी। शरद ने उसे शकरपारे से भर दिया। शरद ने उसे बताया कि उसकी मां ने ये शकपारे बनाए हैं। यह सुनकर गोपी का गला भर आया। उसके सामने अपनी अम्मा का चेहरा घूम गया। वह अम्मा से मिलने जाना चाहता था पर श्यामलाल ने कह रखा था कि एक साल तक छुट्टी लेने के बारे में वह न सोचे। शरद ने गोपी से पूछा कि वह कहां रहता है, कैसे रहता है। गोपी ने सब कुछ बता दिया कि वह कैसे एक कमरे में अकेले रहता है और होटल का खाना खाता है। वह घर का खाना खाने के लिए तरस गया है। इस पर शरद ने कहा कि वह उसके घर आए तो उसे उसकी मां के हाथ का खाना मिल सकता है। पर गोपी ने टाल दिया। तब शरद ने कहा कि वह टिफिन में उसके लिए खाना बनवाकर ले आएगा। गोपी को यकीन नहीं हुआ। क्या बड़े शहरों में भी ऐसे लोग होते हैं जो पहली ही मुलाकात में दोस्त बन जाएं। गोपी को लगा कि शरद यूं ही कह रहा है। लेकिन अगले दिन शरद सचमुच गोपी के लिए एक बड़ी सी टिफिन में खाना लेकर आ गया। लंच टाइम में शरद ने गोपी को सब के साथ खाने को बुलाया। गोपी धर्मसंकट में पड़ गया। उसने सोचा कि ऐसा करना ठीक नहीं रहेगा। शरद उसकी दुविधा को भांप गया। उसने उसे टिफिन थमा दिया और कहा कि वह अपनी सुविधानुसार जब चाहे खा ले।

कितने दिनों बाद गोपी को घर का खाना मिला था। पूरी, छोले, सब्जी, अचार, लड्डू और शकरपारे। मजा आ गया। उसकी आत्मा तृप्त हो गई। उसने शरद को टिफिन लौटाते हुए ‘थैंक्यू’ कहा तो शरद थोड़ा नाराज होकर बोला, ‘अरे तुम मुझे थैंक्यू बोल रहे हो। मैने तो तुम्हें दोस्त समझकर खाना खिलाया था।’ गोपी झेंप गया। धीरे-धीरे शरद के जरिए वह कंपनी के और लड़कों के संपर्क में आया। हालांकि वह अपनी ओर से कम से कम बोलने की कोशिश करता था, लड़के ही उससे मजाक करते रहते। गोपी सिर्फ मुस्करा देता। ज्यादातर लोग उसे पहलवान समझते थे। उन्हें लगता था कि गोपी जरूर किसी अखाड़े से जुड़ा रहा होगा। लेकिन गोपी ने उन्हें बता दिया कि उसने कभी कुश्ती नहीं लड़ी।

कंपनी के सभी लड़के अपने भविष्य को लेकर चिंतित रहते थे। उनकी बातचीत से लगता था कि यह कंपनी इन दिनों घाटे में चल रही थी इसलिए मैनेजमेंट ने कुछ लोगों को निकालने का फैसला किया था। किसको-किसको निकाला जाए, इस पर विचार चल रहा था और जल्दी ही उसकी एक लिस्ट जारी होने वाली थी। हर कोई इसी बात से डरा रहता था कि लिस्ट में कहीं उसका भी नाम न हो। जब अलग अलगग्रुपों में वे बात करते तो गोपी उनकी तकलीफ को महसूस करता। उसे यकीन नहीं होता था कि महानगर में पढ़े-लिखे, सुखी लोगों के जीवन में भी इतनी अनिश्चितता हो सकती है। एक दिन कोई किसी से कह रहा था, ‘यार मेरे पिताजी को लकवा मार गया है। मैं उनका इलाज करवा रहा हूं। अगर अचानक नौकरी चली गई तो पता नहीं क्या होगा।’ एक लड़की एक दिन कह रही थी कि उसके पिताजी रिटायर कर चुके हैं और घर का खर्चा उसी की कमाई से चलता है। अगर उसे निकाल दिया गया तो परिवार पर मुश्किलों का पहाड़ टूट पड़ेगा। तत्काल तो दूसरी नौकरी मिलेगी भी नहीं। उनकी बातों को सुनते हुए गोपी को पब के लड़के-लड़कियों की बातचीत याद आ जाती। वे तो हर समय यही बात करते रहते कि अमुक मॉडल की गाड़ी लेनी है या हांगकांग घूमने जाना है या इस बार छुट्टियां स्विट्रजरलैंड में बितानी है। बिल्कुल दो तरह का संसार था एक ही शहर में। यह सोचते हुए गोपी को एक दिन परी की याद आई। तभी उसके कहीं भीतर से नफरत का एक ज्वार सा पैदा हुआ। उसे शर्म आई अपने ऊपर। आखिर क्यों वह उसे कुछ दिनों के लिए अच्छी लगने लगी थी। उसमें ऐसा तो कुछ नहीं था। बढ़िया हुआ कि उसने पब की ड्यूटी छोड़ दी। यहां इस कंपनी में तो हर कोई जाना-पहचाना लगता था, अपने गांव और गली का नजर आता था।

एक दिन शरद ने जिद करके उसे अपने घर बुलाया। रविवार के दिन गोपी बेहद सकुचाता हुआ उसके घर पहुंचा। शरद अपनी मां और छोटी बहन के साथ रहता था। शरद की मां ने गोपी से उसके गांव, परिवार, जाति वगैरह के बारे में विस्तार से पूछा। फिर अंत में उसने जो सवाल किया उससे गोपी का चेहरा लाल हो गया। शरद की मां ने पूछा, ‘क्या तुम्हारी शादी नहीं हुई अभी तक?’

गोपी ने शरमाते हुए कहा, ‘नहीं हुई।’

‘क्यों कोई खास बात?’

‘बस ऐसे ही चाची। कोई कामधाम था नहीं...।’

इस पर शरद की मां ने कहा, ‘लेकिन अब तो नौकरी कर रहे हो। ठीकठाक कमा रहे हो।’

शरद की मां के व्यवहार में अपनत्व पाकर गोपी ने अपने मन में दबी बात भी कह दी, ‘वैसे मुझसे कोई क्यों शादी करेगा। लड़कियां मुझे पसंद नहीं करतीं।’

शरद की मां जोर से हंसी, ‘ऐसा कुछ नहीं है रे। मैं कराऊंगी तेरी शादी। एक तो अभी ही मेरे ध्यान में आ रही है। कल ही बात करती हूं उसके घर वालों से।’

उस दिन गोपी ने शरद के घर छककर खाया और दिन भर सोता रहा। कितने दिनों बाद यह सुकून मिला था। लेकिन अगले ही दिन एक ऐसी घटना घट गई जिससे गोपी को गहरा झटका लगा। रोज की तरह गोपी सिंहानिया साहब के चैंबर के बाहर बैठा था। तभी शरद आया। उसने गोपी को हाथ हिलाया और चैंबर में घुस गया। हालांकि हर कोई उसमें घुसने से पहले गोपी से पूछता था और सिंहानिया साहब से इजाजत लेने के बाद ही गोपी उन्हें अंदर जाने देता था। लेकिन शरद तो ऐसे ही चला गया। उसका माथा ठनका। तभी सिंहानिया साहब की तेज आवाज आई, ‘गोपी।’

गोपी अंदर गया। सिंहानिया साहब ने शरद की ओर इशारा करके कहा, ‘यह अंदर कैसे आ गया?’

गोपी हकलाने लगा, ‘सर, सर।’

तभी शरद ने कहा, ‘सर आप मेरी बात तो सुनिए। आप आखिर कब तक टालते रहेंगे।’

सिंहानिया साहब ने गोपी से कहा, ‘इसे बाहर निकालो। बाहर करो इसे।’

गोपी ने इस पल की कभी कल्पना भी न की थी। इतने दिनों की नौकरी में अभी तक ऐसा मौका नहीं आया था कि किसी को बल प्रयोग करके बाहर निकालना पड़े। अब तो शरद को ही उसे बाहर निकालना था। वह शरद की ओर देखने लगा।

शरद ने सिंहानिया साहब से कहा, ‘आपको मेरी बात सुननी हो होगी।’ सिंहानिया साहब गरजे, ‘अरे देखते क्या हो। बाहर करो इसे।’

गोपी ने शरद की ओर हाथ बढ़ाया पर उसका हाथ हवा में ही लटका रह गया। उसकी हालत वैसी ही हो गई जैसे सपने में आदमी जब भागना चाहता है तो उसके पैर सुन्न हो जाते हैं। लेकिन शरद अपने आप चला गया। उसके पीछे गोपी भी बाहर आ गया। वह पसीने से तरबतर हो गया था। समझ में नहीं आ रहा था कि ऐसा क्यों हुआ। इसका क्या नतीजा निकल सकता है। तभी सिंहानिया साहब बाहर आए और उन्होंने कहा कि वह किसी जरूरी काम से निकल रहे हैं। लौटकर नहीं आएंगे। गोपी चाहे तो घर जा सकता है। गोपी ने सोचा कि शरद से बात करे, पर वह समझ नहीं पा रहा था कि वह उससे क्या कहे। गोपी अपने कमरे पर चला आया। उसे नींद आ गई और वह सो गया। उसकी नींद मोबाइल की आवाज से खुली। श्यामलाल का फोन था। उसने कहा, ‘गोपी तेरी कम्प्लेंट आई है। सिंहानिया साहब तुझसे नाराज हैं। वो तो दूसरा बाउंसर मांग रहे हैं पर मैंने बड़ी मिन्नत की तो उन्होंने तुझे एक मौका और देने का फैसला किया है।...तू क्या करता है यार। ऐसे कहीं नौकरी होती है। तू तो सिंहानिया साहब के इम्प्लॉइज का दोस्त बन गया है। सुना है, तू उनके साथ बैठकर ही ही करता है। अरे भाई घोड़ा घास से दोस्ती कर लेगा तो खाएगा क्या। तेरी नौकरी इसलिए हैं कि उस कंपनी के कर्मचारियों में तेरा खौफ हो लेकिन तू तो साले उनका यार बन बैठा है। मैने तुझे कहा था कि तू किसी से बात नहीं करेगा फिर तूने क्यों बात की?’ श्यामलाल का स्वर तल्ख होता जा रहा था। गोपी को कोई उत्तर नहीं सूझ रहा था। कुछ देर चुप रहने के बाद गोपी ने बात का रुख बदलने के लिए कहा, ‘लेकिन वो ंिसंहानिया ठीक आदमी नहीं है।’

‘वो कैसा भी आदमी है उससे तुम्हें क्या मतलब है? अब मैं तेरे लिए कोई भला आदमी कहां से ढंूढकर लाऊं जिसकी तू नौकरी करेगा। देख गोपी, नौकरी के कुछ उसूल होते हैं। तू तो अपने पैर पर ही कुल्हाड़ी मार रहा है।..नौकरी करना सीख ले नहीं तो टिक नहीं पाएगा यहां। आखिरी मौका दे रहा हूं तुझे। फिर मैं तेरी कोई मदद नहीं कर पाऊंगा।’ यह कहकर श्यामलाल ने फोन काट दिया।

‘आखिरी मौका...।’ मतलब यह कि अगर गोपी ने अपने को नहीं बदला तो श्यामलाल से उसका रिश्ता खत्म। श्यामलाल ही तो उसे यहां तक लाया है। गांव के सारे लोग केवल बड़े-बड़े आश्वासन भर देते रहे लेकिन श्यामलाल ने जो कहा वह करके दिखाया। श्यामलाल उसका भला चाहता है। वह भी बेचारा क्या करे। वह इतने दिनों से इस शहर में रह रहा है, इसलिए यहां के चाल-चलन को अच्छी तरह से जान गया है। ...अब गोपी भी परदेस से रोजी-रोटी कमाने आया है न कि रिश्ता बनाने। अरे जब चुप रहने से ही रोजी-रोटी चलती हो तो आदमी चुप रह लेगा। लोग पेट की खातिर जान पर खेल जाते हैं। गांव के मेले में एक आदमी तो अपने शरीर में आग लगाकर काफी ऊंचाई से पानी में कूदता था। गोपी को तो वैसा भी कुछ नहीं करना है। बस सीरियस बने रहना है।

गोपी पछताने लगा। क्या जरूरत थी शरद से बात करने की। अम्मा का कहना ठीक है। अपनी जीभ के कारण ही गोपी को मुसीबत उठानी पड़ती है। शकरपारे के लोभ के कारण ही वह शरद के पास गया था और फिर उससे दोस्ती हो गई जिसका नतीजा उसे भुगतना पड़ रहा है। नहीं, अब जो हो गया, सो हो गया। अपने को बदलेगा गोपी। जब पूरी दुनिया बदलने को तैयार है तो क्या वह नहीं बदल सकता? शायद जीने के लिए अपने को मारना जरूरी है। श्यामलाल ने उसे एक मौका दिया है। आखिरी मौका। उसे अपने आप को साबित करना होगा। उसे इस बात का सबूत देना होगा कि वह नौकरी कर सकता है।

बाहर हल्का उजाला फैलने लगा था। ट्रक की घड़घड़ाहट सुनाई देने लगी थी। दूर कहीं किसी मंदिर से भजन का स्वर आ रहा था। बस कुछ ही क्षणों में शहर झटके में उठेगा और भाग खड़ा होगा तेजी से। गोपी भी उस दौड़ का हिस्सा बनेगा। लेकिन इस बार अलग तरीके से। नींद का झोंका गोपी को हिलाने लगा था पर उसने तय किया कि अब सोना नहीं है। अगर सो गया तो देर हो जाएगी। वह हाथ मुंह धोकर तैयार हो गया।

वह एक अलग अंदाज में दफ्तर पहुंचा। उसने काला चश्मा लगा लिया था ताकि कोई उसकी आंखों में झांककर उसके मन को न ताड़ सके। उसने अपने बाल भी रंगवा लिए थे सुनहले रंग में। गोपी बाहर और भीतर दोनों से एक नया गोपी दिखना चाहता था। सबसे पहले तो सिंहानिया साहब ही चौंक गए। उन्होंने कहा, ‘सिर्फ स्टाइल देने से कुछ नहीं होगा। काम करके भी दिखाओ।’

‘अब आपको कोई शिकायत नहीं होगी सर।’

‘ठीक है देखते हैं।’ सिंहानिया साहब ने धीरे से कहा।

गोपी जब बाहर खड़ा था तो उसे देखकर कंपनी के कुछ लड़के ठिठके। एक ने कहा, ‘गोपी काफी चेंज हो गया है।’

दूसरे ने गोपी को घूरते हुए कहा, ‘यह गोपी नहीं है यार। यह तो कोई और है।’

पहले ने बहुत गंभीरता से कहा, ‘ यह उसका भाई लगता है। दोनों यहीं काम करते होंगे।’ दोनों चले गए। गोपी ने अपनी हंसी पर काबू रखा। उसने तय कर लिया था कि अब वह नहीं हंसेगा। हंसने का कोई प्रसंग आते ही वह अपनी दुखद स्मृति में चला जाएगा। वह अपने पिता की मृत्यु को याद करेगा। अपने छोटे भाई के यहां हुए अपमान को याद करेगा।

तभी शरद का दोस्त निरंजन आ धमका, ‘कहो गोपी भाई क्या हाल है? आज तो हीरो बनकर आए हुए हो। क्या बात है?’ गोपी ने कोई जवाब नहीं दिया। चुपचाप बुत की तरह खड़ा रहा। उसने सोचा था कि इन लोगों को झटका देना चाहिए। निरंजन ने पूछा, ‘पहचान नहीं रहे हो क्या?’ गोपी दूसरी तरफ देखने लगा। निरंजन चला गया। गोपी ने राहत महसूस की। उसे लगा सब कुछ उसकी योजना के मुताबिक ही चल रहा है। उसने सिंहानिया साहब के सामने भी अपनी तत्परता दिखाने की कोशिश की। जब बाहर से कुछ लोग उनसे मिलने आए तो गोपी ने उन्हें अंदर भेजने में ज्यादा सतर्कता दिखाई। अपनी ड्यूटी निपटाकर वह लौटा तो दिन भर के बारे में सोच रहा था। कितना कठिन था लोगों से रूखा व्यवहार करना। निरंजन से रोज वह हंसकर मिलता था। वह उसके साथ एक बार कैरम भी खेल चुका था। लेकिन आज निरंजन को अनदेखा करना पड़ा उसे। गनीमत है कि आज शरद छुट्टी पर था। क्या उसके साथ गोपी वैसा ही कर सकता है? करना पड़ेगा। वह अब किसी का चेहरा नहीं देखेगा। कंपनी के हर कर्मचारी को वह सिंहानिया साहब की तरफ आने वाले संकट की तरह देखेगा जिन्हें दूर कर देना ही उसका फर्ज है। आखिर उसे नौकरी करनी है।

अगले दिन दोपहर के वक्त शरद शकरपारे लेकर आया और हमेशा की तरह हंसते हुए बोला, ‘और गोपी भाई। क्या बात है तुम तो स्मार्ट बन गए हो। ये लो शकरपारे खाओ।’

‘नो थैंक्स।’ गोपी ने कहा तो शरद थोड़ा सकपकाया। फिर उसने अपने को संभालते हुए कहा, ‘ठीक है ले लो, बाद में खा लेना।’ यह कहकर वह उसकी जेब में शकरपारे रखने लगा। गोपी ने पीछे खिसककर कहा, ‘मुझे नहीं चाहिए।’

शरद ने कहा, ‘अरे पहली बार शकरपारे के लिए मना कर रहे हो। क्या हो गया है तुम्हें। वैसे तुमसे एक खास बात भी कहनी थी। जरा इधर आना।’

‘मेरे पास टाइम नहीं है।’ गोपी ने कहा और दूसरी तरफ मुंह फेर लिया। शरद ने कुछ देर सोचा फिर कहा, ‘सिंहानिया साहब ने कुछ कहा है क्या? अरे उससे क्यों डरते हो यार।’

‘ठीक है ठीक है आप जाइए अपनी सीट पर।’ जब गोपी ने यह कहा तो शरद के चेहरे का रंग बदला। उसने गोपी को घूरा और कहा, ‘ऐसा है भाई साहब कि यह कहने की हिम्मत तो आज तक इस सिंहानिया के बच्चे ने भी मुझसे नहीं की।’

गोपी को लगा कि यही मौका है। उसे अपना रंग दिखाना ही होगा नहीं तो इस शरद के चक्कर में उसकी नौकरी ही खतरे में पड़ जाएगी। उसने तैश में कहा, ‘मुझे तुम जो समझ रहे हो वह मैं नहीं हूं।’ तब तक वहां निरंजन, अशोक, कमल और दूसरे कुछ लड़के भी आ गए। शरद बोला, ‘तुम क्या हो, बता ही दो।’

‘मैं बहुत खतरनाक हूं।’ गोपी के यह कहते ही सब हंस पड़े। गोपी समझ नहीं सका कि उसने अपने को खतरनाक कहा है तो इसमें हंसने की क्या बात है।

उसने फिर कहा, ‘मैं तुम जैसों को उठाकर दूर फेंक सकता हूं। गांव में मैं कितनों की हड्डियां तोड़ चुका हूं। समझे। अब आप लोग यहां से दफा हो जाइए। नहीं तो मुझे एक्शन लेना होगा।’

तभी आपस में सब बात करने लगे, ‘आज गोपी मूड में है।’ तभी निरंजन ने कहा, ‘आज अपना जलवा दिखा ही दो गोपी भाई।’

गोपी को लगा उसे यह चुनौती दे रहा है। अगर वह पीछे हटा तो उसकी कमजोरी साबित हो जाएगी। इसलिए उसे कुछ न कुछ करना ही होगा। उसने निरंजन को पकड़ कर ऊपर उठा दिया। सभी ताली बजाने लगे। गोपी को समझ में नहीं आ रहा था कि सब इस चीज पर घबराने की बजाय मजा क्यों ले रहे हैं। वह चाह रहा था कि किसी तरह सिंहानिया साहब तक बाहर की आवाज पहुंचे और वह देख लें कि गोपी ने निरंजन को किस तरह हवा में उठा रखा है। वह यह सोच ही रहा था कि शरद ने गोपी के पेट में गुदगुदी शुरू कर दी। हंसी रोकने की गोपी की तमाम कोशिशें बेकार गईं और वह ठठाकर हंस पड़ा। उसके साथ सभी हंसने लगे। तभी सिंहानिया साहब का दरवाजा खुला। वह चिल्लाए, ‘यह क्या तमाशा हो रहा है?’ सारे लड़के एक तरफ हो गए और गोपी दूसरी तरफ। सिंहानिया साहब ने गोपी से कहा, ‘तुम यहां नौकरी करने आए हो या नौटंकी करने। तुम अभी और इसी वक्त यहां से निकल जाओ। मुझे तुम्हारी कोई जरूरत नहीं है। गेट आउट।’

गोपी के जी में आया कि वह सिंहानिया साहब को उठाकर दूर फेंक दे। पर वह अब एक और गलती नहीं करना चाहता था। वह चुपचाप निकल पड़ा। शरद उसके पीछे दौड़ा। उसने आवाज दी, ‘गोपी कहां जा रहे हो यार।’ गोपी ने कोई जवाब नहीं दिया। वह तेजी से चलने लगा। शरद बड़बड़ाता हुआ चला आ रहा था, ‘अरे वह तुम्हें ऐसे कैसे निकाल सकता है। मैं बात करता हूं। लेकिन तुम चल कहां दिए। मेरी बात तो सुनो।’

गोपी ने सोच लिया इस शरद से कोई बात नहीं करनी है। सब कुछ इसी की वजह से हुआ है। इसी ने गोपी की नौकरी ली है।

इतने में शरद गोपी के करीब आ पहुंचा। उसने आगे से गोपी का रास्ता रोक लिया, ‘आई एम सॉरी गोपी भाई। मैं जानता हूं हमलोगों की वजह से ही यह सब कुछ हुआ है। पर हम तुम्हें इस तरह नहीं जाने देंगे। तुम हमलोगों के दोस्त हो। तुम पर मुसीबत आई है तो हम सब मिलकर उसका सामना करेंगे।’

‘बकवास बंद करो।’ गोपी ने उसे डांटकर कहा।

‘गोपी भाई...।’

‘मेरा रास्ता छोड़ो।’ गोपी ने शरद को धकेलते हुए कहा।

‘ठीक है’, शरद ने कहा, ‘मेरी बात मत सुनो। पर ये शकरपारे लेते जाओ।’

शकरपारे! इसी शकरपारे के कारण यह नौबत आई है। वह शकरपारे कैसे खा सकता है। लेकिन शरद की मुट्ठी में रखे शकरपारे देखकर उसके भीतर हलचल सी हुई। उसकी जीभ तरल मिठास में छपछपाई। अब गोपी के साथ जो हुआ उसमें इस शकरपारे का क्या कसूर। नौकरी, शहर, श्यामलाल, शरद और सिंहानिया साहब के बीच वह शकरपारे को क्यों लाए। शकरपारे चाहे जिस माध्यम से उसके पास आएं उसे लेने में क्या हर्ज है। शकरपारे और गोपी के बीच जो रिश्ता है, वह कभी खत्म नहीं हो सकता। यह सोचकर गोपी ने हाथ बढ़ा दिया। फिर उसने कुछ शकरपारे मुंह में डाले और बाकी जेब के हवाले किए। भाड़ में जाएं बाकी चीजें। फिलहाल इसकी मिठास के साथ जिया जाए। गोपी मुंह चलाता हुआ आगे बढ़ा। शरद ने हाथ उठाया। गोपी ने भी हाथ उठा दिया।

……

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