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HAPPY CHRISTMAS MARIYA

कथा—संग्रह

हैप्पी क्रिसमस मारिया

रतन वर्मा

संक्षिप्त परिचय

नाम ः रतन वर्मा

जन्म तिथि ः 06.01.1951

जन्म स्थान ः दरभंगा

प्रकाशन (पत्रिकाओं में) : हंस, धर्मयुग, इंडिया टुडे, सारिका, आजकल, समकालीन भारतीय साहित्य, नया ज्ञानोदय, पाखी, इन्द्रप्रस्थ भारती आदि पत्रिकाओं में लगभग 200 कहानियाँ एवं इनके अतिरिक्त समीक्षायें, साक्षात्कार, कविताएँ, गीत, गजलें, संस्मरण प्रकाशित।

पुस्तकें : ‘पेइंग गेस्ट', ‘दस्तक' एवं ‘नेटुआ' (कहानी संग्रह), ‘यात्रा में' (काव्य संग्रह), ‘रुक्मिणी' एवं ‘सपना' (उपन्यास), ‘श्रवण कुमार गोस्वामी एवं उनके उपन्यास' (आलोचना पुस्तक)

पुरस्कार :

— ‘गुलबिया' कहानी को वर्त्तमान साहित्य द्वारा

आयोजित कृष्ण प्रताप स्मृति पुरस्कार का प्रथम

पुरस्कार (1989)

— नाट्‌यभूमि सम्मान (1991)

— ‘सबसे कमजोर जात' कहानी आनन्द डाइजेस्ट

आंचलिक कथा प्रतियोगिता में सर्वश्रेष्ठ (1991)

— ‘नेटुआ' नाटक : साहित्य कला परिषद्‌, दिल्ली द्वारा दशक के सर्वश्रेष्ठ छहः नाटकों में शामिल (1992)

— ‘अवसर' सम्मान (1994)

— समग्र साहित्य पर ‘राधाकृष्ण पुरस्कार' (2003)

— ‘निखित भारत बंग साहित्य सम्मेलन, नई दिल्ली' द्वारा

विशिष्ट कथाकार पुरस्कार (2004)

सम्प्रति : स्वतंत्र लेखन

सम्पर्क : क्वार्टर सं0 के—10, सी0टी0एस0 कॉलोनी, पुलिस लाईन के निकट, हजारीबाग—825301 (झारखण्ड)

मोबाईल न0 9430347051, 9430192436

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भूमिका

आर्थिक विषमता के बावजूद संवेदना के स्तर पर बुने गये रिश्ते तात्कालिक तौर पर तो सुखद होते हैं, पर ऐसे रिश्ते लम्बे समय तक चल पाना, बोझ ढोने के समान होते हैं। ‘हैप्पी क्रिसमस मारिया' ऐसी ही पृष्टभूमि पर रची गयी कहानी है। संवेदना जब गहन हो जाती है, तो विषमता और विसंगतियो को पाट सकने में तात्कालिक तौर पर कामयाब जरूर होती है, पर आगे चल कर इसका परिणाम कितना दुखद होता है, इस कहानी से समझा जा सकता है।

प्रशासनिक असंगति कभी कभी बेरोजगार युवकों की भावनाओं से खेल कर, उन्हें किस तरह एक कठिन निर्णय लेने के कगार तक पहुँचा देती है, इसी का उदाहरण है — ‘अथ सरकारी नौकरी कथा'।

हैप्पी क्रिसमस मारिया

चौबीस दिसम्बर की वह रात, जैसे बर्फ में लिपटी निस्तब्ध सो रही थी।

अचानक चर्च में बारह का घंटा टनटना उठा था। इसके साथ ही पटाखों की आवाज से निस्तब्घ सो रही रात हड़बड़ा कर जाग उठी थी।

निषान्त, आवाजों की भयावहता से डरा—सहमा अपने अंदर ही कहीं छुप पाने की जगह तलाषने लगा था, जहॉं वह हो ... सिर्फ वह! नितान्त अकेला ! न मारिया हो, न रूपु और सुषान्त, न ही कोई और ? मगर वह अपने इस प्रयत्न में कतई सफल नहीं हो पा रहा था। ये तमाम लोग पता नहीं उसकी स्मृति के किस कोने में छुपे बैठे थे कि जब भी वह सोने की चेष्टा करता, उसके मस्तिष्क पर जोर—जोर से दस्तक देने लगते। इसके साथ ही निषान्त की बेचैनी विक्षिप्तता की हद तक पहुॅंचने लगती।

केन्हरी रोड स्थित अपने ... नहीं—नहीं, अपनी पत्नी मारिया के सरकारी र्क्वाटर में, रजाई में लिपटा, बिल्कुल अकेला, वह स्मृतियों के चक्रव्यूह में फॅंसा, कसमसाता, पलंग पर बेचैन, करवटें बदलने में मषगूल था। स्मृतियों के दंष उसे हर पल आहत कर रहे थे।

आज पटने का चर्च खूब सजा होगा — अपने मूल स्वरूप को खोकर छोटे—बड़े रंग—बिरंगे बल्बों से लदा—ढका, जगमगाता—मुस्कुराता हुआ। राजा ख्रिस्ट जन्म ले चुके होंगे—हर वर्ष की तरह ही। क्रिसमस ट्री का भी अपना एक खास सौन्दर्य होगा आज की रात—हजारों रंग—बिरंगे बल्बों के फलों से लदा—फदा। राजा ख्रिस्ट के गोहाल ने भी अपने पुरानेपन पर नयेपन का रंग—रोगन चढ़ा लिया होगा। मोमबत्तियों की भरमार होगी चर्च में — अंधेरे की भयावहता को लील लेने की ताकत खुद में संजोये।

शहर के सभी इसाई अपने—अपने घरों से निकल कर चर्च में इकट्‌ठे हो गये होंगे। सबों की सज—धज ऐसी होगी, जैसे किसी फैषन—कम्पीटीषन में भाग लेने जा रहे हों। रंग—बिरंगे पोषाक, चर्च में चकाचौंध पैदा कर रहे होंगे। पूरा चर्च सेंट—स्नो—पाउडर और किस्म—किस्म के कॉस्मेटिक्स से महमहा रहा होगा।

मारिया भी रूपु और सुषान्त के साथ चर्च की भीड़ में अपनी अलग पहचान बनाने के लिए प्रयत्नषील, परेषान होगी। उसकी कांजीबरम साड़ी का ऑंचल बार—बार उसके सीने से फिसल कर जरूर उसे परेषान कर रहा होगा। रूपु और सुषान्त भी उसे तंग कर रहे होंगे शायद। पादरी ने पिता, पुत्र, पवित्र आत्मा को अपना नमस्कार करते हुए बाइबिल का प्रवचन शुरू कर दिया होगा। सभी एकाग्र होकर प्रवचन सुनने में लीन हो गये होेंगे।

कुछ मॉड लड़के—लड़कियॉं अपने बुजुर्गों से ऑंखें बचाकर भीड़ में इधर—उधर अपने प्रेमी—प्रेमिकाओं को भी तलाषने लग गये होंगे। उनमें से कई अपने जोड़ों से ऑंख मिल जाने के साथ ही, कर्ष्यांग दार्जीलिंग, नैनीताल, मसूरी, कष्मीर या ऐसे ही किसी पहाड़ की ठिठुरती रात की कई—कई रजाइयों में लिपटा जाने वाली रूमानी ठंड से सिर से पैर तक सिहर उठे होंगे। लंदन से मारिया की बड़ी बहन जोसलीन दी भी आ गयी होंगी।

जोसलीन दी का लंदन से आना किसी बड़े उत्सव के समान ही हुआ करता है। उनके आने की खबर के साथ ही विभिन्न शहरों में बिखरे उनके सगे—सम्बन्धी, उस एक ही शहर में आ जुटते हैं, जहॉं जोसलीन दी का आना होता है। फिर घर का माहौल किसी मेले के समान हो जाता है। सभी उनसे एक बार मिलकर ‘निहाल' होने की ललक लिए उनके गिर्द मंडराते नजर आते हैं। जोसलीन दी ने जिसे भी एकाध बार टोक दिया, वह उस ‘मेले' का महत्त्वपूर्ण व्यक्ति समझा जाता है।

जोसलीन दी भी एक—एक को ध्यान में रखकर लंदन से चलती हैं।

‘‘पीटर तुम्हारे लिए यह घड़ी। ... कैसी है ?''

‘‘बहुत अच्छी, दीदी।''

‘‘और रॉबिन! तेरे लिए यह सूट का कपड़ा, पसंद आया?''

‘‘जी दीदी, मार्वेलस।''

‘‘और मारिया, तेरे लिए तो यह साड़ी और टॉप्स खासतौर से लायी हॅूं। जरा पहन कर दिखा तो।''

‘‘और सेलिन ... और सालेन ... और जूलिया ... और जेम्स ... और पास्कल ... और .... और ... सभी निहाल।

मगर दूसरे ही क्षण .....

‘‘पीटर तो बाजी मार ले गया इस बार। उसकी घड़ी के आगे मेरे सूट का कपड़ा क्या है! उसकी घड़ी की डायल पर तो लगता है, जैसे सोना मढ़ा हो।''

‘‘चुप भी कर, रॉबिन! तेरे सूट के आगे मेरी जर्सी का मोल तो कुछ भी नहीं। दीदी ने तो मुझे ठग दिया।''

और फिर ऐसे ही षिकवे—षिकायतों से रिष्तेदारों के बीच मनमुटाव की स्थिति पैदा हो जाती है। कुछ रिष्तेदार तो जोसलीन दी के द्वारा दिये गये उपहारों की कीमत की तुलना अपने आने—जाने के खर्च से करके खुद को कोसने लगते हैं कि आया ही बेकार। झूठ—मूठ का घाटा उठाना पड़ा।

पिछली बार लगभग आठ वर्ष पूर्व जोसलीन दी आयी थीं। मारिया की नयी—नयी सरकारी नौकरी उसी वर्ष लगी थी।

मैके से मारिया को खबर आयी थी, पटना आ जाने के लिए। निषान्त और बच्चों के साथ या अकेले ही, कुछ भी उस पत्र में नहीं था। पत्र उसके पिता का था। सिर्फ इतना लिखा था उस पत्र में कि जोसलीन लंदन से आ रही है। तुम भी आ जाती तो अच्छा रहता। फिर घर के कुछ हाल—समाचार के बाद पत्र समाप्त कर दिया गया था।

पत्र बिलंब से प्राप्त हुआ था। जोसलीन दी दूसरे ही दिन आने वाली थीं।

मारिया ने दौड़—धूप कर किसी तरह उसी दिन अपनी छुट्‌टी करा ली थी। फिर घर आकर सामान बांधने में जुट गयी थी। निषान्त भी सामान बांधने में उसकी मदद करने लगा था।

जब अटैची में वह निषान्त के भी कपड़े रखने लगी, तब निषान्त ने उसे टोक दिया था, ‘‘मारिया, तुम्हारे पिता ने मुझे तो नहीं बुलाया है, फिर मेरे कपड़े ...... ?''

‘‘कैसी बातें करते हो, निषान्त! मुझमें और तुम में कोई फर्क है? तुम्हारे बिना अकेले जाकर मैं भला क्या करूंगी? तुम नहीं जाओगे तो लो, मैं भी नहीं जाती। बस्स।'' मुॅंह फुलाकर मारिया पलंग पर बैठ गई थी। अपने किसी भी व्यवहार से मैं मारिया को अप्रसन्न नहीं करना चाहता था। मान—अपमान की बात भूलकर वह जाने के लिए राजी हो गया था।

जोसलीन दी आ चुकी थीं।

मारिया के घर में खासी चहल—पहल थी। लग रहा था जैसे वह घर कोई महत्वपूर्ण तीर्थ—स्थल बन गया हो उस दिन। और देवता के दर्षनों के लिए लोग आपस में धक्का—मुक्की करते हुए उतावले हो रहे हों।

ऐसे माहौल से निषान्त का कभी दूर का भी परिचय नहीं था। तीन—चार घंटे में ही वह उस दमघोंटू वातावरण से ऊबने लगा था। बिना किसी को कुछ बताये वह घर से बाहर निकल गया था। बेवजह रात तक वह सड़कों के चक्कर काटता रहा था। फिर नाइट—षो एक पिक्चर हॉल में गुजार कर लौटा तो घर बिल्कुल निस्तब्ध था— गहरी नींद में लीन हो जैसे। आहिस्ते से दरवाजे की कुंडी खटखटायी थी उसने।

मारिया शायद जागकर उसका इन्तजार ही कर रही थी। दरवाजा खोलने के साथ ही फुसफुसाहट भरी आवाज में उलाहना देती हुई बोली थी वह, ‘‘अजीब आदमी हो तुम भी। कहॉं घूम रहे थे इतनी रात तक ? इतनी रात तक भी कोई घूमने का समय हुआ? वह तो चलो, दीदी ने तुम्हे ढूंढ़ा नहीं था। अगर ढूंढ़ लेतीं तो कितना दुःख होता उन्हें ?''

निषान्त ने सिर्फ मुस्करा भर दिया था। फिर चौखट को लॉंघते हुए पूछा था, ‘‘सुषान्त और रूपु सो गये क्या?''

‘‘और नहीं तो क्या ? चलो, चलकर जल्दी से खाना खा लो।''

‘‘खाना? ... भूख नहीं है, मारिया। शाम को डट कर नाष्ता किया था। ...... अच्छा, सोने का इन्तजाम किधर है ?''

‘‘मर्द और औरतों के लिए अलग—अलग कमरे दे दिये गये हैं।''

सारी रात फिर सो नहीं पाया था निषान्त। ऊल—जलूल की सोच में ही रात कट गयी थी। मन हुआ था कि कुछ लिखे, पर माहौल ने कुछ लिख पाने का संयोग भी छीन लिया था — इधर—उधर टॉंगे फैलाये, नाक बजाते लोग, बम्बइया फुट—पाथ का दृष्य उपस्थित कर रहे थे। घुटन—सी महसूस होने लगी थी उसे। मन हुआ था कि वहॉं से भाग कर किसी निर्जन स्थान की शरण में चला जाय, चाहे वह श्मषान ही क्यों न हो।

सुबह से घर का माहौल, फिर से पिछले दिन की तरह ही हो गया था। वही भीड़ और भीड़ में धिरी जोसलीन दी।

घर में सभी उसके परिचित थे — साले, सालियॉं, सास, ससुर, और भी रिष्ते के लोग, मगर सभी अपरिचितनुमा — जैसे उनमें से किसी ने कभी उसे देखा तक नहीं हो। कभी किसी ने उससे कुछ बातचीत भी की थी, तो जैसे अजनबी समझ कर ही।

उस भरी—पूरी भीड़ में वह खुद को बिल्कुल अकेले की तरह ही महसूस करता रहा था। मेले में खो गये बच्चे की तरह। फर्क सिर्फ इतना था कि वह रो नहीं रहा था। एक बार उसका मन हुआ भी था कि वह अपनी पूरी ताकत से चीख कर उस भीड़ केा अपनी भी उपस्थिति का एहसास करा दे, मगर चुपचाप बैठा मुस्कराता रहा था। शायद उतने सारे षिष्ट लोगों के बीच वह अषिष्ट नहीं बनना चाहता था।

अचानक मारिया के पीछे घिसटती हुई—सी जोसलीन दी उसके करीब आ खड़ी हुई थीं। उनका एक हाथ मारिया के हाथ में था। लग रहा था, जैसे मारिया ने जबरदस्ती उन्हें घसीटते हुए निषान्त के सामने ला खड़ा किया हो।

‘‘अच्छा तो ये हैं तुम्हारे हस्बैन्ड। रियली, सो हैन्डसम।'' मारिया की ओर देखकर मुस्कराती हुई वे बोल पड़ी थीं। फिर निषान्त की ओर मुड़कर पूछा था, ‘‘मे आई कम टू नो योर नेम प्लीज।''

‘‘ओ श्योर, निषान्त सक्सेना!''

‘‘नाइस नेम, जस्ट लाइक योर पर्सनालिटी।'' फिर उसकी ओर एक घड़ी बढ़ाती हुई बोली थीं, ‘‘आई हैव ब्राउट इट ओनली फॉर यू फ्रॉम लन्डन, हाउ इट इज?''

‘‘योर रिमेम्बरेबुल ब्लेसिंग, एन्ड नथिंग एल्स।''

‘‘थैंक्यू .... थैंक्यू .... वेरी इन्टरेस्टिंग योर हस्बैन्ड इज।'' मारिया से कहती हुई वे फिर से मुड़कर भीड़ में शामिल हो गयी थीं।

चार दिनों तक निषान्त का रहना हुआ था वहॉं। उन चार दिनों में उसे फिर एक बार भी जोसलीन दी का दर्षन नहीं हुआ था। चारों दिन भीड़ में तन्हाई झेलता रहा था वह।

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पिछले दिनों लंदन में जोसलीन दी की लड़की रोजी की शादी थी। वहॉं से इनविटेषन—कार्ड आया था — मिस्टर एन्ड मिसेज निषान्त सक्सेना के नाम।

निषान्त ने उस इनविटेषन कार्ड को पढ़ते हुए मारिया से चुटकी ली थी, ‘‘मारिया, इस इनविटेषन कार्ड के साथ हमारे लिए दीदी प्लेन का टिकट भी भेज देतीं, तो कितना अच्छा होता। उनकी लड़की की शादी में शामिल होने के बहाने हम और बच्चे भी लंदन की सैर कर आते।''

मारिया का पारा एकदम से चढ़ गया था, ‘‘बैठे—ठाले तुम्हारे दिमाग में आयेगा भी क्या ? व्यंग्य, सिर्फ व्यग्य। सच तो यह है कि दीदी के सुखी जीवन से तुम्हें ईर्ष्या होती है। खुद तो कुछ करते नहीं और दूसरों के सुख में डीठ लगाते हो।''

एक फीकी मुस्कराहट उभर आयी थी निषान्त के चेहरे पर — बिल्कुल रो देने जैसी मुस्कराहट। मुस्कराते हुए ही वह बोला था, ‘‘मेरा मजाक अच्छा नहीं लगा न, मारिया। चलो, न सही। सच तो यह है मारिया कि तुम्हारी तरह मेरा भी कोई रिष्तेदार बड़ा अफसर होता, तो मैं भी किसी दफ्‌तर में तुम्हारी तरह स्टैनो नहीं, तो किरानी—विरानी जरूर होता। खैर छोड़ो इस बात को।''

‘‘छोडूं कैसे, मेरी नौकरी से भी जलन होती है न! कहो तो रिजाइन कर दूॅं। फिर घर का खाना—कपड़ा, दोनों बच्चों की पढ़ाई और अपने बीड़ी—पान की जुगाड़ करते रहना खुद ही, अपनी कलम—घिसाई करके।

इस बार ठहाका लगा उठा था निषान्त। जोरों का ठहाका। फिर अचानक ही शांत हो गया था। उसकी ऑंखें इधर—उधर कुछ तलाषने लगी थीें। टेबुल पर रखे बीड़ी के डिब्बे में से एक बीड़ी निकाल कर सुलगाता हुआ वह बाहर निकल गया था।

जब कभी उसे सीने में किसी धारदार चीज की चुभन—सी महसूस होती है, और पीड़ा असहनीय होने लगती है, वह ऐसे ही ठहाका लगा उठता है। लोग इसे ठहाका समझते हैं, मगर निषान्त को लगता है जैसे वह फूट—फूट कर रो रहा हो। ऐसा क्यों होता है? ... रोने और ठहाका लगाने में इतनी समानता क्यों है? वह आज तक नहीं समझ पाया था। हॉं, ठहाका लगाने के तुरन्त बाद वह अक्सर बाहर निकल जाया करता है — झील के किनारे वाले पार्क में या वैसे ही किसी निर्जन स्थान की तलाष में, जहॉं वह जी भर कर रो सके। सचमुच की रूलाई। जहॉं उसे कोई देख ना पाये, कोई जान न पाये कि निषान्त रो भी सकता है।

उस दिन झील के किनारे का पार्क बिल्कुल निर्जन शांत था। दूधिया चांदनी की सफेद चादर—सी बिछी हुई थी पार्क में। अक्तूबर के अंत की गुलाबी ठंड भरी शाम थी वह।

निषान्त जाकर चुपचाप एक बेंच पर बैठ गया था। फिर वह रोया था या गुमसुम देर तक बैठा रहा था, यह उसकी प्रकृति ने ही महसूस किया होगा।

अचानक उसे लगा था, जैसे मारिया उसके करीब आ बैठी हो — वही दस—ग्यारह वर्ष पूर्व वाली अल्हड़़ मारिया। हठी और मासूम मारिया। बात—बात में रूठ जाने वाली मारिया।

‘‘मारिया! ..... मारिया! मुझे समझने की कोषिष करो, मारिया। मेरी बातों को भावुकता में मत लो। यथार्थ पर भावुकता का आवरण चढ़ा देना कतई तुम्हारे हक में नहीं होगा। भावुकता तो सिर्फ सपने दिखाया करती है— परी—नगर के सुनहरे ख्यालों वाले सपने। यथार्थ को समझना, उस पर अमल करना और उसी में जीना, सही मायनों में अक्लमंदी होती है।''

‘‘चलो, मान लिया कि मैं बेकफूक हूूॅं। बस न।''

‘‘फिर वही मजाक, मैं सच कह रहा हॅूं मारिया, तुम मेरी बातों पर अमल क्यों नहीं करती।''

‘‘क्या अमल करूॅं। खाक?''

‘‘यही कि तुम मुझ जैसे बेकार और बेरोजगार आदमी के साथ बंधकर कभी सुखी नहीं रह सकती। तुम्हारा यह फैसला, तुम्हारे जीवन का सत्यानाष करके रख देगा। .... जरा सोचो, मेरे पास न रहने के लिए घर है और न ही कोई खेती—व्यवसाय, जिसके भरोसे तुम्हें अपने जीवन का हिस्सा बना लूॅं। मैं अंतिम बार .....''

‘‘ओह निषान्त, झूठ—मूठ इतनी सुखद चांदनी को अमावस में क्यों बदल रहे हो? अपनी बेमौसम की बातों से ! ... एक बार नहीं हजारों बार कह चुकी हॅूं कि मैं तुम्हारे बिना जिन्दा नहीं रह सकती। बस्स। ... अब ख्वामख्वाह अपनी ऊल—जलूल बातों से अपना और मेरा दोनों का समय बर्बाद कर रहे हो। आओ, कुछ अच्छी—अच्छी बातें करें — प्यार भरी बातें। इतनी खूबसूरत चांदनी और यह एकान्त बार—बार नहीं मिलता, निषान्त।'' निषान्त के थोड़ा और करीब खिसक कर उसने अपनी बॉंहें उसके गले में डाल दी थीं।

‘‘ओफ्‌फ। अब मैं तुम्हें कैसे समझाऊॅं कि .....''

‘‘मैं कुछ समझना चाहती भी नहीं। इस वक्त मुझे कुछ दिखायी नहीं दे रहा, सिवाय तुम्हारे और इस चॉंदनी रात के।''

‘‘मारिया, जरा सोचो। तुम तो जानती ही हो कि मेरे मॉं—पिता नहीं है। चाचा के यहॉं ही मैं पला—बढ़ा हॅूं। मेरेे चाचा बिल्कुल पुराने खयालात के हैं। वे हमारी शादी के लिए कभी राजी नहीं होंगे। अंतर्जातीय या अंतधर्मीय विवाह को वे कभी प्रश्रय नहीं देंगे।''

अचानक ही मारिया के चेहरे का भाव बदल गया था— किसी चोट खायी नागिन की तरह निषान्त के गले को एक झटके के साथ अपनी बॉंहों के घेरे से मुक्त कर उसके चेहरे पर अपनी सुलगती ऑंखें टिका दी थीं। कुछ पल वैेसे ही उसे देखती रही थी। फिर बड़े तीखे लहजे में बोल पड़ी थी, ‘‘अच्छा ... तो अब समझी... ''

उसके अचानक के बदले हुए रूप को देखकर एकदम से हड़बड़ा गया था निषान्त। अचकचा कर पूछ बैठा था, ‘‘क्या हुआ?''

‘‘यही, कि इतने देर से तुम्हारे खेले जा रहे ड्रामे का आषय अब जाकर समझ में आया है। .... अपने चाचा के डर से ही तुम मुझे अपनाने में झिझक रहे हो न। ठीक है। चलो, चलकर मुझे हॉस्टल तक छोड़ आओ। अब मैं दुबारा तुमसे कभी कुछ नहीं कहूंगी। हॉं, जाते—जाते इतना जरूर कहूंगी कि मुझे कतई यह विष्वास नहीं था कि तुम इतने कायर भी हो सकते हो।'' इसके साथ ही वह झटके से उठकर खड़ी हो गयी थी।

निषान्त ने उसका हाथ पकड़कर उसे जबरन अपने पास बिठा लिया था। फिर उसकी हथेली को सहलाता हुआ बोल पड़ा था, ‘‘तुमने मुझे गलत समझ लिया है, मारिया। मेरा आषय वह नहीं है, जो तुम समझ रही हो। दरअसल मैं यह सोच रहा हॅूं कि शादी के बाद तुम्हें रखूंगा कहॉं, खिलाऊंगा क्या, मैं तो ....''

‘‘... निषान्त, यह बचकानी बातें मुझे बिल्कुल अच्छी नहीं लगती। मैं तुम्हारे साथ धूप—बारिष, कहीं भी खुषी—खुषी रह लूंगी .... रूखा—सूखा खाकर या भूखे—अधपेटे भी जिन्दगी गुजार लूंगी, मगर ....। यह क्यों नहीं सोचते कि जिन्दगी का इतना बड़ा फैसला क्या हमें तुम्हारे चाचा या मेरे पिता के भरोसे करना चाहिये, निषान्त ? तुम बी.ए. पास हो, मैंने भी बी.ए. की परीक्षा दे दी है। पास भी हो जाऊंगी। मान लो, फिलहाल तुम्हें कहीं नौकरी न भी मिली, तो दो—चार ट्‌यूषन करके ही क्या तुम हम दोनों की परवरिष नहीं कर सकते?''

उसकी दलील के आगे निषान्त बिल्कुल निरूत्तर हो गया था। उसे लगा था कि मारिया कुछ भी गलत नहीं कह रही।

सप्ताह भर बाद ही दोनों ने कोर्ट—मैरिज कर लिया था। बिना किसी से पूछे या बताये। फिर, जैसा कि निषान्त को पहले से पता था, उसके चाचा ने दुल्हन तो क्या, उसका तक मुॅंह देखने से इन्कार कर दिया था।

उसके बाद शुरू हुआ था उनके भटकाव का सिलसिला —— एक शहर से दूसरे शहर, कस्बों, महानगरों में काफी कुछ झेलने के बाद मारिया के एक दूर के रिष्तेदार से उनकी मुलाकात हुई थी। बड़े ही उदात्त प्रकृति के थे वे। अन्तर्धर्मीय विवाह को उन्होंने अन्यथा नहीं लिया था। उन्हें उनसे सहानुभूति हो आयी थी। वे उसी शहर में कोई बड़े अफसर थे। मारिया की नौकरी, उन्होंने एक सरकारी दफ्‌तर में स्टेनो के पद पर लगा दी थी। दरअसल निषान्त यानी मर्द के लिये उस दफ्‌तर में कोई वेकेन्सी नहीं थी। वह तो मारिया एक सूझ—बूझ वाली लड़की थी, जिसने पढ़ाई करते हुए शॉर्ट हैंड—टाइपिंग भी सीख ली थी।

फिर धीरे—धीरे मारिया के अपने मैके से भी सम्बन्ध सुधरने लगे थे। मगर निषान्त, अपने ससुरालवालों की नजरों में अपनी कोई पहचान नहीं बना पाया था। सभी निषान्त के व्यक्तित्व में एक आर्थिक खोखलापन महसूस करते थे। एक ऐसा खोखलापन, जिसे भर पाने के लिए निषान्त ने भरसक, जी—जान से लगातार कोषिषें की थीं, मगर सफल नहीं हो पाया था। अन्त में हारकर बैठ गया था वह — निरूद्देष्य, निराष।

जब कभी भी मारिया, उससे मैके साथ चलने की जिद करती, वह अपने टूटकर बिखरे हुए वजूद को समेटने की कोषिष करने लगता था। शायद समेट भी लेता था, किसी ओढे़ चमकते आवरण के रूप में। मगर ससुराल से लौटते हुए वह फिर से अपने टुकड़े—टुकड़े वजूद को ही ढोता हुआ वापस लौटता था। हॉं, उन टुकडों में से एक खास टुकड़ा हमेषा वह वहीं भूल आया होता था। उसे हमेषा यही महसूस होता था कि उसके ससुरालवाले, रिष्ता निवाहने की जगह, रिष्ता झेल रहे हों जैसे। जैसे वह उनके गले की हड्‌डी हो। जिसे उनसे न निगलते बन रहा हो और न उगलते ही।

समय पीछे छूटता गया था। मारिया के साथ उसके प्यार—मुहब्बत की कहानी, बासी समाचार—सी होती गयी थी। समय बीतने के साथ—साथ उसे महसूस होने लगा था कि मारिया के लिए वह समय के बहाव में बीतता जा रहा था। जैसे वह उस घर के लिये एक बेजरूरत की चीज—सा होता जा रहा था। अगर उसका महत्व, मारिया के पति, या दोनों बच्चों के बाप होने से जुड़ा न होता, तो कब का वह लैम्प की टूटी हुई चिमनी की तरह बेमानी—सा सड़क को सुपूर्द कर दिया गया होता।

इस बार फिर से मारिया के नाम उसके भाई की चिठ्‌ठी आयी थी। फिर से जोसलीन दी लंदन से आने वाली थीं। दस दिसम्बर को। इस बार का क्रिसमस उन्हें भारत में ही मनाना था — अपने मैके में रहकर।

पत्र में लिखा था —

मारिया,

जोसलीन दी दस दिसम्बर को आ रही हैं। क्रिसमस, वे यहीं मनायेंगी। चारों तरफ चिटिठयॉं भेज दी गयी हैं। तुम थोड़ा पहले आ जाती तो उनके आने से पहले घर को ठीक—ठाक कर लेती। मैं और रॉबिन तो दिल्ली चले जायेंगे। उन्हें रिसीव करने। यहॉं, घर में बहुत काम पड़ा रह जायेगा। तुम जल्दी आ जाती तो अच्छा रहता।

तुम्हारा भइया

पीटर

1/12/87

मारिया बच्चों को लेकर चली गयी थी, घर को बिल्कुल सूना छोड़कर। उस सूने घर में भूत की तरह रह गया था सिर्फ निषान्त।

वैसे जाने के पूर्व एक बार मारिया ने फॉरमली पूछा जरूर था, ‘‘तुम नहीं चलोगे निषान्त ?''

मगर इस बार अपने टुकड़े—टुकड़े वजूद को समेट पाने में असमर्थ हो गया था निषान्त। ऐसे समय के लिये संजोकर रखी गयी फीकी मुस्कान फिर से उभर आयी थी उसके चेहरे पर। बोला था, ‘‘मैं यहॉं रहकर कुछ काम करना चाहता हॅूं। तुम ही हो आओ, बच्चों के साथ।''

फिर मारिया के द्वारा कोई अनुनय, कोई आग्रह नहीं, जबकि वह जानती थी कि अकेला रहकर निषान्त कोई पहाड़ तो ढाहेगा नहीं।

निषान्त चाहता रहा था कि बार—बार आग्रह करे मारिया उससे चलने के लिये। यहॉं तक कि रूठ ही जाये पहले की तरह कि तुम नहीं चलते, तो लो मैं भी नहीं जाती। फिर मुॅंह फुला कर बैठ जाये पलंग पर।

मगर मारिया के चेहरे से लगा था कि उसके इन्कार से उसने जैसे संतोष की सॉंस ली हो।

बस—स्टैंड प्रस्थान से पूर्व उसने अपने पर्स में से निकालकर उसे एक, सौ का पत्ता थमाया था। फिर बोली थी, ‘‘काम चल जायेगा न! पन्द्रह—बीस दिनों की तो बात है। राषन घर में है ही। थोड़ा—बहुत घटेगा भी, तो खरीद लेना। .... और हॉं, घर के प्रति लापरवाह मत बने रहना। घर में चूहे बहुत हो गये हैं। देखना, कहीं पर्दा—वर्दा न काट दें।''

बेगैरत की तरह उसने रूपये थाम लिये थे। फिर से उसका मन ठहाका लगाने को हो आया था, लेकिन मुस्कराहट से ही उसने काम चला लिया था।

उस समय भी, और इसके पूर्व भी कई बार उसके मन में आया था कि वह शहर छोड़कर ही भाग जाय। इस शहर से बहुत दूर .... इतनी दूर, जहॉं उसकी षिनाख्त करने वाला कोई न हो .... जहॉं वह मर भी जाय, तो उसकी लाष पषु—पक्षी के काम आ जाये। पर अपने इस इरादे में वह कभी कामयाब नहीं हो पाया था। कभी हो भी नहीं पायेगा शायद, क्योंकि मारिया को वह बहुत प्यार करता हैं उसे अपने इस जन्म की उपलब्धि मानता है। ..... और सुषान्त—रूपु भी तो उसके लिये किसी महान उपलब्धि से कम नहीं हैं। उनके बिना तो वह चैन से मर भी नहीं पायेगा।

मारिया और बच्चों को बस—स्टैंड पर सी—ऑफ करने के बाद, घर लौटते हुए उसे अपनी सुहागरात का दृष्य याद आने लगा था।

पच्चीस रूपये माहवार की वह झोपड़ीनुमा कोठरी। उसमें बिछी एक चौकी। चौकी पर बिछी गुदड़ी। उस पर बैठा वह। उसकी गोद में लेटी हुई, मारिया का सिर। उसके खुले हुए बिखरे बाल। कोठरी में फैली लालटेन की पीली—उदास रोषनी। उस रोषनी में दमकता हुआ मारिया का चेहरा।

उसके बालों मे ऊंगली फिराते हुए उसने पूछा था, ‘‘मारिया!''

‘‘ऊॅं।''

‘‘एक बात पूछूं ? बताओगी ?''

‘‘पूछो!''

‘‘ऐसा क्या है मुझमें, जिसने तुम्हें मेरे साथ उम्र भर के लिये बंध जाने पर विवष कर दिया ?''

‘‘बता दूॅं?''

‘‘हॉं।''

सच—सच बता दॅूं ? तो जरा लालटेन को मेरे चेहरे के करीब लाओ तो।''

हाथ बढ़ाकर खिड़की पर से लालटेन उतार कर वह उसके चेहरे के करीब ले आया था।

‘‘अब जरा मेरे ललाट की सबसे मोटी और चमकीली लकीर को पढ़ो तो। वहॉं तुम्हें स्पष्ट अक्षरों में अपना नाम लिखा दिखायी दे जायेगा।''

निहाल हो गया था निषान्त उसका उत्तर सुनकर। सिर से पैर तक पुलक से सराबोर। झुककर उसने उसके माथे को कई बार चूम लिया था।

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सड़क पर चलते हुए उसकी ऑंखों के सामने फिर से मारिया का चेहरा उभर आया था। गौर से उसने उसके ललाट की लकीर को पढ़ने की कोषिष की थी। पर उसे लगा था कि जिस लकीर पर उस दिन उसने सचमुच अपना नाम लिखा देखा था, वह लकीर इतनी मद्धिम पड़ गयी थी कि अब शायद दूरबीन से भी देखने पर उसे अपने नाम का हल्का निषान भी वहॉं देखने को नहीं मिलता।

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स्मृतियों के चक्रव्यूह को तोड़कर, कब उसे नींद ने थपकियों से सुला दिया था, वह जान भी नहीं पाया था।

सुबह उठा, तो दिन चढ़ आया था। घड़ी में दस बज रहे थे। बाहर, सड़क पर खूब चहल—पहल थी। कमरे में ही उसे सड़क पर से आती औरत—मर्द की मिली—जुली, आवाज सुनायी पड़ी थी, ‘‘हैप्पी क्रिसमस ..... बड़ा दिन मुबारक हो...... वगैरह—वगैरह।''

फिर से उसने खुद को स्मृतियों के चक्रव्यूह में कसा जाता महसूस किया था।

‘‘हैप्पी क्रिसमस, मारिया।''

‘‘कौन ? .... ओ मारग्रेट। कैसी हो यार?''

‘‘नाइस। तुम कैसी हो ?''

‘‘ठीक ही हॅूं।''

‘‘मीट माइ हस्बैण्ड।''

मारग्रेट की बगल में खड़े सूट—टाई में सजे हुए युवक ने मारिया की ओर अपना हाथ बढ़ाते हुए कहा होगा, ‘‘हैप्पी क्रिसमस मिस ....''

‘‘मिस नहीं, मिसेज।''

पता नहीं, उसने खुद के बारे में मिसेज कहा भी होगा या नहीं। .... कहा भी होगा तो झिझकते हुए ही। अपने लिये ‘‘मिस'' सम्बोधन सुनकर उसके गाल शर्म से सूर्ख जरूर हो गये होंगे।

उसने भी उससे हाथ मिलाते हुए कहा होगा, ‘‘हैप्पी क्रिसमस टू यू आलसो।''

‘‘और वो कहॉं हैं?'' मारग्रेट ने जरूर पूछा होगा।

‘‘ वो कौन?'' चौंकते हुए जान—बूझकर पूछा होगा मारिया ने।

‘‘अरे वही। तुम्हारे वो।''

‘‘अच्छा .... अच्छा, निषान्त। वह नहीं आया।''

उसके यह कहने का अंदाज निष्चित ही ऐसा रहा होगा— ‘‘क्या बात ले बैठी, मारग्रेट। उस बेकार के आदमी को मैं कहॉं—कहॉं लिये डोलती फिरूॅं ?''

फिर निषान्त की ऑंखों के सामने मारग्रेट से उसकी पहली मुलाकात वाली घटना चित्रनुमा उभरनेे लगी थी।

पहली—पहली बार वह सुसराल गया था। उस समय मारग्रेट की शादी नहीं हुई थी। वह अपनी सहेली .... खासकर निषान्त से मिलने आयी थी। निषान्त को देखते ही चहक उठी थी, ‘‘यार, वाह। तुम्हारी किस्मत को तो चूम लेने का मन कर रहा है। क्या गुड्‌डा फॅांसा है ... कहॉं से उड़ा लायी इस गुड्‌डे को? .... खैर, ले तो आयी हो यहॉं, पर सावधान ही रहना। यहॉं की गुड़ियों का कोई ठिकाना नहीं। किसी की ऑंख में चढ़ गया तेरा गुड्‌डा तो हाथ मलती रह जायेगी, हॉं।'' शरारत भरी ऑंखों से उसने निषान्त की ओर देखा था।

‘‘अरे वाह। मैं कोई विदेषी गुड़िया हॅूं क्या ? मुझे नहीं पता, यहॉं की गुड़ियों का ? .... खासतौर से तेरी ऑंखों का ?'' मारिया ने उसकी बॉंह में चिकोटी काटते हुए कहा था।

‘‘धत्त, बड़ी बेषर्म हो गयी है तू, मारिया। मैं तो वैसे ही ....।'' कहकर उसने कुछ ऐसा मुॅंह बनाया था कि दोनों सहेलियॉं एकबारगी ठठाकर हॅंस पड़ी थीं।

फिर वह निषान्त की ओर मुड़कर बोली थी, ‘‘मेरा नाम तो आप सुन ही चुके हैं— मारगे्रट। आपका?''

‘‘जी निषान्त ..... निषान्त सक्सेना।''

‘‘अच्छा, तो कल मेरे घर आपकी दावत है। ... क्यों मारिया?''

‘‘मुझसे क्या पूछती है? जिसे बुलाया है, उससे पूछ। अब मैं कौन होती हॅूं तेरी। काम तो तेरा निषान्त से निकलेगा न, मेरी गुड़िया रानी।''

‘‘सचमुच बड़ी बेषर्म हो गयी है तू। .... अच्छा बोल, आ रही है न?''

‘‘हॉं भई। ... क्यों निषान्त?''

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शायद चर्च में सुबह का मीसा खत्म हुआ था। बाहर हो—हल्ला और पटाखेबाजी पूर्ववत्‌ ही जारी थी। लोग चर्च से अपने घरों को वापस जा रहे थे।

निशान्त को चाय की तलब लग रही थी। पर खुद से बनाने की उसकी इच्छा नहीं हो पा रही थी।

कपड़े पहन कर वह सड़क पर निकल गया था। यह सोचकर कि चौराहे पर जाकर चाय पी आयेगा।

सिर झुकाये हुए वह चौरहे की ओर बढ़ा जा रहा था उस भीड़—भरी सड़क से अलग—थलग।

अचानक उसके कान में आवाज पड़ी थी, ‘‘हलो निषान्त। हैप्पी क्रिसमस।''

उसने सड़क के दूसरी ओर देखा था। बर्नार्ड और डैमियन वहॉं मुस्कराते हुए खड़े थे।

‘‘हैप्पी क्रिसमस टू बोथ ऑफ यू।'' उसने भी उन्हें मुबारकबाद दी थी।

‘‘हम तो यार, तुम्हारे ही घर जा रहे थे। भाभी से मिलने। उन्हें क्रिसमस की मुबारकबाद देने।'' बर्नार्ड बोला था।

‘‘वह तो यहॉं है ही नहीं।''

‘‘कहॉं गयी हैं?''

‘‘मैके गयी है।''

‘‘तुम नहीं गये ?''

‘‘यों ही। कुछ काम था यहॉं।''

‘‘अजीब घोंचू आदमी हो। भला क्रिसमस मेें भी कोई ससुराल का मौका छोड़ता है? ... खैर, तुम कवि—कथाकारों के दिमाग को तो ईसु भी नहीं जान सकते।''

‘‘... तो फिर घर में अकेले क्यों झख मार रहे हो? आओ, चलो हमारे घर। तुम्हारा क्रिसमस तो अब हमारे साथ ही मनेगा।''

‘‘आओ, चाय पीते हैं।'' हल्की मुस्कराहट के साथ बोला था निषान्त।

‘‘ये लो, आज भी भला कोई चाय पीने का दिन है? ... चलो मेरे घर। तुम्हें ठंढी—कड़वी चाय पिलाता हॅूं।''

‘‘नहीं यार, फिलहाल चाय ही पीने की इच्छा है।''

‘‘खैर, तुम जाकर पियो चाय। हमारा तो वैसा कोई मूड है नहीं। क्यों डैमियन?''

‘‘हॉं यार। चाय क्या पीनी, आज के दिन?'' डैमियन ने उसकी हॉं में हॉं मिलायी थी।

‘‘हॉं, तो मेरे घर आना भूलना मत। नहीं तो मम्मी को बुरा लगेगा। हर साल भाभी के साथ तो तुम आ ही जाते थे। इस बार भाभी नहीं, तुम ही सही। .... और भाभी आयें, तो उन्हें हमारी ओर से क्रिसमस की मुबारकबाद देना भी मत भूलना।''

चाय की दुकान पर जाकर खड़े—खड़े ही उसने दो कप चाय पी थी। फिर सिगरेट सुलगाता हुआ घर की ओर मुड़ गया था।

पता नहीं क्यों, न चाहते हुए भी मारिया और जोसलीन दी के साथ, वहॉं का पूरा वातावरण उसकी स्मृति पर रह—रह कर छाने लगा था——

पता नहीं, जोसलीन दी ने उसके बारे में एक बार भी पूछा होगा या नहीं?... नहीं ही पूछा होगा। उस भीड़ का विषाल चेहरा पल भर के लिये भी उनकी ऑंखों से लुप्त हुआ होगा, तब ही न। नहीं तो कौन आया, कौन गया, कौन मिला उनसे और कौन बगैर मिले ही चला गया, उन्हें भला कैसे पता चला होगा।

पर वह तो उनका खास रिष्तेदार है — उनकी छोटी बहन का पति। भला उसके बारे में नहीं पूछा हेागा उन्होंने? .... जरूर पूछा होगा। ... अगर पूछ लिया होगा, तो मारिया ने क्या उत्तर दिया होगा? ... यही न, कि वह नहीं आया।

फिर उन्होंने यदि पूछ लिया होगा कि क्यों, तब?

यह तो शायद वह कह नहीं सकती कि दीदी, कहॉं—कहॉं लेकर घूमती फिरूॅं उसे? ....यदि किसी ने पूछ लिया कि क्या करता है तेरा हस्बैण्ड, तो क्या जवाब दूंगी भला ? .... मैं तो दीदी, यही समझ लो कि फॅंस गयी। बड़े—बुजुर्गों की बात नहीं मानने का नतीजा भुगत रही हॅूं ....''

न्न .... कतई उसने ऐसा नहीं कहा होगा। आखिर उसके अंदर भी कोई ईगो है या नहीं? ... इतने भर से ही उसने काम चला लिया होगा, ‘‘उसका मूड। ... वह जाने। बोली तो थी उससे, पर आया ही नहीं।''

‘‘जीजा जी। नमस्ते...ए ...ए।'' स्ट्रेला की परिचित आवाज ने उसे चौंका दिया था। हड़बड़ा कर निषान्त पीछे मुड़ा था।

सामने चुहल भरी मुस्कान चेहरे पर खिलाये स्टे्रला अपनी देा सहेलियों के साथ खड़ी थी।

रिष्ते में स्ट्रेला मारिया की मौसेरी बहन लगती है।

निषान्त के चेहरे पर चिरपरिचित फीकी मुस्कान उभर आयी थी। फिर उसके होंठ हिले थे ‘‘कैसी हो, स्ट्रेला?''

‘‘ठीक ही हॅूं। आपके ही घर जा रही थी। दीदी से क्रिसमस मिलने। देखूं, दीदी ने क्या—क्या बनाया है आज मेरे लिये।''

‘‘मारिया तो यहॉं है नहीं।'' बोला था निषान्त।

‘‘क्यों ... कहॉं हैं?''

‘‘पटना गयी हैं। उसकी बड़ी बहन लंदन से आयी हैं न।''

‘‘क्या जोसलीन दी आयी हैं?''

‘‘हॉं।''

‘‘देखिये, मुझे पता ही नहीं चला, नहीं तो मैं भी क्रिसमस पटने में ही मनाती। .... मगर आप नहीं गये?''

‘‘हॉं ... वैसे ही।''

‘‘वैसे ही, या रूठे हुए हैं किसी बात पर? भई, आप दामादों से तो भगवान ही बचायें।''

‘‘क्या उत्तर देता निषान्त। चुपचाप खड़ा मुस्कराता रह गया था।

‘‘ठीक है, दीदी आये तो मेरी ओर से उन्हें क्रिसमस की मुबारकबाद देना मत भूलियेगा ... एंड हैप्पी क्रिसमस टू यू आलसो।'' मुस्कराती हुई तीनों सहेलियॉं आगे बढ़ गयी थीं।

कुछ पल ठगा—सा निषान्त उन्हें जाते हुए खड़ा देखता रह गया था। उसे लगने लगा था कि क्या उसके लिए भी यह क्रिसमस हैप्पीनेस का सौगात लाया था। भूत—बंगलानुमा उसके डेरे में कैद उसकी तन्हाई में क्रिसमस का हैप्पीनेस छुपा था या हर लम्बा टुकड़े—टुकड़े वजूद को समेट पाने की उसकी कोषिष में?

पता नहीं क्यों उसे हैप्पी—क्रिसमस से अब डर—सा लगने लग गया था। इसके पहले कि कोई फिर मिले उसे और कहे, ‘हैप्पी क्रिसमस, निषान्त', वह अपने भूत—बंगले में कैद हो जाना चाहता था।

दरवाजा खेालकर अंदर कदम रखने के साथ ही उसकी नजर, सामने टंगी मारिया की मुस्कुराती तस्वीर पर पड़ी थी। उसे लगा था, जैसे मारिया अपने पूरे वजूद के साथ मुस्कुराती हुई उसके सामने आ खड़ी हुई हो। इसके साथ ही उसने महसूस किया था कि मारिया के होंठ हिलने लगे थे, ‘‘हैप्पी क्रिसमस, निषान्त।'' उसने साफ सुना था शायद। अपने अविष्वसनीय ऑंखों से टकटकी साधे देर तक वह तस्वीर के सामने खड़ा रह गया था। उसके होंठों पर वही चिरपरिचित फीकी मुस्कान फिर से खेल गयी थी। इसके साथ ही उसके होंठ थरथराये थे, ‘‘हैप्पी क्रिसमस, मारिया'' ‘‘हैप्पी क्रिसमस ... है ...''

फिर अनायास ही उसकी हथेलियों ने उसके चेहरे को ढक लिया था।

अथ सरकारी नौकरी कथा

घर में उत्सव कर माहौल है। घर के लोगों के पैर जमीन पर पड़ ही नहीं रहे। चारो तरफ खुषियां ही खुषियां। फिर ऐसा माहौल हो भी क्यों नहीं? मोहन की नौकरी जो लग गयी है। वह भी सरकारी नौकरी। सब भगवान की कृपा है। अब भगवान की कृपा का बदला भी तो चुकाना है। सो सत्यनारायण भगवान की पूजा ठन गयी घर में। छप्पर पर ‘लौडिस्पीकर' का भोपू टंग गया—‘हो ढोल तारे ढोल बाजे, ढोल बाजे, ढोल बाजे, ढोल, कि ढम—ढम बाजे बाजे ढोल ...

‘ऐ लौडिस्पीकर वाला, ई कैसा बाजा बजाता है? भगवान वाला बाजा बजाओ। भगवान खुष होंगे तो अभी तो नौकरिये दिहिन हैं मोहना को, बाद में तरक्कियो देंगे। चलो, बजाओ भगवान वाला बाजा ...'

थोड़ी ही देर में भोपू दूसरा गाना उचारने लगा, ‘हो चल्ले भोले बाबा, हो चल्ले शंकर बाबा, होके बैल पे सवार, करके अनोखा सिंगार, चले भोले बाबा ब्याह रचाने को ...

‘हां, ई फिट' गाना है। मोहन के बाबूजी मगन हो उठे। मगर तुरंत हो ध्यान ‘बिआह' पर जाके अटक गया। हां, बिआह! नौकरी के तौर पर मोहना को भोलेबाबा का ‘आषीर्वाद' तो मिल गया, पर अब भोले बाबा मोहना के बिआह की भी ‘सिपारिस' कर रहे हैं। ... नहीं तो दूसरा गाना नहीं बजता भोंपू में भगवान वाला? ... जय हो भोले बाबा! सब आपही किरपा है ... तो आपका हुकुम भी ‘सिरोधार'! ... बलइया से कि नौकरी के फेरा में एक बिघा जमीन बिग गया साहेब को चढ़ावा चढ़ाने में। ... पर है गांव भर में कोई पट्‌ठा, जो लाख—दू लाख टेंट में खोंस के भी पटा ले साहब को? साहब तक पहुंच तो पैबे नहीं करेगा। ... भगवान मोहना जैसा होनहार बेटा सबको दें। ... गया सत्तर ... अस्सी हजार तो गया, मगर मोहने ऐसा सपूत निकला कि साहब को पटा भी लिया और नौकरी भी झपट लिया। पूरे गांव—जवार में बाप की छाती ऐसे चौड़ा कर दिया कि पचपन की उमिर में भी बाप पचीस—छब्बीस का लगने लगा। ... ऊपर से सोना से सोहग्गा ई कि इधर छौरा नोकरी से लगा नहीं कि लड़की वाला सब ‘दुआर' पर नाक रगड़ने लगा मोहना के बिआह की खातिर।

फिर का था, देखते ही देखते घर में एक ‘सुन्नर—सुथ्थर' दुलहिनिया भी आ बिराजी। ... सब भोले बाबा की किरपा! और किरपा भी इतनी प्रबल कि दू बरिस में ही मोहना के बाबूजी की गोदी में दू—दू ठो पोता भी खेलने लगा। ... मेाहना खुष, घर—परिवार खुष, गांव—जवार खुष ... मतलब, चारों तरफ से चकाचक।

घर में एक बिघा की जोत बची थी, एक बिघा बिकने के बाद। सो मोहन के बाबू जी वही दिन भर जोत—कोड़ करते और बाकी के टैम में भोले बाबा का गुणगान और पोतों की दुलार पुचकार।

पहले तो बाबू—बबुआन के खेत में मजूरियो करते फिरते थे, सो भी अकेले नहीं, मोहना की मइया के संग, पर अब जदी ई—सब करेंगे तो गांव—जवार का कहेगा? ... अब तो मोहना सिरफ कमाता जाय और वे कट्‌ठा दू कट्‌ठा करके धरती ‘अरजते' जायें, बस्स! ... पर तीन बरिस में एक धूर भी धरती कहां अरज पाये थे वे। मोहन जो भी कमा के भेजता, सब तो पेट की भट्‌ठी में समाता चला जाता। ... मगर कोई फिकिर नहीं ... ‘जिनगी' तो बाबू—बबुआन जैसी कट ही रही थी। ... सब भोले बाबा की किरपा!

पर या भोले बाबा ..., ई का? मोहना ‘थुथुना' लटकाये काहे आ रहा है? — मोहन आया, न पैर छुआ बाप का, न घर का हाल—समाचार पूछा, सीधे बाप के आगे करेजा फाड़ के रोने लगा।

बाप का मुंह फक्क, ‘का मोहन, का हुआ? कोई कुछ कहिस का, जो तू रोये जा रहा है?'

पर मोहन का रोना रुके तब तो कुछ बके वह।

खैर, देर तक की दुलार—पुचकार के बाद मुंह खुला उसका, ‘नौकरी गयी बाबूजी।'

‘का?' जैसं पूरा मूसल बरसा दिया हो अपने बाप की छाती पर, ‘पर काहे रे? कोनो कसूर हो गया तेरे से? या भोले बाबा।'

‘ई तो हमको भी नहीं पता। लेटर में लिखा है कि नौकरी अवैध तरीका से दी गयी थी, इसी खातिर हटाया जा रहा है।'

बोलते—बोलते फिर से रो पड़ा वह, ‘हम तो बर्बाद ... हो गये बाबूजी। ... एक बिघा जमीनो गया ... परिवारो बढ़ गया। ... अब का होगा बाबूजी? ... अब तो सरकारी नौकरी की उमिर भी नहीं बची। ... जिनगी एकदम से बेकार हो गयी।'

बाप तो बस फटी आंख से बेटा को देखता ही रह गया था। खैर, उधर नौकरी गयी और इधर मोहन का गांव में रहना जान का जंजाल बन गया। गांव में जिधर निकलता, कहीं सहानुभूति, तो कहीं व्यंग्यवाण, ‘का रे मोहना, कर आया सरकारी नौकरी? ... बाप रे, इसको नौकरी का लगी, इसका बाप तो एकदम से मुखिया—सरपंच हो गया ...

और एक रोज पूरे गांव में हड़कम्प मच गया— मोहना ने रात में एक पेड़ से लटक कर आत्म—हत्या कर ली।

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यह कोई कहानी नहीं, बल्कि हकीकत है। और न ही यह हकीकत किसी एक मोहन से ताल्लुक रखती है। ऐसे सैकड़ों मोहन मिल जायेंगे, जिन्होंने या तो फांसी के फंदे को अपनी मजबूरी का साथी बना लिया, या हालात से समझौता कर अभिषप्त जीवन जीने के लिए विवष हो गये। या फिर प्रतिषोध की ज्वाला में धधकते हुए हथियार थाम कर किसी बीहड़ में भटकने का रास्ता अख्तियार कर लिया। आखिर गलती किसकी थी— मोहन का अथवा उस अधिकारी का, जिन्होंने जान—बूझकर अवैध ढंग से मोहन की नियुक्ति की थी?

आये दिन अखबारों में इस तरह के समाचार पढ़ने को मिल जाते है। अभी हाल में ही भागलपुर में लगभग दो वर्ष पूर्व नियुक्त 157 कक्षपालों को बर्खास्त कर दिया गया। कहा गया, नियुक्ति अवैध थी। अगर नियुक्ति अवैध थी तो दोषी कक्षपाल थे या वे अधिकारी, जिन्होंने उन्हें नियुक्त किया था? कक्षपालों ने तो पद सृजित नहीं किया था और न ही बगैर सरकारी नियुक्ति पत्र के कुर्सी से जाकर चिपक गये। फिर सजा कक्षपालों को क्यों ? होना तो यह चाहिए कि ऐसे गैरजिम्मेदार अधिकारियों को इतनी कड़ी सजा मिले कि आगे से कोई भी अधिकारी अपने छोटे—से लाभ के लिए अवैध नियुक्ति की कल्पना से ही कांप उठें। नहीं तो भारतेन्दु हरिष्चन्द्र के नाटक ‘अंधेर नगरी चौपट राजा' की तर्ज पर बेकसूर मोहन फांसी पर लटकता रहेगा और कसूरवार अधिकारी बेखौफ होकर गैरजिम्मेदाराना हरकत करते रहेंगे।

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