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सहाब तो सहाब ही हैं

कथा संग्रह

साहब तो साहब ही हैं

रतन वर्मा

संक्षिप्त परिचय

नाम ः रतन वर्मा

जन्म तिथि ः 06.01.1951

जन्म स्थान ः दरभंगा

प्रकाशन (पत्रिकाओं में) : हंस, धर्मयुग, इंडिया टुडे, सारिका, आजकल, समकालीन भारतीय साहित्य, नया ज्ञानोदय, पांखी, इन्द्रप्रस्थ भारती आदि पत्रिकाओं में लगभग 200 कहानियाँ एवं इनके अतिरिक्त समीक्षायें, साक्षात्कार, कविताएँ, गीत, गजलें, संस्मरण प्रकाशित।

पुस्तकें : ‘पेइंग गेस्ट', ‘दस्तक' एवं ‘नेटुआ' (कहानी संग्रह), ‘यात्रा में' (काव्य संग्रह), ‘रुक्मिणी' एवं ‘सपना' (उपन्यास), ‘श्रवण कुमार गोस्वामी एवं उनके उपन्यास' (आलोचना पुस्तक)

पुरस्कार :

— ‘गुलबिया' कहानी को वर्त्तमान साहित्य द्वारा

आयोजित कृष्ण प्रताप स्मृति पुरस्कार का प्रथम

पुरस्कार (1989)

— नाट्‌यभूमि सम्मान (1991)

— ‘सबसे कमजोर जात' कहानी आनन्द डाइजेस्ट

आंचलिक कथा प्रतियोगिता में सर्वश्रेष्ठ (1991)

— ‘नेटुआ' नाटक : साहित्य कला परिषद्‌, दिल्ली द्वारा दशक के सर्वश्रेष्ठ छहः नाटकों में शामिल (1992)

— ‘अवसर' सम्मान (1994)

— समग्र साहित्य पर ‘राधाकृष्ण पुरस्कार' (2003)

— ‘निखित भारत बंग साहित्य सम्मेलन, नई दिल्ली' द्वारा

विशिष्ट कथाकार पुरस्कार (2004)

सम्प्रति : स्वतंत्र लेखन

सम्पर्क : क्वार्टर सं0 के—10, सी0टी0एस0 कॉलोनी, पुलिस लाईन के निकट, हजारीबाग—825301 (झारखण्ड)

मोबाईल न0 9430347051, 9430192436

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अपनी ओर से

आज की प्रशासनिक व्यवस्था में जो उच्चाधिकारी होते है, वे स्वभाव से कठोर हो या मृदु, शायद ही किसी का चरित्र आम आदमी के सुख—दुखः में सहायक सिद्ध होता हो। बल्कि इनके लिए आम आदमी जैसे उनकी सम्पत्ति होती है। ऐसे प्रशासनिक अधिकारियों के चरित्र (?) निर्माण में आज की राजनैतिक व्यवस्था की कितनी अहम भूमिका होती है, इसी का जीवंत चित्रण, संग्रह की शीर्षक—कथा ‘साहब तो साहब ही हैं' में किया गया है।

‘कबाब' कहानी एक ऐसे व्यक्ति की कहानी है जिसका पूर्वार्द्ध रईसी भरा होता है लेकिन आगे चलकर वह आर्थिक असमर्थता का शिकार हो जाता है। ऐसे में परिवार में उसकी क्या दुःस्थिति होती है, यही कहानी का मूल स्वर है।

संग्रह की कहानियाँ वर्तमान प्रशासनिक व्यवस्था, राजनैतिक व्यवस्था तथा आर्थिक आधार पर परिवार में इंसान की स्थिति—दुःस्थिति की अत्यंत ही सूक्षमता के साथ विश्लेषण प्रस्तुत करती है।

साहब तो साहब ही हैं

साहब की मुलायमियत

साहब बहुत अच्छे हैं। इतने अच्छे कि शहर का हर एक आदमी उनके बराबर की कुर्सी पर बैठ सकता है। समझ लीजिए कि साहब की मुलायमियत के आगे तो मक्खन की मुलायमियत भी फीकी पड़ जाय। इनके पहले वाले साहब थे न! बाप रे, इतने खुर्राट कि अगर किसी की तरफ आँख उठा कर भी देख लें तो कँपकँपी समा जाय उसके तन—मन में।

फिर भी, दोनों साहबों के स्वभाव में भिन्नता के बावजूद, जाति तो साहबों की एक ही होती है न! मसलन वेतन भत्ते गाड़ी—घोड़े, अर्दली, चपरासी आदि की सुविधा सारे साहबों की एक जैसी। और जब सारी सुविधायें एक जैसी, फिर स्वभाव व्यवहार में अंतर कैसा ? मगर नहीं, ये जो नये वाले साहब आये हैं न, उनकी तो बात ही निराली है। पिछले वाले साहब तो अपने क्लाइट्‌स से अपने सख्त स्वभाव की कीमत वसूला करते थे, मगर ये वाले साहब अपने मक्खनी—स्वभाव की।....... चलिए, आप खुद ही देख लीजिए कि दोनों साहबों में क्या फर्क है —

पहले वाले साहब! ............उनके सामने वाली कुर्सियाँ खाली। मगर ठेकेदार साहब भीगी बिल्ली बने उनके सामने खड़े। साहब की आँखें टेबुल पर की खुली फाइल्स पर स्थिर। अचानक साहब की गुर्राती आवाज ”क्या है? आप अंदर कैसे आ गये?”

‘‘च..... च..... चिट तो भिजवायी थी सर ! पिउन ने कहा जाने को।‘‘

‘‘हाँ—हाँ ठीक है, काम बताइये।‘‘

‘‘सर, आपका परसेन्टेज!” ठेकेदार के हाथ का ब्रीफकेस थोड़ा ऊँचा।

‘‘आप जानते हैं कि मैं....... ! स्टेनो से मिल लेते।‘‘ साहब की आँखों में चमक, मगर आवाज में वही सख्ती!

‘‘स्टेनो बाबू कहीं गये हैं सर!‘‘

‘‘आइ सी ! ठीक है, ब्रीफकेस रख दीजिए और जाइये।‘‘

ब्रीफकेस टेबुल पर रखते हुए ठेकेदार की मिमियाहट ‘‘सर।‘‘

‘‘अब क्या है ?‘‘

‘‘सर मेरा दूसरा वाला बिल.... ?”

‘‘कहा न जाइये! स्टेनो से मिल लीजिएगा।‘‘ साहब की आँखें फिर से फाइल पर!

अब दूसरे वाले साहब —

‘‘कौन फलाने बाबू ? आप खडे़ क्यों हैं, बैठिये न! बताइये क्या लेंगे, ठंडा या गरम?‘‘

‘‘जी कुछ नहीं, आपका ही दिया तो खाता हूँ।‘‘

‘‘अरे मैं कौन होता हूँ, सब ऊपर वाले की माया है। तब, कैसे याद किये?‘‘

‘‘वो आपका परसेन्टेज सर!‘‘ ब्रीफकेस टेबुल पर।

‘‘ठीक है, ठीक है! पूरे तो हाेंगे ही!‘‘

‘‘क्या कहते हैं सर, पूरे कैसे नहीं होंगे ?‘‘

‘‘ठीक है, मगर स्टेनो बाबू से भी मिल लीजिएगा। उन्हें भी तो आपका ही आसरा रहता है न!‘‘

‘‘क्यों नहीं, क्यों नहीं! .... अच्छा सर, वह मेरा दूसरा वाला बिल ?‘‘

‘‘अरे पास हो जायेगा वह भी। ..... मगर उस बिल में थोड़ा लफड़ा है। साइट इंस्पेक्शन में कुछ ..........‘‘

धक्क ! ठेकेदार की मिमियाहट, ”तो सर ..... । देखिये जैसे जो बन पडे़। मैं आपसे अलग थोडे़ ही हूँ।‘‘

‘‘उफ्‌फोह, आप बहुत जल्दी घबडा जाते है। भइ मैं हूँ, तो बिल तो पास होना ही है।‘‘

ठेकेदार की चहक, ”जी सर तो कब आऊँ ?‘‘

‘‘कब क्या, जब जी चाहे आते रहिये। मिलना जुलना — भी चलता रहे।‘‘

‘‘जी! .... अच्छा तो चलता हूँ! प्रणाम सर!‘‘

‘‘प्रणाम ..... स्टेनो बाबू से जरूर मिल लीजिएगा।‘‘

ठेकेदार के जाने के थोड़ी देर बाद —

‘‘रामाश्रय.... रामाश्रय !‘‘ दरवाजे पर बैठे पिउन को साहब की पुकार।

पिउन हाजिर।

‘‘जरा स्टेनो बाबू को भेजना तो। .... अच्छा, ठेकेदार ने तुझे कुछ दिया या.........

“जी, एक सौ।‘‘

‘‘चलो ठीक है, कुछ तो मिला न!........... अच्छा शाम के लिए थोड़ी हरी सब्जी ले आना। ........... अब जाओ, स्टेनो बाबू को भेज दो।‘‘

रामाश्रय स्टेनो के सामने भुनभुनाता हुआ,‘‘ ई साहब हैं कि छुछुन्दर! अभी ठेकेदरवा सौ रूपया दिहिस नहीं कि कर दिहिन फरमाईश—हरा सब्जी चाहिए। ठीक है, खिलायेंगे तो सब्जी जरूर, मगर सड़ा—सड़ा पिल्लू वाला।........ जाइये स्टेनो बाबू, आपको भी बोलाइन हैं।‘‘

‘‘अरे ठेकेदार गया है, तो बुलायेंगे नहीं? मैं तो इंतजार ही कर रहा था, बुलाहट का। साले का वश चले तो घी में पड़ी मक्खी को भी निचोड़कर चाट जाय .......

स्टेनो, साहब के सामने।

‘‘अरे आपके तो चांदी ही चांदी हैं स्टेनो बाबू! ठेकेदार से कितना हाथ लगा?“

साहब का आत्मीयता से सराबोर स्वर।

‘‘क्या हाथ लगेगा सर ! नम्बरी कंजूस है। मैं तो ले ही नहीं रहा था, मगर जबरदस्ती जेब में हजार रूपया ठूंस गया।‘‘

‘‘लीजिए हजार रूपये कम होते हैं क्या ? तीस दिन कलम घिसटते हैं, तब जाकर चार पाँच हजार मिलते हैं आपको। और यहाँ चुटकी में हजार मिल गये, फिर भी संतोष नहीं ..........‘‘

मन ही मन स्टेनों की भुनभुनाहट, ‘‘और आपको ? आपको तो सिर्फ दस्तखत करने के अठारह—बीस हजार मिलते हैं, फिर भी ब्रीफकेस भरकर रूपये चाहिएँ। आपसे अच्छे तो वे सख्त वाले साहब थे। डाँट—फटकार जरूर करते थे, मगर कभी पूछते नहीं थे कि किसने क्या दिया। बल्कि उन्हाेंने तो फिक्स कर रखा था कि जितना वे खुद लेते हैं, उसका कम से कम दो परसेन्ट स्टेनो को भी देना होगा ऊपर से। तब अगर मेम साहब कुछ फरमाईश भी करती थीं तो अखरता नहीं था......... वह तो कहियेे कि ये साहब अपनी मेम—साहब को साथ नहीं रखते हैं, नहीं तो चूतर पर लगोट भी नहीं रहने देते.....।‘‘

‘‘स्टेनो बाबू, वो क्या है कि टी० बी० का स्टेबलाइजर ठीक से काम नहीं कर रहा। काफी पुराना हो गया है। सोचता हूँ, इसे रिजेक्ट कर नया ही ले लूँ।‘‘ साहब की पुचकारती—सी आवाज

‘‘ज.....ज जी सर!‘‘ स्टेनो के चेहरे पर हवाईयाँ।

‘‘मैं समझता हूँ चार—साढ़े चार सौ में मिल जायेगा। तो ऐसा कीजिए, अभी जाकर ले आइये।‘‘

‘‘जी सर!‘‘ स्टेनो के शब्दकोश में जितनी भी गालियाँ थी, उसके अंतस में घुमड़ उठी थीं।

साहब लेखक भी

फिर भी, चाहे कोई कुछ भी कह ले, साहब हैं बहुत अच्छे। और फिर अच्छे हों भी कैसे नहीं! साहब सिर्फ साहब थोड़े ही हैं, वे तो एक महान साहित्यकार भी हैं। उनकी अपनी लिखी हुई दस—बारह किताबें हैं। अब, जब साहब लेखक भी हैं, तो उनका स्वभाव भी तो लेखक जैसा होगा ही — मक्खनी.........मृदुभाषी।

मगर इस इलाके में आने से पहले साहब को लेखक के तौर पर कुछ ही लोग जानते थे। जानते भी तो कैसे ? कभी पत्र—पत्रिकाओं में उनकी रचनाएँ पढ़ी होतीं, तभी न। रही बात किताबों की, तो किताबें पहुँचती ही कितने पाठकों तक हैं। पर इस इलाके में उनका आगमन क्या हुआ, कुछ ही दिनों में इलाके का बच्चा—बच्चा जान गया कि साहब एक महान लेखक हैं। हुआ यों कि यहाँ आने के साथ ही साहब को पता चला कि यहाँ पत्र—पत्रिकाओं में छाये रहने वाले, ‘समर्पित जी' उपनामधारी एक लेखक का भी वास है। फिर तो साहब ने ऐसे लपक कर फाँस लिया समर्पित जी को, जैसे वे कोई खूबसूरत पक्षियों के पारखी बहेलिया हों। मसलन, अब तो आये दिन समर्पित जी की झोंपड़ी के आगे पहरा देती हुई साहब की चमचमाती कार नजर आने लगी थी। फिर समर्पित जी भी अब सड़कों पर यदा—कदा ही पैदल दिखाई देते। अक्सर साहब के साथ कार में ही नजर आते वे। फिर तो माध्यम समर्पित जी और किसी भी साहित्यिक समारोह में अध्यक्षता, उद्‌घाटन, मुख्य अतिथि बनना, मुख्य वक्ता होना, साहब के हिस्से। इस प्रकार साहब का आये दिन अखबारों में छाये रहना आम बात होेकर रह गया था।

साहब का अपना एक प्रकाशक भी है। उस दिन साहब के यहाँ दिल्ली से वे ही पधारे हुए थे। साहब की सारी पुस्तकें उन्होंने ही छापी हैं। साहब के पास, कमिश्नरी भर के पुस्तकालयों में पुस्तकें आपूरित करने के लिए कुछ अच्छा—खासा फंड आया हुआ था। उसी फंड की ऐसी की तैसी करवाने के लिए साहब ने बुलवाया था प्रकाशक को। साथ में अपनी एक पाण्डुलिपि भी थमा दी थी उन्होंने उन्हें।

समर्पित जी भी वहीं मौजूद थे। प्रकाशक को अपनी पांडुलिपि थमाने के बाद साहब ने समर्पित जी से आग्रह किया था, ”आपको एक कष्ट दे रहा हूँ समर्पित जी — मैं थोड़ी देर के लिए ऑफिस जा रहा हूँ। तब तक आप थोड़ा प्रकाशक जी को शहर की सैर करा दें, कृपा होगी। मैं एक कार और ड्राइवर छोड़े जा रहा हूँ।'

समर्पित जी की मौन स्वीकृति।

सैर के क्रम में प्रकाशक जी खिड़की से प्राकृतिक छटा को निहारते हुए बोल पड़े थे, ”भई वाह, आपका यह शहर तो कमाल का खूबसूरत है। जिधर भी नजर उठाइये, हरियाली ही हरियाली..... ये पहाड़, ये जंगल, सचमुच मजा आ गया सैर का।”

”हमारी खुशकिस्मती! नहीं तो लोग तो इस इलाके को जंगली मानकर खारिज कर देते हैं।”

”अच्छा समर्पित जी, आप तो साहब के घनिष्ट मित्र हैं..... तो कभी उनकी रचनाओं को भी मौका निकाल कर देख क्यों नहीं लेते?”

”क्यों ? कमी क्या है उनकी रचनाओं में ?” लहजे में व्यंग्य उभर आया था समर्पित जी के। उनके व्यंग्य को समझते हुए बोले थे प्रकाशक, ”देखिये, हैं तो वे साहब ही। उनकी व्यस्तता तो किसी से छुपी हुई नहीं है। फिर भी समय निकालकर वे कुछ लिख लेते हैं, यही क्या कम है ? ऐसे में थोड़ी बहुत कमियाँ तो रह ही जाती हैं रचनाओं में। अब आप जैसे प्रसिद्ध साहित्यकार उनके मित्र हैं तो....”

”क्या....क्या कहा ? मैं और प्रसिद्ध? क्यों मजाक कर रहे हैं आप ? अगर मैं सचमुच आपकी नजरों में काबिल होता तो मेरे पत्रों के उत्तर नहीं देते ?...... बल्कि अगर ऐसा ही है, तो आप मुझसे भी पाण्डुलिपि मांगते छापने के लिए.....”

प्रकाशक के होठों पर एक फीकी मुस्कुराहट उभर आयी थी। शायद व्यंग्य—भरी मुस्कुराहट। बोले थे, ”आपकी शिकायत वाजिब है समर्पित जी। मगर इससे भी बड़ी शिकायत हम प्रकाशकों की है आप लेखकों से। क्या आप मुझे यह यकीन दिला सकते हैं कि आप अपनी ही प्रकाशित पुस्तक की दो सौ प्रतियाँ भी बिकवा देंगे ?.... नहीं। .... फिर क्यों कोई प्रकाशक आपकी पुस्तक छापेगा ? बात कड़वी जरूर है, मगर सच कह रहा हूँ मैं — आज कोई भी प्रकाशक किसी लेखक को नही छापना चाहता है। मंत्री—सांसदों की पुस्तकें छापना चाहता है। या फिर ऐसे लेखकों की, जिनकी पैठ मंत्री—अधिकारियों के बीच है अथवा जिनकी रचनाओं का एकेडेमिक—वैल्यु है। ....जानते हैं, साहब ने कितने का आर्डर दिलवाया है पुस्तकालयों से ? पूरे पाँच लाख का......”

”इसका मतलब तो यह हुआ कि कोई अगर बिकवाने का जिम्मा ले ले, तो आप कूड़ा भी छाप सकते हैं।“

”समर्पित जी, मैं कोई आलोचक नहीं हूँ कि रचनाओं का मूल्यांकन करता फिरूँ। मैं प्रकाशक हूँ, सीधे—सीधे एक व्यवसायी। मेरे लिए तो जो लेखक मुझे जितना लाभ दिला दे, वह मेरे लिए उतने ही महत्व का है। और आपकी जानकारी के लिए एक बात और बता दूँ....... कि मैंने कई ऐसे आलोचकों को भी देखा है, जो ऐसे साहबोें को छापने के लिए सिर्फ रिकोमेन्ड नहीं करते, बल्कि उनकी पुस्तकों को चर्चा में लाने का जिम्मा भी उठाते हैं। बल्कि कई तो ऐसे हैं, जो खुद अपनी लिखी हुई रचनाओं को अपने थोड़े से लाभ के लिए ऐसे लोगों के नाम से छपवाते रहते हैं।“

प्रकाशक के स्पष्टीकरण से अवाक रह गये थे समर्पित जी। समझ गये थे वे कि लेखक होने के लिए सामर्थ्यवान होना भी जरूरी है। उसी क्षण उनके मन में आया था कि कागज—कलम से नाता तोड़ ही लें वे अपना। मगर मजबूरी जो थी — अब लेखन के अलावा किसी और काम के भी तो नहीं रहे थे वे।

साहब की पुस्तक छप कर आ गयी थी। समर्पित जी के संयोजन और साहब की दरियादिली के बल पर पुस्तक का विमोचन—समारोह खूब धूम—धड़ाके के साथ सम्पन्न हुआ था। साहित्य जगत में इतनी पहचान तो थी ही समर्पित जी की कि उनके ही सहयोग से इस समारोह में बड़े—बड़े लेखक और आलोचकों ने हिस्सा लिया। और साहब ने भी ऐसी पंच—सितारायी सुविधा मुहय्या करायी अतिथियों को कि साहब की कृति उस एक दिन में ही साहित्याकाश का सितारा सिद्ध हो गयी। अखबारों ने भी जमकर कवरेज दिया समारोह को। उस पूरे समारोह में एक तरह से समर्पित जी उपेक्षा के ही शिकार बने रहे। उनके घनिष्ट मित्र भी उनकी अपेक्षा साहब को ही अधिक तरजीह देते रहे।

अतिथियों की विदायी भी, साहब ने उन्हें गदगदाहट की हद तक पहुँचा कर की।

शहर—भर के ठेकेदार और चाटुकार, साहब के साथ समर्पित जी की निकटता के बारे में तो जानते ही थे। सभी इसी कोशिश में रहने लगे थे कि समर्पित जी को माध्यम बना कर साहब से लाभ उठा सकें। आखिर एक ठेकेदार ने उन्हें उनके अभावग्रस्त जीवन का एहसास दिलाकर राजी कर ही लिया कि पूंजी उसकी, श्रम भी उसका और लाभ में चौथायी की साझेदारी! इसमें ठेकेदार को उनकी श्रीमती जी का सहारा लेना पड़ा। फिर समर्पित जी समझ तो चुके ही थे कि खुद को साहित्य की भट्टी में झोंककर भी उन्हें हासिल क्या हुआ ? अब जबकि थोड़े—से समझौते से बीबी—बच्चों के होठों पर खुशियाँ लौटा सकते हैं, तो इसमें हर्ज ही क्या है।

इस सोच के साथ ही वचन दे ही दिया उन्होंने ठेकेदार को कि मौका देखकर वे साहब से बात करेंगे।

मंद—मंद हवाओं की लय पर थिरकती हुई शाम। साहब की कोठी का भीतरी लॉन। सामने मेज पर खुली हि्‌वस्की की बोतल और दो गिलासें। प्लेटों में भुने हुए काजू और चिकेन—चिल्ली। साहब और समर्पित जी मौसम का आनंद उठाते हुए जाम टकराने में मस्त।

”सर, एक व्यक्तिगत बात कहूँ ?“ समर्पित जी का संकोच—भरा स्वर।

”हा हा हा हा....... व्यक्तिगत बात। अरे, कहिये जनाब। आप कहें, मैं सुनूं........ मैं कहूँ, आप सुनें, हि्‌वस्की का मजा तो तभी है।”

”नहीं, वह बात नहीं। क्या है, कि मेरा एक मित्र है। वह आपके विभाग से कुछ सप्लाई वगैरह का काम लेना चाहता है।”

”क्यों नहीं, क्यों नहीं, जरूर। मगर इस पर कभी इत्मीनान से बातें करेंगे। अभी तो.... हा हा हा हा! भई समर्पित जी, आप चिकेन—चिल्ली तो छू ही नहीं रहे। रियली क्या लजीज बनी है।” साहब ने टप से एक टुकड़ा उठाकर अपने मुँह में डाल लिया था।

दूसरे दिन से साहब बहुत व्यस्त रहने लगे थे। इतने कि अब उनके पास समर्पित जी के लिए भी वक्त नहीं था। हालांकि अब अक्सर उनके यहाँ बाहर के किसी न किसी साहित्यकार का डेरा डला ही रहता, शराब—कबाब के दौर भी चलते रहते। बल्कि अब तो स्थानीय पत्रकार और कुछ लेखकों से भी संबंध बन गये थे उनके।

साहब का दलित—प्रेम

साहब का क्षेत्र बहुत बड़ा है। इस क्षेत्र के दायरे में नदी, तालाब, जंगल, पहाड़ सब आ जाते हैं। और जब जंगल—पहाड़ भी उनके प्रशासन—क्षेत्र में आते ही हैं, फिर जंगल में बसने वाले जंगली, जंगलियों के मांदर की धुन, उनके पैरों की थिरकन, उनके कंठ से उचरने वाले कोयली गीत, नृत्यांगना—गायिकाओं के मनमोहक सांवले रंग, टेसू के फूल से बनी उनके माथे की बिन्दी, महुए की दारू से मदमत्त उनकी गुलाबी आँखें, वगैरह—वगैरह सारा कुछ तो उनके अधिकार—क्षेत्र में आयेगा ही।

फिर साहब साहित्यकार भी तो हैं। संवेदनशील, मक्खनी और कोमल—हृदय के स्वामी!

उस रात साहब अपने क्षेत्र के किसी अंचल का निरीक्षण करके कार से जंगल के बीचोबीच बनी पक्की सड़क से लौट रहे थे। निरीक्षण के क्रम में उनके अधीनस्थों ने एक छोटी—सी पार्टी भी रखी थी — थोड़ी हि्‌वस्की—विस्की की।

सो रात का सफर, उसमें भी चांदनी रात का। कार की खुली खिड़की से आती, देह को सहलाती शीतल हवा, साहब को बेहद सुहावनी लग रही थी। तभी जंगल के सन्नाटे को चीरते गीत—संगीत के मादक तीर कहीं से आकर सीधे साहब के कानों के रास्ते सीने में उतर कर उन्हें बेचैन करने लगे थे —

‘हो ढनन ढनन ढनन ढनन

ढनन ढनन ढन ...................

”वाह, क्या धुन है।“ साहब के मुँह से बेसाख्ता निकल पड़ा था, ”ड्राइवर, गाड़ी रोको।”

क्षणांश में गाड़ी चरमराती आवाज के साथ रूक गयी थी। ड्राइवर और उसकी बगल में बैठे साहब के बॉडी—गार्ड की प्रश्नवाचक आँखें पीछे बैठे साहब पर।

”तुमलोग यह धुन सुन रहे हो ? लगता है, आदिवासी लोग कहीं पास ही गा—बजा रहे हैं। चलो, चलते हैं वहाँ।” साहब का आदेश।

बॉडी—गार्ड की दबी आपत्ति, ”साहब, इस वक्त ?”

”क्यों, क्या हुआ इस वक्त। रिवॉल्वर लोड है न। फिर डर कैसा ? चलो, गाड़ी उतारो पगडंडी पर।”

साहब का आदेश! कार पगडंडी पर उतर गयी। संगीत की डोर से खिंचती हुई कार, उन दुम्बों (पत्तों से बनी शंकु आकार की छोटी—छोटी झोंपड़ियाँ) के पास अलाव के गिर्द नाचते—गाते जंगलियों के समीप पहुँच गयी। लेकिन कार की रोशनी ने नृत्य कर रही युवतियों के थिरकते पैरों और मांदर पर बरसते एक युवक के हाथों पर जैसे ब्रेक का काम किया हो — सारे चेहरे आतंकित और सीने, धड़कन—विहीन।

कमर से बंधे रिवॉल्वर—केस के रिवॉल्वर की मूठ पर हथेली जमाये बॉडी—गार्ड ने उनके पास आकर संदेश दिया, ”साहब आये हैं। तुमलोगों का नाच—गाना सुनना चाहते हैं।”

एक युवक, थोड़ा साहस दिखाते हुए, ”कोन साहब ?”

”अरे मैं हूँ भाई!” कार से उतर कर साहब उन लोगों के करीब! ”इधर से जा रहा था। तुमलोगों का गाना सुना। अच्छा लगा, इसलिए इनाम देने आ गया।”

”इनाम ?”

”अरे पैसे देने।” जेब से पर्स निकालकर कुछ दस—पाँच के नोट निकाल लिये थे उन्होंने।

आँखे चमक उठीं सभी की। युवक की चहक, ”रुपया..... रुपया देगा साहेब ? जोहार (प्रणाम)...... जोहार साहेब, जोहार!” सभी के समवेत अभिवादन।

साहब ने बॉडी—गार्ड को रुपये थमाते हुए कहा, ”बाँट दो।”

मगर मांदर वाले युवक ने सारे नोट लपक कर वहीं पास में महुए की दारू की बोतलों के पास बैठे एक बूढ़े को थमा दिया। साहब के द्वारा पूछे जाने पर उसने उस बूढ़े को अपना नायक बताया।

थोड़ी ही देर में नाच—गाना फिर से शुरू हो गया —

“हो ढनन—ढनन ढनन ढनन

ढनन ढनन दन

हो कौना मासे महुआ से

कौना माले केन्दवा से

कौना मा ऽ से

ऊ जे लागतई झुमरवा

से कौना माऽ से

हो ढनन ढनन ढनन ढनन

ढनन ढनन ढन ..............“

हालांकि आये तो थे साहब गीत और मांदर की धुन से आकर्षित होकर, मगर अब उनकी आँखें अलाव की सिन्दूरी लौ की रोशनी में तम्बई हो उठी नृत्यांगना पर जाकर ठहर गयी थीं। खास तौर पर महुए की दारू में मस्त उन्नीस—बीस वर्ष की उफान खाती दो नृत्यांगनाओं के जिस्मों पर। उन्हें तो लग रहा था, जैसे वे खुद इंद्रासन पर विराजमान इन्द्र हों और नृत्यांगनायें साक्षात्‌ इन्द्रलोक की अप्सरायें — मेनका और रम्भा।

वहाँ से लौटकर भी सारी रात वे सो नहीं पाये थे। जब भी आँखें बन्द करते, पलकों को छेदकर मेनका और रम्भा पुतलियों में उतर आतीं। और सुबह होते—होते तक अचानक उनके साहित्यकार मस्तिष्क में एक योजना बिजली की कौंध की तरह साकार हो उठी।

दूसरे दिन अलस्सुबह साहब कुछ पत्रकारों के साथ जंगल की ओर प्रस्थान कर गये। योजना, दलित—उद्धार की थी। जाकर उनसे उनकी समस्याओं के बारे में पूछा। पता चला चोरी—छिपे जंगल से लकड़ी काट कर वे दूर—दराज के इलाकों में जाकर बेचते हैं। उससे जो चार—पाँच रुपयों की आमदनी होती है, उतने में ही उनका खाना—पीना और महुए की दारू का खर्चा चलता है। लेकिन इसमें जोखिम बहुत है। वर्दीधारी लोग बहुत तंग करते हैं। मारते—पीटते भी हैं, पैसे—वैसे भी छीन लेते हैं और पकड़कर भी ले जाते हैं। यह भी पता चला कि उन दोनों नृत्यांगनाओं रक्सी और टुन्डी के भाई रेंडू को भी लकड़ी चोरी के इल्जाम में वर्दीधारी पकड़कर ले गये हैं। वे, वही नृत्यांगनायें थीं, जिनके तम्बई जिस्म की थिरकन ने सारी रात साहब को परेशान कर रखा था।

सारी बातें सुनकर साहब का मन पसीज उठा। दस रुपये की गड्‌डी से नोट निकाल—निकाल कर सभी को बाँटते हुए उन्होंने रक्सी और टुन्डी को आश्वासन दे दिया कि वे जल्दी ही रेंडू को छुड़वा देंगे।

नोट बाँट रहे साहब पर पत्रकारों के फ्लैश चमक उठे। रक्सी और टुन्डी को आश्वासन देते हुए भी साहब की आँखें उन दोनों बहनों के जिस्म के एक—एक उभार को टटोलती रही थीं। हालांकि उस वक्त उन दोनों की वेश—भूषा मेनका—रम्भा से अलग, अजीब भद्दी—सी थी — मैले—बिखरे बाल, पुरानी मैली धोती, कई जगह से फटे ब्लाउज, मतलब बेतरतीब—अल्हड़नुमा। फिर भी साहब की पारखी नजर ने तो उसी रात से उन्हें अपनी मेनका—रम्भा मान लिया था, जिस रात उन्होंने उनके नृत्य देखे थे।

अगले दिन के अखबारों ने साहब के दलित—प्रेम को अच्छा कवरेज दिया था।

साहब थे तो साहब ही। दूसरे ही दिन रेंडू को छुड़वाकर खुद अपने साथ लिये—दिये पहुँचे थे रक्सी और टुन्डी के पास। रेंडू को देखकर दोनों बहनों और उनके बूढ़े बाप की आँखें खुशी से भर आयी थीं। रक्सी और टुंडी ने अपनी कृतज्ञता के बोझ से दबी आँखें साहब के चेहरे पर टिका दी थीं।

साहब बोल पड़े थे, ”अब यह रोना—धोना छोड़ो। ...मगर रेंडू, छूटकर तो आ गया तू, पर अब करेगा क्या ?” रेंडू को सम्बोधित किया था साहब ने।

”क्या करेगा साहेब, वहीं जो करता था।”

”मतलब चार—पाँच रुपये के लिए फिर से जंगल से लकड़ी चुरायेगा ? फिर से पकड़ा गया तो ? अच्छा, तुम चारो मिलकर रोज कितना कमा लेते हो ? पन्द्रह—बीस रुपये ही न। अगर मैं तुम्हें पचास रुपये रोज की नौकरी दे दूं, तो ? तब तो.......”

इस प्रकार अपने ही विभाग की बन रही एक इमारत में साहब ने रेंडू को पचास रुपये रोज पर कैजुअल—लेबर बहाल कर लिया था। वहीं आउट—हाउस में उसके रहने की भी व्यवस्था करवा दी थी।

एक दिन साहब ने बुलवाया था रेंडू को। बोले थे, ”तुम अपने बाप और बहनों को क्यों नहीं बुलवा लेते अपने पास ? वहाँ तो वे भी वही करते होंगे, जिस जुर्म में तुम पकड़े गये थे।”

“कइसे बोलायेगा साहेब ? इत्ता रुपया में सबका खियोन—पियोन कइसे होएगा?”

”क्या ? वहाँ तो पन्द्रह—बीस रुपये में ही गुजारा हो जाता था.....”

”ऊहाँ खुद्दे दारू बनाता था, पन ईहाँ तो कीनना (खरीदना) रैता है।”

एक स्नेहिल—सी मुस्कुराहट उभर आयी थी साहब के होठों पर। पुचकार—भरे शब्दों में बोले थे, ”दारू तुमलोगों से नहीं छूटेगी। खैर, एक काम मैं कर सकता हूँ, तुम्हारी एक बहन को नौकरी दे दूंगा। उसे भी रोज के पचास मिलेंगे, मगर उसे बंगले पर रहना होगा, मेरे यहाँ। घर में झाडू—पोछा, खाना—वाना बनायेगी।”

”रैगा साहेब, काए नेई रैगा!” कृतज्ञता से रेंडू के हाथ जुड़ गये थे साहब के आगे। और साहब के होठों पर एक रहस्यमयी मुस्कुराहट इतरा उठी थी।

छोटी वाली रक्सी साहब को अधिक उपयुक्त लगी थी नौकरी के लिए। उसे ही बुलवाकर खानसामा के सुपूर्द कर दिया था उन्होंने, ताकि वह उसे खाना पकाना और घर का अन्य काम सिखा दे। उसी दिन उसके लिए नये कपड़े, साबुन, पाउडर वगैरह भी मंगवा दिया था उन्होंने।

रक्सी सचमुच काफी सलीकेदार निकली थी। सप्ताह भर में ही उसने सारा काम सीख लिया था। फिर तो साहब को अब खानसामा की जरूरत थी नहीं, सो उस रोज पता नहीं कैसे सब्जी में नमक थोड़ी अधिक पड़ गयी कि साहब हत्थे से उखड़ गये थे उसपर और सीधे बंगले से निकाल बाहर किया था उसे। हाँ, नौकरी नहीं ली थी उसकी, मगर अब उसकी ड्‌यूटी, बतौर पिउन अपने ऑफिस में ट्रांसफर कर दी थी।

रक्सी जबसे आयी थी, साहब के यहाँ, तबसे दारू की एक बूंद नसीब नहीं हो पायी थी उसे। उसका दिन तो जैसे—तैसे काम—धाम में गुजर जाता, मगर रात में जब वह ड्राइंगरूम के फर्श पर बिछी कालीन पर सोने जाती, उसकी एक—एक नस खिंचने—सी लगती। दारू की आदत बचपन से ही जो बनी रहती है उन लोगों में।

लगभग रोज ही रात में साहब को आंगन के लॉन में लाल रंग वाली दारू पीते देखकर ललचती रहती वह।

लेकिन जिस दिन खानसामा गया था, उस रात साहब ने लॉन में अपनी बैठक नहीं जमायी थी। रक्सी से बोलकर अपने कमरे में ही जग और गिलास मंगवा लिया था।

रक्सी की नजर गिलास और जग को टेबुल पर रखते हुए लाल बोतल पर पड़ी थी। उसकी आँखों में उभर आये लालच के भाव को पढ़ते हुए पूछ ही बैठे थे साहब, ”जानता हूँ, तुमलोग रोज ही पीती हो। चाहिए क्या ?”

हड़बड़ा गयी थी रक्सी! पलटकर भागना ही चाह रही थी वह कि साहब ने उसकी कलाई थाम ली थी। बोले थे, ”लजाती क्यों है ? जा अपने लिए भी गिलास ले आ।“

पहले तो थोड़ी सकपकायी थी वह, पर साहब की एक हल्की, पर मीठी झिड़की के बाद लजाती—सकुचाती सी जाकर गिलास ले आयी थी। मगर इस लाज और संकोच को अधिक देर तक ढोये नहीं रख पायी थी वह। हलक से मिक्सचर और भुने हुए काजू के साथ लाल पानी के दो—एक पैग उतरे नहीं कि पूरी तरह निःसंकोच हो गयी थी वह। फिर तो अंग्रेजी शराब की दहक से सुलग सा उठा उसका जिस्म सारी रात साहब की बाँहों में थिरकता रहा था — साहब के लिए सचमुच किसी स्वर्ग का सिंहासन बना।

और रक्सी के लिए तो इतने सारे सुखों के एवज में इतनी छोटी—सी कीमत भी भला कोई मायने रखती थी ?

उसी रात मन बना लिया था साहब ने कि वे न सिर्फ रक्सी का, बल्कि सारे जंगलियों के नस्ल को सुधार कर मुख्य धारा में ले आयेंगे।

दूसरे ही दिन मांस, मत्स्य और मदिरा के साथ आयोजित पत्रकार—सम्मेलन में साहब ने यह ऐलान किया था कि वे इन जंगलियों को मुख्यधारा में ले आने के लिए कृतसंकल्प हैं, जिसकी पहली कड़ी है — रेंडू और उसकी बहन रक्सी!

उस दिन साहब से इजाजत लेकर, साहब के द्वारा दी गयी नयी साड़ी झमका कर, रक्सी अपने भाई—बाप और बहन से मिलने गयी थी। अब तो उसका परिवार भी शहर में ही आ गया था। उनलोगों से मिलकर जब रक्सी वापस लौटी तो उसके साथ उसकी बड़ी बहन टुंडी भी थी।

साहब को यह अच्छा तो नहीं ही लगा था, पर रक्सी को नाखुश भी तो नहीं करना चाहते थे वे। मगर रात में उनका सारा गिला—शिकवा दूर हो गया था। उस रात शराब के नशे में धुत्त स्वेच्छा से उनके सपने की मेनका और रम्भा, दोनों ही उनकी बाँहों में थिरकती रही थीं। साहब के लिए इतना बड़ा सुख तो अपूर्व ही था। उन्होंने दोनों को कोठी में रहने की इजाजत दे दी थी। अपने पी०ए० से कहा था उन्होंने, ”साइट पर टुन्डी असुरक्षित महसूस कर रही थी शायद, इसीलिए यहाँ आ गयी। अच्छा ही है, अब दोनों बहनें साथ ही रहेंगी।

ऐसा नहीं कि रक्सी और टुंडी के आ जाने से साहब की संवेदना पत्रकारों से किये गये वायदे कि वे सारे जंगलियों को मुख्य धारा में लाकर रहेंगे, के संदर्भ में शून्य हो गयी थी। बिल्कुल नहीं। बल्कि अब तो वे और भी उत्साह के साथ आये दिन उनलोगों से मिलने—जुलने लगे थे। जब भी जाते, कोई न कोई ठेकेदार उनके साथ जरूर होता, साथ में पत्रकार भी। ठेकेदार इसलिए कि उनकी मदद करते हुए साहब की अपनी जेब हल्की न हो। बल्कि साहब ने तो यह तक ऐलान कर दिया था कि उन जंगलियों को मुख्यधारा में लाने के लिए उनसे जो बन पड़ेगा, वह करेंगे। यहाँ तक कि जैसे ही उनके अधीनस्थ विभागों में रिक्तियाँ होंगी, वे सभी को नौकरी भी दे देंगे।

एक दिन पता नहीं साहब को क्या सूझा कि पत्रकारों और ठेकेदार के साथ जंगल की ओर प्रस्थान करते समय उन्होंने ठेकेदार से खरीदवाकर कुछ कोल्ड—डिं्रक्स और समोसे भी रखवा लिये गाड़ी में।

उस दिन दूरदर्शन का एक पत्रकार भी अपनी टीम के साथ उनकी मंडली में शामिल हो गया था। जंगली जनजीवन पर एक वृत्तचित्र निर्माण के सिलसिले में उसने साहब से सम्पर्क किया था। शायद साहब की गदगदाहट का कारण यही था और इसी गदगदाहट में उन जंगलियों के लिए उन्होंने कोल्ड—डिं्रक्स पार्टी की व्यवस्था करवायी थी।

वहाँ पहुंचकर सभी को एक पंक्ति में खड़ा कराने के बाद उनके बीच पहले समोसे, फिर कोल्ड—डिं्रक्स खुद अपने हाथों से वितरित किये थे साहब ने।

इस बीच दूरदर्शन का पत्रकार उन जंगलियों से कुछ बातें भी करता रहा था —

‘‘तुमलोग काम पर कब जाते हो?‘‘

‘‘भोरे में, आउर केखन?(सुबह में, और कब)‘‘

‘‘आज नहीं गये?‘‘

‘‘नेई! साहेब का बाट जोहता रहा।‘‘

‘‘तुम्हें पता था कि साहब आयेंगे?‘‘

‘‘नेई, ऊ तो हरसठे आता है। (वह तो हमेशा आते हैं) रूपया देता है, चाउर (चावल) देता है।‘‘

‘‘अच्छा तुम्हें समोसा अच्छा लगा या बोतल वाला?‘‘

कईयों ने हाथ की बोतल को उठाकर लहराया।

‘‘मगर पेट तो समोसा से भरता है। फिर तुम्हें यह क्यों अच्छा लगा?‘‘

सभी एक—दूसरे की ओर देखने लगे। वी.डी.ओ. कैमरा उस पूरे दृश्य के साथ साहब के गदगद चेहरे को भी कैद करता रहा। कुछ ही दिनों बाद दूरदर्शन से वृत्तचित्र का प्रसारण हुआ। उस दिन साहब ने अपने सारे अधीनस्थ अधिकारियों को अपने यहाँ आमंत्रित कर रखा था। लेकिन यह क्या, पत्रकार ने तो अपने वक्तव्य में साहब के सारे किये—धरे पर पानी फेर कर रख दिया था —

‘‘इन आदिवासियों, अति पिछड़े लोगों को प्रशासन द्वारा मुख्यधारा में लाने के लिए जो प्रयोग किये जा रहे हैं, वे न सिर्फ अव्यवहारिक हैं, बल्कि विस्फोटक भी हैं। उन्हें समोसे और कोल्ड डिक्स की नहीं, बल्कि सही रास्ता दिखाने की जरूरत है। उनके बीच पैसे और राशन का बाँटा जाना, उन्हें काहिल बनाने की प्रक्रिया है। ये अपना काम छोड़कर साहब की प्रतीक्षा करते इसलिए नजर आ जायेंगे क्योंकि साहब के आने पर उन्हें पैसे, राशन और स्वादिष्ट पेय मुफ्त मेें ही मिल जायेंगे। इन्हें समोसे की तुलना में कोल्ड ड्रिक्स ज्यादा भाता है। कल को अगर साहब का तबादला हो गया, तब क्या होगा? मिहनत से जितनी आय होती है इनकी, उतने में तो इनकी दारू और भोजन का खर्च भी नहीं निकल पाता, फिर समोसे और कोल्ड—ड्रिक्स के लिए संभव है, इन्हें चोरी भी करनी पड़ जाय। इन सीधे—सादे लोगों में मुफ्तखोरी की आदत का डलना घातक ही होगा......‘‘

एकबारगी अपने तमतमाये चेहरे के साथ साहब ने उठकर टी०बी० बंद करते हुए कहा था,‘‘ पता नहीं अच्छे काम से लोग जलते क्यों है? खुद तो कुछ करेंगे नहीं, और.........‘‘

उपस्थित सारे अधिकारियों के चेहरे पर साहब के प्रति सहानुभूति का भाव था। पर मन में?

रक्सी और टुन्डी का अभिजात्य

साहब के इतना कुछ करने पर भी रेडू और उसका बाप जरा भी सुधर नहीं पाये थे। अब भी वे मैले—फटे कपड़ों में ही नजर आते थे। अक्सर दोनों रक्सी और टुंडी से भेंट करने बंगले पर भी आते ही रहते थे। दोनों बहनों को तो अब उन दोनों को देखने के साथ ही उबकाई—सी आने लगती थी। उनका वश चले तो अपने भाई और बाप को बंगले पर आने के लिए साफ मना कर दें। मगर क्या करें, रिश्ते को झुठला भी तो नहीं सकती थीं!

पर उस दिन तो हद ही कर दी दोनोें बाप बेटे ने—खुद तो बंगले पर आये ही, साथ में अपने चार—पाँच जंगल के साथियों को भी लेकर पहुँच गये। करमा का पर्व तो महान पर्व होता ही है उन लोगों के लिए, सो वे दोनों बहनों को नाचने—गाने के लिए आमंत्रित करने आये थे।

हालांकि करमा पर्व का नाम सुनकर रक्सी और टुन्डी के मन में हिलोर तो जरूर उठा था, मगर तुरंत उन्हें अपनी हैसियत का भी एहसास हो आया था कि अब जबकि दोनों अच्छा खाती—पहनती हैं, आलीशान बंगले में रहती हैं, फिर जंगल में जाकर आदिवासी भुच्चड़ों की तरह नाचना—गाना शोभा देगा उन्हें? सो अपने बाप का हाथ पकड़कर उसे किनारे ले जाकर बरस पड़ी थी टुन्डी,‘‘तू सब्भे को काए लाइस ईहाँ? साहेब देखिस तो भोत गोस्सा! हम ईहां से नए जा सकिस।‘‘

सचमुच जंगल के घिनौने जीवन को वे भूल कैसे सकती थीं भला! कल तक तो जंगल में लकड़ी चोरी करते समय अगर किसी वर्दीधारी की नजर पड़ जाती उनपर तो भद्‌दी—भद्‌दी गांलियों से सान देते वे उनको। बल्कि अक्सर तो उनके लात—घूसे और बलात्कार तक झेलने पड़ जाते। मगर आज साहब के वैसे ही वर्दीधारी बॉडी—गार्ड तक दोनों से अदब के साथ बातें करते हैं। जैसे उनसे नहीं, बल्कि साहब से ही बात कर रहे हों।

तो उस दिन अपने बाप—भाई और बस्ती वालों को सिर्फ निराश करके नहीं, बल्कि उनके मन को बुरी तरह तोड़ कर लौटाया था दोनों बहनों ने।

साहब के साहब उर्फ मंत्री जी

उस दिन साहब के साहब, यानी मंत्री जी का आगमन हुआ था जिले के सर्किट हाउस में। साहब देर तक बात करते रहे थे मंत्री जी से टेलीफोन पर। बात क्या, सिर्फ हाँ सर, जी सर, ओ०के० सर......‘‘

रक्सी और टुन्डी भी वहीं मौजूद थीं। दोनों, आँखें फाड़े सिर्फ अपने साहब को देखे जा रही थीं। समझ नहीं पा रही थीं कि उनके साहब का भी कौन सा साहब पैदा हो गया? कल तक तो लोग उनके साहब को ही सर—सर किये रहते थे, मगर साहब किसे सर कह रहे हैं.........

रिसीवर रखते हुए साहब के चेहरे पर परेशानी उभर आयी थी। तभी उनकी नजर रक्सी और टुन्डी पर पड़ी थी। अचानक होठों पर एक रहस्यमयी मुस्कुराहट उभर आयी थी उनके। इसके साथ ही उठे थे वे और तेजी से उठकर ड्राइवर को आवाज लगाते हुए अपने बेडरूम में घुस गये थे। कुछ देर बाद एक ब्रीफकेस लिये बाहर निकल गये थे।

रक्सी और टुन्डी हैरत—भरी आँखों से उन्हें देखती ही रह गयी थीं।

सर्किट हाउस में मंत्री जी और साहब आमने—सामने बैठे हुए। साहब का चेहरा और लहजा खुशामदी! मंत्री जी की ओर ब्रीफकेसा बढ़ाते हुए, ‘‘सर!‘‘

‘‘हाँ—हाँ देख लिये! केतना है?‘‘ मंत्री जी का अनुत्साहित लहजा!

‘‘पाँच सर!‘‘

‘‘का? सिरफ पाँच लाख? अइसे मेें तो आप, सब चउपट कर के रख दीजिएगा महराज! जानते हैं, इलिक्शन कब है? छौ—सात महिन्ना रह गया है, आउर आपका ई हाल है? तब तो आप जिता दिये सरकार को। महराज आपको तो साहब नहीं, चपरासी होना चाहिए.........‘‘

‘‘सर!‘‘

‘‘का सर—सर किये हैं?‘‘

‘‘सर, मेरी बात सुनिये तो!‘‘

‘‘अच्छा कहिये, जरा सुनिये लें।‘‘

‘‘सर, पूरी कमिशनरी में लगभग ढाई सौ फोर्थ—ग्रेड का पद रिक्त है। मैंने पदों के अनुमोदन के लिए आपके पास रिकोमेन्डेशन भी भेज रखा है। अगर आप अनुमोदन कर के भिजवा दें तो बीस—पच्चीस लाख तो चुटकियों में आ जायेंगे....।

‘‘ऊ तो ठीक है, हम लौट के आपका ई काम कर देते हैं, पर इसके पहिले आप कम से कम पाँच का इंतजाम आउर कर दीजिए!

साहब मौन! सिर्फ 'सर' सम्बोधन होठों पर।

‘‘ठीक है, आप इंजाम कीजिए, तब तक हम दू—चार जगह आउर इंपेस्सन करके हप्ता भर में आते हैं। आउर याद रहे, इलिक्शन का सब भार आप ही पर है। जीतना हमरा ही कंडीडेट चाहिए।‘‘

‘‘सर!.... सर बेफिक्र रहें सर! इलाके का एक—एक गुंडा और वह जितेन्द्र सिंह है न, वही उग्रवादियों का सरगना, सभी मेरी मुट्‌ठी में है।........... अच्छा सर, आज रूकेंगे नहीं?“ होठों पर रहस्य—भरी मुस्कुराहट और आँखों में खास आमंत्रण का आग्रह।

‘‘काहे?‘‘ फिर साहब की आँखों में कुछ पढ़ते हुए, एक निर्लज्ज मुस्कुराहट के साथ बोले थे, ”रूकियो सकते हैं, अगर कुछ इंजाम—बात हो।‘‘

‘‘इसी से तो कह रहा हूूँ सर। हें हें हें हें .......... । तो शाम को भिजवा दूं?‘‘

‘‘का बात करते हैं आप ? पगला उगला गये हैं का? ईहाँ भेजवाईयेगा? का चाहते हैं, इलिक्शन के टैम में देखार हो जाएँ?.... अइसा करिये कि सांझ को अपना घर पर खाना रखिये। ऊहें बोलवा लीजिए उसको। मगर माल ठीक है न!‘‘

‘‘क्या बात करते है सर! देखियेगा तो मस्त हो जाइयेगा। दो माल छँटवा कर रखूंगा। आपको जो पसंद आ जाये........। अच्छा तो सर, शाम को हाजिर होता हूँ।‘‘ इसके साथ ही साहब मंत्री जी के पैरों में झुक गये थे।

‘‘ठीक है, ठीक है, जाइये खुस रहिये, एकदम से दनदनाते रहिए।‘‘

मंत्री जी का आशीर्वाद पाकर प्रफुल्ल—मन लौट पडे़ थे साहब।

वहाँ से लौटकर रक्सी और टुंडी को समझाना शुरू किया था साहब ने‘‘ तुम दोनों को शायद पता नहीं कि मेरे ऊपर भी एक साहब हैं। रक्सी, तुम्हारी नौकरी अभी पक्की नहीं है। कभी भी जा सकती है। मतलब आज तुम बंगले में रहती हो, मगर कल को अगर तुम्हारी नौकरी छूट गयी, तो फिर से जंगल में जाकर रहना पड़ सकता है।‘‘ इतना बोलकर वे दोनों के चेहरे पढ़ने लग गये थे, जिनपर खौफ की एक गहरी पर्त सी उभर आयी थी। साहब की भाषा अब अच्छी तरह समझने लग गयी थीं दोनों।

लोहा गर्म देखकर पुनः वार किया था उन्होंने ‘‘मगर डरने की बात नहीं है। मेरे जो साहब हैं, वे बहुत अच्छे हैं। वे अगर चाहें तो रक्सी के साथ—साथ टुंडी और रेंडू, सबको पक्की नौकरी दे सकते हैं। फिर कभी कोई तुमलोगों की नौकरी नहीं छीन सकता।‘‘

‘‘तो तुम अपना साहेब से कहेगा न साहेब?‘‘ रक्सी और टुन्डी के समवेत स्वर!

‘‘हाँ भइ, कहूँगा कैसे नहीं। मगर तुम दोनों को एक काम करना होगा। शाम को मेरे साहब यहीं खाना खायेंगे। उस समय तुम दोनों खूब सज—संवर कर रहना। बस साहब जैसा कहें, करती रहना। उन्हे खुश कर देगी तो साहब तुम्हारा काम जरूर कर देंगे। मैें खुद करवा लूंगा..........‘‘

उन दोनों को भला इसमें क्या आपति हो सकती थी? जो सुख उन्हें प्राप्त था, उसे बरकरार रखने के लिए तो वे कुछ भी कर सकती थीं।

शाम को जब रक्सी और टुन्डी की नजर मोटे—थुलथुल काले—कलूटे तोंदुल मंत्री जी पर पड़ी, मन अजीब कसैला—सा हो उठा दोनों का । मन ही मन अपने इष्ट देवता से दोनों प्रार्थना करती रहीं कि साहब के साहब को वह नहीं, उसकी बहन पसंद आ जाय!

मंत्री जी ने छोटी वाली रक्सी को ही पंसद किया था। पूरे तीन—चार घंटे तक रक्सी रही थी मंत्री जी के साथ। मगर उन तीन—चार घंटों के लिजलिजे एहसास को रक्सी शायद ही तीन चार जन्मों तक भूल पाये। फिर भी वह खुश थी कि अब उसकी पूरी जिन्दगी ऐशो—आराम से कटेगी।

राजधानी लौटने के साथ ही मंत्री जी ने थर्ड—ग्रेड की नियुक्तियों का आदेश साहब के पास भिजवा दिया था। नियुक्तियों की सारी जिम्मेवारी साहब ने अपने पी०ए० के सुपूर्द कर दी थी, इस आदेश के साथ कि एक भी नियुक्ति बिना पच्चीस हजार के चढ़ावे के नहीं हो सकती। हाँ इतनी उदारता जरूर बरती थी उन्होंने कि रक्सी, टुन्डी और रेडू के लिए तीन रिक्तियाँ आरक्षित करवा ली थीं कि उन ढाई सौ रिक्तियों में से तीन किसी भी कीमत पर न भरी जायें।

तीन को छोड़कर बाकी की सारी रिक्तियों पर नियुक्तियाँ सम्पन्न हो गयी थीं। अब सिर्फ रक्सी, टुंडी और रेंडू ही शेष रह गये थे। अभी साहब उन तीनों के नियुक्ति पत्र तैयार करने का आदेश निर्गत ही करने वाले थे कि मंत्री जी का फोन घनघना उठा था, ”देखिये, हम पाँच ठो कंडीडेट भेज रहे हैं, उनको भी बहाल कर लीजिएगा।‘‘

साहब की गिड़गिडाहट, ‘‘सर, नियुक्तियाँ तो सारी की सारी हो चुकीं।‘‘

‘‘का कहे? हो चुका?....... देखिये नबाबी मन छाँटिये। पाँचों में तीन ठो तो हमरा रिलेटिभे है। तीनों का तो होनाइये चाहिए, न तो बूझियेगा!‘‘ बोलकर रिसीवर क्रेडिल पर पटक दिया था मंत्री जी ने।

मरता क्या न करता। हारकर रक्सी टुंडी और रेंडू वाली जगहें मंत्री जी की झोली में डालना ही पड़ा था साहब को।

चुनाव का मौसम और साहब

चुनाव के अब गिने चुने कुछ ही दिन रह गये थे। मगर लग ही नहीं रहा था कि चुनाव साहब नहीं बल्कि सतारूढ दल के बनवारी बाबू लड़ रहे हैं। बल्कि गुंडे और उग्रवादियों की अपनी फौज को साफ हिदायत दे दी थी साहब ने कि वे मानकर चलें कि चुनाव बनवारी बाबू नहीं, बल्कि उनलोगों के साहब लड़ रहे हैं.........

मगर बुरा हो चुनाव आयोग का कि विपक्षियों की समवेत शिकायत और अपने द्वारा करायी गयी जांच के आलोक में साहब पर यह आरोप लगाते हुए कि किसी खास पार्टी के पक्ष में वे अपने अधिकारों का दुरूपयोग कर रहे हैं, जो सरासर गैर— जिम्मेदाराना हरकत ही नहीं, बल्कि अपराध तुल्य है, साहब को रातों—रात क्लोज करवा कर राजधानी के मुख्यालय में भिजवा दिया।

वैसे इस बार पूरे राज्य मेें सतारूढ़ दल के विपरीत हवा तो चल ही रही थी, फिर साहब अपनी जगह पर बने रहते अथवा नहीं, उनके द्वारा खड़ी की गयी गुंडे—मवालियों की फौज भी इस बार उनका साथ देती या नहीं, यह भी संदिग्ध ही था। क्याेंकि हवा के रूख की पहचान तो उन्हें भी थी ही और उनकी गुंडागर्दी की दुकान तभी चल सकती थी, जब हवा सताधारी दल के पक्ष में होती! ऐसे में जब हवा वर्तमान सतारूढ़ दल के विपरीत चल रही थी, तब उनके लिए तो यही मुनासिब था कि वे भी हवा के रूख के साथ ही बहते चलें।

चुनाव समाप्त हो गया था। सतारूढ़ पार्टी की करारी हार हुई थी और राज्य सता विरोधी पार्टी के हाथ में आ गया था। फिर तो नयी सरकार ने रातोंरात प्रशासन तंत्र में हड़कम्प मचा कर रख दिया था। पिछली सरकार के पिट्‌ठू जितने भी पदाधिकारी, पुलिस और प्रशासन में थे, सभी को सारे सुखों से वंचित कर सचिवालय में ठूंस दिया गया तथा पिछली सरकार से त्रस्त पदाधिकारियों को मुख्य—मुख्य जगहों पर पदस्थापित कर दिया गया।

बेचारे साहब भी सचिवालय की शोभा बढ़ाने वालों में एक थे। उस दिन जब अपना बोरिया—बिस्तर समेटने के लिए साहब राजधानी के मुख्यालय से अपने सरकारी बंगले पर पहुँचे, रक्सी और टुन्डी उनको, बेसब्र प्रतीक्षा में मिलीं। आने के साथ ही टुन्डी पूछ बैठी,‘‘ आप तो कहिस था साहेब कि दुई रोज में घूर के वापस आयेगा, पन.......‘‘

अचानक विफर उठे थे साहब उस पर, ”तुमलोग मुझे सांस भी लेने दोगी या नहीं? अभी आया नहीं कि लगी सर खाने। अब खड़ी खड़ी मुँह क्या देख रही हो? जाओ यहाँ से।‘‘

सकपकाहट से दोनों बहनों के चेहरे और भी मासूम हो उठे थे। जबसे वे आयी थीं यहाँ, तबसे शायद पहली ही बार साहब की डाँट सुननी पड़ी थी उन्हें। दोनों की आँखों में आंसू छलछला आये थे। चुपचाप वे हट गयी थीं साहब के पास से।

नये वाले साहब आकर सर्किट हाउस मे टिके थे। चार्ज—वार्ज देने के चक्कर में पुराने साहब दो दिनों तक टिके रहे थे वहाँ। इन दो दिनोें में उन्हाेंने रक्सी और टुन्डी से भी कोई सम्पर्क नहीं रखा था। और जिस दिन जाने लगे थे, उस दिन दोनों बहनें हसरत भरी निगाहों से उन्हें देखती ही रह गयी थीं। उनके चले जाने के बाद साहब के खास पिउन रामाश्रय से पूछा था दोनों ने, “साहब कब आयेगा, तुमको पता?

‘‘लो, ई भी नहीं बताया उन्हाेंने? ऊ तो गये। अब कहियो नहीं आयेंगे।” दोनों को सिर से पैर तक अपनी पैनी नजरों से घूरते हुए बोला था रामाश्रय।

”का?‘‘ सीना धक्क से कर उठा था दोनों का।

नये वाले साहब बंगले मे आ गये थे। आने के साथ ही रक्सी और टुंडी को निकाल बाहर किया था उन्होंने। अपने साथ अपना निजी खानसामा लेकर ही आये थे वे। दोनो की गिड़गिड़ाहट को कोई तबज्जो नहीं दिया था उन्होंने। दोनों बहनें तो आकाश से जमीन पर आ गिरी थीं। अब कौन सा मुँह लेकर वे जंगल में अपने लोगों के पास जायेंगी, इसकी भी चिन्ता सताने लगी थी उन्हें। वह दृश्य भी आँखों के आगे उभर—उभर कर उनके मन में कचोट पैदा करने लगा था, जब करमा पर्व के अवसर पर आमंत्रित करने आये अपने बस्ती वालों का मन तोड़ कर वापस किया था दोनों ने।

लेकिन खाता को राम देता!.......... ऐसे आड़े वक्त मे आखिर रामाश्रय ने सहारा दे ही दिया था उन्हें। उसका परिवार तो गाँव में रहता था, सो दोनों को उठाकर अपने डेरे में पनाह दे दी थी उसने, मगर अपनी कुछ खास शर्तों के साथ।

उधर बिल्डिंग का काम भी समाप्त होने को चला था। उसमें अधिक मजदूरों की जरूरत थी नहीं, सो रेडू को भी काम से निकाल दिया गया था। रेंडू और उसका बाप गुहार लगाने साहब के बंगले पर पहुँचे। वहाँ साहब के तबादले का पता चला उन्हें। बेटी के हाल का भी पता चला उन्हे रामाश्रय से। रामाश्रय के साथ आकर दोनों बाप—बेटे रक्सी और टुन्डी से भी मिले। दोनों को जंगल में लौट चलने को भी कहा।

मगर अब वे कहाँ लौटने वाली थीं। अब तो फिर से उनके पुराने वाले दिन काफी हद तक लौट आये थे — रामाश्रय की कृपा से रोजाना की उनकी रातें किसी न किसी होटल में किसी ठेकेदार के साथ हँसी खुशी में गुजरने लगी थीं। वह भी शराब कबाब के साथ। कुछ दिनों तक तो वे रामाश्रय के घर में रही थीं, मगर बाद मे रामाश्रय ने उनके लिए अलग रहने की व्यवस्था कर दी थी। जहाँ अब शहर के गुण्डा मवाली और मनचलों का आना—जाना भी शुरू हो गया था।

साहब तो साहब ही है

सचिवालय का वह छोटा सा कार्यालय साहब को बिल्कुल रास नहीं आ रहा था। वहाँ के तो उनके अधीनस्थ क्लर्क—स्टेनों से लेकर चपरासी तक, सारे के सारे नम्बरी बदतमीज थे। चपरासी तो दिन भर तम्बाकू ही ठोकता रहता। क्या मजाल कि साहब अपने पैसे देकर भी उससे घर की सब्जी तक मंगवा लें। जानते तो थे ही सभी कि सचिवालय में वैसे ही साहबों की पोस्टिंग होती है, जिनसे सरकार नाखुश होती है। फिर हल्की—फुल्की गलती पर भी ऐसे साहबों की लताड़ लगाने के लिए अक्सर मंत्री जी की तलब लगी ही रहती है। और गलती न हो, इसलिए साहब को अपने किरानी बाबुओं से पुचकार भरे लहजे में ही बात करनी होती है। मंत्री जी से साहब यह तो शिकायत कर नहीं सकते कि किरानी उनकी बात नहीं मानता। अगर उलट कर कह दे किरानी कि मैंने तो फाइल भेजी थी, साहब ने उसे बैरंग लोटा दिया, तो? फिर लम्बे समय से सचिवालय मेें रहने के कारण दफ्तर के चपरासी तक मंत्री जी के कार्यालय में अपनी गोटी फिट रखने का गुर तो जानते ही थे।

मसलन यहाँ आकर साहब तो चपरासी से भी बदतर होकर रह गये थे। मगर साहब थे तो साहब ही। अपनी मनपंसद जगह में पोस्टिंग कैसे करायी जाती है, इसका नुस्खा तो वे जानते ही थे। फिर मंत्री जी के दरवाजे में हाजिरी लगाते रहने के क्रम मे उनके पी० ए० से अच्छी पहचान बना ली थी उन्होंने और एक दिन पी०ए० से मशविरा के बाद नोटों से भरी एक अटैची लेकर जा पहुँचे थे मंत्री जी के दरबार में। उस दिन मंत्रीजी काफी खुल कर मिले थे साहब से और आश्वासन भी दे दिया था कि उनका काम हो जायेगा।

आखिर थे तो साहब साहब ही न। और जब वे साहब थे ही, तो साहबी तो उनकी जागीर थी ही............

इन दिनों रक्सी और टुंडी ने अपनी बस्ती की कुछ और लडकियों को भी बुला लिया है अपने पास! अक्सर उन लडकियों को शहर के बस स्टैन्ड, रेलवे स्टेशन आदि के पास बन संवर कर घूमते देखा जा सकता है। अब उन्हें कोई तकलीफ नहीं हैंं। यह आशंका भी नहीं कि कल को फिर से जंगल में लौटना पड़ेगा उन्हें। हाँ, कभी कभार पुलिस बगैरह का लकड़ा जरूर पड़ जाता है उन्हें। मगर जंगल में भी वे इन खतरों से महफूज कहाँ थीं? बल्कि अब अगर ऐसे जोखिम उठाने भी पड़ते हैं तो सुख भी तो कम नहीं मिलता। रही बात उनके बस्ती के लोगों की, तो उन लड़कियों की मदद से अब उन्हें भी कोई खास दिक्कत नहीं थी।

इस प्रकार जंगल से उठा कर साहब ने उन्हें शहर तो पहुँचा ही दिया था। शायद उन्हें मुख्यधारा में लाने का साहब के द्वारा किया गया प्रयोग सफल हो गया था.....।

या फिर उनके नस्ल—सुधार का फार्मूला ही।

कबाब

अपनी श्रीमती जी को गरमागरम चाय की फरमाईश के साथ कागज पर कलम साधने की मुद्रा में आया ही था कि सत्यानाश हो मुए अमरनाथ के नौकर श्री सुरेश प्रसाद जी का, जिसने आकर ऐसी खबर सुनायी कि दिमाग में प्रसव वेदना से ब्याकुल सारे विचार दिमाग में ही घुसड़कर रह गये और मेरी समस्त चेतना को झकझोरता तथा आँखों को गीला करता अमरनाथ आँखों के सामने साक्षात—सा उपस्थित हो आया।

आपको अचरज हो रहा होगा कि एक अदने से नौकर के नाम के पूर्व मैंने ‘श्री' और अंत में ‘जी' जैसे आदर सूचक सम्बोधन का प्रयोग क्यों किया। अजीब तो मुझे भी लगा था, जब पहली बार अमरनाथ के मुँह से अपने नौकर के लिए श्री सुरेश प्रसाद जी के पुचकार और आदर से परिपूर्ण सम्बोधन को सुना था। मगर इस सम्बोधन पर स्पष्टीकरण फिर कभी। फिलहाल तो नौकर द्वारा प्राप्त दोहरे आघात भरी सूचना ने बुरी तरह झकझोर कर रख दिया था। पहला आघात यह कि अमरनाथ अब इस संसार में नहीं रहा और दूसरा यह कि उसे दिवंगत बनाने वाला, यानी उसका हत्यारा, कोई और नहीं, बल्कि उसके स्वयं का ही परमप्रिय सुपुत्र सुजीत था।

फिर क्या था — कागज—कलम समेट कर यथा—स्थान रखते हुए जल्दी—फल्दी में कपड़े बदल कर भागा था मैं अमरनाथ के घर की ओर। मन में एक ही भूचाल—आखिर हत्या क्यों की सुजीत ने अपने बाप की..............

पर इस किस्से को सविस्तार आगे के लिए छोड़ता हूँ। फिलहाल तो समस्या यह थी कि बेचारे अमरनाथ के पार्थिव शरीर को अंतिम तन्दूर तक पहुँचाने की तैयारी में जुट जाया जाय।

जी हाँ, अंतिम तंदूर ही! वह इसलिए कि जिन्दगी के आखिरी क्षण तक तंदूर तो बना ही रहा था उसका पल क्षण। और जिस तंदूर में लगातार कबाब की तरह सिंकता रहा था वह।

मेरे पहुँचने तक आनन—फानन में ही जनाजे के उठने की सारी प्रक्रियायें सम्पन्न हो चुकी थीं। प्रक्रियायें क्या — न किसी रिश्तेदार के आगमन की प्रतीक्षा, न किसी आत्मीय के, बस आस—पड़ोस के चार कंधाें पर सवार होकर प्रस्थान कर गये थे अमरनाथ बाबू अपने अंतिम तंदूर की ओर। अब सुपुत्र महोदय पूरे सम्मान के साथ बाप की विदाई की तैयारी करते या अभी तक आँखों के आगे झूल रहे पुलिस के फंदे के खौफ से मुक्ति का उपाय करते? जबकि मरते—मरते भी अमरनाथ ने अपने बयान में पुत्र के प्रति अगाध प्रेम का परिचय देते हुए सुजीत को पूर्णतः दोषमुक्त तो कर ही दिया था। बावजूद इसके, पुत्र महाशय की आँखों के आगे से अब तक पुलिसिया खौफ का बादल छँट कहाँ पाया था।

खैर, तो रईसों के रईस श्रीमान अमरनाथ जी पूरी शान के साथ चार कंधों पर सवार ‘राम नाम सत्य है' की धुन पर कंधों की उचकन के साथ थिरकते हुए प्रस्थान कर ही गये थे अपनी अंतिम यात्रा पर।

लीजिए, फिर से एक रहस्य रच दिया मैंने। — रईसों के रईस! अब इस रहस्य को भी साफ कर ही दूं कि जब मैने अमरनाथ को ‘रईसों के रईस' की संज्ञा से विभूषित किया है, तो फिर जीवन के अंतिम क्षण तक वह कबाब की तरह सिंकता क्यों रहा।

दरअसल कबाब की तरह सिंकते रहना उसके जीवन का उत्तरार्द्ध काल था और पूर्वार्द्ध का तो पूछिये ही मत। यानी जब तक नौकरी में रहा अमरनाथ, अगर उन दिनों खुद वाजिद अली शाह भी जीवित होते तो उसकी जीवनशैली को देखकर जल—भुन कर कोयला हो गये होते। क्या यारों का यार था वह। मसलन, जो यार थे उसके, वे तो थे ही, नये—नये यारों को अपना मुरीद बनाते रहने की काबलियत भी कम नहीं थी उसमें। लेकिन अधिकांश यारों से घर के बाहर तक ही वास्ता रखा करता था वह। घनिष्टों में घनिष्ट शायद एकमात्र मैं ही था उसका। और शायद वह भी, जिसके साथ, अपनी श्रीमती जी से छुप—छुपाकर वह इश्क की पेंगे लिया करता था। स्वाभाविक था कि अपनी प्रेयसी के साथ पेंगों का चक्कर भी घर के बाहर तक ही सीमित था उसका। इस प्रकार शायद एकमात्र मैं ही था, जिसके साथ वह पूरी तरह अंदर बाहर से खुला था। एक बार तो मुझसे आत्मीय संबंधों का लाभ उठाते हुए उसने अपनी ‘धप्पो—गोटी' यानी प्रेयसी पर धौंस दिखाने के लिए अपने नाम से एक कहानी भी लिखवा ली थी। वैसे कहानी सिर्फ सुनायी होगी उसने अपनी धप्पो—गोटी को। क्योंकि प्रकाशित रूप में कहानी मेरी नजरों से कभी नहीं गुजरी। हाँ, एक दिन हस्तलिखित कहानी के आखिरी पृष्ठ के पृष्ठभाग पर अपनी धप्पो गोटी के हाथ से लिखी टिप्पणी जरूर दिखायी थी —

‘कहानी पढ़कर बहुत—बहुत आनन्द प्राप्त की,

बड़ी ही अच्छी कहानी लिखते हैं कहानीकार जी।'

वैसे उसकी पे्रयसी के लिए ‘धप्पोगोटी' सम्बोधन मेरा इजाद किया हुआ नहीं है। जब भी प्रेयसी का जिक्र करता वह, ‘धप्पोगोटी' सम्बोधन से ही।

खैर, तो उसकी धप्पो—गोटी पर चर्चा फिर कभी, अगर मौका मिला तो। फिलहाल तो.........

इंसान का मस्तिष्क भी विचित्र ही होता है। कहाँ तो मातमी माहौल में मैं शवयात्रा में शरीक हूँ और कहाँ अमरनाथ के रईसी के किस्से अमरनाथ का भूत बनकर दिमाग से उतरने का नाम ही नहीं ले रहे —

सचमुच, क्या ठाठ थे उसके उस जमाने में। सुबह से शाम तक क्या मजाल कि उसके पैर एक पल के लिए भी रिक्शे से उतरते होंगे। पता नहीं जब वह घर मेें रहता होगा या दफ्तर में ही, उस समय भी उसका खास रिक्शा अपने चालक मंसूर के साथ उसकी प्रतीक्षा में बाहर खड़ा रहता होगा या नहीं। इसलिए कि मंसूर अपने रिक्शेे के साथ जब भी नजर आया था मुझे या तो रिक्शे पर सवार अमरनाथ के साथ, या फिर उसके घर के बाहर उसकी प्रतीक्षा करता हुआ। इतना ही नहीं, रास्ते में अगर चाय या पान की तलब लग जाती उसे, तो मंसूर भी उसके साथ चाय—पान में शरीक जरूर होता और उस दरम्यान अगर कोई मित्र परिचित मिल जाता तो उसे भी उपकृत करने में कोताही नहीं बरतता। हाँ, उसके शौक में शराब—सेवन भी पूरी अहमियत के साथ शामिल था। पर शराब वह घर के अंदर ही पीता था। वह भी रात में। शायद इसलिए कि एक तो वह मित्र परिचितों के बीच शराबी के तौर पर बदनाम सिद्ध नहीं होना चाहता था और दूसरे, घर के अंदर उसे मन—मुताबिक चखना भी उपलब्ध हो जाता था। सचमुच उसका नौकर श्री सुरेश प्रसाद जी क्या लजीज मटन—कबाब पकाया करता था........... कि जो खाये, उंगलियाँ चाटता ही रह जाय।

उन दिनों एक चर्चा पूरे देश के अखबारों की सुर्खियाँ बनी हुई थी........ कि फलाने राज्य की ढिमाकी महिला मुख्यमंत्री ने अपने घर में लजीज कबाब बनाने वाले रसोईये की हुनर से खुश होकर उसे साहित्य और संस्कृति कोटे से एम०एल०.सी० बनवा दिया। राज्य के साहित्यकार और संस्कृतिकर्मियों की एक जमात में इस बात को लेकर खासा रोष था और सभी ने इस बात को लेकर हाईकोर्ट में याचिका भी दायर कर दी थी।

उन्हीं दिनों एक शाम जब अमरनाथ के साथ मैं भी शराब का लुत्फ उठा रहा था, तभी मुँह में कबाब का टुकड़ा डाल कर उस घटना का जिक्र करते हुए बोला था अमरनाथ, “तो मुख्यमंत्री महोदया ने गलती क्या की? कम से कम नमकहरामी तो नहीं की उन्होंने अपने कबाब स्पेशलिस्ट के साथ। लोगों को भला क्या पता कि जो कबाब बनाता है, उसे खुद भी कबाब की तरह सिंकना पड़ता है। अब उसकी मालकिन ने जरा उसे इनाम क्या दे दिया कि चले आये लोग कबाब में हड्डी बनने। लेकिन लोगों को शायद पता नहीं कि जो कबाब के शौकिन होते हैं, वे कबाब में पड़ गयी हड्डी को निकालकर खाने में भी माहिर होते हैं।........एक बात कहूँ कवि जी! अगर मेरे वश में होता तो मै भी अपने सुरेश प्रसाद को कुछ वैसा ही तोहफा देता। साला, क्या मजेदार कबाब बनाता है। है कि नहीं? हा हा हा हा...............“

वैसे एक बात तो जरूर है कि किस्साये कबाब तो पूरी कायनात के चप्पे—चप्पे पर छाया होता ही है — कुछ कबाब सेंकते है कुछ कबाब की तरह सिंकते है और कुछ ऐसे भी हैं, जो लजीज कबाब का सिर्फ लुत्फ उठाते हैं।

बहरहाल, मारिये गोली कबाब को। तो धीरे—धीरे मैं अमरनाथ का काफी घनिष्ट होता गया था। कुछ ही दिन हुए वह हमारे सामने वाले मकान में बतौर किरायेदार रहने आया था। शुरू—शुरू में तो हमारे सम्बंध सामान्य पड़ोसीनुमा ही थे — घनिष्टता बढ़ाने की पहल उसी ने की थी —

एक दिन शाम को कहीं से घूम—फिर कर लौट रहा था मैं। अभी घर का बरामदा चढ़ने को ही था कि पीछे से अमरनाथ की आवाज सुनायी पड़ी थी मुझे, ”अरे कवि जी। कभी इस गरीब की झोंपड़ी का भी रूख कर लिया करो।“ यहाँ स्पष्ट कर दूं कि मैं कवि नहीं, कथाकार हूँ। अमरनाथ को इस बात की जानकारी भी थी। पर सम्बोधित वह मुझे कवि जी से ही करता था।

खैर, तो बरामदा चढ़ना छोड़कर मैं उसके पास पहुँचा था। अभी कुछ बोलना ही चाह रहा था कि मेरी बात को अनसुनी करता पूरी बेतकल्लुफी से पूछ बैठा था, ”अरे छोड़ो भी इधर—उधर की बातें, पहले यह बताओ कि तुम्हें सिर्फ चाय—दूध ही चलता है या कुछ ठंडा—कड़वा भी?“

लीजिए, नेकी और पूछ—पूछ ? वैसे था तो मैं यदा—कदा का ही शौकीन, फिर भी अगर कोई मुफ्त का शराब ऑफर कर दे, तो न का तो सवाल ही नहीं उठता था।

फिर भी थोड़ा संकोच प्रदर्शित करते हुए बोला था, ”हाँ, कभी—कभार, मगर लत बिल्कुल भी नहीं है।“

”ये हुई न बात! तो फिर हम यहाँ क्यों खड़े है, चलते है अंदर।“

रिक्शा—चालक मंसूर भी अपने रिक्शे के साथ वहीं खड़ा था। हमें अंदर की ओर बढ़ते देखकर पूछा था उसने, ”सर, हम जायें?“

”अरे ठहरो भी!“ फिर एक दस का नोट मंसूर को थमाते हुए बोला था, ”इतने में तुम्हारे लिये अद्‌धा तो हो ही जाएगा।“

नोट थामते हुए खीसें निपुर गयी थीं उसकी।

ड्रांइगरूम में पहुँचकर अपनी श्रीमती जी को आवाज लगायी थी उसने, ”अरे अलका जी! देखिये तो कौन आया है? सामने वाले कवि जी।“

अलका जी उपस्थित हो आयी थीं वहाँ। उनके पीछे—पीछे उनका नौकर भी।“

नौकर पर नजर पड़ते ही पूछ बैठा था अमरनाथ, ”तब श्री सुरेश प्रसाद जी! आज क्या है चखने में?“

”जी, कबाब!“

”तो जाइये, लेकर आइये और हाँ गिलास दो लाइयेगा।“ चेहरे पर स्मित खिलाये सुरेश अंदर चला गया था।

पूछ ही बैठा था मैं, ”यार, तुम तो नौकर को भी पूरे आदर के साथ सम्बोधित करते हो।“

”हाँ देखिये न, सिर पर चढ़ा रखा है इन्होने इसे।“ अमरनाथ की जगह अलका जी ने जवाब दिया था।

इस पर बोला था अमरनाथ,“लो और सुनो। तुम ही बताओ कवि जी! किसी को दुलार—पुचकार देना सिर पर चढ़ाना होता है क्या? पूछो इनसे कि वह घर के काम में कोई कोताही करता है? नहीं न! फिर? देखा ही होगा तुमने कि मेरा थोड़ा सा प्यार पाकर उसका चेहरा कैसे खिल उठा था। लेकिन इन्हें यह सब अच्छा नहीं लगता। जानते हो क्याें! इसलिए कि अलका जी सरकारी स्कूल में मास्टरनी हैं न। दिन भर हाथ में छड़ी लेकर बच्चों पर धौंस जो जमाती रहती हैं। हा हा हा हा हा..........

चेहरा खिसियाना—सा हो आया था अलका जी का। उठकर चुपचाप खिसक गयी थीं वह वहाँ से

उनके जाने के बाद अमरनाथ आलमारी से हि्‌वस्की की बोतल निकाल लाया था। थोड़ी ही देर में गिलास, पानी और कबाब, सबकुछ रख गया था सुरेश।

पहली चुस्की के साथ मेरे मन में एक जिज्ञासा उठी थी। पूछ ही बैठा था, ”यह रिक्शा तुम्हारा है क्या?“

”कमाल करते हो कवि जी तुम भी। मैं तुम्हे रिक्शा वाला नजर आता हूँ क्या?“

”नहीं—नहीं, मेरा मतलब है कि रिक्शा तुम्हारे खुद का है और मंसूर को बतौर चालक नौकर रख रखा है तुमने।”

”नहीं भाई, रिक्शा हन्ड्रेड—परसेन्ट मंसूर का है। बल्कि उसका भी नहीं, उसके मालिक का, जो रोजाना का चालीस रूपये भाड़ा वसूलता है उससे।“

”अच्छा, तब तो तुम्हें भी रोजाना अच्छा—खासा भाड़ा चुकाना पड़ता होगा मंसूर को। हमेशा तो तुम रिक्शे पर ही सवार होते हो। इससे अच्छा तो यह होता कि तुम एक स्कूटर खरीद लेते।“

”लो, और सुनो। यार कवि जी, अपनी रचनाओं में तो तुमलोग गरीबों के मसीहा नजर आते हो, पर बात करते हो उनके पेट पर लात मारने की। भइ, सारे रिक्शा चढ़ने वाले अगर स्कूटर ही खरीद लें, तो इन रिक्शेवालों का क्या होगा? ऊपरवाले ने अगर चार पैसों की कमायी दी है मुझे, तो क्या मंसूर जैसे लोगों का उसमें हिस्सा नहीं बनता? मंसूर तो फिर भी सीने पर रिक्शा खींच कर पैसे लेता है। पर बटेसर?..अरे मेरे ऑफिस का चपरासी? वह तो सरासर चूतिया समझता है मुझे। चाय या पान के लिए दस का नोट दूं उसे या पाँच का, क्या मजाल कि छुट्‌टे वापस कर दे। पर, फिर वही सोचता हूँ कि शायद ऊपर वाले ने मेरी कमायी मे ंउसका भी हिस्सा मुकर्रर कर रखा हो।“

अभी पता नहीं वह और क्या—क्या बकता रहता कि तभी उसका सात—आठ वर्ष का बेटा सुजीत अंदर से आकर उसकी गोद में बैठ गया था। उसके पीछे—पीछे अलका जी भी गरमागरम कबाब की दूसरी खेप के साथ। ट्रे टेबुल पर रखती हुर्इं मुझसे मुखातिब हुई थी वह, ”भाई साहब, आपको यह सब कब से चलने लगा?“

अभी मैं कुछ बोलता कि अमरनाथ ने ही जवाब दिया था,”अरे नहीं............बस मेरा मन रखने की खातिर आ गया। क्यों कवि जी?“

अब मैं क्या जवाब देता। सिर्फ मुस्कुरा भर दिया था।

तभी सुजीत अपने बाप से फरमाईश कर उठा था,”पापा मुझे दस रूपये चाहिएं।“

”दस रूपये? क्यों कल ही तो दस रूपये लिये थे।“

”वो तो खर्च हो गये।“

”खर्च हो गये? सारे के सारे पैसे? देखो बेटे, पैसे की कीमत समझा करो।“

तभी बाप बेटे के बीच अलका जी टपक पड़ी थीं,”अब मांग रहा है तो दे भी दीजिए न! कौन सा सौ—दो—सौ मांग रहा है? अमीर घरों के बच्चों से दोस्ती है तो कुछ खर्च तो होगा ही इसका। वे भी तो खर्च करते हैं। तो हमारा बेटा किसी से कम है क्या?“

”लो बाप—बेटे के बीच तुम्हें किसने कहा टपकने को? तुम क्या समझती हो, मैं मना कर दूँगा? अरे एक ही तो बेटा है मेरा। बुढ़ापे की लाठी। पायल और रिंकी का क्या? वे तो शादी करके ससुराल जा बसेंगी। आखिरी वक्त में सहारा तो यही बनेगा। अरे दस रूपये क्या हैं, वश चले तो रूपयों में तौल दूं इसे।“

उस बीच सुजीत लगातार कबाब पर हाथ साफ किये जा रहा था।

अमरनाथ की नजर पड़ी थी उसपर। स्नेह से उसके सिर पर हाथ फिराते हुए मुझसे बोला था, ”जानते हो कवि जी, मटन के किसी भी प्रिपरेशन में कबाब सुजीत को ज्यादा पसंद है। घर में मटन आये और इसके लिए कबाब न बने, ऐसा हो ही नहीं सकता।“

उतनी देर में आधा से ज्यादा कबाब चट कर गया गया था वह। अमरनाथ ने उसके गाल पर एक चुम्बन अंकित किया था, फिर जेब से दस का नोट निकालकर उसे थमाते हुए बोला था, ”ठीक है बेटे, अब तुम जाओ।“

रूपये लेकर वह अंदर की ओर चला गया था। उसके पीछे—पीछे अलका जी भी।

बाद के दिनों में पिता—पुत्र प्रेम के और भी अनेक सारे किस्सों का गवाह बनता रहा था मैं।

सुजीत क्रमशः बड़ा होता जा रहा था। इसके साथ ही शायद उसका खर्च भी बढ़ता जा रहा था। और शायद उसके अनाप—शनाप खर्च की आपूर्ति में अमरनाथ का पुत्र—प्रेम पूर्णतः सहयोगी सिद्ध हो रहा था। लेकिन एक दिन—

उस दिन घर के बाहरी बरामदे पर ही अपने परमप्रिय पुत्र पर दनादन चप्पलें बरसाते हुए बकबकाये जा रहा था अमरनाथ, ”हरामजादे.....न पढ़ाई, न लिखाई ..........ऊपर से चोरी? न्न, आज तो जान से मार दूंग्रा इस नालायक को.............“

हल्ला सुनकर मैं भी पहुँच गया था वहाँ। देखा, सुजीत को छुड़ाती हुर्इं अलका जी अमरनाथ से ही उलझी हुई थीं, ”छोड़िये, छोड़ते हैं या नहीं इसे ? बाप रे, सौ रूपये क्या ले लिये इसने, जैसे पूरा खजाना लूट लिया। आखिर आदमी कमाता किसके लिए है...........“

अब अमरनाथ पत्नी पर ही चिंघाड़ उठा था, ”तुम? तुम हटती हो या नहीं बीच से? बड़ी आयी हैं बेटे की तरफदारी करने। चोरी करेगा तो आरती उतारूंगा इसकी? कब इसने पैसे मांगे और नहीं दिये हैं मैंने? पर चोरी? नहीं आज तो इसकी आदत छुड़ा कर ही रहूँगा.....“

लेकिन पुत्र—पे्रम का भूत ऐसा सवार था अलका जी पर कि वे भी कहाँ चुप रहने वाली थीं — अबकी चुनौती देती बोल पड़ी थीं, ”तो आइये अब। देखती हूँ, कैसे मारते हैं इसे? और तू?“ सुजीत से सम्बोधित हुई थीं वह, ”पैसे की इतनी ही जरूरत थी, तो मेरे पर्स से निकाला लेता। इस कसाई की जेब से निकालने की क्या जरूरत थी? खबरदार, जो आज के बाद इनके पैसे पर थूकने भी गया...........“

वहाँ पड़ोस के कुछ और लोग भी इकट्ठा हो आये थे। पायल और रिंकी भी सहमी—सहमी सी एक ओर खड़ी वह तमाशा देख रही थी।

बात बढ़ती देख मुझे मित्र के कर्त्तव्य का ध्यान आ गया था — अमरनाथ को जबरन खींचकर वहाँसे मैं अपने घर ले आया था। उस दिन अत्यंत ही कातर स्वर में कहा था उसने मुझसे ”जानते हो कवि जी, यह औरत आये दिन सुजीत को मेरे खिलाफ भड़काती रहती है। तुम ही बताओ, कोई बेटा चोरी करे, तो क्या उसकी पीठ थपथपानी चाहिए?“

इस पर भला क्या जवाब देता मैं, सो चुपचाप सिर हिलाता रहा था।

श्मशान पहुँचाने तक अमरनाथ के जीवन के पूर्वाद्ध के अनेक सारे दृश्य मस्तिष्क के पर्दे पर उभरते—मिटते रहे थे। अब बारी थी, उसे अंतिम तंदूर के सूपूर्द करने की, जिसके लिए सुजीत का उताबलापन देखते ही बन रहा था। अंतिम तंदूर हल्की—फुल्की धार्मिक औपचारिकताओं के बाद सुजीत के हाथों की अग्नि से सुलग उठा था। इसके साथ ही मेरा मस्तिष्क पुनः अमरनाथ के साथ बिताये गये क्षणाें के सुपुर्द। अब जीवन का उत्तरार्द्ध मस्तिष्क पर हावी हो आया था —

मरने को तो अमरनाथ मरा जरूर, मगर एक सम्पूर्ण मनुष्य का जीवन जीकर—जिसमें प्रेम घृणा, रईसी, अपमान, तिरस्कार भावुकता, रूमानियमत—यानी जीवन का शायद ही कोई ऐसा पक्ष हो, जिसके भोग का समावेश न रहा हो उसके जीवन में। और इसके साथ ही नियति भी उसके भविष्य के निर्धारण की योजना में जुटी रही थी शायद। और उसी नियति की योजना को सत्यापित करने के उद्देश्य में बाप के साथ बेटे की उद्दंडता दिन प्रति दिन बढ़ती ही जा रही थी। लेकिन अलका जी के पुत्र प्रेम का आलम यह था कि हमेशा वह पिता—पुत्र के बीच पुत्र के पक्ष में ढाल बनकर खड़ी रहतीं। समय गुजरता गया था। अमरनाथ की दोनों पुत्रियाँ ब्याह कर ससुराल जा बसी थीं। उन शुभ कार्यों में दोनों पति—पत्नी के प्राविडेन्ट फंड का अधिकांश हिस्सा स्वाहा हो गया था — कुछ तो नन—रिफंडेबुल के तौर पर और कुछ किश्तों में अदा होने वाले कर्ज के तौर पर। इस प्रकार बेटियों की शादी के बाद घर की हालत थोड़ी खस्ती हो गयी थी। फिर भी अमरनाथ की रईसी में कुछ खास कमी नहीं आयी थी। लेकिन कुछ ही दिनों बाद राहत यह पेश आयी थी उसके साथ कि सुजीत की नौकरी लग गयी थी और बतौर पेशाकार वह स्थानीय कोर्ट में मुलाजिम हो गया था।

तभी अचानक भाग्यचक्र ने एक नया खेल रच दिया था अमरनाथ के साथ। हुआ यों कि एक दिन उसकी इकलौती बहन का आगमन हुआ था उसके घर। बहन की बेटी की शादी तय हो गयी थी। उसी खुशखबरी का बहाना लेकर उपस्थित हुई थीं वह। बहाना इसलिए, क्योंकि उनका असल मकसद था, भाई से कुछ मोटी रकम की सहायता की उम्मीद। अलका जी से छुपकर भाई के समक्ष अपनी समस्या रखी थी उन्होंने।

हालांकि मना कर पाना तो फितरत में था नहीं अमरनाथ के, फिर भी संकोच के साथ कहना ही पड़ा था उसे ”दीदी, तुम तो जानती ही हो कि इधर दोनों बेटियों की शादी से मुक्त हुआ हूँ। हाथ एकदम खाली है।“

”नहीं अमर, ऐसा मत कहो। बहुत उम्मीद लेकर आयी हूँ। कहीं से भी बीस हजार तक का इंतजाम कर दो। थोड़ा—थोड़ा करके जल्दी ही वापस कर दूंगी.................“बोलते बोलते सिसक पड़ी ंथीं वह।

अब बहन के आंसू कहाँ बरदाश्त थे उसे। सोचा था कैशियर तो है ही वह। लाखों रूपये कैश लॉकर में पड़े ही रहते हैं उसके पास। उसी में से दे देगा। फिर धीरे धीरे वेतन से पूरा करता रहेगा। और दीदी जैसे जैसे लौटाती रहेंगी वह भी डालता जायेगा।

बस वही किया था उसने और बहन को खुशाी खुशी विदा कर दिया था।

कहावत है कि दुर्भाग्य कभी अकेले नहीं आता। कई सारे संकटों को अपने साथ लेकर आता है। अमरनाथ के साथ भी कुछ वैसा ही हुआ था। बहन को विदा किये अभी एक सप्ताह भी नहीं हुआ था कि उसके तबादले का आदेश आ गया था। अब उसे अपनी जगह पर आये नये कैशियर को चार्ज सौंपना था। पर चार्ज सौंपे तो सौंपे कैसे? लॉकर से बीस हजार तो उसने बहन को दे दिये थे। तत्काल एक ही उपाय सूझा था उसे कि एक सप्ताह की छुट्‌टी ले—ले और उस बीच कहीं से रूपयों का इंतजाम करके कैश पूरा कर दे।

पर छुट्‌टी की अर्जी नामंजूर हो गयी थी। साहब ने सिर्फ दो दिनों का समय दिया था चार्ज देने के लिए। उन दो दिनों में खूब हाथ पैर मारे थे उसने कि कहीं से बीस हजार का कर्ज मिल जाय और तात्कालिक संकट से मुक्ति मिल सके। पर सब व्यर्थ। हार कर अलका जी के समक्ष दीदी को बीस हजार देने वाले राज को खोलते हुए अपनी समस्या से अवगत कराया था उन्हें। पहले तो जमकर लानत—मलामत की थीं उन्होंने उसकी। फिर मौके की संजीदगी को समझते हुए बोली थीं, ”तो भुगतिये! अब मैं भी क्या कर सकती हूँ? पी०एफ० से कुछ ले नहीं सकती। जेवर पायल बेटी और रिंकी की शादी में चढ़ गये। और कर्ज कहीं से मिलेगा नहीं..............“

”जरा सुजीत से कहकर देखती।“ अंतिम प्रयास।

”वह कहाँ से देगा। पहला ही तो वेतन मिला था उसे, जिसमें से अपने लिए कुछ कपड़े बनवाये उसने, दोस्तों को पार्टी—वार्टी दी और थोड़े पैसे घर में भी दिये।“

यानी कहीं से भी इंतजाम नहीं ही हो पाया था और गबन के आरोप में नौकरी से हाथ धोना पड़ गया था उसे। फिर तो धीरे धीरे घर में उसकी हैसियत दो कौड़ी की होती गयी थी। आये दिन अपने निरंकुश पुत्र के कटाक्ष तो सुनने ही पड़ते उसे और ऐसे बख्त आशा भरी नजरों से अगर अलका जी की ओर देखता वह कि पति के पक्ष में वही सुजीत को कुछ समझाये या डाँटे तो उनकी आँखों में भी उसे हिकारत ही नजर आती।

धीरे—धीरे अंदर ही अंदर टूटता गया था वह। अब तक के जीवन में कभी अभाव से पाला नहीं पड़ा था उसका। परिवार के अंदर हो या बाहर, हमेशा सिर ऊँचा करके रहा। पर अब पैसे—पैसे को मोहताज। अब तो वह जब भी सड़क पर नजर आता, पाँव पैदल ही। यहाँ तक कि शराब भी कभी कभार ही नसीब हो पाती उसे। उस कभी कभार के लिए भी पैसे कहाँ से लाता, यह तो वही जाने, पर अधिकतर जब उसने शाम को शराब ढाल रखी होती, मेरे पास जरूर आ जाता और आकर खुली किताब भी हो जाता। एक दिन शाम को आया, तो अत्यंत कातर स्वर में बोलने लगा, ”जानते हो कवि जी, जब तक मैं कमाता रहा, माँ—बेटे को कभी कोई कमी नहीं होने दी। दोनों को जब भी पैसे देता, कभी पूछता नहीं कि पैसों का क्या करेंगे वे, पर अब, जब मुझे कुछ जरूरत होती है वे पैसों का हिसाब मांगते है। तुम समझ नहीं पाओंगे कवि जी कि उनके आगे हाथ फैलाने से पहले मुझे कितनी बार मरना पड़ता है। इन दोनों से अच्छा तो अपना मंसूर रिक्शावाला है। जब भी सड़क पर पैदल देखता है और रिक्शा खाली होता है, तो आरजू—मिन्नत करके बिठा लेता है।“

और एक दिन तो बोलते बोलते इतना भावुक हो गया था वह कि आँखे छलक पड़ी थीं उसकी। हथेली से आँखें पोछते हुए बोला था, ”अब तो उनका व्यंग्यबाण सहा नहीं जाता। बेटा व्यंग्य के तीन छोड़ता है और माँ उसकी ‘हाँ' में ‘हाँ' मिलाती है। दोनों शायद यही चाहते हैं कि मैं घर छोड़कर चला जाऊँ। चला भी जाता कहीं, पर क्या करूँ, उनलोगों के मोह के फंदे ने ऐसे फाँस रखा है कि.......। पहले तो मैं कुछ भी गलत सही करता, अलका को कोई फर्क नहीं पड़ता था। पर अब..........। तुम्हीं सोचो कविजी, कच्ची छड़ी को तो मोड़ सकता है कोई पर पकी हुई छड़ी को मोड़ेगा तो वह तो टूट ही जायेगी। बस यही हाल है मेरा। समझ लो कि माँ—बेटा ब्रह्मफांस बन गये हैं मेरे लिए। जिसे चाह कर भी तोड़ नहीं पाता। हनुमान जी की तरह ब्रह्मफांस का कैदी होकर रह गया हूँ........“

इसी तरह एक दिन बड़े ही हल्के मूड में मिला था वह। पता नहीं कैसे मुझे उसके घर के कबाब की याद आ गयी थी। पूछ ही बैठा था,मैं ”क्यों भाई, इन दिनों तुम्हारे घर में कबाब—वबाब का क्या हाल है? बनता तो होगा ही।“

तपाक से उत्तर दिया था उसने, ”हाँ बनता क्यों नहीं है। अब तो रोज ही बनता है। पर अब सुरेश प्रसाद नहीं बल्कि अलका जी और उनके सुपुत्र ने कबाब सेंकते रहने में माहिरी हासिल कर ली है......“

उसके होठों पर व्यंग्य और आँखों में पीड़ा साफ नजर आ रही थी मुझे।

पुनः बोला था वह, ”नहीं समझे ? अरे कवि जी, मैं तुम्हें सिंके हुए कबाब से कम लगता हूँ? फर्क सिर्फ इतना है कि इस कबाब का मजा सिर्फ माँ और बेटे ले सकते हैं।“

मुझे लगा था, जैसे अंदर ही अंदर दर्द से कराह रहा हो वह।

चिता की लपटें अब मद्धम पड़ने लगी थीं। मेरी नजर सुजीत पर पड़ी थी, जो मरघट के डोम के साथ मिल कर बाँस के एक बल्ले से खँरोच—खँरोचकर डोम की तरह ही चिता को पूरी तरह स्वाहा कर डालने की प्रक्रिया में संलग्न था। अचानक मुझे लगा था, जैसे उसके हाथ का वह बाँस का बल्ला चमकते हुए पेपरवेट में तब्दील हो गया हो और अमरनाथ उसके सामने आ खड़ा हुआ हो। फिर बाप—बेटे में बकझक और पेपरवेट का एक करारा वार सीधे बाप के सिर पर........

हाँ जैसा कि अमरनाथ के नौकर सुरेश ने उसकी मौत यानी हत्या का किस्सा बयान किया था, वह कुछ इसी प्रकार था —

सुजीत की जेब से अमरनाथ ने सचमुच रूपये चुराये थे या उसके सुपुत्र ने उसपर इल्जाम लगाया था, यह तो अमरनाथ की आत्मा ही जाने, पर रात में मुँह से शराब की गंध छोड़ता अमरनाथ जब घर के अंदर दाखिल हुआ, चोरी का इल्जाम लगाता सुजीत बुरी तरह बाप से उलझ पड़ा था। बाप के द्वारा लाख सफाई, पर सुजीत मानने को तैयार ही नहीं.........।

अब कोई बेटा अपने बाप पर तीन सौ रूपयों की चोरी का इल्जाम लगाये, वह भी ऐसे बाप पर, जो अपने जमाने में रईसों का रईस रह चुका हो, भला यह कहाँ बरदाश्त था अमरनाथ को। सो, जब सुजीत की बदतमीजी हद से पार हो गयी, तब गुस्से में सुधबुध खोते हुए अमरनाथ ने सुजीत पर तमाचा चला दिया था। फिर तो वही होना था जो हुआ—सुजीत ने भी आव देखा न ताव, पास ही टेबुल पर पड़े पेपरवेट को उठाकर दे मारा अपने बाप के सिर पर। इसके साथ ही बाप का बे्रन—हैमरेज, फिर अस्पताल की यात्रा..पुलिस की तफ्तीश .......संयोग, कि बीच में थोड़ी देर के लिए अमरनाथ की अचेतावस्था दूर.............उसी बीच पुलिस को बयान — ‘छत से उतर रहा था, नशे में पैर डगमगा गया, सीढ़ियों से लुढ़क गया'..... पुनः अचेत....... फिर राम नाम सत्य........

चिता पूरी तरह जल चुकी थी। हम मरघट से लौटने लगे थे। मैंने सुजीत की ओर देखा — उसके चेहरे की ओर। वहाँ भीषण संतोष और तृप्ति का भाव था। ठीक वैसा, जैसा भाव बचपन में अपने बाप की गोद में बैठकर कबाब का लुत्फ उठाते हुए उस दिन उसके चेहरे पर था।

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