काइयाँ Ramesh Khatri द्वारा लघुकथा में हिंदी पीडीएफ

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काइयाँ

कहानी रमेष खत्री

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काइयाँ

आज फिर दफ्तर पहुँचने में देर हो गई । रामदीन के साथ अक्सर ऐसा होता है । वह रोज़ सोचता है, ‘आज देर हो गई सो हो गई, पर कल तो जरूर अपने निर्धारित समय पर दफ्तर पहुँचूगा । लेकिन उसका कल किसी स्वप्न की तरह उसकी सोच में ही बना रहा । वह आज में कभी तब्दील नहीें हो पाया । हमेषा कल के रूप में ही उसके सामने चुनौती बना डटा रहा । कल जो दूर था, अगम था, उसकी पकड़ से बाहर था, वह वैसा का वैसा ही बना रहा और उसकी सोच को लगातार कुरेदता रहा । जिससे वह लगा रहता अपने आज को बिताने में । इसका एक कारण और भी था और वह था रामदीन खुद । उसने चारों तरफ अपने हाथ पैर इस क़दर फैला रखे हैं मानो पेड़ की शाखाएँ निकल आई हो । कंटीली झाड़ियों की तरह बिखरे हुए सम्बन्धों में वह पूरी तरह से घिरा हुआ है । जिससे निजात पाना उसके लिए असंभव बना हुआ है । वह चाहते हुए भी इस ओढ़े हुए लबादे से बाहर नहीं निकल पाता । बल्कि उसके अन्दर ही ध्ाँसता जा रहा है जैसे मक्खी गुड़ में लिपटती जाती है । यह उसकी ही सदाषयता का नतीज़ा है जो एक एक एक कर अनेक जिम्मेदारीयाँ उसके जिम्मे आती चली गई और अब उसके लिए परेषानी का सबब बन रही है ।

वैसे रामदीन ऐसा शख्स है, जो कभी भी समय की सीमा में बन्धकर नहीं जिया । वह तो हमेषा ही समय की सीमा से बाहर रहा और जब भी समय ने उसे अपनी सीमा के अन्दर लेने की कोषिष की तभी वह पके फल की तरह डाली से अलग जा गिरा और समय अपनी सीमा में सिमटता चला गया । अब तो रोज़ ही नियत समय पर दफ्तर जाने का एक ऐसा फच्चर उसकी जान को फंँसा है जिसे वह जैसे तैसे निभा रहा है ।

दफ्तर आकर भी वह कौनसा तीर मार लेता है । जब भी उससे समय पर आने के बारे में कहा जाता, वह अपनी आँखों को गोल गोल करके जोर से हँसने लगता । जे़ब सेे तम्बाकू की डिब्बी निकालता और बेषरमी से तम्बाकू बनाने लगता । कँंचों की तरह गोल उसकी आँखें उस समय स्थिर हो जाती । किन्तु उसकी हँसी की आवाज़ खोदृखो करती हुई हलक से बाहर निकलती और पूरे माहौल में फैल जाती । वह मुद्‌दे को हँसी की भेंट चढ़ाता हुआ अपनी कुर्सी पर जाकर बैठ जाता । पचपन वर्षीय रामदीन मंझोले कद का होने के कारण कुछ अधिक ही मोटा दिखाई देता है । उसके कुर्सी पर बैठते ही सब कुछ शान्त हो जाता । जिसको गुस्सा आ रहा होता वह भी थोड़ी देर में अपने आपको कोसता हुआ शान्त हो जाता और बात आई गई हो जाती । फिर थोड़ी ही देर में वह कुर्सी पर बैठा खर्राटे लेने लगता ।

अब यह सवाल उठना स्वाभाविक है, ‘इस निरे बुद्धू, कामचोर और समय की कद्र न करने वाले इस व्यक्ति के बारे में इस समय बात करने की क्या तुक है ?' यह प्रष्न जायज है । ऐसे लोग हमारी सोच की सीमा से ही बाहर होने चाहिए जो समय के पाबन्द न हो और जो हर बात को मज़ाक में लेकर उड़ा देता हो, उसके बारे में बखान करने की क्या तुक है ? किन्तु यह बताना भी जरूरी है कि ‘समय किसी के लिए भी कभी खाली नहीं होता है, वह तो अपने आप विभाजित होता जाता है । कई बार हम चाहकर भी समय का उपयोग अपनी इच्छानुसार नहीं कर पाते और कोई दूसरा ही उसमें घुसता चला आता है । अभी यह रामदीन भी ऐसे ही घुसा है हमारी सोच के दरीचों में और वह आँधी की तरह फैल गया विचारों के ताने बाने में ।

किन्तु वह शुरू से ऐसा नहीं था । तीन साल पहले की बात है । उसकी पत्नी कुसुम का निधन हो गया और उसके बाद उसने पूरी तरह से निर्लज्जता ओढ़ ली । लापरवाही को उसने अपना अस्त्र बना लिया । जब तक कुसम थी तब तक रामदीन उसके साथ और समय के साथ बंधा हुआ था । उसके जाते ही वह सभी तरफ से आज़ाद हो गया । कुसुम ने रामदीन को अपने पल्लू से क्या बांधा समय उससे बंध गया था बीस साल का साथ था दोनों का । वही रामदीन के जीवन की समय सूचक घड़ी थी । इसीलिए उसने कभी भी अपनी कलाई पर घड़ी नहीं बांधी । समय पर सब चीज़े उसके सामने अपने आप आ जाया करती और समय रहते ही उसे घर से दफ्तर के लिए रवाना कर दिया जाता । तो फिर उसे अपनी कलाई पर घड़ी बांधने की जरूरत कहाँ थी ।

उन दिनों वह समय का पाबन्द था । हर काम को मेहनत और गम्भीरता से करता । साथी कर्मचारी उससे जला करते थे । अधिकारियों के बीच उसकी अच्छी रेपुटेषन हुआ क्रती थी । ऑफिस के गोपनीय और महत्वपूर्ण कामों के लिए उसकी खोज मचा करती थी । वह उत्तरदायित्व के महत्व को पूरी तरह से समझता और निभाता भी था ।

पर नियति को रामदीन की यह अच्छाई षायद रास नहीं आई । एक दिन सुबह जब वह उठा तो क्या देखता है कुसुम अभी तक सोई हुई है । जो शक्स उससे पहले जाग जाता था, उसका इतनी देर तक सोते रहना चिंता की बात थी । वह सोचने लगा ‘अभी नहीं उठी तो क्या हुआ, उठ जायेगी थोड़ी देर में । कई बार होता है आदमी के साथ किसी दिन वह ज़्यादा देर तक सोना चाहता है । आलस उसको चारों तरफ से जकड़ लेता है और वह चाहकर भी बिस्तर छोड़ ही नहीं पाता है । शायद आज कुसुम के साथ भी यही सब हो । पर रात को भी तो कुसुम जल्दी ही सो गई थी !' उसके मन में इसी तरह के ख़याल आते रहे और वह इन्हीं ख़यालों के घटाटोप में बिना चाय पिये ही ड्‌यूटी पर चला गया । उस समय तक बच्चें भी गहरी नींद में लीन थे । उनको जगाने वाला ही जब गहरी नींद के आगोष में हो तो बच्चों को क्या परवाह है । किन्तु कुसम को नहीं उठना था, सो वह नहीं ही उठी । फिर उसे उठाया गया । उस समय सूरज छत के ठीक ऊपर आ बैठा था । आदमी की परछाई खुद उसके ही पैरों तले दबकर रह गई । परछाई रहित कई आदमी रामदीन के दरवाज़े पर इकट्‌ठा हुए और कुसुम को उठाकर ले गये । उस समय रामदीन भरी भरी आँखों से कभी कुसुम को देखता तो कभी उन लोगों को जो कुसुम को ले जाने के लिए इकट्‌ठा हुए थे । बच्चें उस समय ज़ोर ज़ोर से रो रहे थे । रामदीन की आँखें पनीली जरूर हुई किन्तु बरसी नहीं उसने सारा का सारा खारा पानी अपने अन्दर उतार लिया और अंदर बन गया खारे पानी का समन्दर ।

फिर लम्बी छुट्‌टी के बाद रामदीन जब दफ्तर आया तो उसका मन उखड़ा हुआ था और उसका पहले वाला रूप उससे बिला गया था । उसके स्थान पर धीर धीरे एक नया रामदीन पैदा होने लगा जो निहायत काँईया, मक्कार और पूरी तरह से कामचोर था । उसकी गोल गोल आँखों में हर वक्त एक अजीब तरह की मक्कारी चमकती रहती । वह हवाओं को सूंघने लगा और फिर उसमें से अपने काम की बातें उलीचने लगता । उसे हर कहीं उसकी तरह ही मक्कार और कामचोर लोग नज़र आते जो हर वक्त कुछ न कुछ षडयंत्र रच रहे होते । किन्तु ऐसा नहीं था । हमारा ऑफिस एक सरकारी सांस्कृतिक केन्द्र था । यहाँ पर उम्दा किस्म के कलाकारों और साहित्यकारों का आनादृजाना लगा रहता था । किन्तु इससे उसे कोई फर्क नहीं पड़ता वह तो दिन पर दिन घाघ होता जा रहा था । समय के साथ उसमें व्याप्त अच्छाईयों का लोप होता गया और उसके स्थान पर उग आया घनघोर काँटेदार बबूल । जिसने तेज गति से बढ़ते हुए उसकी सारी अच्छाईयों को नोचकर बाहर फेंक दिया ।

बीतता हुआ समय रामदीन को और भी काईया बनाता रहा । वह समय की सीमा से बाहर निकलता रहा और समय उसे खदेड़ता रहा । अब उसका कहीं कुछ भी निर्धारित नहीं था सब कुछ अनिष्चित सा ही चल रहा था । अब तक ऑफिस भी उसके लिए हँसी मज़ाक का स्थान बन कर रह गया । कुसुम के रहते जिसकी वह पूजा किया करता और काम को धर्म समझता वही अब हर काम को मज़ाक में उड़ा दिया करता है । वैसे भी हमारे दफ्तर में एक चपड़ासी के लिए काम ही कितना है । कुछ फाइलो को एक टेबल से दूसरी तक पहुँचाना । अधिकारियों के कमरे में रखे जगों में समय पर पानी भर देना और फिर कहीं दुबककर बैठ जाना । वह भी ऐसी जगह जहाँ उन्हें खोजना कठिन हो । और वैसे भी किसी भी ऑफिस में चपड़ासियों को कौन खोजता है । जो सामने दिख जाता है उसी को काम कह दिया जाता है । और जो नहीं है वह ‘नहीं है' मान लिया जाता है । अब तक रामदीन भी ‘नहीं ही है' की श्रेणी में आ चुका था । यदि कहीं भूल से वह दिख भी जाता और उसे कोई काम कह दिया जाता तो वह काम बताने वाले का ही मज़ाक उड़ाने लगता । उसके सामने खोदृखो कर इतनी ज़ोर से हँसने लगता कि उसके मुँह से थूक के छीटें उड़ने लगते । वह देखते ही देखते इस तरह का माहौल बना देता कि काम बताने वाला ही खुद शर्मसार हो जाये ।

इस कारण भी कोई उसे किसी भी तरह का काम नहीं कहता और वह धीरे धीरे पूरी तरह से खाली होता चला गया । अब उसके पास ऑफिस में करने के लिए भी कुछ काम नहीं होता । सब लोग उससे कतराने लगे, कोई उससे बात करना भी पसन्द नहीं करता । उसको देखते ही सामने वाले में मन में यह शंका घर करने लगती कि ‘न जाने कब और बगैर किसी कारण के ही वह बेइजत्ती करने पर उतारू हो जाये ।' अब रोज़ रोज़ तो भला उससे उलझा नहीं जा सकता न । और वैसे भी सरकारी नियमों में ‘लो पेड कर्मचारियों के लिए कई तरह की रियायतें दी हुई है ।' इसके चलते वह अपने लिए लाभ की गली निकाल लेता है और अपने शातिर दिमाग से उसी पर चलता रहता है और बचता भी रहता है । अधिकारी यह सोचकर उससे बचते रहते कि ‘कौन कीचड़ में पैर डाले अपने ही पैर गंदे होंगे ।' और साथी कर्मचारी ‘अपनी इज्जत के कारण उसके मुँह नहीं लगते । और वह इस स्थिति का फायदा उठाकर बचे खुचे बाकी समय में अपनी कुर्सी पर बैठा खर्राटे भरता रहता । ऑफिस का काम भी ऐसा ही है, दूसरी तरह से सोचे तो ऑफिस तो सागर है जिसमें हज़ारों नदियाँ आकर मिलती हैं और कितना कुछ इधरदृउधर होता है । उसमें से यदि दो चार बूंद पानी इधर उधर हो जाये तो किसी को पता ही नहीं चलता । जहाँ दो सौ आदमी काम करते हो वहाँ यदि एक आदमी काम न भी करे तो कोई फर्क नहीं पड़ता ।

वैसे हर ऑफिस मेें दो चार लोग गधेनुमा भी होते ही हैं जिनको अधिक से अधिक काम करने का जुनून सवार रहता है । अधिकारी उनके इस जुनून को हवा देते रहते हैं और अपना काम निकलवाते रहते हैं । वे रामदीन जैसे निखट्‌टू लोगों का काम जुनूनी लोगों को देकर चैन की बंसी बजाते है । ऑफिस का काम अपनी जगह होता रहता है ,रामदीन जैसे लोग मजे भी मारते रहते है । अफ़सर भी खुष, रामदीन भी और वे भी जिनको अतिरिक्त काम मिला । कुल जमा सभी खुष ।

किन्तु एक बात और हो गयी ऑफिस में पिछले दिनों । अपनी इन्हीं हरकतों की वज़ह से रामदीन अफसर का मुँहलगा चमचा बन गया । जैसे करेला और ऊपर से नीम चढ़ा । वह अपनी कुटिलताओं के चलते अधिकारियों के हर अच्छे बुरे काम में सहयोग करने लगा । यह उन दिनों की बात है जब ऑफिस में केजुअल बाबू के इन्टरव्यू हो रहे थे । उस समय उसे ही डायरेक्टर के साथ लगा दिया गया । कितनी रात गये तक वह ऑफिस में रूकता उसे खुद पता नहीं । क्योंकि वह तो पहले ही समय की सीमा से बाहर निकल चुका था । उसे तो समय का कुछ ध्यान रहता नहीं किन्तु उसके साथ जो लोग जुड़े थे, वे तो अभी भी समय की जद में थे । उसका लड़का जब उसके लिए खाने का टिफिन लेकर आता तब उसे दिन के बीत जाने का अहसास होता । अधिकारी के कमरे के बाहर जलती लाल लाईट को भी वह अच्छी तरह से जानता था । ऑफिस समय के बाद किसी जवान, खुबसूरत लड़की को बुलाकर वह अधेड़ गंजा अधिकारी क्या करता है वह इसे भी अच्छी तरह से जानता है । और अब तो वह उनके इस तरह के कामों में सहयोग करने लगा । ऐसे अवसरों की तलाष में उसकी छोटीदृछोटी कंजी आँखें लगी रहती । मौके तलाष कर अधिकारियों को नवाजना और दरवाज़े के बाहर पहरेदार की तरह खड़े हो जाना उसकी आदत में शुमार हो गया ।

धीरेदृधीरे वह ऑफिस की इस तरह की गतिविधियों में लिप्त होता चला गया । न जाने कब वह इन सब का हिस्सा बना और बनता ही चला गया । आँखों के परदे में सारा खेल चल रहा था । सबको सब पता था किन्तु कोई भी किसी से कुछ नहीं कहता था । किन्तु शक की नज़र से सब एक दूसरे को देखने लगे । कुल मिलाकर कुछ ही लोगों की बदोलत अच्छा खासा माहौल अजीब सी खुसर पुसर में तब्दील हो गया । वह जब कभी रंगत में होता तो इस सबको चस्के ले लेकर सुनाता । एक दिन अपनी इसी रो में बोाल ‘अरे...मेरे को मालुम है कौन कित्ता इमानदार है । कोई मुझे इमानदारी का पाठ न पढ़ावे । सबके सब इस हमाम में नंगे है ।'

तभी उसके पास खड़ा दूसरा प्यून बोला ‘अरे यार आज ऐसा क्या हो गया जो तू सबको ही नंगा बता रहा है ?'

तब रामदीन ने अपनी पेंट की जेब से तम्बाकू की पुड़िया निकाली । उसमें से थोड़ी सी तम्बाकू अपनी हथेली पर रखी और फिर पुड़िया से चूना निकाकर तम्बाकू पर रगड़ते हुए बोला ‘अरे मैंने जो देखा है....उसे कोई ओर देख लेता तो उसके तो होष फाक्ता हो जाते । उस दिन तो मेरे भी पैरों के नीचे से ज़मीन खिसक गई थी ।'

‘अरे भई......तूने ऐसा क्या देख लिया जो आज तक उसके मजे ले रहा है ?'

‘अरे अभी.....दो महिने पहले की बात है, मैं लगा ही था डायरेक्टर के साथ । दोपहर का टेम था और मैं अपनी पिन्नक में सीधा उसके कमरे में चला गया । बाहर लाल बत्ती जल री थी वो मैंंने देखी नी और सीधा कमरे में चला गया । वहाँ जो देखा तो देखता ही रह गया । एक केजुअल सोफे पर बैठी थी और ये साला गंजा डायरेक्टर उसके पास बैठा अपनी मस्ती में मस्त था । अचानक मुझे देखकर चौंक गये दोनों और मेरी जो हालत थी वो देखने वाली थी ।'

‘फिर क्या हुआ....?' पहले वाला प्यून फिर पूछ बैठा ।

‘होना क्या था.....साला गंजा मुझ पर टूट पड़ा । लगा डाटने । मैंने भी कुछ जवाब नहीं दिया । चुपचाप निकल आया कमरे से और सीधा निकल लिया यहाँ.....काफी देर तक केन्टीन में बैठा रहा । और फिर जब सामान्य हुआ तब वापस लौटा । उस समय तक डायरेक्टर खुद ही चला गया था ।'

‘अच्छा तो इसके बाद तू उसका खास बन गया ?'

रामदीन कुछ नहीं बोला केवल आँखों ही आँखों में हँसता रहा । उसने तम्बाकू को मुँह के हवाले किया और अपने हाथों को झाड़ते हुए आगे बढ़ गया । अब तो डायरेक्टर द्वारा हर काम के लिए उसकी ही पुकार होने लगी । उसे अतिरिक्त तवज्जो दी जाने लगी । और इस तरह से वह उस गंदगी का हिस्सा बन गया । अफसर आते रहे, जाते रहे पर उसका काम यथावत जारी रहा । वह अपनी गतिविधियों में लगा रहा । आता हुआ अधिकारी आरम्भ में उसको परखने की कोषिष करता किन्तु इससे उसे कोई फर्क नहीं पड़ता । क्योंकि जाते वक्त अधिकारी आने वाले अधिकारी के कान में रामदीन को लेकर फूक मार दिया करता । और वह फूँक रामदीन के पक्ष में होती । अब तक उसकी बदकारियाँ ही उसकी विषेषताओं में शुमार होने लगी । वह जैसा था वैसा ही अपनी गतिविधियों को जारी रखे रहा । अफसर के कमरे के बाहर लाल लाईट जलती रही, मीटिंगों के दौर चलते रहे । और साथ ही उसकी ड्‌यूटी भी चलती रही ।

अपनी इन्हीं गतिविधियों के चलते उसका प्यून के पद से प्रमोषन हो गया । अब वह स्टूडियो अटेंडेन्ट बना दिया गया । यहाँ उसका कार्य अलग प्रकृति का था । करना यहाँ भी कुछ नहीं था । उसे समय पर ऑफिस पहुँचना होता जो वह कभी पहुँचता नहीं, देर सबेर जब भी पहुँचता तो फिर अपनी कुर्सी पर बैठकर खर्राटे भरने लगता । उसका काम तो ड्‌यूटी ऑफिसर, उद्‌घोषक कर लिया करते और कुछ मदद कन्ट्रोलरूम के कर्मचारी भी कर देते । समय इसी रफ्तार से बीतता रहा । जिनको उसने विचित्र अवस्था में देखा था । वे अवसर का लाभ उठाकर इसी ऑफिस में परमानेन्ट हो गये और देखते ही देखते अच्छे ओहदे पर भी पहुँच गये । एक कारण यह भी रहा, ‘वह चाहते हुए भी ऐसे लोगों को मन से इज्जत नहीं दे पाता । जिनके खुदके चरित्र पर इस तरह के प्रष्नचिन्ह लगे हों वे भला दूसरो से कैसे सम्मान की आषा कर सकते हैं ?' रामदीन की सोच के कई दरवाज़े भड़भड़ाकर खुलते और कुछ ताज़ा हवा उनसे प्रवेष करती । जिससे उसे सांँस लेने में आसानी होती । वह सोचने लगता , ‘आदमी अपने भविष्य के लिए न जाने किन किन हथकण्डों का इस्तेमाल करता है ? ऐसे समय उसके अन्दर के ज़मीर का क्या होता है.......? क्या कभी अकेले में भी उसके अन्दर का आदमी बाहर नहीं निकलता.......! जो उनका गिरेबान पकड़कर पूछ सके......यह तुमने क्या किया....? और क्यों किया......? पर आज के इस मषीनी युग में आदमी के अन्दर ज़मीर नाम की चीज़ बची ही कहाँ है ?' ऐसे ही विचारों से वह हरदम घिरा रहता । और समझ नहीं पाता कि ‘क्या करे....?'

जब तक कुसुम उसके साथ थी । उसके पास ऐसे ख़याल भूले से भी नहीं फटकते थे । क्योंकि हरदम वही उसके साथ होती थी । फिर भला किसी भी तरह के ख़यालों को कहाँ जगह मिलती । उसने अपने साथ ही प्रकृति से भी उसे उलझा रखा था । सुबह की गुनगुनी धूप उसे आकर्षित करती थी, मौसम की पहली बरसात उसके नथुनों में सुवासित गंध उड़ेल देती । अस्ताचल होता सूरज उसके लिए खुषियों की सौगात लेकर आता और वह दुनिया जहान के काम छोड़कर अपनी कुसुम के पास लौट आता किन्तु कुसुम के जाते ही उसका स्थान खाली हो गया और उस खाली स्थान में इस तरह के ख़यालों को जगह मिल गई । शुरू के कुछ दिनों तक तो उसे अकेलापन खाने को दौड़ता फिर धीरेदृधीरे उसने अपने अकेलेपन से ही दोस्ती कर ली । इसके बाद उसे किसी भी दोस्त की कभी जरूरत ही महसूस नहीं हुई । यह बात नहीं है कि वह निपट अकेला है । उसके बेटा है, बहू हैं, बेटी है, दामाद है, साथ ही नाती पोते भी हैं । जो हरदम उसको घेरे रहते हैं । किन्तु उसका इन सबके होते हुए भी मन नहीं लगता, वह अपने अकेलेपन के सायों में हरदम घिरा रहता कुसुम की कमी उसे हरदम सालती रहती हैं ।

उम्र की ढलान पर बैठा रामदीन अक्सर सोचा करता है, ‘आदमी का अपना वजूद क्या है.....?' और इस प्रष्न के उत्तर में वह पाता है, ‘कुछ भी नहीं....आदमी तो मात्र परिस्थितियों का खिलौना भर है, वे ही उसे एक छोर से दूसरे छोर तक घसीटती रहती हैं । आदमी इन सबके बीच खिलौना बनकर रह जाता है ।' वह जब अपने आसदृपास ऐसे खिलौनों को भटकते हुए देखता है, तो उसका मन वितृष्णा से भर जाता । अपने वजूद को मिटाकर पद हासिल करते लोगों के व्यवहार को देखकर उसे हँसी आने लगती और वह कभी उन पर तो कभी अपने आप पर हँसने लगता । अब तो ऐसे लोगों की ऐंठ बढ़ती ही जा रही है । अपनी उस विचित्रावस्था को लोग कितनी जल्दी भूल गये मानो गिरगिट ने अपना रंग बदल लिया हो । आज के इस भौतिक युग में आदमी पैसों के लिए सब कुछ करने को तैयार है । किस तरह से कटपुलती की तरह नाच रहा है आदमी । और चतुराई में तो उसने लोमड़ी को भी मात दे दी है । आज के इस दौर मेंं आदमी ही सबसे ज़्यादा घुन्ना और दगाबाज़ हो गया है । उस पर किसी भी तरह का विष्वास नहीं किया जा सकता । उसकी सोच में इस तरह के न जाने कैसेदृकैसे ख़्ायाल आने लगते । आज के इस दौर में हर कोई बड़ा आदमी बनना चाहता है किन्तु अपनी मेहनत और काबलियत से नहीं अपितु जोड़दृतोड़ के दम पर और उसे इसी बात से चिढ़ होती । सुविधाएं सब हासिल करना चाहते हैं अपने हक से भी ज़्यादा और उसके लिए कुछ भी करने को तैयार रहते हैं । उसे कोफ्त होती तो इसी सब से पर वह दूसरों को तो बदल नहीं सकता था । तो फिर उसने ज़्यादा दिमाग लगाना भी छोड़ दिया किन्तु सोच की ये लहरें उसका पीछा नहीं छोड़ती । और ऐसे समय उसे कुसुम की कमी गहराई से खलने लगती ।

रामदीन के देखते हुए इस दफ्तर में कई लोगों ने अपने दाँव खेले और अपने पास जो भी था लगा दिया । नतीजतन वे अच्छी स्थितियों को पाते चले गये । समय ने करवट ली और वह भी प्रमोषन पा गया । लेकिन उसके आचार व्यवहार में भारी बदलाव हो गया । अब वह पहले जैसा रामदीन नहीं रहा । बल्कि उसकी जगह एक लम्पट और काईयाँ इन्सान ने जन्म लिया ।

बीतते हुए समय ने उसके लिए कठिनाई के दिन ला दिये । अब उसके विरोधियों की सख्या दिनों दिन बढ़ती जा रही थी । वह खुद उम्र की ढलान पर आ बैठा अब उसके रिटायरमेन्ट में भी केवल दो ही साल शेष रह गये । अपनी इस लम्बी पारी में उसने कई दुष्मनों को तैयार कर लिया । जो उसके विचारों से मेल नहीं खाते वे विरोधियों के खेमे में जाकर दम लेते । और विरोधियों का तो एक ही काम था यानि उसकी पीठ को तलाषते रहना । उन्हें तो मौके की तलाष रहती । कब्र खोदने के लिए आदमी को सामान भी कितना चाहिए । वह सब तो उनके पास होता ही है । किन्तु रामदीन सारे विरोधियों के छक्के एक ही पल में छुड़ा देता । उसकी एक हँसी ही काफी है । जब वह खो....खो कर जोर से हँसता तो सब धराषाही हो जाते । छोटी सी पोस्ट का आदमी अच्छे अच्छों को नाको चने चबवा देता ।

कि तभी एक दिन अचानक वह घटना घट गई । उस दिन सुबह से ही बरसात हो रही थी बीतता हुआ समय अपनी ज़द में सब कुछ लेता जा रहा था । आसमान काले बादलों से ऐसे अटा पड़ा था मानो पूरे सागर का पानी अपनी भुजाओं में समेटकर ले आया हो और उस सारे के सारे पानी को यहीं बरसाकर दम लेगा । रह रह कर नगाड़े बजते आसमान में और मन दहलकर रह जाता । घटाएं ऐसे घुमड़ रही थी जैसे समन्दर में लहरें मचलती है। ऑफिस में जगह जगह पानी भर गया, बाहर जाने के रास्ते पर फिसलन पैदा हो गई । वह अपनी ड्‌यूटी के बाद जैसे ही घर के लिए निकला, उसका पैर फिसला और सीधा सर के बल घड़ाम से जा गिरा । उसकी मोटी काया कीचड़ में लथपथ पड़ी थी । कुछ लोग तो दौड़े भी उसे उठाने किन्तु विरोधियों को तो मजा आ गया । वे मजे से देख रहे थे हाथी को गिरे हुए । उस समय तो वह जैसे तैसे उठ गया किन्तु उसके सर में आई आन्तरिक गहरी चोट के चलते वह तुरंत ही मूर्छित हो गया और उसे अस्पताल में भर्ती कर दिया गया । कुछ दिनों के बाद उसे जब होष आया तो उसका दाहिना हाथ कांपने लगा लम्बे इलाज के बाद भी कोई फायदा नहीं हुआ । जैसे जैवे ईलाज होता गया उसकी काम्प्लीकेषन बढ़ती गई । समय समय पर उसके बारे में सूचनाएं आती रही । कुछ लोग जो उससे मिलने जाते वही दम तोड़ती सूचना अन्य के हवाले कर देते । ऐसा कुछ दिनों तक ही हुआ और फिर एक दिन परमानेन्ट सूचना मिली, ‘रामदीन नहीं रहा ।' सर की आन्तरिक चोट अपने साथ लपेटकर उसे उसकी कुसुम के पास ले गई । दस वर्षों के लम्बे अन्तराल के बाद रामदीन और कुसुम के मिलन की घड़ी आई तो वह खुषीखुषी उससे मिलने चला गया ।

इधर ऑफिस में कुछ लोगों ने उसके इस असामयिक निधन पर दुःख प्रकट करने लिए एक शोक सभा का आयोजन कर दिया । जिसमें विभाग के अधिकांष अधिकारियों और कर्मचारियों ने उसकी याद में अपने उद्‌गार प्रकट किये और उसकी अच्छाईयों के बारे में कसीदे पढ़ना चालू किया । ये सब वही लोग थे जो उसे फूटी आँख भी देखना पसंद नहीं करते थे और अब उसके नहीं रहने पर उसके लिए घड़ियाली आँसू बहा रहे थे और उसकी तारीफ कसीदें पड़े जा रहे थे । ठीक ही तो हैं, ‘मरणान्तानि वैराणी.....।'

रमेष खत्री

(संपादक नेट मेगजीन साहित्यदर्षन डाट काम)

53/17,प्रतापनगर , जयपुर 302033

e.mail- ramesh_air2007 @rediffmail.com