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बीच का रिश्ता

कहानी रमेष खत्री

बीच का रिष्ता

वे दोनों जब उठकर चले गये तब एक बेंच ने दूसरी से पूछा, ‘क्यों री......! जरा बता तो......जो अभी यहाँ बैठे थे, वे कौन थे ?'

तब दूसरी बेंच अपने चेहरे पर कुटिल मुस्कान बिखेरते हुए बोली, ‘अरे सखी.....! क्या तू मुझे इतना मुर्ख समझती है । या क्या मैं इतनी बढ़ी हो गई हूँ कि मुझे कुछ भी दिखाई नहीं देता है और मैं आदमी को भी नहीं पहचान पाती । अरे...ये वहीं तो हैं जिनके पास जड़ें नहीं है बस तना ही तना है ।'

‘अरे नहीं री.....मेरे कहने का तात्पर्य यह नहीं था, और तू तो मेरी बात से नाराज हो गई ।' वह फिर अपनी आँखें तरेरते हुए बोली, ‘अरी मेरे कहने का तात्पर्य तो यह था कि उन दोनों के बीच रिष्ता क्या था ?'

तब दूसरी बेंच इठलाते हुए बोली, ‘देख सखी, तुझे तो मालूम ही है कि मैं तेर बाद इस बगीचे में आई हूँ । जब मैं यहाँ आई थी तब सबसे पहले मैंने तुझे ही यहाँ बैठे हुए पाया था और इसी कारण मेरी सबसे अच्छी सहेली भी तू ही है । अब मुझसे ज़्यादा तो तू ही जानती है, ‘उन दोनों के बीच क्या रिष्ता था ?' उसने उल्टा सवाल कर दिया ।

‘हाँ, सखी.....यह तो सच है कि मैं तुझसे पहले इस बगीचे में आई और इस मायने में मैं तुझसे बड़ी हूँ और ज़्यादा जानती हूँ । यह भी पूरी तरह से सही कि मैंने तुझसे ज़्यादा समय इस बगीचे में बीताया है, मैने कई लोगों को यहाँ घुमते हुए देखा है, कुछ चेहरे तो रोज़ ही दिखाई दे जात हैं और कुछ कभी कभार ही आते हैं किन्तु ये दोनों जो आज यहाँ आए थे । उनको मैंने भी आज पहली बार ही यहाँ देखा था ।'

‘अब जब तूने ही इनको आज यहाँ पहली बार देखा था तब भला मैं इनको कैसे जान सकती हूँ और उनके बीच का रिष्ता कैसे बता सकती हूँ ।' पहली बेंच अकडते हुए बोली ।

‘धत्‌त तेरे की.....यह बात तो मेरी बुद्धि में आई ही नहीं । अच्छा....चल ये तो बता वे यहाँ बैठकर क्या बातें कर रहे थे....?' उसने फिर से जानने के लिए पूछा ।

‘देख बहना, मुझ पर शक न करना....मैं सच सच बता रही हूँ.....उन्होंने यहाँ बैठकर तो कुछ भी बात नहीं की ।'

‘क्या कहा....उन्होंने कुछ भी बातें नहीं की । बस चुपचाप बैठे रहे, ऐसा कैसे हो सकता है.....कहीं तू मज़ाक तो नहीं कर रही है ।' पहली बेंच आष्चर्य व्यक्त करते हुए बोली ।

‘नहीं सखी....मैंने तो तुझसे पहले ही कह दिया था मुझ पर शक न करना, पर तू तो वहीं कर रही है, मेरी बात का विष्वास कर ।' उसने फिर अपनी बात को पुष्ट करते हुए कहा ।

‘अरे नही री....मैं तुझ पर शक नही कर रही हूँ, मुझे पता है तू सच बोल रही है और मज़ाक भी नहीं कर रही है पर ये कैसे हो सकता है.....? चल अच्छा यह तो बता जब उन्होंने आपस में कोई बातें नहीं की तो फिर इतनी देर तक वे दोनों करते क्या रहे ?' पहली बेंच ने जिज्ञासावष पूछा ।

‘अब क्या बताऊ तुझे....वे दोनों तो मेरे दोनों किनारों पर निची नज़रें किए बैठे रहे इतनी देर तक जैसे अपने ही ख़्ायालों में गुम हो ।' इतना कह कर दूसरी बेंच चुप हो गई ।

‘क्या कहा....? बस बैठे रहे....! और कुछ भी नहीं किया.....? कुछ भी नहीं बोले....गुम सुम से......!' पहली ने आष्चर्य प्रकट किया ।

‘हाँ....और क्या...?' दूसरी ने प्रष्न दाग दिया ।

‘तो वें इतनी देर तक बगैर किसी कारण के तुझ पर बोझ बने रहे ?'

‘और नही ंतो क्या....बस थोड़ी थोड़ी देर में वह लड़का जो मेरे दाहिने हाथ की ओर बैठा था अपने जूतों से ज़मीन को थपथपाता और फिर चोर निगाहों से उस लड़की की ओर देखने लगता जो मेरे बाये हाथ की ओर बैठी थी । वह अपने होंठ को गोल गोल करके कोई फिल्मी गाना गाने का प्रयास करता किन्तु उसकी आवाज़ गलें ही फंस कर रह जाती और वह पुनः अपने में लौट आता और अपने जूतों से फिर ज़मीन को थपथपाने लगता ।' दूसरी बेंच ने बताया ।

इस पर आष्चर्य व्यक्त करते हुए पहली बेंच ने पूछा, ‘और वह लड़की क्या करती रही इतनी देर तक.....?'

‘अब मैं तुझे लड़की की क्या बताऊँ, वह मेरे बाये हाथ की ओर अपने आपमें सिमटी हुई बैठी रहीं जैसे छुई मुई सी कोई गुड़िया हो । पर हाँ...जब जब वह लड़का अपने जूतो से ज़मीन थपथपता तब तब यह अपने पैर के अंगूठे के नाखून से ज़मीन को कुरेदने लगती फिर अपने दुपट्‌टे को ठीक से कंधे पर डालती, तिरछी निगाहों से उस लड़के की ओर देखती

और फिर अपनी ऊँगली से मेरी पीठ को कुरेदने लगती.....।' दूसरी बेंच ने मायूसी से बताया ।

‘यह सब चलता रहा.....इतनी देर तक.....?' पहली बेंच ने फिर आष्चर्य व्यक्त किया ।

‘और नही ंतो क्या.....? मेरी तो समझ में नहीं आ रहा कि इन दोनों के बीच रिष्ता क्या था । क्यों मुझ पर इतनी देर तक संज्ञाहिन से बोझ बने रहे......? और फिर शहर से इतनी दूर इस बगीचे में आने की जरूरत क्या थी ? जब कुछ करना ही नहीं था तो यहाँ तक आये ही क्यों.....कहीं भी चले जाते....क्यों हमें नाहक परेषान किया....?' दूसरी बेंच ने अपनी आँखें तरेरते हुए फिर कहने लगी ‘अरी.....मैं तो अपने कान लगाकर उनकी रसभरी बातें सुनने के लिए उतावली हुए जा रही थी । हमारे पास तक आने वाले लोग अक्सर बेचैन रहते हैं । हम पर बैठते ही अपने दिल की भड़ास निकालने लगते हैं जैसे आफरे से तुरंत निजात पाना चाहता है आदमी ठीक उसी तरह से अपने आपको हल्का करने में तनिक भी समय नहीं लगाते लोग । अपने मन के गुबार को तुरंत निकाल देना चाहते हैं । और हम भी उनके एक एक शब्द को कैसे पी जाते हैं, कितना मज़ा आता है लोगों की प्यारी प्यारी बातें सुनने में ?' उसने भी अपने मन के गुबार को निकाल दिया ।

‘अरे वह सब तो ठीक है सखी.....पर मैं तो इसी सोच में पड़ी हुई हूँ ये दोनों उन सबसे अलग अपने ही ख़्ायालों में गुम इतनी देर तक चुपचाप बैठे हुए क्या सोचते रहे.....?' पहली बेंच ने फिर प्रष्न दागाा ।

‘अब मैं क्या जानू......? तू भी बार बार मुझसे ही पूछे जा रही है ।' दूसरी बेंच गुस्साते हुए बोली ।

‘अरी, चिढ़ती क्यों हैं.....मेरे सामने भी इस तरह की घटना पहली बार ही हुई है । अब ठहर जरा मुझे अपने दिमाग पर जोर देकर सोचने दे उनके बीच के रिष्ते के बारे में.....।'

‘तो जरा जल्दी कर ना.....अब तो मेरी उत्सुकता बढ़ती ही जा रही है ।'

‘हाँ......हाँ....सोच लिया । मेरे ख़याल से तो दोनों पति पत्नी रहे होंगे, घर से चलते समय दोनों में किसी बात पर झगड़ा हो गया होगा और यहाँ आकर वे दोनों अपने अपने स्तर पर सोचते रहे कि पुनः बात को कैसे शुरू किया जाये तभी वे दोनों तेरे दोनों किनारे पर बैठे अपने आसपास देखते रहे, एक दूसरे को कनखियों से देखते रहे और अपने जूतों और अंगूठे से जमीन को कुरेदते रहे ।' पहली बेंच अपन उम्रदा अनुभव के आधार पर बोली ।

‘मुझे तो तेरी बुद्धि पर हँसी आती है सखी...।' दूसरी बेंच ने उसका मज़ाक उड़ाते हुए कहा । वह हँसते हुए फिर बोली, ‘तू इतना भी नहीं देखा कि वह लड़की सलवार कमीज़ पहने थी ।'

‘तो क्या हुआ.....? आजकल तो सब चलता है ।'

‘चलो माना.....तुम्हारी इस बात पर विष्वास कर लिया जाये कि इस आधुनिक युग में सब चलता है । फिर भी जरा सोच तो सखी क्या उस लड़की के शरीर पर एक भी ऐसा चिन्ह या कि गहना था जो उसे कहीं से भी शादी शुदा होने का संकेत दे रहा हो, और तू उसे शादी शुदा कह सके । क्या उसने अपने पैरों में बिछुए पहन रखे थे । जो सुहागिन महिलाओं के पैरों में देखे जाते हैं । अच्छा बता क्या उसने अपनी माँग में सिंदूर भर रखा था, जो सुहागिन महिलाओं का प्रमुख श्रृंगार प्रसाधन होता है और क्या उसने अपने गले में मंगलसूत्र पहन रखा था, जो सुहागिनों का प्रमुख गहना है ?'

‘ये जो सब कुछ तू गिना रही है ना.....इनको छाड़े तो आज की महिलाओं को एक अर्सा बीत गया है । इस नई सदी की आधुनिक नारी को इस तरह की दकियानुसी बातें मानने में शर्म आती है आज । ये सब बातें तो बीते ज़माने की वर्षों पुरानी बातें हैं । तुझे पता नहीं है सम्यता ने आज बहुत प्रगति कर ली है । आज तो वह आदमी उतना ही आधुनिक है जिसने जितने चुस्त और कम से कम कपड़े पहने हैं ।' पहली बेंच ने अपने ज्ञान को उड़ेलते हुए बोला ।

‘हाँ....यह सब तो हैं ही....किन्तु मैं अब भी यह मानने को तैयार नहीं हूँ ि कवे दोनों पति पत्नी ही थे.....!'

‘तो तू ही बता.....?'

अब दूसरी बेंच सोच में पड़ गई । उसने अपने सर को खुजाते हुए बोला, ‘मेरे ख़्ायाल से तो वे दोनोें भाई बहन रहे होंगे । दोनों में से कोई एक किसी और को प्यार करता होगा और इस बात को वह बताना चाहता होगा कि ‘मैं फला से......।'

‘जी चाहता है कि मैं तेरी इस बात पर ठहाके लगाकर हँसू ।' वह फिर मुस्कुराकर कहने लगी, ‘तेरी छोटी सी बुद्धि में यह बात क्यों नही आती कि यहाँ इस सुनसान बगीचे में भाई बहन भला क्या करने आते......? क्या तुझे यह भी नहीं पता है कि यह बगीचा शहर से पाँच किलोमीटर दूर है ?'

‘तो क्या हुआ......?'

‘अरी पगली । कोई इतनी दूर भला अपनी बहन को लेकर आयेगा.....आज की इस भाग दौड़ ज़िन्दगी में आदमी के पास इतना समय कहाँ है कि वह शहर से पाँच किलोमीटर दूर अपनी बहन के साथ निरूद्‌देष्य बगीचे में घुमता फिर......कलयुग की इस मषीनी ज़िन्दगी ने आदमी को अपने मजबूत षिंकजे में इस कदर कर लिया है कि वह अपने बीबी बच्चों के लिए ठीक से समय नहीं निकाल पाता है । तो िुफर बहन की क्या बिसात.......?' इतना कहने के साथ वह फिर अपनी बात पर अडिग होते हुए बोली ,‘हो न हो.....वे पति पत्नी की रहे होंगे !'

‘नहीं.....नहीं.....। वे तो भाई बह नही थे ।'

‘पतिदृपत्नी ।'

‘भाई दृ बहन ।'

‘मैं कह रही हूँ...... पतिदृपत्नी ।'

‘और मैं कहती हूँ....... भाई दृ बहन ।' इस तर दोनों में बहस होने लगी ।

इन दोनों में इसी तरह बहस चल रही थी तभी पीछे से किसी के मुस्कुराने की आवाज ने उन दोनों का ध्यान अपनी ओर खीचा । वे दोनों देखने लगी कि उनके पीछे खड़ा खड़ा बड़ का पेड़ और जोर जोर से हँस रहा है । ये दोनों अपने दांतों में उंगली दबाये उसे इस तरह हँसते हुए देखने लगी । उसी समय इन्हें अपने छोटेपन का अहसास होने लगा । तभी दोनोें ने दौड़कर बड़ के पेड़ के पैर पकड़ लिये और कहने लगीं, ‘बड़ बाबा....बढ़ बाबा....! आप उम्र में हमसे काफी बड़े हैं । आपके तो सारे बाल सफेद हो गये हैं और आपका अनुभव भी हमसे बहुत ज्यादा है, हम दोनों एक अजीब सी परेषानी में फस गई हैं.....!'

तभी बड़ मुस्कुराकर बोला, ‘मैं जानता हूँ तुम्हारी परेषानी को....? मैं काफी देर से तुम्हारी बातें चुपचाप सुन रहा था । मैंने उन दोनों को भी आते और जाते हुए देखा है जिनके बारे में तुम परेषान हो रही हो और आपस में उलझ रही हो.....।'

बड़ की बातें सुन कर दोनों बेंच एक साथ बोली, ‘बड़ बाबा....! ते फिर आप अपने अनुभव और दूरदृष्टिता से हमारी इस उत्सुकता का समाधान क्यों नहीं कर देते ? आपने तो उन दोनों को यहाँ बैठे हुए भी देखा था......तो फिर उन दोनों के बीच रिष्ता क्या था..?'

‘इसमें कौन सी बड़ी बात है....?' बड़ अपनी लम्बी लम्बी जटाओं पर हाथ फेरते हुए अपने लम्बे अनुभव के मद में चूर अपनी गर्वीली आवाज़ में बोला, ‘मेरा अनुभव कहता है कि वे दोनों प्रेमी प्रेमिका रहे होंगे । इसके अलावा उन दोनों के बीच कोई रिष्ता हो ही नहीं सकता । उनका मेल मिलाप अभी नया नया होगा । मेरा अनुभव कहता है प्रेमी कुछ ज्यादा ही आक्रान्त होते हैं आरम्भ में....इसीलिए तुम देख रही थी न वह लड़का बार बार अपने जूते से किस तरह से ज़मीन को ठोके जा रहा था । वे दोनों शादी करना चाहते होंगे और उनके माता पिता ने उनको इसकी अनुमति नहीं दी होगी । बस इसी कारण वे दोनों घर को छोड़कर यहाँ आ गये । एक मायने में इस शहर में उनका अभी ही प्रवेष हुआ होगा । तुमने देखा नहीं था । यहाँ बैठे वे दोनों किस तरह से अपने ही ख़यालों में गुम थे । दुनिया जहान को भुल कर दुनिया जहान के बारे में ही सोच रहे थे । किस तरह से वह लड़का अपने जूतों से बार बार ज़मीन को थपथपा रहा था । मानो कहना चाह रहा हो कि ‘मैं जिसको पाना चाह रहा था उसे पा लिया । यह दुनिया तो बस जूतों की भाषा समझती है । इसीलिये मैंने सभी को इन जूतों के नीचे मसलकर रख दिया है ।' तो वहीं दूसरी तरफ वह लड़की छुईमुई सी अपने ही आँचल में सिमटी हुई यह सोच रही थी कि ‘मैंने अपने ही हाथों से अपने कुल की मर्यादा को इस तरह उछालकर फेंक दिया जैसे कोई माली किसी सड़े हुए पौदे को बगीचे से उखाड़कर फेकता है ।' बस इसी सोच में वह अपने पैरों के नाखुन से ज़मीन को कुरेदकर अपनी बेबसी का परिचय दे रही थी । वह बार बार अपने आँचल को ठीक करते हुए सोच रही थी, ‘मैं नारी हूँ, कोमलांगी हूँ लेकिन वक्त आने पर यही नारी दुर्गा का रूप भी धारण कर लेती है ।' अपनी ऊँगलियों के नाखुन से तुम्हारी पीठ को खुजलाते हुए वह अपने अन्दर छुपी हुई उसी ताकत को उजागर करने का प्रयास कर रही थी । भई मेरे अनुमान से तो उन दोनों के बीच प्रेमीदृप्रेमिका के अलावा और कोई रिष्ता हो ही नहीं सकता ।' इतना कहकर बड़ हाँफने लगा ।

बड़ की इस बात पर दोनों बेंचें ज़ोर ज़ोर से हँसने लगी । उनकी हँसी की गूँज पूरे बगीचे में फैल गयी और सब की नज़रें उन पर आकर टिक गई । किन्तु वे दोनों तो मारे हँसी के दुहरी हुई जा रही थी । बड़ विस्फारित नैत्रों से उनको हँसते हुए देखने लगा । परन्तु वे दोनों तो हँसती ही जा रही थी.... हँसती ही जा रही थी । अन्त में बड़ ही गुस्से में आकर बोला, ‘ये क्या पागलपन लगा रखा है तुम दोनों ने..?'

दोनों बेंचे एक दूसरे की ओर देखकर आँखों ही आँखों मेें इषारे करने लगी । फिर एक बेंच ने हिम्मत करके बड़ की ओर देखते हुए कहा, ‘बड़ बाबा...तुम्हारे दिमाग़ पर वक़्त ने जंग लगा दिया है । जो कहानी तुम अभी हमें सुना रहे थे वह तो जैसे ऐतिहासिक लगती है । इस प्रकार की कहानियाँ तो अब मात्र किताबों में ही पढ़ने को मिलती है । अब भला इसमें तुम्हारा भी क्या दोष ? दोष तो बस तुम्हारी याददाष्त का है । जिस घटना को तुमने अपनी जवानी के दिनों में देखा या सुना था उसे तुम्हारी याददाष्त आज भी भुला नहीं पाई है और किसी रटन्तु तोते की तरह लगातार दोहराती चली जा रही है । इस प्रकार तुम एक ही लीक पर चलने वाले बैल की तरह अन्धे हो गये हो जिसे और कुछ दिखाई ही नहीं देता है । तुम्हें नहीं मालूम कि आज आदमी इस तरह की भावनाओं को छोड़कर काफी आगे निकल गया है । नाते रिष्ते, मान अपमान और भावनाओं की ज़मीन को उसने बहुत पहले छोड़ दिया है जहाँ प्रेम, ममत्व, अपनत्व तथा कुल मर्यादा की जंजीरे बाँधने की कोषिष करती थी । तोड़ दी है उसने वे सारी कड़ियाँ जिससे इस तरह की जंजीर तैयार होती थी । और जो आदमी को नियन्त्रित करती थी । आज का आदमी स्वतंत्र है....पूर्ण रूप से आज़ाद...!'

बड़ बेंच की एक साथ इतनी सारी दलीलें सुुनकर बौखला गया । वह अपने आपको सम्हाल भी नहीं पाया था कि तभी दूसरी बेंच उससे मुखातिब होकर कहने लगी, ‘बड़ बाबा....! आपने तो अनुभव का खूब परिचय दिया । हम तो समझते थे कि हमें भी आपके अनुभव से कुछ ज्ञान प्राप्त होगा, किन्तु हमारी मान्यता थोथी निकली । दुःख है तो इसी बात का और आष्चर्य है तो इस बात का कि फिजूल में हमने अपना इतना समय क्यों गंवाया । ऐसा लगता है कि आप वर्तमान में नहीं जी रहे हैं । जो वर्तमान में नहीं जीता है लोग उसे भुला देते हैं । आपको शायद इस बात का पता नहीं है नहीं तो आप इस तरह की बे सिर पैर की बातें नहीं करते । अब भला आपको कैसे बताएं इस मषीनी युग में कोई लैला मजनू की तरह इतना घनिष्ट प्रेम कर सकता है भला...और वह भी उसके लिए सब कुछ छोड़ दें....? अरे आज के ज़माने में तो बगैर कुछ खोये बहुत कुछ पा लेना चाहते हैं लोग....आप किस संसार में जी रहे हैं ?'

बड़ फिर छटपटाया, उसकी सारी जटाएं एक साथ हिलने लगी । और बेंचे पहले की तरह ही ठहाके लगाकर फिर से हँसने लगी । हँसते हुए एक बेंच दूसरी से बोली, ‘अरी चल सखी....! तू भी किस दकियानूस के चक्कर में फँस गई । वह बूढ़ा क्या बतायेगा जिसकी दृष्टि ही कमजोर और कुंद हो । चल....चल किसी ओर से इस सम्बन्ध में पूछते हैं ।' इतना कहते हुए दोनों बेंचे वहाँ चल दी और बगीचे से बाहर निकल आई ।

मैं पास ही के गमले में पड़ा उनको बाहर जाते हुए देखता रहो, वे दोनों मेरी नज़रों से ओझल हो गई तब मैंने अपनी नज़र घुमाकर बड़ की ओर देखा, उस समय उसकी शक्ल देखने लायक थी । उसका सारा का सारा बड़प्पन पानी के रेले की तरह बह गया था । उसकी शक्ल ऐसी लग रही थी मानो किसी ने भरे बाज़ार में उसके कपड़े उतारकर उसे निरवस़्त्र कर दिया हो । उसकी आँखों से अंगारे बरसने लगे । वह गुस्से में झुँझलाते हुए बोला, ‘न जाने क्या समझती है अपने आपको...ज़मीन से निकल भी नहीं पाई कि आ गई मुझे षिक्षा देने । ये नई पीढ़ी न जाने किस मंज़िल पर पहुँचेगी ? भगवान ही मालिक है क्या होगा इन लोगों का.....?'

बड़ के इस तरह नाराज़ होने पर मुझे क्षोभ होने लगा, लेकिन फिर वही प्रष्न मेरे मानस में भी घुमने लगा और मैंने अपने साथी फूल के कान के पास अपना मुँह ले जाकर पूछ लिया, ‘यार....तू ही बता......आखिर उन दोनों के बीच रिष्ता क्या था.....? जो इस सूनसान बगीचे में आये और थोड़ी ही देर में हलचल पैदा करके चले गये ।'

वह मेरी तुच्छ बुद्धि पर मुस्कुराने लगा और सगर्व बोला, ‘अपनी छोटी सी बुद्धि से इतना भी नहीं समझते । वे दोनों तो दोस्त थे । टहलते टहलते यहाँ तक चले आए, और जब थक गये तो यहाँ पर कुछ देर सुस्ताकर वापस चले गये....बस इतनी सी बात को इन लोगों ने बतंगड़ बना दिया ।'

मेरे साथी फूल ने मेरी अल्पज्ञता पर अपनी सर्वज्ञता की छाप छोड़ते हुए उस प्रष्न का एक और समाधान प्रस्तुत किया । जो समाधान रूपी उस जंजीर की एक और कड़ी बन गया । जो विचारणीय भी था ।

मैं इन्हीं के बारे में सोच रहा था कि तभी अचानक मेरे दिमाग में एक बात आई जब वे दोनों बेंचें किसी और से पूछ कर अपने स्थान पर वापस आयेंगी तब जाकर मैं उन्हीं से पूछ लूँगा, ‘कुछ पता चला आखिर उन दोनों के बीच रिष्ता क्या था.....?'

लेकिन मुझे इन्ज़ार करते हुए बरसों बीत गय । बेंचें अभी तक लौटकर नहीं आई हैं । मेरी आँखें आज भी उसी जगह पर लगी हुई है, जहाँ वे दोनों बैठा करती थी । मेरा इन्तज़ार अभी भी जारी है क्योंकि मुझे विष्वास है कि एक न एक दिन वे दोनों लौटकर जरूर आएंगी ।

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