यादों की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई Ramesh Desai द्वारा फिक्शन कहानी में हिंदी पीडीएफ

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यादों की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई

                         : प्रकरण -9 

ललिता बहन से बातचीत का नाता कुछ समय तक टूट गया था. उन की सभी हरकते फ़िल्म की खल नायिका ललिता पवार जैसी थी. ईस लिये मैं उन्हें उसी नाम से हीं बुलाता था.

मुझे उन की फ़िक्र नहीं थी. सुजाता के साथ बात करना, उस के साथ बाहर घूमना, फिल्मे देखना, होटल में जाना हमारा मेनू बन गया था. बाजू में रहने के बावजूद ललिता पवार को उस की भनक तक नहीं आनी दी थी.

उस की कोलेज की ओर से ' सरस्वती चंद्र ' फिल्म का विशेष शो प्रायोजित किया गया था. मैं भी वह देखने जाऊंगा. ऐसा ललिता पवार को संदेह था. इस लिये वह किसी को बेटी की जासूसी करने के लिये थियेटर भेजनें वाले थे. सुजाता ने मुझे फ़िल्म देखने से पहले यह बात बताई थी.वह अनिकेत को इस काम के लिये भेजेगी.

सुजाता का यह तर्क था.

सुनकर में नचिंत हो गया था.अनिकेत के साथ मेरी अच्छी बनती थी, मुझे विश्वास था, वह जरूर हमारी मदद करेंगा. उन्हों ने थियेटर तक तो किसी को भेजा नहीं था. फ़िल्म छुटते ही मैं टैक्सी में सुजाता और मेरे दो मित्रो के साथ नुक्कड़ पर उतरा था..उस वक़्त देवरानी जेठानी वहाँ मौजूद थे. उस से कुछ साबित नहीं हुआ था,  हम लोग साथ में फ़िल्म देखने गये थे. सुजाताने अपनी और से खुलासा किया था.

 "वह लोग टेक्सी में आ रहे थे औऱ उन्हों ने मुझे लिफ्ट दी थी "

.और बात यही ख़त्म हो गईं थी.

.उस की एक सहेली मुझे अच्छी तरह पहचानती थी. उस ने हम दोनों को अपने घर बुलाया था.

 शादी के पहले किसी के घर जाना नहीं चाहिए था. वह हमारी गलती थी. साथ साथ सहेली ने भी हमें बुलाकर भूल की थी. उस की मा को यह पता चला तो उन्हों ने भी टकोर की थी.

उस के बाद वह सहेली सुजाता को मिलने घर आई थी .मैं उसे जानता था. इस लिये मैंने उसे अपने घर में आमंत्रित किया था. हम लोग किचन में बैठ कर बातें कर रहे थे. उस वक़्त गीता बहन और भाविका भी हमारे साथ थे. ललिता पवार को पता चला तो वह सीधा मेरे घर के भीतर किचन में घुस आये थे और दोनों को अपने साथ ले गये थे. इतना ही नहीं उन्हों ने सुजाता को बहुत डांटा था.

उस के बाद रात को कुछ सिखने के बहाने वह मेरे पास आई थी. उस वक़्त ललिता बहन अपनी बेटी को घर के भीतर ले गये थे, और मुझे भांड़ने लगे थे. 

मुझे ' लुच्चा' भी कहां था.. यह बात मैं झेल नहीं पाया था. मेरा गुस्सा ज्वाला मुखी की तरह फट गया था.फिर भी वह यह बात स्वीकारने था को तैयार नहीं थे. उस के लिये उस ने अपनी छोटी बेटी की जूठी कसम भी खाई थी.

यह आखिरी कक्षा की बात थी. कोई भी मा ऐसी अपनी बेटी की जूठी कसम कैसे खा सकती है.

उसी पल से ही वह मेरे मन से उतर थे. मैं उस क़ो मा नहीं मान सका था.

उस वक़्त सुहानी ने उस का विरोध किया था तो जाकर उस ने दूसरे दिन आकर मेरे पिताजी के सामने पलटी मारी थी. जूठी सफाई पेश की थी.

" मैंने आप के बेटे को लुच्चा नहीं कहां था, लेकिन उस का गुस्सा शांत करने के लिये मैंने झूठ का आसरा लिया था."

एक मा का ऐसा रूप देखकर मुझे बहुत खुन्नस आया था. और मैंने पूरी तरह उस से बोलना चालना बंद किया था.

लेकिन मैं और सुजाता निरंतर बाहर मिलते थे, घूमते थे, होटल में जाते थे और फिल्मे भी देखते थे.घर में केवल सुहानी को हमारे प्यार के बारे में जानकारी थी. लेकिन वह हमारे मुआमले में बिल्कुल चूप थी, क्यों की वह भी हमारी नैया की सवार थी. अनिश के साथ उस का रिश्ता हम से आगे निकल गया था. हमने कई बार उन्हें हैंगिंग गार्डन की झाड़ी में धूमते, सहलते और इश्क़ फरमाते हुए देखा था.

हमें इस इलाके का बुरा अनुभव था. हम लोग उन्हें रोकना चाहते थे. लेकिन हमारे बीच कोई बात चीत का सम्बन्ध नहीं था. इस लिये हमने चुप रहना ज्यादा मुनासिब  समझा था. 

ऐसी मा अपनी संतानो क़ो कया शिक्षा देगी?

यह मिलियन डॉलर का सवाल था!

अपने बच्चों पर ललिता पवार का कोई काबू नहीं था. वह भी अपनी दुनिया में मस्त रहते थे . पराये पुरुषो से बातें करना, उस के साथ उठना बैठना अच्छा मुफ्त के खाना पीना मेनू बन गया था.

जो उस के काम का आदमी या औरत था, उस के साथ वह खुले मन संबंध रखती थी. उस को घर में लेती थी. बाकी किसी ओर को पानी के लिये पूछना भी  संस्कार में शामिल नहीं था.

कुदरत की गति बहुत ही न्यारी हैं. उस की वजह से मानव जिंदगी में ना जाने कितने तूफान आते हैं, उस का क़ोई अंदाजा नहीं लगाया जा सकता हैं..

' सब कुछ यहीं चुकाना हैं. ' 

इस बात का मैंने संपूर्ण तौर से स्वीकार कर लिया था. कदम कदम पर मुझे इस बात का अनुभव भी हुआ था.

वह किसी को भूखा सुलाता नहीं हैं. यह एक सनातन सत्य था..मेरी समस्त जिंदगीमें मुझे सदैव दुःख, तकलीफो का आस्वाद प्राप्त हुआ हैं. 

लेकिन यहाँ कुछ नया हुआ था. विपरित माहौल में मुझे सुजाता मिल गई थी, और मैंने आर्य समाज विधि से सभी संबंधी, रिश्तेदार और परिचित लोगो की मौजूदगी में प्रेम विवाह रचाया था.

सुजाता की मा को हमारा रिश्ता पसंद नहीं था. इस लिये हमने उन्हें बताने की जरूरत नहीं समझी थी.

उस के 18 साल पूर्ण होते ही हम लोगो ने शादी कर ली थी.बाद में एक व्यवहार के तौर पर मेरे पिताजी ने शादी के बाद सुजाता की मा को फोन पर खबरी सुनाई थी. सुनकर वह लाल पिले हो गये थे. अपनी जैठानी और घर के नौकर को लेकर आर्य समाज होल में दौड़े आये थे. हम लोगो से झगड़ने पर उतारू हो गये थे. ललिता पवार से  ज्यादा उस के घर का नौकरने ज्यादा पझेसिव - मालिक की तरह मुझे सवाल किया था:"

" यह तुमने क्या किया? "

मैंने उस को रोकते हुए अपमानित करते हुए बाजु कर दिया था.  वह तो मुझे मरने मारने के लिये तैयार हो गया था.

उस वक़्त होल के सदस्य ने उसे मारकर होल से बाहर निकाल दिया था.

उस वक़्त ललिता बहन ने मुझ पर अपनी लड़की पर जबरदस्ती करने का इल्जाम लगाया था.

हम लोग एक रूम में बैठे थे. उस वक़्त उन की जैठानी हमारे पास आई थी. सब लोग उसे ' बड़ी मा ' के नाम से बुलाते थे. मैंने बड़ी विनम्रता से उन से बातें की थी.

" यह आप की भतीजी आप के सामने हैं. उसे पूछिये हमने उस के साथ मैंने क़ोई जबरदस्ती की हैं? अगर वह हां कहे तो आप उसे अभी अपने घर ले जाइये. और मैं यह शादी भूल जाऊंगा. "

बड़ी मा को मेरी सच्चाई पर पूरा विश्वास था. उन्होंने उसे मान लिया था. माहौल बिगड़ा हुआ था. इस स्थिति में उन की पड़ोस में रहना सलामत नहीं था. इस लिये पिताजी ने गीता बहन की मौसेरी बहन के खाली फ्लेट में रहने का बंदोबस्त कर लिया था.

एक ही हप्ते में सासु मा की सान ठिकाने आ गई थी. वह अपने कुछ रिश्तेदारों को लेकर हमारे घर आई थी. और प्रस्ताव रखा था.

" मैं सत्कार समारोह का आयोजन करना चाहती हूं."

"हमें इस बात से भला क्या इन्कार हो सकता था?  हमने तुरंत हामी भर दी थी.और दो दिनों में सत्कार समारोह आयोजित किया गया था.

                       0000000000  ( क्रमशः )