: प्रकरण 11 :
प्रकाश के जन्म पहले मैं एक छोटी सी कंपनी में काम करता था. उस में कोई भविष्य नहीं था. मैं दूसरा जोब तलाश कर था. तब वहाँ एक परिचित बुजुर्ग व्यकित आती जाती रहती थी.
उन की सिफारिश से मुझे ' प्रेम सन इंटरप्राइज ' में काम मिल गया था.
प्रकाश के जन्म के एक महिने के भीतर ही मुझे यह जोब मिला था. मैं पहले जहाँ काम करता था, वहाँ 175 रूपये मिलते थे और प्रेम सन का जोब मैंने 150 में स्वीकार किया था. मेरे पास उस के अलावा क़ोई विकल्प नहीं था.
हकीकत में मैंने पढ़ाई के दौरान एक पार्ट जोब किया था, रोजाना चार घंटे काम करने के बाद मुझे केवल 75 रूपये मिलते थे.
मैं शादी सुदा था. एक बच्चे का बाप भी था. ईस बात को समझते हुए कंपनी के जूनियर पार्टनर श्याम कुमार ने महिने के अंत में ही खुद मुझे कहां था.
" तुम्हे 200 रूपये पगार मिलेगा ! . "
तब मैं जानता नहीं था. लेकिन उस की बीवी नीता मेरी बाजू में रहने वाले सीता बहन की नातून थी. वह बार बार वह हमारे बिल्डिंग में आती थी. उस के साथ मेरी दोस्ती हो गई थी. हम दोनों साथ साथ खेले भी थे.
पहले तो मुझे मालूम नहीं था. लेकिन उस के छोटे भाई की शादी में यह राज खुला था.
मैं सब कुछ काम करता था. फिर भी उस के बड़े भाई राम कुमार का शक्की स्वभाव मुझे रास नहीं आता था. ईस बजह से हमारे बीच बार बार नोक झोंक होती रहती थी.
मेरे साथ दो तीन लड़कियां भी काम करती थी. उस के साथ मेरी अच्छी बनती थी. दो लड़कियां कैथोलिक घराने से थी. वह मुझे बहुत सन्मान देती थी.
वह दोनों एक बार मेरे घर भी आई थी . मेरे घरवालों ने उन का आदर सत्कार किया था.
उस के अलावा एक ओर लड़की थी, वह भी केथलिक बिरादरी से ताल्लुक रखती थी. उस ने मेरे बारे में जानने के लिये दिलचस्पी दिखाई थी. उस ने मुझे गुजारिश की थी.
" मुझे आप के बारे बहुत कुछ जानना हैं. "
ओफिस में राम कुमार और श्याम कुमार की उपस्थिति में बात करना मुमकिन नहीं था. मैंने लंच दौरान उसे होटल में बुलाया था. लेकिन वह नहीं आई थी. बाद में मैंने उस से बातचीत करना छोड़ दिया था.
ओफिस में एक बूढा आदमी भी काम करता था. वह कंपनी के बारे में कुछ ना कुछ बडबड करता रहता था. कंपनी उस की हरकतों से नाराज थी. लेकिन वह काम की चीज था. इस लिये साप भी काम आता है ऐसा सोचकर ओफिस में रखा था.
मैं उन की आदतों से अवगत था. ईस लिये उस से दूर रहना पसंद करता था.
बड़ा भाई राम कुमार की नियत ठीक थी. उन्हों ने कभी ओफिस में काम करने वाली लड़कियो पर बूरी नजर नहीं डाली थी. अपने मतलब के लिये इस्तेमाल नहीं किया था.
लेकिन दूसरा भाई श्याम कुमार चैप्टर था. वह एक नंबरी ऐय्यासी किस्म का आदमी था.. क़ोई ना क़ोई बहाने लड़कियों को बाहर ले जाता था, खाना खिलाता था और पैसों की लालच देकर उन का यौन शोषण करता था.
दोनों भाई अपने आप में अजीबो गरीब नमूने थे.
लेकिन मैं उन की परवाह नहीं करता था.
सीधा मुंह बात करता था.
मैं एक लेखक था. उस बात को मैंने साफ शब्दों में उन के सामने जिक्र किया था, जिस ने उन के भीतर एक खौफ पैदा को किया था. लेकिन उस के रवइये ने उस बात की मुझे भनक नहीं आने दी थी.
पगार का स्केल भी बिल्कुल निम्न स्तर का था. बढ़ती हुई महंगाई में सब के लिये मुश्किल हो रहा था..
यह सोचकर ओफिस में सब स्टाफ ने मिलकर दोनों भाई यों से बात करने का निर्णय लिया था. लेकिन किसी भी सामने चलकर बात करने की हिम्मत नहीं थी. मैंने छोटे से चपरासी के बारे में सिफारिश की थी, तो उन्हों ने उड़ा दी थी. मुझे उन दोनों का कोई भरोसा नहीं था.
मैं कंपनी का सिनियर स्टाफ था. सब लोगो ने मुझे उन से बात करने की हिमायत की थी.
लेकिन मैं कोई जोखिम लेना नहीं चाहता था.
उन्ही दिनों गणपति का त्यौहार आ रहा था. उस दिन सब कुछ बंद होता हैं. हम लोग भी छुट्टी चाहते थे. उस के लिये हमने लिखित गुजारिश की थी.
सब ने उस पर साइन किया था.
दोनों भाई उस वक़्त ओफिस में नहीं थे. मैंने अर्जी उन के टेबल पर रख दी थी. आते ही वह अर्जी देखकर आग बबूला हो गये थे.
उन्हों ने अकाउंटेंट को बुलाकर सुचना दी थी.
" इस में लिखो. जो कोई भी कल ओफिस नहीं आयेगा. उसे ओफिस से बाहर निकाल दिया जायेगा. "
सुनकर सब को बुरा लगा था. उन के ऐसे फैसले से मुझे भी बड़ा झटका लगा था.
और दूसरे दिन कोई ओफिस में नहीं आया था.
उस से राम कुमार का गुमान चकनाचूर हो गया था.
मैंने उन के ऐसे रवइये पर खरी खोटी सुनाई थी.
" आप ने एक बिनती, गुजारिश के बदले धमकी देखकर आप की बुद्धि का प्रदर्शन किया हैं. आप की इस हरकत से आप कितने गये गुजरे हो उस का प्रमाण पत्र मिल गया हैं. "
" अगर आप ने कहां होता. ओफिस में कुछ पेंडिंग काम निपटाना हैं तो मैं सब को ओफिस में ले आता."
इतना सब कुछ होने के बाद एक लडके ने मेरी पीठ के पीछे छूरी मारी थी. वह मेरा अच्छा दोस्त होने का दावा था..
राम कुमार ने उसे लोन दिया था. उस वजह से उस का हाथ पत्थर के नीचे आ गया था. वह लाचार, विवश था. राम कुमार ने उसे तुरंत लोन भरपाई करने का आदेश दिया था..और उसे अकेले ओफिस आना पडा था.
बाकी कौन आया था? वह तो मालूम नहीं था.. लेकिन सब माफ़ी मांगकर चुपचाप बैठ गये थे.
और राम कुमार ने मुझे जोब से बर्खास्त कर दिया था. और हिसाब कोर्ट में जाकर वसूल करना..ऐसा आदेश सुनाया था.
तब मैंने भी उसे ललकारा था.
"मेरे पास हमारी अर्जी की नकल हैं. तुमने एक बिनती के सामने हमें धमकी दी हैं . कोर्ट भी तुम्हे नहीं बक्शेगी.
मैंने उन्हें मुंह तोड़ जवाब दिया था.
उस वक़्त उस का दुबई स्थित भाई मौजूद था. उस ने मुझ पर पेपर चोरी का इल्जाम लेकर अपनी अधमता का परिचय दिया था.
मैंने उसे भी साफ सुनाया था.
" क्या तुम लोगोने मुझे अपनी तरह बेवकूफ समझ लिया है ? मैंने खुद का कागज इस्तेमाल किया था . मैं तुम लोगो को भी मेरी हैसियत से धूल चटवाऊंगा! "
ऐसा कहकर मैं उन की ओफिस से बाहर आ गया था.
मेरे साथ अन्याय हुआ था. यह बात मैं कभी भूला नहीं पाया था. मैंने उन्हें सबक सिखाने का ठान लिया था.
मैने नया जोब ज्वोइन किया था.
उसी समय एक सामायिक के तंत्री से मेरी मुलाक़ात हुई थी. वह एक साप्ताहिक भी चलाते थे. मैंने उस पेपर के जरिये राम कुमार की कंपनी को नंगा किया था..
मैंने उस चमचे को साप्ताहिक न्यूज पेपर के तंत्री से एक बार मिलाया था . वह उस का पेपर पढ़ता था.. उस ने मेरा आर्टिकल पढ़ा था और जाकर राम कुमार को भड़काया था.
उस ने मेरा एड्रेस ढूंढ़कर राम कुमार को दिया था! और उस ने ' शेठ ब्रधर्स ' को उस की कॉपी के कुछ हिस्सों अंडर लाईन कर के पोस्ट करवाई थी.
उन बेवकुफो को कहाँ पता था?. उस के पहले मैंने उस लेख की दो प्रत ओलरेडी 'शेठ ब्रदर्स ' क़ो दी थी.
जिस में मैंने ' शेठ ब्रदर्स ' के भी कुछ राज खुल्ले किये थे. जिस में फ्लोरा के साथ किये गये अन्याय की बात का ब्यौरा शब्दश पैश किया था. .
000000000 ( क्रमशः )