: प्रकरण - 18 :
एक दिन सुजाता के चचेरे भाई का फोन आया था.
" मेरे डैडी मरने से पहले एक बात कहकर गये हैं.
" संभव कुमार को अपनी कंपनी में ऱख लेना! "
सुनकर मैं बहुत खुश हुआ था. ईश्वर का शुक्रिया माना था.
इस नौकरी के साथ भगवान ने मुझे अनमोल उपहार दिया था.
जिस का नाम संगीता था.
मैंने उस के नाम का अंग्रेजी करण किया था
' म्यूजिका'
यह नाम उसे बहुत पसंद आया था.
वह दक्षिण भारतीय लड़की थी.
उस के पिताजी कोमी दंगल का शिकार हो गये थे. वह अपने मामा मामी के साथ रहती थी.
हमारे बीच एक अनूठा रिश्ता बन गया था.
मैं उसे बेटी मानता था.
वह मुझे पापा कहती थी.
हम लोग एक ही बेंच पर बैठने वाले स्टूडेंट्स थे. दोनों के बीच उम्र का बड़ा फर्क था. उस ने कुछ कंप्यूटर के बारे में मुझे जानकारी दी थी..
हमारे इस रिश्ते को एक महाराष्ट्रीयन लड़की ने सहयोग दिया था. हमारे रिश्ते की तारीफ की थी.
मैं हररोज उस के लिये कुछ ना कुछ खाने की चीजे ले जाता था..
एक बार उस ने मुझे कुछ कहां था. सुनकर मुझे बुरा लगा था. मैं किचन में जाकर रोने लगा था.. उसे किसी ने बताया था तो वह तुरंत मेरे पास दौड़ी आई थी.
मेरे आंसू पोछे थे. मेरी जेब से टेबलेट निकालकर मुझे खिलाई थी. और तहेदिल से मेरी मांफी भी मांगी थी..
हम लोग रोज साथ में खाना खाते थे. और वह सदैव मेरी बाजु में बैठती थी..
इतवार के दिन भी हम लोग फोन पर बात करते थे.
उन दिनों ओफिस का शिफ्टिंग हुआ था.. उस के लिये पूजा रखी गई थी. उस वक़्त सुजाता और वह दोनों मिले थे. उस ने मेरी बीवी के पांव छुए थे.
एक बार इतवार को मैंने उसे फोन किया था. तब घर में कुछ मेहमान आये हुए थे.. उस ने मुझे बताया था..
और दूसरे दिन दफ्तर में कदम रखते ही उस ने खुशी खबर सुनाई थी.
" पापा! आप का सपना सच हुआ.. कल मुझे देखने एक लड़का अपने परिवार के साथ आया था.. हम दोनों एक दुसरो on the spot पसंद आ गये हैं.. अगले इतवार को मेरी सगाई भी होने वाली हैं.. ".सुनकर मेरी खुशी की कोई अवधि नहीं बची थी.
मैंने उस की सगाई में हाजरी दी थी.. उस के मंगेतर का नाम प्रसाद था.. मैंने सगाई की रस्म निभाते हुए एक लिफाफा दिया था. प्रसाद को गले भी लगाया था.
और यह सिनारियो केमेरा मेन ने केमेरा कैद कर लिया था.
उस की शादी के कार्ड भी छप गये हैं.
रिवाज़ के हिसाब से एक पिता बेटी का पहला कार्ड भगवान की छबी के पास रखता हैं. उस का श्रेय उस ने मुझे देते हुए कहां था.
" आप मेरे पिता क़ी तरह यह पहला कार्ड भगवान क़ी छबी के पास रखो ."
उस ने मुझे सन्मान दिया था ऊस बात का मुझे गौरव हुआ था.
मैं ऊस के कंधो पर हाथ कर भगवान क़ी छबी के पास ले गया था. इस बात से चाचा का लड़का बहुत खुश हो गया था.
मैंने संगीता को भगवान क़ी छबी के सामने ख़डी कर के ऊस के हाथो में कार्ड रखकर बिनती क़ी थी.
" बोलो भगवान मेरी शादी क़ी यह पत्रिका में अपने पिता का नाम लेकर तुम्हारे चरणों में रखती हूं.. तुम ऊस का स्वीकार करो. "
यह दृश्य देखकर हर कोई प्रभावित हो गया था.
म्यूझिका मेरे गले रखकर रोने लगी थी.
मेरे लिये तो यही ऊस क़ी सच्ची बिदाई थी.
मैं उसे गीत के जरिये बिदाई देना चाहता था.
ऊस के पहले वह खुद अपनी बिदाई मांग रही थी.
खुशी खुशी कर दो बिदातुम्हारी बेटी राज करेंगीमहलो का राजा मिला के रानी बेटी राज करेंगी
यह सुनकर मेरा दिल भर आया था. ऊस पर उसने गीत को आगे बढ़ाया था.
बेटी तो हैं धन ही परायापास कोई कब ऱख पायाअपने बाबुल जी देंगे दुआके रानी बेटी राज करेंगी
ऊस पर मेरे होठों पर गीत आ गया था
बाबुल क़ी दुवाये लेती जाजा तुझ को सुखी संसार मिलेमैं के कभी ना याद आये ससुराल में इतना प्यार मिले
बीते तेरे जीवन क़ी घड़िया आराम क़ी ठंडी छावो में कांटा भी न छूने पाये मेरी लाडली तेरे पावो में
मैं आगे गा नहीं पाया क्यों क़ी संगीता रो रही थी.
मैंने फिर उसे गले लगाया था और नियत समय उसे स्टेशन तक छोड़ने का फेंसला किया था और उसे स्टेशन भी छोड़ आया था. हमें देखकर ऊस क़ी मम्मी और मामी भी भावुक हो गये थे.
म्यूझिका मुझ से दूर हो गई थी लेकिन ऊस ने मेरे दिल में अपनी जगह बना ली थी.
प्रसाद के साथ मेरी अच्छी दोस्ती हो गई थी.
मै अक्सर फोन पर ऊस से बात करता था.. मैं क्या बात करता था. यह जानने के लिये वह म्यूझिका सदैव उत्सुक रहती थी.
एक बार उसे चिढ़ाने के ख्याल से मैंने उसे कहां था.
" मैं अक्सर प्रसाद से एक ही बात करता हूं. म्यूझिका मेरी बेटी हैं लेकिन थोड़ी पागल हैं. ऊस से बचकर रहना. "
लेकिन ऊस ने मेरी बात का भागाकार करते हुए कहां था :
" जाओ जाओ तुम मेरे बारे मै ऐसा नहीं कह सकते. "
" क्या तुम्हे मुझ पर इतना भरोसा हैं? "
" हा मुझ से भी बढ़कर! "
मैंने ऊस के सामने घुटने टेक दिये थे
मुझे नाख़ून चबाने क़ी बुरी आदत थी जिसे मै छोड़ नहीं सकता था.
एक बार ऊस ने मुझे नाख़ून चबाते हुए देख लिया था. वह मुझ पर भड़क गई थी.
" छी! छोटे बच्चे क़ी तरह नाख़ून चबाते हो.
ऊस क़ी आवाज मै मानो एक दादी मा क़ी डांट थी.
और उसी दिन से मेरी यह आदत छूट गई थी.
दो महिने के बाद मैंने अपने दोनों हाथो क़ी ऊँगली उसे दिखाई थी. देखकर वह खुश हो गई थी. ऊस ने सवाल भी किया था.:
" यह कैसे हो गया? "
" बस एक दादी मा क़ी वजह से."
" कौन हैं तुम्हारी दादी मा? "
पहले मैं उसे बताना नहीं चाहता था, थोड़ा तंग करना चाहता था, लेकिन ऊस के चेहरे क़ी मासूमियत ने मुझे रोक लिया था, और मुझे बताना पडा था.
" तुम्हारे बिना दूसरी कौन हो सकती है? "
" आप मुझे इतना मानते हो? "
" हा सब से ज़्यादा! "
ऊस के जाने के बाद मैं अकेला हो गया था. ऊस वक़्त म्यूझिका क़ी यादें मुझे बहलाती थी..
मैं एक पल भी उसे दिल से निकाल नहीं पाया था.
00000000 ( क्रमशः)
: प्रकरण- 19 :
मुझे ज्योतिष ने यह भी बताया था, मैं किसी के हाथ नीचे काम नहीं कर पाउँगा.. इस बात का मुझे कदम कदम पर एहसास हुआ था, जो प्रेम सन के राम कुमार ने करवाया था.
ऊस के साथ काम करने से मुझे काफ़ी तकलीफ हुई थी और उन क़ी ही ओफिस में किसी की सिफारिश से मुझे उन के ही किसी हरीफ क़ी कंपनी में काम मिला था.
यह जानकर राम कुमार वहाँ दौड़ा आया था. ऊस ने कंपनी के डायरेक्टर को भड़काया था.
" यह आदमी यूनियन का आदमी है. ऊस से बचकर रहना. "
मेरे इमीडिएट बोस ने मुझे बताया था.
उन क़ी यह हरकत ने मुझे उकसाया था..
और कंपनी के सारे काले धंदो को यादी एक जुट कर के मैंने एक लेख के जरिये लोगो के सामने रखी