यादों की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई Ramesh Desai द्वारा फिक्शन कहानी में हिंदी पीडीएफ

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यादों की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई

                     : प्रकरण - 15 :

घर पहुंचते ही मैंने परमेश्वर क़ो पूछा था.

" ठीक से घर पहुंच गये ना? "

" हा! संभव भैया? और आप?? "

" हम भी. "

थकान तो बहुत महसूस हो रही थी लेकिन कीसी और परमेश्वर की यादों ने सारी थकान मिटा दी थी.

सुबह समय पर उठकर ऑफिस जाने के तैयार हो गया था. रोज की 9-35 की गाड़ी पकड कर 10-10 के आसपास चर्च गेट स्टेशन पऱ उतरा था.

और रोज की तरह कीसी का OCM बैनर के नीचे ऊस का इंतजार कर के खड़ा रह गया था . करीब करीब 10 मिनिट राह देखकर मैं बस स्टोप की ओर अकेला ही चल पडा था.

तब यह ख्याल आया था. शायद कीसी थक गई होगी. इस लिये शायद वह नहीं आयेगी.

दो मिनिट में मैं बस स्टोप पहुंच गया था..एक साथ दो बसें ख़डी थी. मुझे पिछली बस मे चढने क़ो मिल गया था.

दोनों बसें आगे जाकर सिग्नल पर रुक गई थी. ऊस वक़्त मेरी नजर दूसरी बस मे ख़डी ' कीसी ' पर पड़ी थी. आज कैसे भगवान ने हमें नहीं मिलाया? मेरे दिमाग़ मे सवाल हुआ था.

बस से उतरकर ओफिस जाते हुए हम दोनों मिल गये थे. हम लोग क्यों नहीं मिल पाये? यह बड़ा राज था, या कोई ईश्वरी संकेत था.

जो भी हो लेकिन एक बात साफ थी. हम दोनोंने कोई चूक नहीं की थी . फिर भी ऐसा क्यों हुआ था? ऊस मे कोई भगवान का निर्देश होने का संदेह हुआ था.

ऑफिस में दाखिल होते ही वॉचमैन और ड्राईवर ने हमें ' गुड मोर्निंग ' और जयश्रीकृष्ण विश करके हमारा स्वागत किया था. और हम लोग फ्रेश हो गये थे.

मेरा और ' कीसी ' का परिवार साथ में पिकनिक गया था, यह जानकर ओफिस में सब क़ो मिर्ची लगी थी..

हमारे रिश्ते क़ो लेकर किशन और काजल अक्सर गंदी कमैंट्स पास किया करते थे.

काजल कहती थी : " दिन क़ो सिस्टर रात क़ो बिस्तर. "

ऊस क़ो किशन अपने शब्दों में उस की पूर्ति करता था.

" दिन क़ो दीदी, रात को बीवी. "

ऑफिस में हर कोई कुछ ना कुछ बकवास करता था. ऊस सब में रायजी ऊपर था. जो सब पर नजर रखता था, सभी जानकारी जमा करता था. वह एक न्यूज़ पेपर की प्रत जैसा था.

वह बाहर बैठे शेठ लोगो की बुराई करता था और अंदर जाकर स्टाफ की बुराई करता था और अतिरिक्त पैसे इकट्ठे करता था.

पूरा दिन शुष्क साबित हुआ था. ऊस दिन हम दोनों टिफ़िन लेकर नहीं गये थे. मैं ' कीसी' क़ो बाहर खाने ले गया था. यह जानकर ओफिस मे अफवाह का पूरा बाजार मानो खुल गया था.

काजल ने तो हमारे रिश्ते के बारे में कमेंट कर के उस का अवमूल्यांकन किया था.

" दिन को सिस्टर, रात को बिस्तर. "

किशन ने इसी बात को अपने शब्दों में दोहराया था.

" दिन को दीदी, रात को बीवी.. "

मजेदार बात तो यह थी काजल का एक दूसरे लडके साथ हमारे जैसा ही रिश्ता था. लेकिन ऊस ने ऐसा कभी नहीं सोचा था. कोई उन के बारे में भी ऐसी घटिया बातें सोच सकता हैं.

एक बार मैंने उस से पेन मांगी थी. तो उस ने बिंदास्त कहां था.

" बहन भी चाहिये तो वह भी मिलेंगी. "

अब ऊस का क्या मतलब होता सकता था? . शायद उसे मालूम नहीं था . एक बहन ऊस के लिये रात को बीवी थी. या ने वह द्विमुखी भूमिका निभाने को तैयार थी!!

किशन ने भी मुझे पूछा था : " तुम फ्लोरा मैडम के साथ आते जाते हो यह बात बीवी को मालूम हैं?

उस ने ऐसा सवाल किया था. और मैंने उस का मुंह तोड़ते हुए सुना दिया था.

" वह मेरे लिये क्या हैं? वह मेरी बीवी अच्छी तरह जानती हैं. मुझे उस के बारे में किसी क़ो सफाई देने की आवश्यकता नहीं हैं.. "

और ऊस का चेहरा देखने लायक हो गया था.

एक दिन शाम को कीसी ने मुझे बताया था:

" संभव भैया! मेरा एक पायल कहीं खो गया हैं. परमेश्वर ने अपनी बचत से यह पायल मेरे लिये ख़रीदे थे. खो जाने की खबर सुनकर ऊसे बहुत दुःख होगा. मैं पायल रिप्लेस करना चाहती हूं. "

" ओ के तुम ऊस दुकान को जानती हो जहाँ से यह पायल ख़रीदे गये थे..? "

" हा वह मुझे साथ ले गया था. आप मेरे साथ चलेंगे? "

" क्यों नहीं मेरी बहना? "

और हम दोनों बस में दुकान पहुंच गये थे.

शाम का वक़्त था. दुकान में भीड़ थी. हमें थोड़ा रुकना पडा था.

दस मिनिट में हमारा टर्न आया था. सेल्समेन ने कीसी को पूछा था.

" क्या चाहिये, मैडम? "

कीसी ने अपनी हैंड बैग से पायल निकालकर उसे दिखाकर पूछा था!

" क्या ऐसा पायल मिलेगा? "

सेल्समेन मैन पायल लेकर गोडाउन में गया था. कुछ देर में वह दो पायल लेकर बाहर आया था.

कीसी तो पहचान भी नहीं सकी कौन सा अपना था, कौन सा नया?

पायल हाथ में लेकर ऊस ने नीचे बैठकर पहनने की कोशिश की थी , लेकिन वह पहन ना पाई तो मैंने उसे मदद की थी.

उसी वक़्त ना जाने कहाँ से रायजी एक साप की तरह अपने दर से बाहर निकल आया था. ऊस ने आते ही हमें कहां था:

" तुम लोग टेक्सी में आ रहे थे तो मुझे बोलना था मैं भी साथ आ जाता. मेरा लड़का भी यहाँ काम करता हैं, तुम्हे डिस्काउंट भी मिल जाता. "

हमें पहले तो ऊस की एक बात पर गुस्सा आ गया था हम लोग तो टेक्सी में नहीं आये थे. फिर ऊस ने ऐसे कैसा कयों कहां था?

" तुम लोग टेक्सी में आ रहे थे तो मुझे बोलना था ना मैं भी साथ आ जाता. "

यह ऊस के विचित्र स्वभाव का नमूना था., एक पक्का सबूत था.

हमें तो यह आदमी इतना चिप और गया गुजरा लगता था, हम उस से ओफिस में बात करने को काबिल नहीं मानते थे. फिर भी वह दुकान में बहुत कुछ पूछने लग गया था.

हम लोग बिना कुछ बताये दुकान से बाहर निकल आये थे. तो वह भी हमारे पीछे बाहर आया था. और दीवार पर पान की पिचकारी मारकर सवाल किया था .

" अब कहाँ जाओगे? "

हम बिना कुछ बताये टेक्सी में बैठकर चर्नी रोड पहुंच गये थे .

रायजी सोचता था हम लोग होटल में जायेंगे.. वह किशन और काजल का बाप था.

टेक्सी चर्नी रोड स्टेशन पहुंच गई थी. हम लोग सीढ़ी चढ़कर प्लेट फॉर्म नंबर एक पर पहुंच गये औऱ ' कीसी' को लेडीज कम्पार्टमेंट में चढ़ाकर मैं बाजु के जेंट्स कम्पार्टमेंट में चढ़ गया था. .

                     000000000 ( क्रमशः )